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राजनीति: कर्ज का बढ़ता मर्ज

भारत में आर्थिक समस्या से पार पाने के लिए वर्तमान परिस्थितियों से हट कर पिछले दो वर्ष से चली आ रही आर्थिक सुस्ती को आधार बनाया जाना चाहिए। इस बात पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए कि देश में वर्तमान समय के आर्थिक संकट से पहले ही एक बड़ी मांग-आधारित आर्थिक सुस्ती आ चुकी थी और देश अब आपूर्ति-आधारित आर्थिक सुस्ती का भी सामना कर रहा है।

देश की अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए और बदलाव करने की जरूरत है।

संजय ठाकुर
अनुमान है कि इस साल के अंत तक वैश्विक अर्थव्यवस्था एक प्रतिशत तक सिकुड़ सकती है। संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक एवं सामाजिक मामले विभाग ने आर्थिक संकट के और गहराने की संभावना जताई है। विश्व पर ऋण की यह धनराशि विश्व के कुल उत्पादन के दोगुना से भी ज्यादा है। इस वक्त अर्थव्यवस्था के बहुत बुरे दौर से गुजरने के कारण ऋण की स्थिति और भी चिंताजनक है।

विश्व भर की अर्थव्यवस्थाओं के थमने से व्यापार और निवेश बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। इस समय विश्व की एक बड़ी जनसंख्या संसाधन न होने से बड़े वित्तीय संकट का सामना कर रही है। यह स्थिति विकसित और विकासशील, दोनों तरह के देशों में है। विकसित देशों में भी उपभोक्ताओं द्वारा किए जाने वाले खर्च में तेजी से गिरावट आई है, जिसका प्रभाव विकासशील देशों से उपभोक्ता-वस्तुओं के आयात पर पड़ेगा। वैश्विक विनिर्माण उत्पादन में गिरावट आने से वैश्विक आपूर्ति शृंखला भी बुरी तरह प्रभावित होगी।

इंस्टीट्यूट आफ इंटरनेशनल फाइनेंस की एक रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक ऋण दो सौ पचपन ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर को पार कर गया है। वैश्विक ऋण में भारी वृद्धि का कारण चीन और अमेरिका द्वारा बड़े पैमाने पर ऋण लेना है। विश्व भर के कुल ऋण का साठ प्रतिशत भाग इन्हीं दो देशों का है। इनके अलावा इटली, लेबनान, अर्जेंटीना, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और यूनान भी ज्यादा ऋण लेने वाले देशों की सूची में हैं।

वैश्विक ऋण के बढ़ने का एक कारण वैश्विक बॉण्ड बाजार पर निर्भरता भी है। इंस्टीट्यूट आफ इंटरनेशनल फाइनेंस के अनुसार वर्ष 2009 में वैश्विक बॉण्ड बाजार सत्तासी ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर था, जो वर्ष 2019 में एक सौ पंद्रह ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच चुका था। इस दृष्टि से देखें तो विश्व की सात अरब सत्तर करोड़ की कुल जनसंख्या में प्रत्येक व्यक्ति पर बत्तीस हजार पांच सौ पचास अमेरिकी डॉलर यानी चौबीस लाख इकतालीस हजार दो सौ पचास रुपए से ज्यादा के ऋण का भार है।

यह बहुत चिंता का विषय है कि कुल वैश्विक ऋण में से वाणिज्यिक ऋण का एक बड़ा भाग संकट में है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष पहले ही आगाह कर चुका है कि विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देशों में लगभग चालीस प्रतिशत यानी उन्नीस ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर का वाणिज्यिक ऋण संकट वाला है। इस संकट वाले ऋण का बड़ा भाग अमेरिका, चीन, जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस और इटली के पास है।

भारत के विदेशी ऋण में भी लगातार वृद्धि हो रही है। भारतीय रिजर्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत पर कुल विदेशी ऋण पांच सौ तिरालीस अरब अमेरिकी डॉलर का आंकड़ा पार कर चुका है। इस ऋण में एक वर्ष के अंतराल में तेरह अरब सत्तर करोड़ अमेरिकी डॉलर की वृद्धि हुई है। ऋण की यह राशि सकल घरेलू उत्पाद की 19.7 प्रतिशत है। भारत सरकार को प्रति वर्ष लाखों करोड़ रुपए सिर्फ ऋण के ब्याज के रूप में खर्च करने पड़ते हैं। वर्ष 2019-2020 के बजट में इस ऋण के ब्याज के रूप में सत्ताईस लाख अस्सी हजार करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया था।

भारत पर कुल ऋण में 37.3 प्रतिशत का एक बड़ा भाग वाणिज्यिक ऋण का है। इसके अलावा छब्बीस प्रतिशत भाग अनिवासी भारतीयों के जमा धन का है। ऋण की शेष राशि में 17.2 प्रतिशत अल्पावधिक ऋण, 11.1 प्रतिशत बहुपक्षीय ऋण, 2.2 प्रतिशत निर्यात-ऋण और 1.1 प्रतिशत अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से लिया गया ऋण है। इस कुल ऋण का आकलन करें तो पता चलता है कि भारत के प्रत्येक व्यक्ति पर पच्चीस हजार दो सौ इक्यावन रुपए का औसत ऋण है।

ऋण का यह भार इसी तरह बढ़ता रहा, तो उसे चुकाने के लिए भी ऋण लेने की स्थिति पैदा हो सकती है। इस समय भारत सरकार को हर वर्ष अपनी कुल आय का उन्नीस प्रतिशत ऋण के ब्याज के रूप में चुकाना पड़ता है, जो कि शिक्षा और स्वास्थ्य पर छह प्रतिशत से भी कम खर्च की जाने वाली धनराशि से कहीं ज्यादा है।

भारतीय अर्थव्यवस्था में एक बड़ा भाग देश के तीन राज्यों महाराष्ट्र, तमिलनाडु और कर्नाटक का है। देश की अर्थव्यवस्था में इन तीनों राज्यों का कुल योगदान सात सौ अस्सी अरब डॉलर है। वर्तमान परिस्थितियों में ये राज्य आर्थिक दृष्टि से देश के सबसे ज्यादा प्रभावित राज्यों में हैं, जिसका प्रभाव देश की समूची अर्थव्यवस्था पर पड़ना निश्चित है। ऐसे में देश पर वैश्विक ऋण का भार भी बढ़ेगा।

देश की प्रति व्यक्ति आय वर्ष 2019 तक दस हजार पांच सौ चौंतीस रुपए मासिक अर्थात एक लाख छब्बीस हजार चार सौ आठ रुपए वार्षिक थी। वित्तवर्ष 2020-2021 में राष्ट्रीय स्तर पर प्रति व्यक्ति आय के कम होने का अनुमान लगाया गया है। भारतीय स्टेट बैंक की एक शोध रिपोर्ट ‘इकोरैप‘ के अनुसार वित्तवर्ष 2020-2021 के दौरान अखिल भारतीय स्तर पर प्रति व्यक्ति आय 5.4 प्रतिशत कम हो जाएगी।

इस रिपोर्ट में चालू वित्तवर्ष के दौरान महाराष्ट्र, गुजरात, तेलंगाना और तमिलनाडु जैसे धनी राज्यों की प्रति व्यक्ति आय में दस से बारह प्रतिशत तक की गिरावट आने का अनुमान है। इस रिपोर्ट के अनुसार कुल मिलाकर आठ राज्यों और संघशासित प्रदेशों की प्रति व्यक्ति आय में इस दौरान दहाई अंक में गिरावट आने का अनुमान है।

इन राज्यों का देश के सकल घरेलू उत्पाद में सैंतालीस प्रतिशत तक का योगदान है। जिन राज्यों की प्रति व्यक्ति आय अखिल भारतीय स्तर के औसत से ऊंची है, ऐसे धनी राज्य प्रति व्यक्ति आय के मामले में ज्यादा प्रभावित होंगे। मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, और ओड़ीशा जैसे राज्यों में, जहां प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से कम है, प्रति व्यक्ति आय में आठ प्रतिशत की गिरावट आने का अनुमान है। इस रिपोर्ट में वित्तवर्ष 2020-2021 के दौरान सकल घरेलू उत्पाद में 6.8 प्रतिशत की गिरावट का अनुमान लगाया गया है।

उभरे परिदृश्य से पहले भी भारतीय अर्थव्यवस्था बहुत बुरे दौर से गुजर रही थी। भारत का नाममात्र सकल घरेलू उत्पाद पैंतालीस वर्ष और वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद ग्यारह वर्ष के न्यूनतम स्तर पर था। बेरोजगारी की दर पिछले पैंतालीस वर्ष में सबसे ज्यादा थी। ग्रामीण स्तर पर मांग पिछले चालीस वर्ष के न्यूनतम स्तर पर थी। ऐसे में आर्थिक संकट का उभरे परिदृश्य के संदर्भ में ही नहीं, एक समग्र आकलन किया जाना चाहिए।

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक, एशियाई विकास बैंक और मूडीज इन्वेस्टर्स सर्विस जैसी संस्थाएं भारत की आर्थिक वृद्धि दर के अनुमान में पहले ही बड़ी कटौती कर चुकी हैं।

वैश्विक आर्थिक संकट की दृष्टि से दो पहलुओं पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है। पहला, किसानों, असंगठित क्षेत्र के मजदूरों और शहरों में छोटा-मोटा काम करके आजीविका चलाने वाले लोगों से संबंधित अर्थव्यवस्था की सबसे कमजोर जनसंख्या और दूसरा, पूंजी और गैर-पूंजी वस्तुओं के उत्पादन से संबंधित क्षेत्र, जिसे अर्थव्यवस्था में उत्पादक कहा जाता है।

विश्व भर की सरकारों को इन दोनों ही पहलुओं पर काम करना होगा। इसके अलावा मध्यवर्ग पर भी ध्यान देना होगा, क्योंकि अर्थव्यवस्था के संकट में यह वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित होता है और सरकारों द्वारा जारी किए जाने वाले राहत-पैकेज में इसका कहीं नाम नहीं आता।

भारत में आर्थिक समस्या से पार पाने के लिए वर्तमान परिस्थितियों से हट कर पिछले दो वर्ष से चली आ रही आर्थिक सुस्ती को आधार बनाया जाना चाहिए। इस बात पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए कि देश में वर्तमान समय के आर्थिक संकट से पहले ही एक बड़ी मांग-आधारित आर्थिक सुस्ती आ चुकी थी और देश अब आपूर्ति-आधारित आर्थिक सुस्ती का भी सामना कर रहा है।

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