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जहरीला होता भूजल

केंद्र सरकार 2024 तक प्रत्येक परिवार को साफ और शुद्ध पीने का पानी मुहैया कराने की योजना पर कार्य कर रही है, लेकिन सवाल है कि नदियों, झीलों, नहरों और तालाबों के पानी को साफ कर क्या सबको शुद्ध पानी उपलब्ध कराया जा सकता है? भूजल के विषैले होने और भूजल का स्तर लगातार नीचे जाने जैसी विकट समस्या के समाधान के बगैर देश के प्रत्येक परिवार को कैसे साफ और शुद्ध जल उपलब्ध कराया जा सकता है?

भारत सहित दुनिया के तमाम देशों में पीने लायक शुद्ध पानी मिलना किसी चुनौती से कम नहीं है। फाइल फोटो।

भारत सहित दुनिया के तमाम देशों में पीने लायक शुद्ध पानी मिलना किसी चुनौती से कम नहीं है। भारत में महज तीस प्रतिशत लोगों को पीने लायक पानी उपलब्ध है। उत्तर और दक्षिण भारत के अनेक इलाकों में भूजल में कई तरह के रासायनिकों के मिश्रण की वजह से शुद्ध पानी की उपलब्धता कठिन होती जा रही है। इस दिशा में सर्वोच्च न्यायालय ने संज्ञान लेकर जल मंत्रालय और राज्य सरकारों को ठोस कदम उठाने का निर्देश दिया था, लेकिन समस्या दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। गुजरात के कच्छ, राजस्थान के कई जिले, पश्चिम बंगाल, असम, कर्नाटक, हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश के कई जिलों में भूजल मिश्रण की समस्या विकराल होती जा रही है। राजस्थान के कई जिलों में लोगों को कई किमी पैदल चल कर पीने का पानी मिलता है, वह भी रासायनिक तत्त्वों से युक्त।

सरकारी आंकड़े बताते हैं कि सेहत के लिए खतरनाक रासायनिक तत्त्वों की मिलावट वाले दूषित पानी की उपलब्धता से सर्वाधिक प्रभावित राज्यों में राजस्थान, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और असम हैं। पर्यावरण मंत्रालय की मदद से केंद्रीय एजेंसी ‘एकीकृत प्रबंधन सूचना प्रणाली’ (आईएमआईएस) द्वारा देश में पानी की गुणवत्ता को लेकर तैयार किए आंकड़ों के मुताबिक राजस्थान की सर्वाधिक 19,657 बस्तियां और इनमें रहने वाले 77.70 लाख लोग जहरीला पानी पीने की वजह से प्रभावित हैं। आईएमआईएस द्वारा पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय को सौंपे गए आंकड़ों के मुताबिक पूरे देश में 70,736 बस्तियां फ्लोराइड, आर्सेनिक, लौहतत्त्व और नाइट्रेट सहित दूसरे लवण एवं भारी धातुओं के मिश्रण वाले दूषित जल से प्रभावित हैं। इस पानी से सीधे-सीधे 47.41 करोड़ आबादी प्रभावित है।

राजस्थान में फ्लोराइड, नाइट्रेट और लवणयुक्त भूजल का प्रकोप सबसे ज्यादा है। राज्य में 5996 बस्तियों के 40.94 लाख लोग फ्लोराइड, 12,606 बस्तियों में रहने वाले 28.53 लाख लोग लवणयुक्त और 1050 बस्तियों के 8.18 लाख लोग नाइट्रेट मिश्रित पानी के इस्तेमाल को विवश हैं। वहीं असम के भूजल का बहुत बड़ा हिस्सा आर्सेनिक के मिश्रण की वजह से इस्तेमाल के काबिल नहीं रह गया है। एक आंकड़े के मुताबिक असम की 4514 बस्तियों में रहने वाली सत्रह लाख की आबादी को आर्सेनिक युक्त पानी पीना पड़ रहा है। इससे कैंसर, हृदय सम्बंधी बीमारियों और पेट की बीमारियों से लोगों को दो-चार होना पड़ रहा है। असम सरकार ने इस दिशा में कुछ कोशिशें की हैं, लेकिन भूजल के प्रदूषित होते जाने में कोई ऐसा कदम अभी नहीं उठाया गया है, जिससे राज्य के सभी लोगों को साफ और शुद्ध पीने लायक पानी मिल पाए।

इसी तरह उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर, सोनभद्र, मेरठ, जौनपुर, बस्ती सहित अनेक जिलों में आर्सेनिक और दूसरे रासायनिक तत्त्वों का मिश्रण भूजल में पाया गया है। चंडीगढ़ स्थित लेबोरेटरी के परीक्षण के मुताबिक दिल्ली में जमीन के नीचे के पानी में क्लोराइड की मात्रा तय सीमा से एक हजार फीसद तक अधिक पाई गई। इसी तरह कैलशियम, मैग्नीशियम, जस्ता, सल्फेट, नाइट्रेट, फ्लोराइड, फेरिक (लोहा) और कैडमियम की मात्रा लगातार बढ़ती जा रही है। इन तत्त्वों से युक्त पानी पीने से हृदयघात, किडनी पर बुरा असर, लीवर का संक्रमण, गैस्ट्रिक कैंसर, दांत संबंधित बीमारियां, नर्वस सिस्टम पर बुरा असर, त्वचा संबंधी रोग, तनाव, अस्थमा, थॉयरायड, हृदय संबंधी रोग, डायरिया और आंख संबंधी अनेक समस्याएें देखी जा रही हैं।

सर्वोच्च न्यायालय ने भूजल के प्रदूषित होने के मद्देनजर बड़ी औद्योगिक इकाइयों को बंद करने या आबादी से दूर स्थापित करने का आदेश दिया था। उसका पालन कुछ राज्य सरकारों ने किया, लेकिन आज भी दिल्ली, कोलकाता, मुम्बई, हरिद्वार, फरीदाबाद, गुरुग्राम और दूसरे तमाम शहरों में औद्योगिक गतिविधियां जारी हैं, जिस पर तत्काल गौर करने की जरूरत है।

पश्चिम बंगाल, राजस्थान और असम की तरह ऐसा तीसरा राज्य है, जहां पानी में आर्सेनिक, नाइट्रेट जैसे जहरीले रासानिक तत्त्व बहुतायत में पाए जाते हैं। कोलकाता, उत्तर परगना, दक्षिण परगना, मुर्शीदाबाद जैसे अनेक जनपदों के भूजल में आर्सेनिक का होना सामान्य बात है। आंकड़ों के मुताबिक राज्य की 17,650 बस्तियों के 1.10 करोड़ लोग जहरीले पानी की उपलब्धता वाले इलाके में रहते हैं। इन इलाकों में रहने वाले ज्यादातर लोग कैंसर, फेफड़े, आंख की समस्या, अस्थमा, त्वचा संबंधी बीमारियों से पीड़ित रहते हैं। चिंता की बात यह है कि राज्य सरकार ने इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाए हैं, जिससे समस्या लगातार बढ़ती जा रही है। गौरतलब है कि राज्य सरकार की तरफ से लोगों को साफ और शुद्ध पीने लायक पानी मुहैया कराना बहुत बड़ी चुनौती है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने आर्सेनिक का अधिकतम सुरक्षित स्तर दस पार्ट्स प्रति अरब (पीपीबी) माना है। गौरतलब है दुनिया के पंद्रह करोड़ लोग नियमित रूप से इससे अधिक आर्सेनिक युक्त पानी पी रहे हैं। भारत के अलावा बांग्लादेश, अमेरिका सहित दुनिया के ऐसे तमाम देश हैं जहां आर्सेनिक, नाइट्रेट, कुछ खास तरह के लवण भूजल में घुले मिलते हैं। गौरतलब है कि विकसित देशों ने नई तकनीक के जरिए भूजल के विषाक्त होने की समस्या को काफी कुछ हल कर चुके हैं, लेकिन भारत, बांग्लादेश जैसे विकासशील देशों में अभी इस दिशा में ऐसा कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा सका है, जिससे लोगों को जहरीला पानी पीने से छुटकारा मिलता।

नई वैज्ञानिक भूजल शोधन तकनीकि से आर्सेनिक, नाइट्रेट और दूसरे जहरीले रसायनों का भूजल में मिश्रित होने की प्रक्रिया को समझ कर भूजल के जहरीले होने से रोका जा सकता है। उदाहरण के तौर पर अपरदन से चट्टानों के माध्यम से चट्टानों में मौजूद खनिज मिट्टी में आर्सेनिक छोड़ते रहते हैं। फिर मिट्टी से यह भूजल में चला जाता है, जिससे भूजल जहरीला हो जाता है। इसके अलावा मानव गतिविधियां, जैसे खनन और भूतापीय ऊष्मा उत्पादन, आर्सेनिक के पेयजल में मिलने की प्रक्रिया को बढ़ाते हैं। इसका एक उदाहरण कोयला जलने के बाद उसकी बची हुई राख है, जिसमें आर्सेनिक और दूसरे जहरीले पदार्थ होते हैं, हवा या दूसरे माध्यम से शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। गौरतलब है कि भूजल में जहरीले तत्त्वों के मिश्रण, जिस प्रक्रिया से जल को दूषित करते हैं उसे रोकना असंभव नहीं तो मुश्किल जरूर है। लेकिन नई तकनीकि के इस्तेमाल से जल का शोधन कर पीने लायक पानी लोगों को मुहैया कराया जा सकता है।

प्रदूषित पानी पीने से सेहत पर तो असर पड़ता ही है, जिस जानवर को पिलाया जाता है और खेती के लिए इस्तेमाल किया जाता है वे सभी जहरीलें तत्त्वों के असर से दूषित हो जाती हैं। इससे ग्रामीण इलाकों के लोगों, जानवरों और खेती पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है। वैज्ञानिकों के मुताबिक पानी में फ्लोराइड से फ्लूरोसिस, नाइट्रेट से श्वास संबंधी बीमारियां, लौह युक्त पानी से आॅस्टियोपोरोसिस, आर्थराइटिस और आर्सेनिक युक्त दूषित जल से कैंसर जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। यानी अगर भारत के लोगों को शुद्ध पानी मुहैया करा दिया जाए तो करोड़ों लोग अनेक घातक बीमारियों से बच सकते हैं।

केंद्र सरकार 2024 तक प्रत्येक परिवार को साफ और शुद्ध पीने का पानी मुहैया कराने की योजना पर कार्य कर रही है, लेकिन सवाल है कि नदियों, झीलों, नहरों और तालाबों के पानी को साफ कर क्या सबको शुद्ध पानी उपलब्ध कराया जा सकता है? भूजल के विषैले होने और भूजल का स्तर लगातार नीचे जाने जैसी विकट समस्या के समाधान के बगैर देश के प्रत्येक परिवार को कैसे साफ और शुद्ध जल उपलब्ध कराया जा सकता है? जल संचयन, बड़े पैमाने पर जल शोधन और जल का अपरिग्रह करके जल से ताल्लुक रखने वाली सभी तरह की समस्याओं का समाधान किया जा सकता है।

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