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वैश्विक कूटनीति और भारत

रूस-यूक्रेन युद्ध के मसले पर तटस्थता का रुख रखने का भारत का फैसला देश-दुनिया में चर्चा का विषय बना हुआ है।

सतीश कुमार

जब अमेरिका ने क्वाड को नाटो की तरह सैनिक तंत्र में बदलने की बात कही थी, तो भारत ने मना कर दिया था। यह भारत की वैश्विक सोच का नतीजा था। संघर्ष और युद्ध का माहौल एशिया महाद्वीप के लिए यथोचित नहीं है। भारत हमेशा युद्ध और संघर्ष के विरुद्ध खड़ा रहा है। इसलिए रूस-यूक्रेन मसले पर भारत के तटस्थता के निर्णय को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने की जरूरत है।

रूस-यूक्रेन युद्ध के मसले पर तटस्थता का रुख रखने का भारत का फैसला देश-दुनिया में चर्चा का विषय बना हुआ है। तटस्थता का रुख छोड़ रूस विरोधी खेमे में शामिल होने के लिए भारत पर लगातार दबाव बनाया जा रहा है। अमेरिका और उसके सहयोगी देश भारत पर इस बात के लिए दबाव बना रहे हैं कि उसे भी रूस के खिलाफ पश्चिमी देशों के प्रतिबंध में साथ आना चाहिए। लेकिन भारत का शुरू से मानना रहा है और वह कहता भी आया है कि रूस और यूक्रेन के राट्रपति को शांति प्रयासों पर जोर देना चाहिए। खेमेबाजी से तो युद्ध कभी शांत नहीं होने वाला। इसलिए भारत तटस्थ है और शांति का पक्षधर भी।

रूस का साथ छुड़वाने के लिए भारत के खिलाफ दबाव की कूटनीति मामूली नहीं है। इसके लिए अमेरिका हर तरह से प्रयास कर रहा है। पिछले दिनों अमेरिकी के उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार दिल्ली आए थे और भारत को चेताया भी था कि चीन के अतिक्रमण की सूरत में रूस उसकी कुछ भी मदद नहीं कर पाएगा, जो अमेरिका कर सकता है। साथ ही यह भी कहा था कि रूस के खिलाफ प्रतिबंधों का मतलब भारत को समझना चाहिए।

दरअसल, अंतराष्ट्रीय राजनीति में हर घटना अपना महत्त्व और नतीजे लिए होती है। इसलिए अमेरिका की इस गीदड़ भभकी का कोई अर्थ नहीं रह जाता। वैसे भी भारत की स्थिति शीत युद्ध के काल वाली नहीं है, जब उसे एक विवश और मजबूर देश के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा था। आज तमाम दबावों के बावजूद भारत अगर अपने फैसले पर अडिग है, तो इसके पीछे उसकी मजबूत और तार्किक विदेश नीति है। भारत का शुरू से कहना रहा है कि वह युद्ध रोकने और किसी भी देश की संप्रभुता की रक्षा के पक्ष में है। अंतरराष्ट्रीय संगठनों की मान-मर्यादा और विश्व शांति का हिमायती है।

भारत के तटस्थता के फैसले को व्यापक संदर्भ में देखने और समझने की जरूरत है। युद्ध एक बीमार मानसिकता का द्योतक है। यूक्रेन पर रूस के हमले से केवल यह मान लेना कि दोष रूस का ही है, सही नहीं है। सच तो यह है कि इस युद्ध की पटकथा लिखने में अमेरिका और यूक्रेन भी बराबर के दोषी हैं। नाटो के गठन से लेकर उसकी भूमिका और अतिक्रमण की नीतियों से दुनिया अनजान नहीं है।

अस्सी के दशक के दौरान अमेरिका ने रूस के पूर्व राष्ट्रपति गोर्बाचेव से वादा किया था कि किसी भी कीमत पर नाटो का विस्तार पूर्वी यूरोप में नहीं किया जाएगा। लेकिन हुआ इसका उल्टा। पहली बार नाटो का विस्तार 1997 में हुआ था, पर तब रूस चुप रहा। फिर 2004 में हुआ। तब भी रूस ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। लेकिन जब 2008 में यूक्रेन और जार्जिया को नाटो में शामिल करने की बात आई, तो रूस भड़क उठा। यानी इस युद्ध की पटकथा 2008 में ही लिखी जा चुकी थी। इसलिए दोषी कौन और कितना है, यह कोई अबूझ पहेली नहीं रह गई है।

देखा जाए तो नाटो का अभी तक का इतिहास रक्त रंजित ही रहा है। कोसोव, इराक और अफगानिस्तान में अमेरिकी नीतियों ने लाखों जानें ले लीं। करोड़ों लोग बेघर हो गए थे और नाटो ने कई देशों की राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था को नष्ट कर दिया था। आज नाटो की पीड़ा इसलिए भी है कि उसकी नीतियों को चुनौती मिल रही है। भारत रूस के आक्रमण से भी इत्तफाक नहीं रखता। इसलिए उसने अपनी टिपण्णी में बात की गंभीरता को बेबाकी से रखने की कोशिश की है। यह भी सच है कि 1956 में हंगरी और 1968 में चेकोस्लोवाकिया और फिर 1979 में अफगानिस्तान में रूसी दखल पर भी भारत ने तटस्थता की ही नीति अपनाई थी।

आज रूस यूक्रेन जंग के बीच भारत भी महाशक्तियों के केंद्र में है। भारतीय कूटनीति के लिए यह अग्निपरीक्षा का समय है। प्रमुख देशों के राजनयिक भारतीय विदेश नीति को अपने-अपने हितों के अनुरूप प्रभावित करने में जुटे हैं। भारत को दुविधा और दबाव में डालने का खेल जारी है। इसीलिए ये सवाल सबको हैरान कर रहे हैं कि आखिर विदेश मंत्रियों की यात्रा का मकसद क्या है? पिछले दिनों भारत यात्रा पर आए प्रमुख विदेश मेहमानों में जापान के प्रधानमंत्री के अलावा रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ही ऐसे नेता थे, जिनसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मिले थे।

इस मुलाकात पर अमेरिका और पश्चिमी देशों की पैनी नजर थी। इसके पहले चीन के विदेश मंत्री भी अचानक भारत यात्रा पर आए थे, लेकिन शीर्ष नेतृत्व से मुलाकात नहीं कर सके थे। इतना ही नहीं, अमेरिकी राजनयिक की यात्रा भी विदेश मंत्रालय तक सीमित रही। रूसी विदेश मंत्री ने पहली बार भारत-चीन सीमा विवाद पर खुल कर संकेत दिया।

उन्होंने कहा कि भारत और चीन के बीच स्थिति एक हद से ज्याउदा खराब नहीं हो, रूस यह सुनिश्चित करने के प्रयास में हमेशा रहेगा। इसके अलावा रूसी विदेश मंत्री ने यह संकेत भी दिया कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन को रोकने के लिहाज से बने भारत, अमेरिका, जापान और आस्ट्रेलिया के चौगुटे (क्वाड) के कारण भारत को लेकर चीन का संदेह खत्म करने का प्रयास भी रूस करेगा। रूसी विदेश मंत्री के ये इशारे हवा-हवाई नहीं कह जा सकते, क्योंकि रूस, भारत, चीन का संगठन- रिक (आरआइसी) इसका आधार मुहैया कराता है।

भारत-रूस रिश्तों का आधार पत्थर पर लकीर की तरह है। 1978 में विदेश मंत्री के रूप में जब अटल बिहारी बाजपयी रूस गए थे तो उन्होंने कहा था कि भारत का एकमात्र दोस्त रूस ही है। 1960 में रूस के राष्ट्रपति ख्रुश्चेव की टिपण्णी भी इसी तरह की थी कि हिमालय से भी भारत आवाज बुलंद करेगा तो रूस उसके लिए हमेशा खड़ा मिलेगा। यह दोस्ती समय के साथ और मजबूत बनती चली गई। शीत युद्ध में भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार रूस ही था। आज भी हथियारों का बड़ा हिस्सा भारत रूस से ही खरीदता है। तेल और गैस की कमी को भी रूस पूरा करने का वचन दे चुका है। मध्य एशिया और अफगानिस्तान की सुरक्षा में रूस की भूमिका महत्त्वपूर्ण है।

रूस और यूक्रेन युद्ध में कुछ बातें स्पष्ट हुई हैं। भारत एक ऐसा देश बना है जिसकी सोच और नीति ने दुनिया के देशों को प्रभावित किया है। भारत संभवत: दुनिया का अकेला देश है जहां हाल में रूस, चीन और अमेरिका के विदेश मंत्री आए। कारण भी स्पष्ट है। जब अमेरिका ने क्वाड को नाटो की तरह सैनिक तंत्र में बदलने की बात कही थी, तो भारत ने मना कर दिया था। यह भारत की वैश्विक सोच का नतीजा था। संघर्ष और युद्ध का माहौल एशिया महाद्वीप के लिए यथोचित नहीं है। भारत हमेशा युद्ध और संघर्ष के विरुद्ध खड़ा रहा है।

इसलिए रूस-यूक्रेन मसले पर भारत के तटस्थता के निर्णय को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने की जरूरत है। इराक, सीरिया, लीबिया, और अफगानिस्तान जैसे देशों में सम्प्रभुता का हनन होता रहा, तो यह कड़ी यूक्रेन के साथ कई अन्य देशों तक बनती चली जाएगी। इसलिए जरूरी है कि अंतराष्ट्रीय संगठनों को मजबूत करना और एक नियम बद्ध वैश्विक व्यवस्था की रचना करना। इसके लिए भारतीय विदेश मंत्री ने भारत की विदेश नीति को दुनिया के सामने स्पष्ट भी कर दिया है। जो देश भारत-रूस रिश्तों को कठघरे में रखने की कोशिश कर रहे हैं, उनका दोहरा चरित्र भी दुनिया देख ही रही है। लेकिन भारत दुनिया को युद्ध की विभीषिका से बचाने की पहल कर रहा है, न कि उन्माद फैलाने की।

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