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क्वांटम कंप्यूटर का युग

भविष्य का यह कंप्यूटर तीन से चार मीटर ऊंचे और डेढ़ मीटर व्यास वाले एक बड़े सिलेंडर जैसा नजर आएगा। इसका बाहरी आवरण किसी थर्मस की तरह दिखेगा और उसी की तरह काम करेगा। ऐसा इसलिए होगा कि इसके भीतर कंप्यूटर को ठंडा करने वाली एक मशीन भी लगी होगी, जिससे इसका तापमान जरूरत के मुताबिक बना रहे।

Author Published on: November 5, 2019 8:21 AM
क्वांटम मैकेनिक्स भविष्य के कंप्यूटर की बुनियाद माना जा रहा है।

असंभव-सी लगने वाली गणनाओं को सेकंड से कम समय में परिणाम में बदलने वाले सुपर क्वांटम कंप्यूटर बनाने का दावा तकनीकी संस्था गूगल ने किया है। रोमांच पैदा कर देने वाले इस कंप्यूटर को ‘साइकामोर’ नाम दिया है। यह क्वांटम कंप्यूटर सुपर कंप्यूटर से भी लाखों गुना तेज गति से क्वांटम कंप्यूटिंग के सिद्धांत पर काम करेगा। यह एक सेकंड में बीस हजार लाख करोड़ गणनाएं करने में सक्षम है। प्रयोग के दौरान इस कंप्यूटर ने दो सौ सेकंड में उस गणना को अंजाम दे दिया, जिसे नतीजे में बदलने में पारंपरिक सुपर कंप्यूटर को दस हजार साल का समय लगता। हालांकि गूगल के इस दावे पर सवाल भी उठने लगे हैं। दरअसल, पिछले हफ्ते गूगल प्रयोगशाला का मसौदा आॅनलाइन लीक हो गया था। इसका परीक्षण करने के बाद आइबीएम वैज्ञानिकों का कहना था कि जिस गिनती में सामान्य सुपर कंप्यूटर को दस हजार साल लगने की बात कही जा रही है, उसमें केवल ढाई साल का समय लगेगा। इनका कहना है कि क्वांटम सुप्रीमेसी का अर्थ है, क्वांटम कंप्यूटर का वह काम कर सके, जो सामान्य सुपर कंप्यूटर नहीं कर सकते हैं। साइकामोर इस पैमाने पर खरा नहीं है। आईबीएम भी क्वांटम कंप्यूटर के निर्माण में लगा है।

तकनीक की दुनिया में दिन दूनी रात चौगुनी गति से प्रगति हो रही है। कुछ समय पहले तक असंभव लगने वाली चीजें आज प्रौद्योगिकी की मदद से सरलता से परिणाम तक पहुंच रही हैं। एक समय संगणक के विकास ने प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव किया था। अब कृत्रिम बौद्धिकता (आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस) ने चिकित्सा से लेकर हथियारों के निर्माण तक हर क्षेत्र में कंप्यूटर और रोबोट के प्रयोग को नया आयाम दिया है।
पारंपरिक कंप्यूटर की दुनिया में इस प्रगति के समांतर एक और अनुसंधान चल रहा है, जिसका नाम है-‘क्वांटम कंप्यूटिंग’ यानी अति-सूक्ष्मता का विज्ञान। भौतिक शास्त्र के क्वांटम सिद्धांत पर काम करने वाली इस कंप्यूटिंग में असीमित संभावनाएं देखी जा रही हैं। शोध के लिहाज से क्वांटम कंप्यूटिंग किसी के लिए भी रुचि का विषय हो सकता है। इसीलिए दुनियाभर में अल्ट्रा फास्ट क्वांटम कंप्यूटर तैयार करने की होड़ लगी हुई है। विशेषज्ञों के अनुसार एक पूर्ण विकसित क्वांटम कंप्यूटर की क्षमता सुपर कंप्यूटर से भी कई गुना ज्यादा आंकी जा रही है। अतएव, यह इतना शक्तिशाली होगा कि इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती।

इस नवीन विषय के अध्ययन की नींव 1890 में भौतिक विज्ञानी वैज्ञानिक मैक्स प्लांक ने डाली थी। हालांकि तब तक वैज्ञानिक यह मान कर चल रहे थे कि भौतिकी में जितने नियमों का आविष्कार होना था, वह लगभग हो चुका है। अब केवल इन नियमों को प्रत्येक जगह क्रियान्वित करना भर शेष है। किंतु कुछ प्रश्न तब भी ऐसे थे, जिनके हल खोजे नहीं जा सके थे। अभी तक काले पिंड के सतत वर्णक्रम (स्पेक्ट्रम) के भिन्न-भिन्न भागों की ऊर्जा के वितरण को परिभाषित नहीं किया जा सकता था। इसे समझने के लिए प्लांक ने प्रकाश उत्सर्जन करने वाले द्रव्य कणों की निरंतर चाल के साथ उनमें बिखरी ऊर्जा को भी समझने का विचार दिया। इससे काले पिंड के वर्णक्रम की व्याख्या सुलझ गई। इस सोच के परीक्षण में जो निष्कर्ष आए, उनसे ज्ञात हुआ कि ऊर्जा का विकिरण लगातार न होकर टुकड़ों-टुकड़ों में होता है। इन टुकड़ों को विकिरण-कण नाम दिया गया। यह विकिरण भी कणों पर नहीं, बल्कि तरंगों के आधार पर चलता है। यह नियम विद्युत चुंबकीय सिद्धांत के विपरीत था, क्योंकि अब तक माना जाता था कि द्रव्य-कणों की गति में विद्यमान ऊर्जा निरंतर गतिशील रहती है। यानी क्वांटम सिद्धांत के तहत अणु, परमाणु और इनके भी मूलभूत कण बेहद लघुतम अवस्था में मौजूद रहते हैं। इस खोज पर 1918 में मैक्स प्लांक को भौतिकी का नोबेल पुरस्कार भी मिला। 1924 में सत्येंद्रनाथ बोस ने प्लांक के विकिरण नियम को समझाने के लिए एक नई विधि सुझाई। उन्होंने प्रकाश की कल्पना द्रव्यमान रहित कणों के एक गैस पिंड के रूप में ली। इसे फोटॉन गैस के रूप में मान्यता मिली। बाद में इस मान्यता को अल्बर्ट आइंस्टीन ने भी स्वीकृति दी।
विज्ञान ने पहले परमाणु को ही ऐसा सबसे सूक्ष्मतम कण बतलाया था, जिसने सृष्टि का निर्माण किया है। फिर आगे की खोज से ज्ञात हुआ कि परमाणु भी विभाजित हो सकता है, यानी उसे और अत्यंत सूक्ष्म कणों में बांटा जा सकता है। फलत: ये सूक्ष्म कण, इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन और न्यूट्रॉन नाम के लघुतम रूपों में सामने आए। कालांतर में इन अतिसूक्ष्म कणों के अध्ययन की शाखा क्वांटम भौतिकी और अन्य विकसित रूपों में सामने आई। तब पता चला कि प्रोटॉन और न्यूट्रॉन को और विभाजित किया जा सकता है। अंतत: इसे क्लार्क और लैपटॉन जैसे सूक्ष्म कणों में विभाजित कर भी लिया गया। इस तरह से कण भौतिकी में एक प्रामाणिक तथ्य सामने आया, जिसमें क्लार्क व लैप्टॉन के बारह सूक्ष्मतम कणों के प्रकार दर्ज हैं। इन्हें जरूर अब तक अविभाज्य माना गया है। अब इन्हें ही मूलकण माना जा रहा है। आधुनिक विज्ञान में यह धारणा बन रही है कि पदार्थ से संबंधित अत्यंत कम द्रव्यमान वाले, इन्हीं मूल कणों से सृष्टि के जड़ एवं चेतन स्वरूप अस्तित्व में आए हैं।

क्वांटम मैकेनिक्स भविष्य के कंप्यूटर की बुनियाद माना जा रहा है। पारंपरिक कंप्यूटर बिट (अंश) पर काम करते हैं, वहीं क्वांटम कंप्यूटर में प्राथमिक इकाई क्यूबिट यानी कणांश होती है। पारंपरिक कंप्यूटर में प्रत्येक बिट का मूलाधार या मूल्य शून्य (जीरो) और एक (एक) होता है। कंप्यूटर इसी शून्य और एक की भाषा में ही कुंजी-पटल (की-बोर्ड) से दिए निर्देश को ग्रहण करके समझता है और परिणाम को अंजाम देता है। वहीं क्वांटम की विलक्षणता यह होगी कि वह एक साथ ही शून्य और एक दोनों को ग्रहण कर लेगा। यह क्षमता क्यूबिट की वजह से विकसित होगी। परिणामस्वरूप यह दो क्यूबिट में एक साथ चार मूल्य या परिणाम देने में सक्षम हो जाएगा। एक साथ चार परिणाम स्क्रीन पर प्रकट होने की इस अद्वितीय क्षमता के कारण इसकी गति पारंपरिक कंप्यूटर से कहीं बहुत ज्यादा होगी, इसलिए पारंपरिक कंप्यूटरों में जो कूट-रचना या गूढ़ लेखन कर दिया जाता है, उससे कहीं अधिक मात्रा में यह कंप्यूटर डाटा संग्रह और उसे सुरक्षित रखने में समर्थ होगा। फिलहाल साइकामोर कंप्यूटर का प्रोसेसर 54 क्यूबिट का है।

भविष्य का यह कंप्यूटर तीन से चार मीटर ऊंचे और डेढ़ मीटर व्यास वाले एक बड़े सिलेंडर जैसा नजर आएगा। इसका बाहरी आवरण किसी थर्मस की तरह दिखेगा और उसी की तरह काम करेगा। ऐसा इसलिए होगा कि इसके भीतर कंप्यूटर को ठंडा करने वाली एक मशीन भी लगी होगी, जिससे इसका तापमान जरूरत के मुताबिक बना रहे। क्वांटम कंप्यूटर तब तक काम नहीं कर सकेगा, जब तक उसे शून्य से दो सौ तिहत्तर डिग्री सेल्सियस कम तापमान तक ठंडा न रखा गया हो। इस व्यवस्था के लिए ही ये बड़े आकर के होंगे। हालांकि गूगल ने जिस क्वांटम कंप्यूटर मशीन को वजूद में लाने का दावा किया है, वह फ्लिप फोन जैसी है। क्वांटम कंप्यूटर की क्षमता को देखते हुए इसे सुरक्षा की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है। यही वजह है कि आविष्कार से पहले इसकी क्षमताओं का मूल्यांकन कर लेने वाले देश इसके अनुसंधान पर बढ़ी धनराशि खर्च कर रहे हैं। चीन की सरकार हेफेई में तिहत्तर हजार करोड़ रुपए के बजट प्रावधान से क्वांटम शोध के लिए प्रयोगशाला के निर्माण में लगी है। इसके 2020 तक अस्तित्व में आ जाने की उम्मीद है। चीन की ई-कॉमर्स कंपनी अलीबाबा अलग से इस पर काम कर रही है। भारत सरकार ने भी इस दिशा में शोध को बढ़ावा देने के लिए क्वांटम सूचना-विज्ञान और प्रौद्योगिकी संस्था का गठन किया है।

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