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राहत की आस में बीड़ी श्रमिक

कोटपा कानून में संशोधन से बीड़ी उत्पादन, वितरण और व्यवसाय पर नियमन तो प्रभावी होगा, लेकिन इससे अशिक्षित और स्थानीय स्तर पर वन आधारित आजीविका चलाने वाले एक बड़े वर्ग के सामने रोजगार का खतरा खड़ा हो गया है। बीड़ी का उत्पादन और उसकी बिक्री से जुड़ा व्यवसाय मूल रूप से कुटीर उद्योग है।

Updated: February 18, 2021 5:53 AM
प्रतीकात्‍मक फोटो।

अरविंद मिश्रा

संसद में पेश किया गया बजट अर्थव्यवस्था के विभिन्न स्तंभों को किस रूप में प्रभावित करेगा, इसे देखने का तात्कालिक कोई पैमाना नजर नहीं आता है। खुले बाजार में पैसा लगाने वाले निवेशक जरूर शेयर बाजार के उतार-चढ़ाव को कुछ हद तक बजट पर निवेशकों की प्रतिक्रिया करार देते हैं। मध्यम वर्ग की नजरें सबसे अधिक करों की दर में होने वाले बदलावों तक ही सीमित रहती हैं।

यदि बात करें श्रमिकों और खासतौर पर बीड़ी मजदूरों की तो उन्हें लगभग हर बार की तरह इस बार के केंद्रीय बजट से भी मायूसी ही हाथ लगी है। कोरोना संकट और ‘सिगरेट एंड अदर टोबैको प्रॉडक्ट्स एक्ट-2003’ (कोटपा) में प्रस्तावित संशोधनों के दोहरे संकट से जूझ रहे बीड़ी श्रमिकों और व्यवसायियों को उम्मीद थी कि बजट में उनके लिए कुछ समाधान जरूर निकलेगा, लेकिन बीड़ी श्रमिकों के लिए वैकल्पिक रोजगार और पुनर्वास से जुड़ी योजनाएं बजट से नदारद रहीं। इस क्षेत्र के श्रमिकों की मांग थी कि बीड़ी को तंबाकू उद्योग से अलग दर्जा दिया जाए और जब तक बीड़ी श्रमिकों के लिए रोजगार की वैकल्पिक व्यवस्था नहीं हो जाती, तब तक तंबाकू कानून में प्रस्तावित संशोधनों पर रोक लगाई जाए।

कोटपा अर्थात तंबाकू कानून 2003 में हाल ही में संशोधन कर कुछ महीने पहले ही नई नियमावली जारी की गई। बीड़ी उद्योग से जुड़े श्रमिक संगठनों का यह भी कहना है कि सरकार ने उन्हें चर्चा के लिए समय भी कम दिया। कोटपा में प्रस्तावित संशोधनों में जिन बिंदुओं पर बीड़ी उद्योग को सबसे अधिक आपत्ति है, उनमें बीड़ी निमार्ता बंडल पर अपने ब्रांड का चित्र नहीं दर्शा सकते हैं और दुकानदार अपनी दुकान पर बीड़ी-बंडलों को प्रदर्शित नहीं कर सकते हैं।

जाहिर है, इससे कौनसा दुकानदार बीड़ी बेचता है और कौनसा नहीं, इसकी पहचान करना ग्राहकों के लिए मुश्किल होगा। इसी तरह हर बीड़ी निमार्ता, ठेकेदार, व्यापारी, डीलर, वितरक, पनवाड़ी और दुकानदार को कोटपा के तहत पंजीयन करवाना अनिवार्य होगा। ऐसा न होने पर लाखों के अर्थदंड सहित जेल की सजा होगी। इसी तरह खुली बीड़ियों का विक्रय प्रतिबंधित कर दिया गया है। हर बंडल पच्चीस बीड़ी का ही होना चाहिए। स्पष्ट है, इन सभी उपायों से बीड़ी के उत्पादन और उसकी बिक्री में अभूतपूर्व गिरावट आई है।

कोटपा कानून में संशोधन से बीड़ी उत्पादन, वितरण और व्यवसाय पर नियमन तो प्रभावी होगा, लेकिन इससे अशिक्षित और स्थानीय स्तर पर वन आधारित आजीविका चलाने वाले एक बड़े वर्ग के सामने रोजगार का खतरा खड़ा हो गया है। बीड़ी का उत्पादन और उसकी बिक्री से जुड़ा व्यवसाय मूल रूप से कुटीर उद्योग है। एक अनुमान के मुताबिक दो करोड़ साठ लाख तंबाकू किसान, पिच्यासी लाख बीड़ी मजदूर, चालीस लाख से अधिक तेंदुपत्ता संग्राहक परिवारों के साथ लाखों पान विक्रेताओं की आजीविका बीड़ी पर निर्भर करती है।

भौगोलिक रूप से देखें तो उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड, ओड़िशा से लेकर तेलंगाना समेत दक्षिण के कई राज्यों में बीड़ी उद्योग फैला हुआ है। सवाल यह नहीं है कि बदलते समय के साथ बीड़ी उद्योग के लिए नए कानून नहीं बनाए जाएं, लेकिन नए कानून तथा कोरोना जैसी विभीषिका का दंश झेल रहे इस तबके पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों का समाधान भी निकालना आवश्यक है।

बीड़ी श्रमिकों के उत्थान के लिए सरकार ने समय-समय पर कदम उठाए हैं। ग्रामीण इलाकों में रहने वाले इस कार्यबल पर केंद्रित कई सरकारी योजनाएं शुरू की गईं। बीड़ी श्रमिकों को आवास के लिए दी जाने वाली राशि भी डेढ़ लाख रुपए की जा चुकी है। लेकिन हकीकत है कि अशिक्षा, जागरूकता और इनके बीच सरकारी योजनाओं के प्रचार-प्रसार के अभाव में बीड़ी मजदूरों को इन योजनाओं का लाभ बहुत ही कम मिल पाया। आज स्थिति यह है कि बहुत कम अनुपात में बीड़ी श्रमिक सरकारी योजनाओं में अपना नाम दर्ज करा पाते हैं।

इससे पेंशन योजना से लेकर और आयुष्मान भारत जैसी महात्वाकांक्षी योजनाओं के लाभ से भी वे वंचित हैं। रही-सही कसर स्थानीय प्रशासन की अनदेखी पूरी कर देती है। उदाहरण के लिए, समाज के इस निचले तबके को स्वास्थ्य सुविधाएं प्रदान करने के लिए कई जिलों में औषधालय भी खोले गए, वहीं जिला चिकित्सालयों में बीड़ी श्रमिकों के इलाज की अलग व्यवस्थाएं भी खड़ी की गईं। लेकिन वहां कितने बीड़ी श्रमिक पहुंचते हैं, यह शोध का विषय है। कई घंटों तक एक टक आंखें गड़ा बीड़ी बनाने वाली वाले श्रमिक टीवी, दमा और सांस से जुड़ी कई गंभीर बीमारियों की शिकार हो जाते हैं।

केंद्रीय बजट में सरकार सामाजिक योजनाओं पर भले ही बहुत अधिक खर्च करने से बची हो, लेकिन बुनियादी ढांचे से जुड़ी परियोजनाओं के लिए सरकार ने अच्छा खासा बजटीय आवंटन किया है। ऐसे में भवन निर्माण समेत अनेक क्षेत्रों में श्रम आधारित रोजगार के अवसर पैदा होंगे। यदि सरकार चाहे तो बीड़ी श्रमिकों को यहां रोजगार के मौके दे सकती है। बीड़ी से जुड़ा पूरा कुटीर उद्योग तंबाकू और तेंदुपत्ता जैसे कृषि व वन आधारित उत्पादों पर आधारित है। देश भर में फैले कृषि विज्ञान केंद्रों का नेटवर्क बीड़ी श्रमिकों के कौशल उन्नयन में महत्वपूर्ण भूमिका निर्वहन कर सकता है।

बीड़ी उद्योग में श्रमिकों की इतनी बड़ी संख्या इसलिए भी सक्रिय है, क्योंकि बीड़ी की बाजार उपलब्धता आसान और व्यापक है। ऐसे में स्वाभाविक रूप से बीड़ी श्रमिकों को कृषि आधारित उद्योगों की ओर उन्मुख करना एक बेहतर उपाय हो सकता है। सरकार चाहे तो बीड़ी श्रमिकों के आर्थिक पुनर्वास के लिए ग्रामीण रोजगार गारंटी सहित अनेक योजनाओं से उन्हें जोड़ सकती है। बीड़ी बनाने के काम में बड़ा अनुपात महिलाओं का होता है।

ऐसे में इन्हें स्वसहायता समूहों से जोड़ कर सहकारिता आधारित गतिविधियों व कार्यक्रमों में शामिल कर महिला सशक्तिकरण के मंत्र को भी साकार किया जा सकता है। हाल में केंद्रीय बजट में असम और पश्चिम बंगाल के मत्स्य पालन उद्योग को राहत देने के लिए सरकार की ओर से एक हजार करोड़ रुपए की राशि आवंटित की गई। कुछ इसी तरह के उपाय बीड़ी उद्योग के लिए भी किए जाने की आवश्यकता प्रासंगिक हो गई है।

देश भर में स्थानीय बाजारों के विकास और आत्मनिर्भर भारत अभियान के अंतर्गत छोटे-छोटे उद्यमों को प्रोत्साहित किए जाने के लिए कदम उठाए जा रहे हैं। मौजूदा सरकार जिस प्रकार कृषि आधारित कार्बनिक कचरे (आॅर्गेनिक वेस्ट) से ऊर्जा संसाधन विकसित करने के प्रयास कर रही है, उस क्षेत्र में भी इस कार्यबल की क्षमता का उपयोग किया जा सकता है।

हाल में सरकार की ओर संसद में बताया गया कि देश में कई हजार बायोगैस संयंत्र लगाने की तैयारी है। ऐसे में कृषि कचरे को बायोगैस संयंत्र तक ले जाने के लिए जरुरी श्रमबल के लिए बीड़ी उद्योग से जुड़ी महिलाएं सहयोगी हो सकती हैं। यदि सरकार इन उपायों को लेकर संजीदा हो भी जाए तो जमीन पर ये तभी सफल होंगे जब बीड़ी श्रमिक विभिन्न सरकारी योजनाओं में अधिक से अधिक पंजीकृत हों।

बीड़ी और उससे जुड़े श्रमिकों के मुद्दे सामाजिक और राजनीतिक विमर्श में इसलिए भी नहीं आ पाते हैं क्योंकि इसका जिक्र होते ही लोगों के मन में धूम्रपान की स्याह तस्वीर सामने आ जाती है। इसमें कोई दो मत नहीं कि धुम्रपान से देश में हर साल लाखों जिंदगियां काल के गाल में समा जाती हैं। बावजूद इसके बीड़ी उत्पादन और उसके व्यवसाय से जुड़ी गतिविधियां करोड़ों परिवारों के लिए पीढ़ियों से रोजी-रोटी का जरिया रहा है। ऐसे में इस कुटीर उद्योग पर आश्रित श्रमिकों और छोटे कारोबारियों के मुद्दों का मानवीय आधार पर समाधान निकाले जाने की आवश्यकता है।

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