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लैंगिक विषमता के समांतर सवाल

रवांडा दुनिया का पहला देश है, जिसकी संसद में चौंसठ फीसदी महिलाएं हैं। इसके बरक्स भारतीय संसद में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी देखें तो वह केवल 14.4 फीसद है। संसद में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण का बिल अभी भी अधर में लटका हुआ है।

Genderसांकेतिक फोटो।

सुधीर कुमार

विश्व आर्थिक मंच ने पंद्रहवीं वैश्विक लैंगिक असमानता सूचकांक 2021 की रिपोर्ट जारी की है। इसमें एक सौ छप्पन देशों में पुरुषों की तुलना में महिलाओं की आर्थिक सहभागिता, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरतों तक उनकी पहुंच और राजनीतिक सशक्तिकरण जैसे मुख्य संकेतकों व लैंगिक भेदभाव को कम करने की दिशा में उठाए जा रहे कदमों का जिक्र किया गया था। रिपोर्ट बताती है कि इस सूचकांक में आइसलैंड, फिनलैंड, नार्वे, न्यूजीलैंड और स्वीडन शीर्ष पांच देशों में शामिल हैं, जबकि लैंगिक समानता के मामले में यमन, इराक और पाकिस्तान सबसे फिसड्डी देश साबित हुए। हालांकि यह रिपोर्ट भारत के संदर्भ में भी लैंगिक समानता की तस्वीर कोई अच्छी नहीं है।

इस सूचकांक में भारत पिछले साल के मुकाबले अट्ठाईस पायदान फिसल कर एक सौ चालीसवें स्थान पर पहुंच गया है। गौरतलब है कि वर्ष 2020 में लैंगिक समानता के मामले में भारत एक सौ तिरपन देशों की सूची में एक सौ बारहवें स्थान पर था। इससे पहले वर्ष 2006 में जब पहली बार यह रिपोर्ट जारी की गई थी, तब इस सूचकांक में भारत अनठानबेवें स्थान पर था। जाहिर है, लैंगिक समानता के मामले में पिछले डेढ़ दशक में भारत की स्थिति लगातार खराब होती गई है। राजनीतिक क्षेत्र में स्त्री-पुरुष समानता के मामले में भारत का स्थान इक्यावनवां है। इस संदर्भ में विश्व आर्थिक मंच का कहना है कि राजनीतिक क्षेत्र में लैंगिक समानता स्थापित करने में भारत को अभी एक सदी से ज्यादा वक्त लग जाएगा।

पुरुषों और महिलाओं की समान भागीदारी सुनिश्चित करके ही राष्ट्र के सर्वांगीण विकास का लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है। विश्व आर्थिक मंच की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में लैंगिक असमानता अभी तिरसठ फीसद से ज्यादा है। लैंगिक असमानता न केवल महिलाओं के विकास में बाधा पहुंचाती है, बल्कि राष्ट्र के आर्थिक और सामाजिक विकास को भी प्रभावित करती है। स्त्रियों को समाज में उचित स्थान न मिले तो एक देश पिछड़ेपन का शिकार हो सकता है।

लैंगिक समानता आज भी वैश्विक समाज के लिए एक चुनौती बनी हुई है। लैंगिक समानता सुनिश्चित करना, महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देना, महिलाओं के खिलाफ हिंसा व भेदभाव को रोकना और सामाजिक पूर्वाग्रहों और रूढ़ियों से निपटना आधुनिक विश्व की बड़ी जरूरत के रूप में सामने आया है। आमतौर पर असंतुलित लिंगानुपात, पुरुषों के मुकाबले साक्षरता और स्वास्थ्य सुविधाओं का निम्न स्तर, पारिश्रमिक में लैंगिक विषमता जैसे कारक समाज में स्त्रियों की कमतर स्थिति को दर्शाते हैं। अगर समाज में लैंगिक भेदभाव खत्म नहीं किया गया तो संयुक्त राष्ट्र के 2030 के सतत विकास लक्ष्यों के मूल में निहित महिला सशक्तिकरण और लैंगिक समानता के लक्ष्य की प्राप्ति में हम पिछड़ जाएंगे।

किसी भी समाज में लैंगिक असमानता लोगों की मानसिकता में बदलाव लाकर ही दूर की जा सकती है। यह समझना होगा कि सामाजिक उत्थान में जितना योगदान पुरुषों का है, उतना ही महिलाओं का भी है। इस संबंध में हम मिजोरम और मेघालय से सीख सकते हैं, जहां बिना किसी भेदभाव के महिलाओं को समान रूप से काम दिया जाता है। महिलाओं को सम्मान और समुचित अवसर देकर ही लैंगिक भेदभाव से मुक्त प्रगतिशील समाज की स्थापना संभव है। लेकिन विडंबना है कि लैंगिक भदेभाव खत्म करने के मामले में हम अपने पड़ोसी देशों जैसे बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल और भूटान से भी पीछे हैं।

अलबत्ता देश में लैंगिक विषमता खत्म करने के सरकारी स्तर पर ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसे अभियान चलाए जा रहे हैं। इसी तरह सैनिक स्कूलों में लड़कियों के प्रवेश का फैसला भी ऐतिहासिक और क्रांतिकारी है। वहीं केरल के कोझिकोड में हाल में बने ‘जेंडर पार्क’ ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है। चौबीस एकड़ के परिसर में बने इस बहुउद्देशीय ‘जेंडर पार्क’ में महिला सशक्तिकरण से संबंधित नीतियां, योजनाएं और कार्यक्रम बनाए जाएंगे। दूसरी ओर, राजस्थान सरकार ने घूंघट की कुप्रथा को खत्म करने के आह्वान के बाद जयपुर के जिला प्रशासन ने ‘घूंघट मुक्त जयपुर’ नामक जागरूकता अभियान शुरू किया। इस तरह के प्रयासों का मकसद लैंगिक समानता स्थापित करने के मार्ग में आने वाले अवरोधकों को दूर करना और महिलाओं की उन्नति के लिए अवसर खोलना है।

कुछ समय पहले विश्व बैंक ने महिला कारोबार और कानून-2021 रिपोर्ट जारी की थी। इसके मुताबिक दुनिया में केवल दस देशों में ही महिलाओं को पूर्ण अधिकार मिला है। जबकि भारत सहित सर्वेक्षण में शामिल बाकी एक सौ अस्सी देशों में महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार और कानूनी सुरक्षा पूर्ण रूप से अभी तक नहीं मिल पाए हैं। इस रिपोर्ट में भारत एक सौ नब्बे देशों की सूची में एक सौ तेईसवें वें स्थान पर है। इसमें भारत के संदर्भ में कहा गया है कि कुछ मामलों में भारत महिलाओं को पूर्ण अधिकार तो देता है, लेकिन समान वेतन, मातृत्व, उद्यमिता, संपत्ति और पेंशन जैसे मामलों में लैंगिक भेदभाव को खत्म करने के लिए आगे कड़े प्रयत्न करने होंगे। महिलाओं को भी आर्थिक स्वतंत्रता मिलनी चाहिए, क्योंकि इससे उनमें आत्मविश्वास और स्वाभिमान का भाव पैदा होता है। आर्थिक गतिविधियों में महिलाओं की हिस्सेदारी जितनी अधिक बढ़ेगी, देश की अर्थव्यवस्था उतनी ही मजबूत होगी।

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का एक अध्ययन बताता है कि अगर भारत में महिलाओं को श्रमबल में बराबरी हो जाए तो सकल घरेलू उत्पाद में सत्ताईस फीसद तक का इजाफा हो सकता है। हालांकि इस तथ्य को जानने के बावजूद वस्तुस्थिति कुछ और ही तस्वीर बयां करती हैं। दरअसल लिंक्डइन अपार्च्युनिटी सर्वे-2021 में यह सामने आया है कि देश की सैंतीस फीसद महिलाएं मानती हैं कि उन्हें पुरुषों की तुलना में कम वेतन मिलता है, जबकि बाईस फीसद महिलाओं का कहना है कि उन्हें पुरुषों की तुलना में वरीयता नहीं दी जाती है। जाहिर है, महिला सशक्तिकरण के लिए इस तरह के आर्थिक भेदभाव मिटाने होंगे।

बहरहाल इस लैंगिक असमानता सूचकांक को देखने के बाद सवाल उठता है कि आखिर लैंगिक समानता के मामले में आइसलैंड, फिनलैंड और नार्वे जैसे राष्ट्र ही क्यों शीर्ष पर बने रहते हैं? गौरतलब है कि इन राष्ट्रों की गिनती दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देशों में भले ही न होती हो, लेकिन बात जब खुशहाल और लैंगिक भेदभाव से मुक्त राष्ट्र की होती है तो ये चुनिंदा देश संपूर्ण विश्व का नेतृत्व करते दिखाई देते हैं। क्यों न दुनिया के अन्य देश इनके अथक प्रयासों और अभिनव प्रयोगों से कुछ सीखें? आइसलैंड को ही देखें तो यह एक छोटा-सा यूरोपीय देश है, जिसकी जनसंख्या केवल साढ़े तीन लाख के आसपास है। लेकिन लैंगिक समानता के मोर्चे पर आज वह विश्व का पथ-प्रदर्शक बन गया है।

इस साल महिला-पुरुष समानता के मामले में आइसलैंड लगातार बारहवें साल दुनिया में अव्वल रहा। इस देश में लैंगिक भेदभाव को नब्बे फीसद तक खत्म किया जा चुका है, जो पूरी दुनिया में सर्वाधिक है। यहां शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं तक स्त्री-पुरुष की समान पहुंच है। यह अपने आप में एक अनुपम उपलब्धि है। आइसलैंड की सरकार ने कानून बना कर एक ही काम के लिए किसी महिला को कम और पुरुष को ज्यादा वेतन देने की प्रथा को अवैध घोषित कर दिया है।

भारत सहित अन्य देशों को आइसलैंड से सीखना चाहिए कि जब निश्चित समय में महिला और पुरुष से समान श्रम करवाया जाता है, तो लिंग के आधार पर उनकी पगार में असमानता क्यों? इसी तरह अफ्रीकी देश रवांडा की अर्थव्यवस्था भले ही छोटी है, लेकिन इस देश को भी महिला सशक्तिकरण की मिसाल के तौर पर जाना जाता है। रवांडा दुनिया का पहला देश है, जिसकी संसद में चौंसठ फीसदी महिलाएं हैं। इसके बरक्स भारतीय संसद में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी देखें तो वह केवल 14.4 फीसद है। संसद में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण का बिल अभी भी अधर में लटका हुआ है। जाहिर है,इस दिशा में भारत को अभी लंबा सफर तय करना होगा।

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