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राजनीति: दरकते रिश्ते और बाजार

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि पहले जहां परिवार को प्रतिमान एवं मूल्य आकार देते थे, वहीं अब यह काम तकनीक और आभासी यथार्थ कर रहे हैं। परिवार में बच्चों का समाजीकरण अब बाजार और तकनीक कर रहे हैं। यही कारण है कि बच्चों में परिवार के प्रति भावनात्मक लगाव पैदा नहीं होता।

उपभोक्तावाद और वैश्वीकरण के आज के जमाने में रिश्तों में बिखराव आम बात हो गई है।

ज्योति सिडाना

वैश्वीकरण और उपभोक्तावादी व्यवस्था के कारण अब परिवार एक स्वाभाविक एवं पवित्र इकाई के रूप में अपना महत्त्व खोता जा रहा है। वैश्वीकरण ने भौगौलिक दूरियां भले कम कर दी हों, लेकिन सामाजिक दूरियां बढ़ा दी हैं। वैश्वीकरण ने समाज की उन औपचारिक और अनौपचारिक संस्थाओं को भी लगभग खत्म-सा कर डाला है जो हमें मूल्य, प्रतिमान, सुरक्षा व स्थिरता देती थीं। आज परिवारों में व्यक्तिवाद का मूल्य हावी हो चुका है। बच्चों को जब माता-पिता की आवश्यकता महसूस नहीं होती तो वे उन्हें उपेक्षित कर देते हैं। कुछ समय पहले सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई को दौरान दो बेटों को अपने पिता की देखभाल न करने और पुश्तैनी घर पर कब्जा कर उन्हें आर्थिक मदद नहीं देने के कारण फटकार लगाई थी।

इसी तरह एक अन्य मामले में एक पंचाट ने सीनियर सिटीजन एक्ट 2007 के तहत बेटों को अपने पिता को सात हजार रुपए प्रति माह जीवनयापन के लिए देने का निर्देश दिया था। लेकिन बेटों ने इस आदेश के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाया। ऐसे ढेरों मामले मिल जाएंगे, जिनमें पारिवारिक विवादों में खासतौर से अभिभावकों की उपेक्षा, उनकी जायदाद पर कब्जा कर लेने जैसे मामलों में अदालतों ने सख्त रुख अपनाया है और बुजुर्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए निर्देश दिए हैं।

वैश्वीकरण ने परिवार की परंपरागत सत्ता संरचना को बदल डाला है। युवा पीढ़ी, विशेष रूप से उच्च शिक्षा और नौकरियों में संलग्न युवा अब परिवार के हित के लिए अपने व्यक्तिगत हितों को त्यागने में विश्वास नहीं करते। इसका एक बड़ा कारण तो यही है कि उपभोक्तावादी समाज में परिवार भी बाजार का हिस्सा बन गया है और परिवार के भीतर भी व्यक्तिवाद तेजी से बढ़ता जा रहा है। शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की बढ़ती लागत ने घर के बाहर महिलाओं के लिए रोजगार के नए अवसर सृजित किए हैं।

नए रोजगार और शैक्षणिक अवसरों की तलाश में युवा पीढ़ी की बढ़ती गतिशीलता से परिवार नाम की इकाई पर सबसे ज्यादा असर पड़ा है और इसी का नतीजा है कि यह परिवार इकाई कहीं न कहीं कमजोर पड़ती जा रही है और पारिवारिक संबंधों में क्षीणता आती जा रही है। भौगोलिक दूरियों और व्यस्तता के कारण परिवार के सदस्य अब पहले की तरह बार-बार एक साथ आने में असमर्थ महसूस करते हैं। परिणामस्वरुप बच्चों, बीमारों और बुजुर्गों की देखभाल और पोषण करने वाली इकाई के रूप में स्थापित ‘परिवार’ की आदर्श अवधारणा प्रभावित हुई है।

जाहिर है, बच्चों के लिए परिवार का मतलब अपनी पत्नी और बच्चों तक सीमित हो गया है। बच्चों में उत्पन्न यह सोच स्पष्ट संकेत करती है कि अब समाज पर बाजारवाद, उपभोक्तावाद इतना हावी हो गया है कि करीबी रिश्ते भी बाजार और उपयोगिता की दृष्टि से आंके जाने लगे हैं। बच्चों को लगता है कि उन्होंने जो भी मुकाम हासिल किया है उसका श्रेय अकेले उन्हीं को जाता है, इसमें परिवार या समाज का कोई योगदान नहीं है।

और यही सोच उन्हें व्यक्तिवादी बनाती है। इस वैश्वीकरण की प्रक्रिया ने ‘दिखावे के उपभोग’ को इतना बढ़ा दिया है कि व्यक्ति केवल भौतिक संसाधनों को जुटाने में व्यस्त रहने लगा है और वही उसके मनोरंजन के भी साधन बन गए हैं। भौतिकतावाद के प्रति आकर्षण ने सामाजिक संबंधों को हाशिए पर कर दिया है। उसी का परिणाम है कि नगरों में वृद्ध आश्रमों की संख्या बढ़ने लगी है।

परिवार संस्था के कमजोर होने का एक कारण यह भी है कि व्यक्ति को लगता है कि बाजार उसकी हर आवश्यकता पूरी कर सकता है। हैरानी की बात यह है कि परिवार कैसा होना चाहिए, उसमें सदस्यों की भूमिका क्या हो, यह भी अब बाजार तय करने लगा है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि परिवार नाम की संस्था भी अब बाजार की वस्तु बन कर रह गई है।

इसीलिए समाज विज्ञानी टालकट पारसंस कहा भी है कि ह्यपरिवार एक कारखाना है जिसमें व्यक्तित्व को आकार दिया जाता हैह्ण। यह सच है कि पूर्व में समाज या व्यवस्था द्वारा उत्पन्न तनाव और निराशा को कम या समाप्त करने में परिवार महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता था, लेकिन अब ऐसा लगता है कि परिवार नातेदारों और संबद्ध समुदाय से लगभग कट से गए हैं। इसी का नतीजा है कि भावनात्मक तनाव परिवार का एक नकारात्मक हिस्सा बन कर उभरा है।

आज ऐसे परिवारों की संख्या ज्यादा है जहां लड़कों के विवाह के बाद उनके माता-पिता या तो घर में अकेले रह रहे हैं या फिर वृद्धाश्रम में, क्योंकि बच्चों ने माता-पिता को अकेले घर में छोड़ दिया या उन्हें घर से बेदखल कर दिया और अपना अलग परिवार बसा लिया। रिश्तों का खोखलापन इस बात से और भी स्पष्ट हो जाता है जब हम अपने रिश्तों की कदर भी नहीं करते और सोशल मीडिया पर मदर्स डे, फादर्स डे, सिस्टर्स डे, ब्रदर्स डे, फ्रेंडशिप डे मनाते हैं। यही रिश्तों का बाजारीकरण है।

वैश्वीकरण के दौर में सामाजिक संबंधों पर भी ‘दिखावे की संस्कृति’ का संकट गहरा गया है। व्यक्ति ह्यस्वयंह्ण को नए तरीके से अभिव्यक्त करने लगा है और केवल खुद से प्यार करने लगा है, इसलिए समूह फोटो का स्थान ‘सेल्फी’ ने ले लिया है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि पहले जहां परिवार को प्रतिमान एवं मूल्य आकार देते थे, वहीं अब यह काम तकनीक और आभासी यथार्थ कर रहे हैं। परिवार में बच्चों के समाजीकरण अब बाजार और तकनीक कर रहे हैं। यही कारण है कि बच्चों में परिवार के प्रति भावनात्मक लगाव पैदा नहीं होता।

संबंधों में अविश्वास उभरा है, इसलिए लोग अलगाव का शिकार हो रहे हैं, क्योंकि अमानवीय परिवेश इतना सघन हो गया है कि वे किसी से भी अपनी इच्छाओं को साझा नहीं कर पाते। कहते हैं कि आज के दौर में मनुष्य ज्यादा स्वतंत्र एवं विकसित हुआ है, पर ऐसा लगता है कि पहले की तुलना में मनुष्य आज अधिक जकड़न में है, क्योंकि उसके पास स्वाभाविक जीवन जीने का समय ही नहीं है। सब कुछ कृत्रिम है, आभासी है।

नव-उदारवादी अर्थव्यवस्था में शासन सत्ता परिवार व्यवस्था को इस तरह से विकसित करना चाहती है कि परिवार समाजीकरण के द्वारा अपने सदस्यों, विशेष रूप से नई पीढ़ी को बाजारवादी मूल्यों के समर्थन के लिए तैयार कर सकें। इसी का परिणाम है कि नई पीढ़ी में आत्म-केंद्रित व्यक्तित्व, प्रतिस्पर्धा, व्यक्तिवादिता, किसी भी कीमत पर सफल होने की आकांक्षा, दिखावे की संस्कृति, सामूहिकता की उपेक्षा जैसे मूल्य हावी हुए हैं।

इस सत्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि अगर परिवार मजबूत होता है तो समाज मजबूत होता है और जब समाज मजबूत होता है तो राज्य भी मजबूत होता है। राज्य मजबूत होता है तो अर्थव्यवस्था, राजनीति, संस्कृति सभी व्यवस्थाएं मजबूत होती चली जाती हैं। ऐसे में राज्य का भी दायित्व है कि तनावग्रस्त और उपेक्षित वृद्ध पीढ़ी के विषयों में हस्तक्षेप करे। ऐसी पीढ़ी को दंडित किया जाना चाहिए जो अपने माता-पिता की देखभाल नहीं करते, उन्हें घर से बेदखल कर देते हैं या उनके प्रति हिंसा करते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि बच्चों के समाजीकरण को नए सिरे से आकार दिया जाए। परिवार की उपेक्षा समाज और राज्य की उपेक्षा है, इसलिए वृद्ध सदस्यों की उपेक्षा को गंभीरता से लेने की आवश्यकता है।

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