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राजनीतिः विवशताओं के बीच ग्राम पंचायतें

विकेंद्रित रणनीति के जरिए ही कोरोना को हराया जा सकता है। इसके लिए ग्राम पंचायतों में रणनीति बनाने की क्षमता बढ़ाना आवश्यक है। खुद पंचायतों को भी ऐसे नवाचार और पहल करनी चाहिए, जिससे वे राज्य सरकारों की खबरी बने रहने के बजाय अपने से ग्राम सभाओं में नियोजन और कार्यान्वन के लिए इस दीर्घावधि दिख रहे कोरोना काल के लिए अपेक्षित धन, सहूलियतें और कर्मचारियों को जुटा सकें।

सरकारी कर्मचारी, जिनमें शिक्षक और अन्य पेशेवर भी हैं, पंचायतों के अधीन काम नहीं करना चाहते।

वीरेंद्र कुमार पैन्यूली

पिछले महीने पंचायत पदाधिकारियों से बातचीत में प्रधानमंत्री ने लौटते प्रवासियों के कारण गांवों में कोरोना संक्रमण के संभावित प्रसार को रोकने में सावधानी बरतने का सुझाव दिया था। तब तक ग्रामीण क्षेत्रों में औद्योगिक और कृषि गतिविधियां शुरू करना तय हो चुका था। इन दोनों गतिविधियों के संदर्भ में भी गांवों में कोरोना संक्रमण रोकथाम आवश्यक था। स्वाभाविक रूप से औद्योगिक क्षेत्रों, नजदीकी बाजारों और मंडियों में बंदी हटने से गांवों में भीतरी और बाहरी लोगों का आवागमन बढ़ना था। इसलिए गांवों में कोरोना संबंधी दिशा-निदेर्शों के पालन की आवश्यकता थी। पर इनका अनुपालन ग्राम पंचायतों के नेतृत्व में ही होना वांछित है। आखिरकार ग्राम पंचायतें ग्राम सरकार हैं। पर ऐसे में जब ग्राम पंचायतों और उनके पदाधिकारियों को कोरोना योद्धा का सम्मान दिया जाना था, गांव पंचायतों में पर्याप्त धन, कार्याधिकार और कर्मचारियों को आपात स्थिति प्रबंधन के लिए तुरंत पहुंचाया जाना था, उसके बजाय लगभग सभी राज्य सरकारों को संक्रमण संबंधी निगरानी के लिए ग्राम पंचायतों पर हावी होकर काम करवाना आसान लगा। जबकि यह तिहत्तरवें संविधान संशोधन और विभागीय विषयों और कामकाजों में पंचायतों को संवैधानिक मान्यता दिए जाने के बाद नैतिक नहीं है।

पंचायती राज संस्थाओं की अवहेलना पहले भी होती रही है। जिला योजनाएं, जिन्हें नीचे से आए सुझावों के बाद प्रस्तावित और पारित किया जाना होता है उन पर और तत्संबंधी बजट पर प्रभारी मंत्री और जिलाधिकारी कलम चलाते रहे हैं। राज्य सरकारें समय पर पंचायती राज चुनावों को टालती रही हैं। उसी मनोवृत्ति से आज भी जब पंचायतों के पास पंद्रह दिनों तक प्रवासियों को खिलाने, रखने के लिए बजट नहीं है और न पंचायतों के पास इतना धन है कि पहले वे खर्चा करें, बाद में वापसी भुगतान के लिए बिल पेश करें, राज्य सरकारें बिना अग्रिम धन दिए उनसे प्रवासियों के एकांतवास, संपर्क सूत्र तलाश, निगरानी और रिपोर्टिंग जैसे काम कराना चाहती हैं।

बात सिर्फ धनाभाव की नहीं है। सरकारी कर्मचारी, जिनमें शिक्षक और अन्य पेशेवर भी हैं, पंचायतों के अधीन काम नहीं करना चाहते। वे पंचायतों को हीन भाव से देखते हैं। मुख्य सचिव, सचिव या जिलाधिकारी पंचायत कर्मियों को कोरोना संक्रमण से जुड़े मामलों में काम करने के आदेश दे रहे हैं। वे उनसे एक पुलिसिया खबरी के तौर पर भी काम लेना चाहते हैं, जो लुक-छिप कर आने वालों, अपने संपर्कों और यात्रा के विवरण न देने वालों, एकांतवास से भागने वालों की खबर प्रशासन को देते रहें। हिमाचल के मुख्य मंत्री ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से पंचायत प्रधानों को कहा कि वे गांवों में बाहर से आने वालों की सूचना दें तथा जिन घरों में लोगों को एकांतवास में रखा गया है उन घरों में निशान लगाएं और निगरानी करें, ताकि वे एकांतवास का उल्लंघन न करें। बिहार सरकार का भी आदेश है कि राज्यों और जिलों की सीमाओं को पार कर जो लोग लुक-छिप कर गांवों में पहुंच रहें हैं उनकी सूचना ग्राम पंचायतें उन्हे दें और फिर उन्हें एकांतवास में रखा जाए। छत्तीसगढ़, झारखंड, ओड़ीशा सब लगभग ऐसा ही निर्देश अपनी पंचायतों को दे रहे हैं।

चूंकि कोरोना से अब तक की पूरी लड़ाई में आपातकाल-सी स्थिति बना कर केंद्र और राज्य सरकारें तथा नौकरशाही जनता से अपने आदेशों-निदेर्शों का अनुपालन करवाती रही हैं, इसलिए ग्राम पंचायतों के संदर्भ में भी वे उन्हें ग्राम सरकार न मान कर राज्य सरकारों के आधीन अंग या कर्मचारी मान कर व्यवहार कर रहे हैं। अगली कतार के कर्मचारियों का व्यवहार भी कोई भिन्न नहीं रहा है। चोरी-छिपे आने वालों को आपदा प्रबंधन और महामारी नियंत्रण के नियमों के अंतर्गत यहां तक डर दिखाया जा रहा है कि उन पर अपनी यात्रा और संपर्कों आदि की सही जानकारी न देने पर हत्या के प्रयास जैसी धाराओं में मुकदमा दायर हो सकता है, इसलिए प्रधान को मुकदमेबाजी के परिप्रेक्ष्य में भी कानूनी खानापूरी करनी होगी।

एकांतवास केंद्रों में आत्महत्याओं, दुष्कर्मों और नशाखोरी जैसे कृत्य भी हो रहे हैं उसकी जवाबदेही प्रधानों के सिर पर अलग है। स्वास्थ्य सुविधाएं न होने के कारण एकांतवास केंद्रों में बीमारों की हालत बिगड़ने और मौतें भी प्रधान की परेशानी बढ़ा देती हैं। प्रधानों को दस्तावेजीकरण भी करना है- प्रवासी की पिछली यात्रा का इतिहास, उसके संपर्क में कौन आए आदि। जो मास्क नहीं पहन रहा है, जो खुले में थूक रहा है, जो गांव में सामाजिक दूरी का पालन नहीं कर रहा है, उस पर आपराधिक मामले दर्ज कराने लगे, तब तो वह निरंतर मुकदमेबाजी में रहेगा।

जहां तक संस्थागत या घर में एकांतवास में लौटते प्रवासियों को रखने का सवाल है, सालों से बंद, टूट-फूट या अन्य कारणों से जो घर रहने लायक नहीं हैं या जहां पर्याप्त जगह नहीं है, वहां पंचायतें कैसे एकांतवास नियमों का अनुपालन करवा पाएंगी। कई भ्रांतियों के चलते आम जन अपने नजदीक किसी को घर में एकांतवास में भी रखने का विरोध करते हैं। अब तो घरों में एकांतवास में रहते लोगों का विरोध करने के मामले इसलिए भी बढ़ सकते हैं, क्योंकि नए सरकारी दिशा-निदेर्शों के अनुसार जिन रोगियों में संक्रमण के लक्षण कम हैं, उन्हें अस्पतालों में भर्ती करने की जरूरत नहीं है।

अक्सर पंचायती भवनों और स्कूलों का उपयोग एकांतवास केंद्रों के तौर पर किया जा रहा है, उनमें पानी, बिजली और शौचालयों की बहुत खराब स्थिति है। शौचालयों की गंदगी में उनके उपयोग से भी लोग बचना चाहते हैं। गावों में पंचायतों में सफाईकर्मी न के बराबर हैं। स्कूलों में भी सामान्य समय में भी नियमित सफाईकर्मिर्यों की कमी रहती है। इस सत्य की भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि अब भी कतिपय क्षेत्रों में महिला प्रधानों और अन्य आरक्षित कोटे से जीते पंचायत प्रधानों या पदाधिकारियों को न तो अपेक्षित सम्मान मिलता है और न ही उनको स्वतंत्रता से काम करने दिया जाता है।

ऐसी स्थितियों के बीच ग्राम पंचायतों के माध्यम से कोरोना से लड़ाई में दबंग हावी हो सकते हैं। इस क्रम में एकांतवास तोड़ने या एकांतवास केंद्र अपने आसपास न चाहने वाले दबंगों का कोप भाजन भी बनना पड़ा है। महिला प्रधानों को अकेले ऐसी स्थितियों से निपटना आसान नहीं है। एकांतवास केंद्रों में दुष्कर्म, नशाखोरी के भी समाचार आए हैं। खुलेआम लोग घर-एकांतवास भी तोड़ते दिख रहे हैं। लोगों में आपसी मनमुटाव भी हो रहे हैं। पर्याप्त संसाधनों के अभाव में पंचायतों को लौटते प्रवासियों को एकांतवास करने की जिम्मेदारी देने को ज्यादातर लोग न्यायसंगत नहीं मानेंगे।

निस्संदेह ग्राम पंचायतों को अपनी-अपनी ग्राम सभाओं के प्रति तो जिम्मेदारी निभानी पड़ेगी। उपराष्ट्रपति वेंकया नायडू ने भी इस बार के पंचायती राज दिवस पर कहा था कि पंचायतों को अपनी जिम्मेदारी निर्वहन के लिए फंड, फंक्शन और फंक्शनरी दिए जाने चाहिए। यानी उन्हे धन मुहैया कराना चाहिए, उन्हें कार्य सौंपे जाने चाहिए और कर्मचारी, कार्यकर्ता दिए जाने चाहिए। जब गाम पंचायतों को काम सौंपा गया है, तो उन्हें उसके लिए धन भी दिया जाना चाहिए और उपयुक्त स्वास्थ्य और सुरक्षा कर्मचारी भी दिए जाने चाहिए। राज्य सरकारों को ग्राम पंचायतों से भी उनकी योजनाओं को जानने के लिए अनुरोध करना चाहिए, न कि उन्हें आदेशित-निर्देशित करना चाहिए।

स्पष्ट है कि विकेंद्र्रित रणनीति के जरिए ही कोरोना को हराया जा सकता है। इसके लिए ग्राम पंचायतों में रणनीति बनाने की क्षमता बढ़ाना आवश्यक है। खुद पंचायतों को भी ऐसे नवाचार और पहल करनी चाहिए, जिससे वे राज्य सरकारों की खबरी बने रहने के बजाय अपने से ग्राम सभाओं में नियोजन और कार्यान्वन के लिए इस दीर्घावधि दिख रहे कोरोना काल के लिए अपेक्षित धन, सहूलियतें और कर्मचारियों को जुटा सकें।

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