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राजनीति: क्‍वाड की रणनीति में चीन

चीन का समुद्री विस्तारवाद हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डों को भविष्य में चुनौती देगा। एशिया में अमेरिका के अपने हित हैं। इन्हें साधने के लिए ही वह जापान और भारत के साथ मजबूत गठजोड़ चाहता है। चूंकि दोनों देशों का चीन से पुराना विवाद है, इसलिए अमेरिका को गठजोड़ बनाने में कोई दिक्कत नहीं है।

चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए क्‍वाड अब तेजी से बढ़ेगा और अरब सागर में सैन्‍य अभ्‍यास बढ़ाएगा। (फोटो सोर्स सोशल मीडिया)

चीन की घेरेबंदी के लिए चार देशों- अमेरिका, जापान, भारत और आस्ट्रेलिया का समूह ‘क्वाड’ सक्रिय है। क्वाड की अवधारणा पर विचार-विमर्श लगभग डेढ़ दशक पहले शुरू हुआ था। लेकिन इसकी सक्रियता अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में बढ़ी। इसी महीने टोक्यो में क्वाड के सदस्य देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक के संकेत साफ थे कि चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए क्वाड अब तेजी से बढ़ेगा।

वैसे क्वाड की जरूरत 2004 की सुनामी ने महसूस करवाई थी। तब एशिया-प्रशांत क्षेत्र में आपसी सहयोग के लिए अमेरिका, भारत, जापान और आस्ट्रेलिया ने नए सहयोग संगठन पर विचार विमर्श शुरू किया था। उस समय इसके गठन में अहम भूमिका जापान के पूर्व प्रधानमंत्री शिंजो आबे की थी। शुरुआत में भारत ने ज्यादा सक्रियता नहीं दिखाई। अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद क्वाड की सक्रियता बढ़ी, खासतौर से 2017 के बाद। अब तो क्वाड को एक सैन्य संधि का रूप देने की दिशा में कदम बढ़ाए जा रहे हैं।

क्वाड सदस्य देश अरब सागर में सैन्य अभ्यास में भाग लेने की तैयारी में हैं। इस सैन्य अभ्यास की खबर ने क्वाड सैन्य संधि की चर्चा बढ़ा दी है। टोक्यो में क्वाड विदेश मंत्रियों की बैठक और उसके बाद मालबार सैन्य अभ्यास में आस्ट्रेलिया के शामिल होने की खबर से चीन की नींद उड़ गई है। चीन ने इसे अपने खिलाफ गोलबंदी करार दिया है।

क्वाड की सक्रियता के तात्कालिक कारणों पर गौर करना होगा। पिछले कुछ सालों से अमेरिका और चीन के बीच व्यापार युद्ध चरम पर है। कोरोना महामारी को लेकर अमेरिका ने चीन के खिलाफ हमलावर रुख अपना रखा है। इधर, भारत और चीन के बीच पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर भारी तनाव है। जापान और चीन का पुराना विवाद है ही और दक्षिण चीन सागर में चीन की बढ़ती सैन्य गतिविधियों को लेकर वह सतर्क है। इन हालात ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र में क्वाड की सक्रियता को बढ़ाया है।

अब तो इस संगठन को एशियाई नाटो में तब्दील करने पर भी जोर दिया जा रहा है। लेकिन अहम सवाल यह है कि क्वाड को लेकर एशिया और प्रशांत क्षेत्र के अन्य देशों का सोचना क्या है?इसमें कोई संदेह नहीं कि क्वाड के सदस्य देशों के हित चीन से टकरा रहे हैं। ऐसे में अन्य एशियाई देशों ने इस नए टकराव का लाभ उठाने के लिए रणनीति बनानी शुरू कर दी है। कई एशियाई देश क्वाड की सक्रियता से खुश हैं।

ये वे देश हैं जो चीन का खुल कर विरोध करने से डरते हैं और चीनी निवेश के जाल में फंसे हैं। ऐसी स्थिति में एशिया और प्रशांत इलाके में क्वाड की सक्रियता इन छोटे देशों का महत्त्व बढ़ाएगी। बेल्ट एंड रोड पहल में शामिल एशियाई देश चीन को क्वाड का भय दिखा कर लाभ उठाने की कोशिश करेंगे। आसियान के कुछ सदस्य देशों का चीन से टकराव है। लेकिन ये देश चीन से सीधा टकराव नहीं लेने से बचते रहे हैं।

मेकांग नदी के पानी को लेकर आसियान के सदस्य देशों- थाईलैंड, लाओस और वियतनाम का चीन से विवाद है। दक्षिण चीन सागर में चीन लगातार वियतनाम को धमका रहा है। इन देशों को अब लग रहा है कि क्वाड की सक्रियता के कारण उनका महत्व बढ़ेगा और चीन से वे बेहतर तरीके से बराबरी के स्तर पर बातचीत करने की स्थिति में आ सकेंगे।

पूर्वी लद्दाख में चीन ने भारत के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। हिंद महासागर में भी चीन के विस्तारवादी कदम भारत के लिए चिंता का बड़ा कारण बने हुए हैं। नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका और पाकिस्तान में चीन की मजबूत स्थिति भी भारत के लिए कम गंभीर खतरा नहीं है। ऐसे में क्वाड की सक्रियता हिंद महासागर में चीन की गतिविधियों पर अंकुश लगाने में बड़ी भूमिका निभा सकती है।

क्वाड की सक्रियता का असर दिखने भी लगा है। बांग्लादेश के सोनाडिया बंदरगाह को विकसित करने का ठेका हासिल करने में चीन विफल हो गया है, क्योंकि बांग्लादेश ने इस द्वीप पर बंदरगाह विकसित करने की योजना ही रद्द कर दी है। अब बांग्लादेश जापान के सहयोग से मातरबारी में बंदरगाह बनाएगा। बांग्लादेश का यह फैसला साफ संकेत दे रहा है कि वह एशियाई भू-राजनीति में संतुलन की कूटनीति पर काम करेगा।

बांग्लादेश चीन की कीमत पर कम से कम जापान और अमेरिका को नाराज नहीं करने वाला, क्योंकि जापान की लगभग तीन सौ कंपनियां बांग्लादेश में निवेश कर चुकी हैं। वहीं बांग्लादेश और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय व्यापार बढ़ रहा है। बांग्लादेशी से होने वाले आयात में अमेरिका की हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है। हालांकि क्वाड के सदस्य देश चीन के विस्तारवाद को रोकने का प्रयास अपने स्तर पर पहले से ही करते रहे हैं।

जापान अपनी सैन्य ताकत चीन के डर से ही बढ़ा रहा है। इसके लिए वह अपने दो पोतों को विमानवाहक बेड़े में तब्दील कर रहा है। अमेरिका ने चीन को आर्थिक रूप से नुकसान पहुंचाने के लिए व्यापार युद्ध पहले ही छेड़ रखा है। भारत अपने तरीके से चीन की सैन्य घुसपैठ को रोक रहा है। चीन का समुद्री विस्तारवाद हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डों को भविष्य में चुनौती देगा। एशिया में अमेरिका के अपने हित हैं।

इन्हें साधने के लिए ही वह जापान और भारत के साथ मजबूत गठजोड़ चाहता है। चूंकि दोनों देशों का चीन से पुराना विवाद है, इसलिए अमेरिका को गठजोड़ बनाने में कोई दिक्कत नहीं है। हालांकि चीन के खिलाफ गठजोड़ को कारगर बनाने के लिए कुछ और एशियाई लोकतांत्रिक देशों का साथ जरूरी है। अमेरिका को जापान और भारत के अलावा ताइवान और दक्षिण कोरिया को साथ लेना होगा। ताइवान और दक्षिण कोरिया का भी चीन के साथ विवाद है। लेकिन यहां भी समस्या है। चीन के घोर विरोधी ताईवान के कूटनीतिक संबंध क्वाड के सदस्य देशों के साथ नहीं हैं। वहीं, दक्षिण कोरिया और जापान के बीच पुराने मतभेद हैं।

क्वाड में सक्रिय और अग्रणी भूमिका के बाद भारत पर अमेरिकी गुट में शामिल होने के आरोप लगने शुरू हो गए हैं। क्वाड को लेकर रूस और ईरान जैसे देश संवेदनशील हैं। ईरान और अमेरिका के बीच लंबे समय से तनाव बना हुआ है। जबकि रूस एशियाई भू-राजनीति में अमेरिका का घोर विरोधी है। पश्चिम एशिया से लेकर मध्य एशिया तक रूस ने अमेरिका विरोधी अभियान जारी रखा हुआ है।

ईरान और रूस जैसे देश समुद्री क्षेत्र में क्वाड की सक्रियता को संदेह की नजर से देख रहे हैं। रूस को यह डर है कि क्वाड और मालाबार सैन्य अभ्यास भविष्य में भारत के हथियार बाजार में उसे नुकसान पहुंचा सकता है। साथ ही उसे यह आशंका भी है कि क्वाड की आड़ में अमेरिका भारत में खरीदे जाने वाले हथियारों और अन्य रक्षा उत्पादों में अपनी हिस्सेदारी बढाने की कोशिश करेगा। जापान पहले से ही अमेरिकी रक्षा उत्पादों का इस्तेमाल कर रहा है।

भारत ने अमेरिका के विरोध के बावजूद रूस से एस-400 मिसाइल खरीदने का फैसला लिया। फ्रांस से राफेल खरीदे हैं। चूंकि अमेरिका को पता है कि आने वाले समय में भारतीय सेना को सैन्य उपकरणों और हथियारों की जरूरत में बढ़ोतरी होगी, इसलिए अमेरिका की नजर भारत की रक्षा संबंधी खरीद पर है। ऐसे में भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती क्वाड में रहते हुए रूस के साथ भी संतुलन बनाने की है।

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