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राजनीतिः बढ़ती गरमी से संकट में धरती

पिछले अनेक वर्षों में जिस तरह से क्योटो प्रोटोकॉल की धज्जियां उड़ा़ई गई हैं, उसने भी हालात को और भयावह बना दिया है। विकसित देश किसी भी हालत में बराबरी का सिद्धांत अपनाने से परहेज करते हैं। जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र संधि की रूपरेखा तैयार करते समय समानुपातिक सिद्धांत को मंजूरी दी गई थी। इस सिद्धांत के अनुसार अधिक ग्रीनहाउस गैसों को पैदा करने वाले विकसित देशों को उत्सर्जन में कटौती की जिम्मेदारी भी ज्यादा उठानी चाहिए।

Author Published on: October 17, 2018 2:24 AM
पिछले दिनों विश्व बैंक ने भी चेतावनी दी थी कि यदि जलवायु परिवर्तन पर समय रहते काबू नहीं पाया गया तो दुनिया से गरीबी कभी खत्म नहीं होगी।

हाल में संयुक्त राष्ट्र की संस्था इंटर गवर्मेंटल पैनल ऑफ क्लाइमेट चेंज (आइपीसीसी) ने इस बात पर गंभीर चिंता जताई है कि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में तेजी से व्यापक कटौती नहीं की गई तो अगले दस साल में धरती का औसत तापमान डेढ़ डिग्री तक बढ़ सकता है। भारतीय उपमहाद्वीप में भी इसके भयानक परिणाम देखने को मिलेंगे। दक्षिण कोरिया के इंचियोन में जलवायु संकट पर जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि दो डिग्री से ज्यादा तापमान बढ़ने पर हमें गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। दरअसल, पिछले कुछ वर्षों में धरती की सतह का तापमान लगभग एक डिग्री तक बढ़ चुका है। इसका असर यह हुआ है कि दुनिया के ज्यादातर हिस्से तूफान, बाढ़ और सूखे की मार झेल रहे हैं और समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है। भविष्य में धरती का तापमान तीन से चार डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है। अगर हम तापमान को दो डिग्री के बजाय डेढ़ डिग्री सेल्सियस तक रोक लेते हैं तो 2050 तक जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणामों से काफी हद तक बचा जा सकता है। इस साल दिसंबर में जलवायु संकट पर पोलैंड में होने वाली बैठक में आइपीसीसी की इस रिपोर्ट पर चर्चा होनी है।

आइपीसीसी की इस रिपोर्ट से इतर दस अक्तूबर को प्राकृतिक आपदाओं पर एक रिपोर्ट जारी हुई। संयुक्त राष्ट्र की ‘आर्थिक नुकसान, गरीबी और आपदा : 1998-2017’ शीर्षक से जारी इस रिपोर्ट में सबसे ज्यादा नुकसान वाले देशों में भारत चौथे और अमेरिका पहले नंबर पर है। रिपोर्ट के मुताबिक 1998 से 2017 के बीच भारत में प्राकृतिक आपदाओं से प्रत्यक्ष आर्थिक नुकसान में 151 फीसद की बढ़ोतरी हुई है। इस दौरान वैश्विक अर्थव्यवस्था को 2908 अरब डॉलर का नुकसान पहुंचा है। यह पिछले दो दशक में हुए कुल नुकसान से दोगुना है। सवाल यह है कि क्या खोखले आदर्शवाद से जलवायु परिवर्तन का मुद्दा हल हो सकता है? जब विकसित देश एक ही लीक पर चलते हुए केवल अपने स्वार्थों को तरजीह देने लगें तो जलवायु परिवर्तन पर उनकी बड़ी-बड़ी बातें बेमानी लगने लगती हैं।

दरअसल, उन्नत भौतिक अवसंरचना जलवायु परिवर्तन के विभिन्न खतरों जैसे बाढ़, खराब मौसम, तटीय कटाव आदि से कुछ हद तक ही रक्षा कर सकती है। ज्यादातर विकासशील देशों में जलवायु परिवर्तन के प्रति सफलतापूर्वक अनुकूलन के लिए आर्थिक एवं प्रौद्योगिकीय स्रोतों का अभाव है। यह स्थिति इन देशों में उस भौतिक अवसंरचना के निर्माण की क्षमता में बाधा प्रतीत होती है जो बाढ़, खराब मौसम का सामना करने और खेती-बाड़ी की नई तकनीक अपनाने के लिए जरूरी है। विभिन्न तौर-तरीकों से जलवायु परिवर्तन के खतरों को नियंत्रित किया जा सकता है। इनमें ऊर्जा प्रयोग की उन्नत क्षमता, वनों को काटने पर नियंत्रण और जीवाश्म र्इंधन का कम से कम इस्तेमाल जैसे कारक प्रमुख हैं। यह सर्वविदित है कि औद्योगिक देशों द्वारा ज्यादा मात्रा में जीवाश्म र्इंधन प्रयोग करने के कारण वातावरण में ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन भी अधिक हो रहा है। ये देश अपेक्षाकृत सस्ते जीवाश्म र्इंधन का लाभ उठा कर अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करते हुए अपना जीवन स्तर ऊपर उठा रहे हैं।

विकसित देशों (जिनमें अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और पश्चिमी यूरोपीय देश शामिल हैं) की जनसंख्या विश्व की कुल जनसंख्या की बाईस फीसद है, जबकि वे अट्ठासी फीसद प्राकृतिक संसाधनों और तिहत्तर फीसद ऊर्जा का इस्तेमाल करते हैं। साथ ही विश्व की पिच्यासी फीसद आय पर उनका नियंत्रण है। दूसरी ओर, विकासशील देशों की जनसंख्या विश्व की जनसंख्या की अठहत्तर फीसद है, जबकि वे मात्र बारह फीसद प्राकृतिक संसाधनों और सत्ताईस फीसद ऊर्जा का इस्तेमाल करते हैं। उनकी आय विश्व की आय की सिर्फ पंद्रह फीसद है। इन सभी आंकड़ों से स्पष्ट हो जाता है कि विकसित देश कम जनसंख्या होने के बावजूद प्राकृतिक संसाधनों का अधिक इस्तेमाल कर अधिक प्रदूषण फैला रहे हैं। इसलिए उत्सर्जन कम करने की जिम्मेदारी भी उन्हें ही उठानी चाहिए। विकासशील देश अभी अनेक स्तरों पर संघर्ष कर रहे हैं। उनके पास अभी उन्नत तकनीक भी नहीं है। यही कारण है कि इन देशों में भी प्रदूषण लगातार बढ़ रहा है। इसलिए विकसित देशों की यह जिम्मेदारी बनती है कि वे विकासशील देशों की अनेक स्तरों पर सहायता करें ताकि वे अपने यहां प्रदूषण नियंत्रित कर सकें।

इस दौर में यह बात किसी से छिपी नहीं है कि यदि ग्रीन हाउस गैसों की वृ़द्धि इसी तरह जारी रही तो दुनिया को लू, सूखे, बाढ़ और समुद्री तूफान जैसी प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पड़ेगा। कुपोषण, पेचिश, दिल की बीमारियां और श्वसन संबंधी रोगों में इजाफा होगा। बाढ़ और मच्छरों के पनपने से हैजा और मलेरिया जैसी बीमारियां बढ़ेंगी। तटीय इलाकों पर अस्तित्व का संकट पैदा हो जाएगा और अनेक पारिस्थितिक तंत्र, जंतु एवं वनस्पतियां विलुप्त हो जाएंगी। तीस फीसद एशियाई प्रवाल भित्ती, जो कि समुद्री जीवन का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है, अगले तीस सालों में समाप्त हो जाएगी। वातावरण में कार्बन डाई आक्साइड की मात्रा बढ़ने से समुद्र के अम्लीकरण की प्रक्रिया लगातार बढ़ती चली जाएगी, जिससे खोल या कवच का निर्माण करने वाले प्रवाल या मूंगा जैसे समुद्रीय जीवों और इन पर निर्भर रहने वाले अन्य जीवों के समक्ष अस्तित्व का संकट हो जाएगा।

धरती का तापमान बढ़ने के कारण ही अंटार्कटिका और ग्रीनलैंड के बाद विश्व में बर्फ के तीसरे सबसे बड़े भंडार माने जाने वाले कनाडा के ग्लेशियरों पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। अगर यही हाल रहा तो इन ग्लशियरों के पिघलने से दुनियाभर के समुद्रों का जलस्तर बढ़ सकता है। पिछले दिनों ‘जियो-फिजिकल रिसर्च लेटर्स’ नामक शोध-पत्रिका में प्रकाशित एक आलेख में नीदरलैंड और अमेरिका के वैज्ञानिकों ने दावा किया था कि जलवायु परिवर्तन की तीव्रता को देखते हुए इन ग्लेशियरों के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लगना तय है। वैज्ञानिकों के अनुसार इस सदी के अंत तक इन ग्लेशियरों के पिघलने से समुद्रों का जलस्तर दो सेंटीमीटर तक बढ़ जाएगा। इस सदी के अंत तक जलस्तर में कुल मिला कर 18 से 59 सेंटीमीटर की वृद्धि होगी।

पिछले अनेक वर्षों में जिस तरह से क्योटो प्रोटोकॉल की धज्जियां उड़ा़ई गई हैं, उसने भी हालात को और भयावह बना दिया है। विकसित देश किसी भी हालत में बराबरी का सिद्धांत अपनाने से परहेज करते हैं। जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र संधि की रूपरेखा तैयार करते समय समानुपातिक सिद्धांत को मंजूरी दी गई थी। इस सिद्धांत के अनुसार अधिक ग्रीनहाउस गैसों को पैदा करने वाले विकसित देशों को उत्सर्जन में कटौती की जिम्मेदारी भी ज्यादा उठानी चाहिए। लेकिन यह विडंबना ही है कि इस सिद्धांत को न अपनाने के लिए विकसित देशों द्वारा तरह-तरह के बहाने ढूंढ़ लिए जाते हैं। दरअसल, ऐसे विकासशील देश जो लगातार विकास के मार्ग पर आगे बढ़ रहे हैं, वे निश्चित रूप से पहले से ज्यादा कार्बन उत्सर्जन कर रहे हैं। लेकिन इसके बावजूद इन देशों को विकसित देशों के समकक्ष नहीं रखा जा सकता, क्योंकि वे अभी विकसित होने की प्रक्रिया में हैं। समस्या यह है कि विकसित देश उत्सर्जन कटौती की जिम्मेदारी से बचकर यह जिम्मेदारी विकासशील देशों पर थोपना चाहते हैं।

पिछले दिनों विश्व बैंक ने भी चेतावनी दी थी कि यदि जलवायु परिवर्तन पर समय रहते काबू नहीं पाया गया तो दुनिया से गरीबी कभी खत्म नहीं होगी। दुनिया की अर्थव्यवस्था पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के संबंध में जारी रिपोर्ट में कहा गया था कि औद्योगिक प्रदूषण के कारण इस शताब्दी के अंत तक धरती का तापमान लगातार बढ़ता जाएगा जिससे भीषण गर्मी के साथ ही वैश्विक खाद्यान्न उत्पादन में भारी गिरावट आएगी। इस रिपोर्ट में पर्यावरण प्रदूषण के कारण तापमान में वृद्धि के लिए मानवीय गतिविधियों को सबसे ज्यादा जिम्मेदार ठहराया गया था। हमें यह समझना होगा कि जब तक विकसित देश खोखले आदशर्वाद की परिधि से बाहर नहीं आएंगे, तब तक जलवायु परिवर्तन के किसी भी मुद्दे पर कोई एक राय नहीं बन पाएगी।

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