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राजनीति: विनाश से बचने के विकल्प हैं गांधी

भारत का दुर्भाग्य यह रहा कि सामाजिक सद्भाव और पंथिक समरसता का जो मंत्र गांधी देश को सिखा गए थे, उसे स्वतंत्रता के बाद की राजनीति ने पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। यदि गांधी के प्रति राष्ट्र का सम्मान वास्तविक और व्यावहारिक होता, तो क्या फरवरी 2020 के अंतिम सप्ताह में छत्तीस घंटे तक दिल्ली में हुई हत्याएं, लूट, हिंसा संभव थी?

राजनीतिमहात्मा गांधी के विचार वैश्विक समस्याओं से निदान का रास्ता बताते हैं (फोटो-फ्री पिक)

वर्ष 1996 में यूनेस्को के तत्वावधान में आयोजित एक सम्मलेन में विश्व के समक्ष उपस्थित समस्याओं पर गहन विचार-विमर्श में यह उभरा कि मूल रूप से हर देश प्रगति और विकास की सही अवधारणा की खोज से जूझ रहा है। ऐसा भी कोई देश नहीं है जिसके सामने आर्थिक संकट समस्या बन कर न उपस्थित हो। इसी प्रकार हर देश ‘किसी न किसी प्रकार के नैतिक संकट’ से भी ग्रस्त है। पिछले पच्चीस वर्षों में बहुत कुछ बदल गया है। वैश्विक समस्याओं का निर्धारण और उनके समाधान की प्राथमिकताएंं अलग-अलग ढंग से देखी और समझी जा सकती हैं, मगर ऊपर लिखे तीनों पक्ष कहीं भी सुलझ गए हों, ऐसा उदाहरण शायद ही मिल सके।

आज के संदर्भ में जलवायु परिवर्तन और उससे जुड़े अनेक पक्ष समस्या बन कर उभरते हैं, जल और वायु की अलग-अलग स्थितियां भी विकट होती जा रही हैं। मनुष्य और प्रकृति के संबंध लगातार छिन्न-भिन्न होते जा रहे हैं, सुधारने के उपाय अपर्याप्त हैं, विकसित देश सहयोग करने में आनाकानी करा रहे हैं। इसके साथ ही हिंसा, युद्ध, आतंक, असुरक्षा, अविश्वास करोड़ों लोगों को प्रभावित कर रहे हैं। मनुष्य और प्रकृति के आपसी संबंध तहस-नहस हो चुके हैं। हर चर्चा में समस्याओं की सूची बढ़ती जाती है। यह भी हमारे समक्ष स्पष्ट है कि इक्कीसवीं सदी के दो दशक पूरे हो रहे हैं, मगर भौतिकवाद की दौड़ में कोई कमी नहीं आई है, परिणामस्वरूप अनेक देश हिंसा और हथियारों के जखीरे को प्रगति और विकास का पर्याय मानते हुए उसी को बढ़ाने में लगे हैं।

इस समय विश्व में सामजिक सरोकार भी अप्रत्याशित गति से बदल रहे हैं। यूरोप के अनेक देश जो एक जाति, धर्म और भाषा से सदियों से परिचित रहे, आज बड़े बदलावों को संभालाने के प्रयासों में लगे हैं। जनसंख्या, सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, भाषा, रंग, धर्म इत्यादि सभी के अनुपात तेजी से बदल रहे हैं। जहां विविधता की स्वीकार्यता का अनुभव नहीं है, वहां अविश्वास, आशंका और हिंसा लगातार बढ़ रहे हैं। अपेक्षा तो यह थी कि अपने हजारों साल के ‘हर प्रकार की विविधता की व्यावहारिक स्वीकार्यता’ के अनुभव के आधार पर भारत वैश्विक परिवर्तन में असमंजस के इस कठिन दौर में विश्व को रास्ता दिखाएगा। इस अपेक्षा को अनेक प्रबुद्ध जन बहुत पहले से ही विश्व के सम्मुख रखते आ रहे हैं। भारत की इस संस्कृति को गहराई तक समझने वाले डा. अर्नाल्ड टायनबी ने उसके महत्त्व को इन शब्दों में वर्णित किया था-‘यह भली भांति स्पष्ट हो रहा है कि एक अध्याय जिसकी शुरुआत पाश्चात्य थी, उसका समापन भारतीय होगा….।

मानव इतिहास के इस सबसे अधिक खतरनाक क्षण में मानव जाति की मुक्ति का यदि कोई रास्ता है तो वह भारतीय है- चक्रवर्ती अशोक और महात्मा गांधी का अहिंसा के सिद्धांत और रामकृष्ण परमहंस के धार्मिक सहिष्णुता के उपदेश ही मानव जाति को बचा सकते हैं। यहां हमारे पास एक ऐसी मनोवृत्ति व भावना है जो मानव जाति के लिए एक परिवार के रूप में विकसित होने में सहायक हो सकती है और इस अणुयुद्ध में विनाश का यही विकल्प है।’

महात्मा गांधी के विश्व पटल पर उभरने के बाद इस सोच को सारी दुनिया में सराहना तो मिली, मगर उसे अपनाने का साहस मार्टिन लूथर किंग जूनियर और नेल्सन मंडेला जैसे लोग ही कर सके। भारत की संस्कृति में जो सर्वश्रेष्ठ था, अद्वितीय था, उसे गांधी ने पहचाना, परखा और रोजमर्रा के जीवन में व्यवहार में अंतर्निहित किया। उन्होंने लोगों को एकजुट होकर राष्ट्रीय संघर्ष में सब कुछ भूल कर केवल भारतीय होकर शामिल होने का सफल आह्वान किया था। भारत का दुर्भाग्य यह रहा कि सामाजिक सद्भाव और पंथिक समरसता का जो मंत्र गांधी देश को सिखा गए थे, उसे स्वतंत्रता के बाद की राजनीति ने पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। यदि गांधी के प्रति राष्ट्र का सम्मान वास्तविक और व्यावहारिक होता, तो क्या फरवरी 2020 के अंतिम सप्ताह में छत्तीस घंटे तक दिल्ली में हुई हत्याएं, लूट, हिंसा संभव थी? इसके कारण तो संचार माध्यमों द्वारा चर्चित होते रहेंगे, राजनेता अपने-अपने दलगत स्वार्थों से आगे नहीं बढ़ेंगे और सार-तत्व आरोपों और प्रत्यारोपों में खो जाएगा। जब तक भारत का संपूर्ण समाज और राजनीति से अनछुए प्रबुद्ध जन आगे नहीं आएंगे, तब तक देश अपने सही रास्ते, अपनी क्षमता और वैश्विक उत्तरदायित्व को नहीं पहचान पाएगा। इसका खमियाजा सारे विश्व को उठाना पड़ेगा।

भारत क्या अपने उस राष्ट्रपिता के सिद्धांतों को अनदेखा कर सकता है, जिसके देहांत पर फ्रांस के मशहूर सोशलिस्ट नेता लीओन ब्लूम ने कहा था- ‘न मैंने उन्हें देखा है, न उनके देश गया हूं, न उनकी भाषा जानता हूं, लेकिन मुझे लग रहा कि मेरा निकट का स्नेही परिवारजन ही बिछुड़ गया है। सारा विश्व दु:ख में डूब गया है।’ आइंस्टीन ने लिखा था कि गांधी जैसी वैश्विक स्वीकार्यता, जन-प्रेम और श्रद्धा केवल उच्चतम स्तर के नैतिक आचरण द्वारा ही प्राप्त की जा सकती है। क्या भारत के हर बच्चे को अपने संवेदनशील वर्षों में ही इस प्रकार के तथ्यों को नहीं जानना चाहिए? विचारणीय है कि हमने शिक्षा में नैतिकता और चरित्र निर्माण को उचित स्थान क्यों नहीं दिया।

आज विश्व में विकसित देश ही नहीं, गरीबी, भुखमरी, अशिक्षा से जूझ रहे देश भी नए-नए हथियार खरीदने पर क्षमता से अधिक खर्च कर रहे हैं, परमाणु हथियारों से अपनी संपन्नता को गवर्पूर्ण ढंग से प्रचारित करते हैं। इनके सामने गांधी के विचारों, मूल्यों और सिद्धांतों को तो वही रख सकता है जो उनका कम से कम आंशिक रूप से पालन कर रहा हो। ऐसी अपेक्षा तो भारत से ही की जा सकती है और लोग कर भी रहे हैं, मगर हम स्वयं अपना घर ही नहीं संभाल पा रहे हैं तो किसी और को कैसे राह दिखा सकते हैं? सामान्यत: निरस्त्रीकरण की कोई संभावना आज के वातावरण में नज़र नहीं आती है।

अर्नाल्ड टायनबी सम्माननीय विद्वान, अध्ययनकर्ता, दार्शनिक और नव-ज्ञान के सर्जक के रूप में जाने जाते रहे। उन्होंने गांधी के रास्ते को मानवता के बचाने का विकल्प माना और ऐसा मानने वाले वे अकेले नहीं थे। गांधी के प्रभाव का विस्तार कितना वृहद् और विस्तृत था, इसका अनुमान आज भी लोगों को आश्चर्य में डाल देता है। जनरल डगलस मकार्थर मित्र-राष्ट्रों की उन सेनाओं के सर्वोच्च सेनानायक थे, जिन्होंने जापान पर कब्जा किया था। उनका सारा जीवन हिंसा को समझने, उसका उपयोग कर दूसरों द्वारा की जा रही हिंसा को शांत करने, यानी युद्ध में विजय प्राप्त करने में ही लगा रहा। वे युद्धक हथियारों की उपयोगिता और उपयोग के उच्चतम स्तर के विशेषज्ञ माने जाते थे।

गांधी के सिद्धांतों के प्रति उनके उद्गारों को कुछ इस तरह समझा जा सकता है- ‘सभ्यता के विकास में और यदि उसे जारी रहना है, यह समझना आवश्यक है कि सभी मनुष्यों द्वारा गांधी के इस विश्वास को स्वीकार करना ही होगा कि बल प्रयोग द्वारा विवादों का सुलझाया जाना न केवल गलत है, बल्कि उसमें मानव जाति के लिए आत्मघाती तत्व निहित हैं।’ यह एक ऐसे व्यक्ति का विश्लेषण है जिसकी प्रखरता, अनुभव और प्रतिबद्धता पर प्रश्न चिह्न लगाना किसी के लिए भी कठिन होगा।

यहां केवल चार संदर्भ दिए गए हैं: राजनेता, विद्वान, वैज्ञानिक और योद्धा! अनगिनत संदर्भों का हवाला दिया जा सकता है। रास्ता तो ज्ञात है, मगर उस पर चल सकने की रणनीति निर्धारित करना उतना ही कठिन है, जितना कि किसी भी देश को आज अपनी विकास की अवधारण निश्चित कर पाना। उचित और उपयोगी मार्ग तो ज्ञान, विवेक और नैतिकता के पथ पर चल कर ही ढूंढ़ा जा सकता है। इन तीनों का द्वार उस सार्वजनिक प्रारंभिक शिक्षा द्वारा खुलता है, जिसकी जड़ें गहराई तक देश की संस्कृति में समाई हों और जो नए ज्ञान को ग्रहण करने के लिए सदा प्रतिबद्ध हो।

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