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ग्लोबल वार्मिंग से बिगड़ते हालात

वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर जलवायु परिवर्तन से निपटने का समुचित उपाय नहीं तलाशा गया तो आने वाले वर्षों में दुनिया की छत कहे जाने वाले तिब्बत का हुलिया बिगड़ सकता है।

तिब्बत पठार शोध के प्रोफेसर शिचांग कांग ने कहा कि ग्लोबल वार्मिंग के रूप में बढ़ रहा तापमान ग्लेशियरों के लिए वास्तविक खतरा है।

‘क्लाइमेट सेंटर आॅफ साउथ वेस्ट चाइना’ तिब्बत आॅटोनॉमस रीजन ऐंड रीजनल रिमोट सेंसिंग एप्लीकेशंस रिसर्च सेंटर’ का यह दावा दुनिया को सतर्क करने वाला है कि तिब्बत जलवायु परिवर्तन की चपेट में है। वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर जलवायु परिवर्तन से निपटने का समुचित उपाय नहीं तलाशा गया तो आने वाले वर्षों में दुनिया की छत कहे जाने वाले तिब्बत का हुलिया बिगड़ सकता है। रिसर्च सेंटर ने अपने अध्ययन में पाया है कि यह सिलसिला पिछले तीन दशक से जारी है और 1981 से 2016 के बीच औसत तापमान में प्रति दशक 0.3 डिग्री सेल्सियस का इजाफा हुआ है। गौरतलब है कि मई से सितंबर के बीच तिब्बत में ज्यादा वर्षा होती है। 1981 से 2016 के बीच की गणना में मई से सितंबर के बीच वर्षा में हर दशक के दौरान 10.1 मिलीमीटर की बढ़ोतरी हुई है, जो तिब्बत की सेहत के विपरीत है। अगर वर्ष 2016 पर नजर दौड़ाएं तो इस साल मई से सितंबर के बीच तिब्बत का औसत तापमान 11.9 डिग्री सेल्सियस रहा, जो आम वर्षों की तुलना में 0.44 डिग्री अधिक है। इस दौरान 445.1 मिलीमीटर औसत बारिश रिकार्ड हुई है, जो आम वर्षों की तुलना में तकरीबन 62.4 मिलीमीटर अधिक है। वैज्ञानिकों का कहना है कि अल्पकाल के लिए यह स्थिति फायदेमंद है, इसलिए कि गरम और आर्द्र मौसम से क्षेत्र में कृषि अधिक होगी, उपज बढ़ेगा, पर्यटन और पशुपालन को बढ़ावा मिलेगा। लेकिन दीर्घकाल के लिए यह स्थिति तिब्बत के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। इसलिए कि इससे इस क्षेत्र में ग्लेशियर और परमाफ्रास्ट के पिघलने का खतरा बढ़ जाएगा, जिससे तिब्बत का पर्यावरण बुरी तरह प्रभावित होगा।

परमाफ्रस्ट उस सतह को कहते हैं, जो दो या अधिक वर्षों से शून्य डिग्री या उससे कम तापमान पर जमी रही हो। अगर ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई तो न सिर्फ तिब्बत का भौगोलिक संतुलन बिगड़ेगा, बल्कि कृषि, पशुपालन और व्यापार भी बुरी तरह प्रभावित होगा। तिब्बत के भौगोलिक परिदृश्य पर नजर डालें तो यह मध्य एशिया की उच्च पर्वत श्रेणियों के मध्य कुनलुन और हिमालय के मध्य स्थित है। इसकी ऊंचाई सोलह हजार फुट है। यहां का क्षेत्रफल सैंतालीस हजार वर्ग मील है। तिब्बत पूर्व में शीकांग से, पश्चिम में कश्मीर से दक्षिण में हिमालय पर्वत से तथा उत्तर में कुनलुन पर्वत से घिरा हुआ है। इस पठार का कुल क्षेत्रफल पच्चीस लाख वर्ग किलोमीटर है। यह पठार पूर्वी एशिया की बृहत्तर नदियों ह्वांगहो, मेकांग आदि का उद्गम स्थल है, जो पूर्वी क्षेत्र से निकलती हैं। भारत की महत्त्वपूर्ण ब्रह्मपुत्र नदी भी दक्षिण तिब्बत से शुरू होती है। तिब्बत के पूर्वी क्षेत्र में कुछ वर्षा होती है और बारह सौ फुट की ऊंचाई तक वन पाए जाते हैं। यहां की कुछ घाटियां पांच हजार फुट ऊंची हैं, जहां कृषि कार्य किए जाते हैं। पठार के पश्चिमोत्तर भाग में पांच हजार मीटर से अधिक ऊंचाई वाला चान्गतंग इलाका है, जो भारत के दक्षिण-पूर्वी लद्दाख तक फैला हुआ है।

तिब्बत में विभिन्न क्षेत्रों और ऊंचाइयों पर फसलों की किस्मों में बड़ा अंतर पाया जाता है। तिब्बत में खेतीबाड़ी मुख्य तौर पर नदियों की घाटियों में होती है। जौ, गेहूं, सरसों, मटर, थोड़ा-बहुत धान और मकई की भी फसल पैदा की जाती है। जलवायु की शुष्कता उत्तर की ओर बढ़ती जाती है और जंगलों के स्थान पर घास के मैदान अधिक पाए जाते हैं। जनसंख्या का घनत्व धीरे-धीरे कम होता जाता है और कृषि के स्थान पर पशुपालन बढ़ता जाता है। पठार के दक्षिणी और पूर्वी हिस्सों में घास के मैदान हैं, जहां मवेशी पालन से खानाबदोश लोग जीवन बसर करते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर तिब्बत को ग्लोबल वार्मिंग की चपेट में आने से नहीं बचाया गया तो न केवल कृषि और पशुपालन बुरी तरह प्रभावित होगा, बल्कि आजीविका का भी संकट उत्पन हो जाएगा। यहां के निवासियों को आजीविका के लिए विस्थापन का दंश झेलना पड़ेगा। पर्यावरणविदों का मानना है कि जलवायु में हो रहे परिवर्तन से तिब्बत के वन क्षेत्र को भारी नुकसान पहुंच सकता है। तिब्बत में वन का क्षेत्रफल तकरीबन चौंसठ लाख हेक्टेयर है, जो स्वायत्त प्रदेश की कुल भूमि का तकरीबन पांच फीसद है। हालांकि यह मात्रा देश के औसत स्तर से काफी कम है, लेकिन यहां लकड़ियों का भंडारण एक अरब चालीस करोड़ से अधिक घनमीटर है। तिब्बत का वन संसाधन मुख्य तौर पर यालूचांगबू नदी के मध्य व निचले भाग, लोका क्षेत्र और पूर्वी तिब्बत की पहाड़ी वादियों में उपलब्ध है।

यहां पर ऊन का बड़े पैमाने पर उत्पादन होता है जो विश्व भर में दुर्लभ है। अगर जलवायु परिवर्तन से कृषि और पशुपालन को नुकसान पहुंचता है, तो फिर उसका नकारात्मक असर तिब्बत की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। वैसे भी गौर करें तो पिछले कुछ वर्षों से तिब्बत का विदेशी व्यापार की स्थिति संतोषजनक नहीं है। यह 2015 में 59.2 फीसद लुढ़ कर पांच अरब युआन यानी 8.61 करोड़ डॉलर रहा और निर्यात 71.9 फीसद घट कर तीन अरब युआन रहा। जबकि आयात 114.4 फीसद घट कर दो अरब युआन रहा। गौरतलब है कि इस गिरावट के लिए प्रमुख रूप से नेपाल में आया भूकंप था। गौरतलब है कि तिब्बत नेपाल का प्रमुख व्यापारिक साझीदार देश है। अगर तिब्बत पर जलवायु परिवर्तन की मार अधिक पड़ती है तो फिर यहां कल-कारखाने और उद्योग-धंधे भी प्रभावित होंगे।

गौरतलब है कि 1959 में प्रजातांत्रिक सुधार के उपरांत यहां औद्योगीकरण को बल बल मिला है। यहां के ल्हासा, लिनची और शिकजे क्षेत्र में बड़े पैमाने पर बिजली, कोयला, धातुशोधन, मशीनरी, रसायन, टैक्सटाइल, चमड़ा, कागज, प्लास्टिक और खाद्य पदार्थ से जुड़े कई बड़े उद्योग स्थापित हुए हैं। अब तो वाणिज्य, पर्यटन, डाक, तार, मनोरंजन और आइटी जैसे नव-उद्योग भी आकार लेने लगे हैं। वैज्ञानिकों ने अपने शोधों में पाया है कि जलवायु परिवर्तन के कारण न केवल तिब्बत का स्वरूप बिगड़ रहा है, बल्कि हिमालय और विश्व के अन्य क्षेत्रों में भी विद्रूप परिवर्तन हो रहा है। एक अध्ययन के मुताबिक पिछले पांच दशक में हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियर दो से पांच किलोमीटर तक सिकुड़ गए हैं। इसके अलावा छिहत्तर फीसद ग्लेशियर चिंताजनक गति से सिकुड़ रहे हैं।
अंतरराष्ट्रीय अनुपात को देखते हुए उत्तरी ध्रुव क्षेत्र दोहरी तेजी से गरम हो रहा है और यहां फैली स्थायी बर्फ की मोटी परत कम हो रही है। सदियों से बर्फ की मजबूत चादर में ढके क्षेत्र भी तेजी से पिघल रहे हैं। वर्ष 2007 की इंटर गवर्नमेंटल पैनल की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर के करीब तीस पर्वतीय ग्लेशियरों की मोटाई वर्ष 2005 में आधे मीटर से ज्यादा कम हो गई। यही नहीं, संयुक्त राष्ट्र की ग्लोबल फॉरेस्ट रिसोर्स एसेसमेंट की रिपोर्ट से भी उद्घाटित हो चुका है कि जलवायु परिवर्तन के कारण 1990 से 2015 के बीच वनक्षेत्र में तीन फीसद की गिरावट आई है। वनों के विनाश से वातावरण जहरीला होता जा रहा है और प्रतिवर्ष दो अरब टन अतिरिक्त कार्बन-डाइआक्साइड वायुमंडल में घुल-मिल रहा है। इससे जीवन की सुरक्षा कवच मानी जाने वाली ओजोन परत को नुकसान पहुंच रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार अगर पृथ्वी के तापमान में महज 3.6 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होती है, तो आर्कटिक और अंटाकर्टिका के विशाल हिमखंड पिघल जाएंगे, जिससे समुद्र के जलस्तर में भारी वृद्धि होगी और समुद्रतटीय शहरों के डूबने का खतरा बढ़ जाएगा। बेहतर होगा कि वैश्विक समुदाय ग्लोबल वार्मिंग की वजह से तिब्बत ही नहीं, बल्कि दुनिया के बिगड़ते स्वरूप से मुंह फेरने के बजाय उससे निपटने की विस्तृत कार्ययोजना तैयार करें।

 

 

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