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राजनीति: निजीकरण नहीं है मर्ज की दवा

यह सवाल का उठना लाजिमी है कि अगर निजी बैंक कुशल हैं तो क्यों डूब गए या फिर क्यों सरकारी बैंकों में उनका विलय कर दिया गया? सवाल यह भी है कि अधिकांश उद्योगपति क्यों सरकारी बैंकों से कर्ज लेना पसंद करते हैं? क्यों निजी बैंक, ढांचागत परियोजनाओं को कर्ज देने से क्यों गुरेज करते हैं और ऐसा करने के लिए सरकारी बैंकों पर क्यों दबाव डाला जाता है?

Accidentally transferred money, Money, bank, money transfer, wrong account, account number, remitter, beneficiary, IFSC code, wrong details, banks, transaction, bank deposite slipबैंक में खड़े ग्राहक।

कोरोना महामारी के कारण सरकार सरकारी बैंकों के एकीकरण की जगह उनके निजीकरण पर विचार कर रही है। बैंक आॅफ इंडिया, सेंट्रल बैंक आॅफ इंडिया, इंडियन ओवरसीज बैंक, बैंक आॅफ महाराष्ट्र, पंजाब एंड सिंध बैंक और यूको बैंक का निजीकरण किए जाने का प्रस्ताव है। कैबिनेट की मंजूरी के बाद निजीकरण की दिशा में आगे बढ़ा जाएगा। सरकार इन बैंकों में अपनी हिस्सेदारी बेच कर राजस्व की कमी को पूरा करना चाहती है। दरअसल, कोरोना संकट की वजह से निर्धारित राजस्व लक्ष्य को हासिल करना सरकार के लिए टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। सरकार के आर्थिक राहत पैकेज से भी सरकारी खजाने पर प्रभाव पड़ा है। चालू वित्त वर्ष में भारत की जीडीपी में 10.6 फीसद तक की कमी आने की आशंका है।

पूंजी जुटाने के लिए सरकार बैंकों के अलावा बीमा कंपनियों के भी निजीकरण पर विचार कर रही है। अभी देश में आठ सरकारी बीमा कंपनियां हैं, जिनमें से सरकार छह बीमा कंपनियों का निजीकरण कर सकती है। निजीकरण के बाद भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआइसी) और एक गैर जीवन बीमा कंपनी ही सरकारी रह जाएंगे। देखा जाए तो सरकारी बैंकों के निजीकरण करने का प्रस्ताव कोई नई संकल्पना नहीं है। बैंकों के एकीकरण की संभावना पर अपना मंतव्य देने के लिए गठित कुछ सरकारी समितियां और भारतीय रिजर्व बैंक सरकारी बैंकों के निजीकरण के पक्ष में पहले ही इशारा कर चुके हैं। इसके अलावा, वर्तमान मुख्य आर्थिक सलाहकार कृष्णमूर्ति सुब्रमण्यम के अनुसार गैर-रणनीतिक क्षेत्रों में सभी सार्वजनिक उपक्रमों का निजीकरण किया जाएगा, लेकिन रणनीतिक क्षेत्रों में दो से पांच उपक्रमों को सरकार के अधीन रखा जाएगा, ताकि सरकार सामाजिक दायित्वों का निर्वहन कर सके। चूंकि, बैंक और बीमा क्षेत्र रणनीतिक क्षेत्र में आते हैं, इसलिए इन क्षेत्रों में सरकारी उपक्रमों की संख्या दो से पांच तक रह सकती है।

गौरतलब है कि सरकारी बैंकों के एकीकरण की प्रक्रिया इस साल अप्रैल में ही पूरी हुई है और इसके तहत ओरिएंटल बैंक आॅफ कामर्स और यूनाइटेड बैंक आॅफ इंडिया का विलय पंजाब नेशनल बैंक में, सिंडिकेट बैंक का केनरा बैंक में, आंध्रा बैंक और कॉरपोरेशन बैंक का यूनियन बैंक आॅफ इंडिया में और इलाहाबाद बैंक का इंडियन बैंक में विलय किया गया है। इससे पहले, एक अप्रैल 2019 को विजया बैंक और देना बैंक का बैंक आॅफ बड़ौदा में विलय किया गया था। एकीकरण की प्रक्रिया पूरी होने के बाद सात बड़े और पांच छोटे यानी बारह सरकारी बैंक बच गए हैं, जबकि वर्ष 2017 में सत्ताईस सरकारी बैंक थे।

सरकारी बैंकों की हालत को लेकर पिछले कुछ समय में जिस तरह की खबरें आई हैं, वे हैरान करने वाली हैं। कहा जा रहा है कि सरकारी बैंकों की भागीदारी तेजी से घट रही है और इसी तरह चलता रहा तो सरकारी बैंक जल्द ही बीएसएनएल और इंडियन एअरलाइंस के रास्ते पर जा सकते हैं। लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक यह बात सच नहीं है। अभी भी सरकारी बैंकों का बाजार में वर्चस्व बना हुआ है। परिसंपत्ति के मामले में भारतीय स्टेट बैंक देश का सबसे बड़ा बैंक है और इसकी बाजार हिस्सेदारी मार्च 2019 में 22.50 फीसद थी। विश्व के सौ शीर्ष बैंकों में भी भारत से केवल भारतीय स्टेट बैंक ही शामिल है। एकीकरण के बाद दूसरे स्थान पर पंजाब नेशनल बैंक और तीसरे स्थान पर बैंक आॅफ बड़ौदा काबिज हो गया है।

भारत में बैंकों की बिगड़ती हालत की सबसे बड़ी वजह बढ़ता एनपीए है। पिछले कई सालों से बैंक इस समस्या से जूझ रहे हैं, लेकिन कोई समाधान नहीं निकल पा रहा। कोरोना महामारी ने इस संकट को और बढ़ा दिया है। एक मोटे अनुमांन के मुताबिक फिलहाल बैंकों का एनपीए 9.35 लाख करोड़ रुपए है। एनपीए में भारी-भरकम वृद्धि के अनुमान की वजह से कोरोना महामारी के बाद सरकार को कमजोर बैंकों में लगभग बीस अरब डॉलर की राशि डालनी पड़ सकती है। दिसंबर, 2019 में भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी वित्तीय स्थायित्व रिपोर्ट में कहा गया था कि सितंबर 2020 तक भारतीय अनुसूचित व्यावसायिक बैंकों का एनपीए कुल कर्ज के 9.9 फीसद के स्तर पर पहुंच सकता है।

बैंकों को मजबूत बनाने के लिए उनके संचालन में पारदर्शिता लाने की जरूरत है। सरकार अक्सर सरकारी बैंकों की तुलना निजी बैंकों से करती है, लेकिन निजी बैंकों पर कभी सरकारी कामों का बोझ नहीं डाला जाता है। सरकारी कामों को करने के एवज में सरकारी बैंकों को कोई क्षतिपूर्ति भी नहीं दी जाती। सबसे जोखिमभरा तो कर्ज देने के लिए सरकार द्वारा असंभव लक्ष्य निर्धारित करना और बार-बार कर्ज माफी के रास्ते पर चलना है। सरकार विभिन्न क्षेत्रों को सरकारी बैंकों द्वारा एक निश्चित समय-सीमा के भीतर कर्ज देने का लक्ष्य निर्धारित करती है।

कम मानव संसाधन होने और लक्ष्य के बहुत ज्यादा बड़ा होने के कारण कर्ज प्रस्तावों की जरूरी जांच-परख बैंक ठीक से नहीं कर पाते हैं, और यही वजह है कि बाद में कर्ज एनपीए में तब्दील हो जाते हैं। वर्ष 1947 से 1969 तक भारत में कुल सात सौ छत्तीस निजी बैंक या तो असफल हो गए थे या फिर उनका दूसरे बैंकों में विलय कर दिया गया था। इसकी वजह से करोड़ों लोगों की जिंदगी भर की कमाई लुट गई थी। निजी बैंकों की नकारात्मक भूमिका को दृष्टिगत करते हुए ही वर्ष 1969 में निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया। वर्ष 1969 से वर्ष 2018 के बीच भी छत्तीस निजी बैंक डूब गए या उनका सरकारी बैंकों के साथ विलय कर दिया गया। इनमें सबसे प्रमुख था- ग्लोबल ट्रस्ट बैंक का ओरियंटल बैंक आॅफ कॉमर्स में विलय, क्योंकि इस विलय के बाद ओरियंटल बैंक आफ कॉमर्स के प्रदर्शन पर नकारात्मक असर पड़ा था।

हाल में आइडीबीआइ बैंक का निजीकरण किया गया है। फिर भी इसके प्रदर्शन में कोई सुधार नहीं दिखा है। इसलिए यह सवाल का उठना लाजिमी है कि अगर निजी बैंक कुशल हैं तो क्यों डूब गए या फिर क्यों सरकारी बैंकों में उनका विलय कर दिया गया? सवाल यह भी है कि अधिकांश उद्योगपति क्यों सरकारी बैंकों से कर्ज लेना पसंद करते हैं? क्यों निजी बैंक, ढांचागत परियोजनाओं को कर्ज देने से क्यों गुरेज करते हैं और ऐसा करने के लिए सरकारी बैंकों पर क्यों दबाव डाला जाता है?

इस वक्त देश के आर्थिक हालात किसी से छिपे नहीं हैं। ऐसे में शेयर बाजारों में उतार-चढ़ाव, बैंकों के एनपीए में बढ़ोतरी की संभावना और सरकार को अपने शेयरों की सही कीमत न मिलने की उम्मीद के कारण चालू वित्त वर्ष में सरकारी बैंकों के निजीकरण की संभावना काफी कम है। अभी चार सरकारी बैंक जैसे- इंडियन ओवरसीज बैंक, सेंट्रल बैंक आॅफ इंडिया, यूको बैंक और यूनाइटेड बैंक आॅफ इंडिया भारतीय रिजर्व बैंक की त्वरित सुधारात्मक कार्रवाई (पीसीए) फ्रेमवर्क के दायरे में हैं, जिसके कारण इन पर कर्ज बांटने समेत अनेक प्रकार की पाबंदियां लगी हुई हैं। इसलिए मौजूदा हालात कोई भी इन बैंकों में निवेश करने से गुरेज करेगा।

भले सरकार कुछ सरकारी बैंकों और बीमा कंपनियों के निजीकरण की बात कह रही है, लेकिन क्या निजीकरण से मौजूदा समस्याओं का समाधान संभव है? सरकार को निजीकरण से कुछ पैसे जरूर मिल सकते हैं, लेकिन कोरोना काल में क्या सरकार को अपने शेयरों की सही कीमत मिल पाएगी? सवाल यह भी है कि छह बैंकों के निजीकरण के बाद बचे हुए सरकारी बैंक क्या सरकारी लक्ष्यों को हासिल कर पाने में समर्थ होंगे? निजीकरण करने के पीछे सरकार का प्रमुख तर्क यह है कि आर्थिक रूप से कमजोर बैंकों का परिचालन संभव नहीं है, लेकिन अगर सरकारी बैंकों के कामकाज में हस्तक्षेप नहीं किया जाए और उन पर सरकारी लक्ष्यों को हासिल करने का दबाव नहीं डाला जाए, तो वे खुद ही बिना किसी मदद के आर्थिक रूप से मजबूत बन सकते हैं।

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