ताज़ा खबर
 

राजनीतिः गांधीजी और राष्ट्रीय शिक्षा नीति

राष्ट्र निर्माण के लिए जरूरी है कि हम लड़कियों को शुरुआती वर्षों से ही सशक्त बनाएं। समानता को एक उत्साही सपने के रूप में ही नहीं दिखना चाहिए, बल्कि स्कूलों में भी दिखना चाहिए। लड़कियों को बिना किसी भेदभाव के शिक्षा दी जानी चाहिए। नई शिक्षा नीति समान रूप से समानता के सिद्धांत को बढ़ावा देती है।

गांधीजी का मानना था कि शारीरिक प्रशिक्षण ही बुद्धि को बढ़ाने का एकमात्र साधन है।

रमेश पोखरियाल ‘निशंक’

पिछले वर्ष गांधीजी की एक सौ पचासवीं जयंती के अवसर पर संयुक्त राष्ट्र महासभा की चौहत्तरवीं बैठक को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था- ‘महात्मा गांधी का सत्य और अहिंसा का संदेश वैश्विक शांति, प्रगति और विकास के लिए अभी भी प्रासंगिक है।’ इस लेख में मैं राष्ट्रीय शिक्षा नीति और यह कैसे गांधीजी के विचारों पर निर्भर करती है, इस पर ध्यान केंद्रित करना चाहूंगा।

शिक्षा प्रणाली में क्रांति लाने के लिए गांधीजी ने ‘वास्तविक शिक्षा प्रणाली’ की शुरुआत की थी और इसका प्रारंभ टॉल्स्टॉय फार्म से प्रयोगों से हुआ था, जहां ‘नई तालीम’ के बीज बोए गए थे। भारत लौटने के बाद सीगन, वर्धा और सेवाग्राम में उनके काम ने उन्हें बुनियादी शिक्षा प्रणाली की जड़ें स्थापित करने में मदद की, एक ऐसी प्रणाली, जिसमें शिक्षा मुफ्त और अनिवार्य थी और मातृभाषा में प्रदान की जाती है। शिक्षा की प्रक्रिया शारीरिक और उत्पादक कार्यों पर केंद्रित थी, जो बच्चे के वातावरण के करीब है।

गांधीजी के प्रयास वास्तव में एक ऐसी शिक्षा प्रणाली के दिवास्वप्न के रूप में सामने आए, जिसमें विद्यार्थियों को सत्य और अहिंसा के मूलभूत सिद्धांतों के साथ देश की आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक समृद्धि तथा राष्ट्रीय समाज के लिए तैयार किया जाता है। उनके शैक्षिक प्रयोगों ने अविनाशी अंतर्दृष्टि प्रदान की, जो आज तक प्रासंगिक हैं। गांधीजी के सिद्धांत केवल भारत के लिए नहीं, बल्कि संपूर्ण विश्व के हैं। इसीलिए संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) के महानिदेशक से बातचीत करते समय मैंने सत्य और अहिंसा के संदेश को पूरे विश्व में प्रसारित करने के लिए दोहराया।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति इक्कीसवीं शताब्दी की आवश्यकताओं और मांगों को पूरा करने के लिए अपनी रणनीतियां बनाते हुए, गांधीजी के दृष्टिकोण को भी रेखांकित करती है। ऐसे पांच तरीके हैं, जो उनकी शिक्षा प्रणाली भारत और पूरे विश्व में शिक्षा के मुद्दे पर वाद-विवाद प्रस्तुत करने के लिए उपयुक्त हैं। इनमें पहला है- ‘शांति के लिए शिक्षा’। गांधीजी के लिए सत्य और अहिंसा श्रेष्ठ मूल्य थे। छात्रों को मानव समुदाय के बीच शांतिपूर्ण और सहयोगात्मक जीवन के लिए तैयार रहना चाहिए, नई तालीम उसी की अभिव्यक्ति थी। हमारी नई शिक्षा नीति का मूल सिद्धांत अच्छे मनुष्य विकसित करना है, जो समतापूर्ण और समावेशी समाज के विकास में योगदान दे सकें, जिसमें तर्क, करुणा, सहानुभूति, सहनशीलता, वैज्ञानिक प्रवृत्ति तथा नैतिकता और मूल्यों को कायम रखने के साथ-साथ सर्जनात्मकता का भी समावेश हो।

दूसरी प्रमुख बात मातृभाषा की आती है। गांधीजी ने इस बात पर जोर दिया कि बच्चे की शिक्षा में मातृभाषा को केंद्रीय या प्रमुख स्थान मिलना चाहिए। उनका विश्वास था कि विदेशी माध्यम में अध्यापन से छात्र राष्ट्र की आध्यात्मिक और सामाजिक विरासत से वंचित हो जाते हैं। उनके सिद्धांतों को प्रतिध्वनित करते हुए, नई शिक्षा नीति बहुभाषावाद को बढ़ावा देती है और स्पष्ट करती है कि ‘जहां भी संभव हो, शिक्षा का माध्यम घरेलू भाषा, मातृभाषा, स्थानीय भाषा या क्षेत्रीय भाषा होनी चाहिए।’ नई शिक्षा नीति में भारतीय भाषाओं के संवर्धन, परिरक्षण और संरक्षण के लिए अनेक पहल प्रस्तावित की गई हैं। प्रधानमंत्री ने इक्कीसवीं शताब्दी के स्कूली शिक्षा सम्मेलन में जोर देकर कहा था कि एस्तोनिया, आयरलैंड, फिनलैंड, जापान, दक्षिण कोरिया और पोलैंड जैसे देश अपनी प्राथमिक शिक्षा अपनी मातृभाषा में प्रदान करते हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि छोटे बच्चे अपनी गृहभाषा या मातृभाषा में अवधारणाओं को जल्दी सीखने और समझने में सक्षम होते हैं।

गांधीजी का मानना था कि शारीरिक प्रशिक्षण ही बुद्धि को बढ़ाने का एकमात्र साधन है। व्यावसायिक शिक्षा को यांत्रिक नहीं, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि से भी पढ़ाया जाना चाहिए। प्रयोगवाद, निर्माणवाद जैसे सिद्धांत व्यावसायिक शिक्षा के समावेश के माध्यम से ही समृद्ध होंगे। श्रम की गरिमा-महत्ता का संरक्षण पहले किया जाना चाहिए। नई शिक्षा नीति के आगमन के साथ कला और विज्ञान, पाठ्यक्रम और पाठ्यचर्या गतिविधियों, व्यावसायिक और अकादमिक धाराओं के बीच कोई सख्त विभाजन नहीं होगा। नई शिक्षा नीति गांधीजी की परिकल्पना के अनुरूप लक्ष्य निर्धारित करती है, जो 2025 तक कम से कम पचास फीसद स्कूल और उच्च शिक्षा प्रणाली को व्यावसायिक शिक्षा के साथ संबद्ध करने का प्रयास करेगी।

व्यावसायिक शिक्षा का एकीकरण माध्यमिक विद्यालय के प्रारंभिक वर्षों में शुरू होगा और फिर चरणबद्ध ढंग से उच्च शिक्षा में शामिल किया जाएगा। इसे देखते हुए शिक्षा मंत्रालय शिक्षकों के लिए राष्ट्रीय व्यावसायिक मानकों के विकास पर काम करेगा। इसे मिशन मोड में अंजाम दिया जाएगा और वर्ष 2022 तक राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद द्वारा एनसीईआरटी, एससीईआरटी, शिक्षकों के परामर्श और व्यावसायिक शिक्षा के विशेषज्ञ निकायों तथा उच्च शिक्षा संस्थानों के परामर्श से पूरा किया जाएगा।

राष्ट्र निर्माण के लिए जरूरी है कि हम लड़कियों को शुरुआती वर्षों से ही सशक्त बनाएं। समानता को एक उत्साही सपने के रूप में ही नहीं दिखना चाहिए, बल्कि स्कूलों में भी दिखना चाहिए। लड़कियों को बिना किसी भेदभाव के शिक्षा दी जानी चाहिए। नई शिक्षा नीति समान रूप से समानता के सिद्धांत को बढ़ावा देती है। नई शिक्षा नीति का लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी बच्चा जन्म या पृष्ठभूमि की परिस्थितियों के कारण सीखने और उत्कृष्टता हासिल करने का कोई अवसर खो न दे। यह नीति सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित समूहों पर विशेष बल देने के साथ लैंगिक पहचान और वंचित वर्गों के हितों को भी ध्यान में रखती है। वंचित क्षेत्रों और समूहों के लिए विशेष शिक्षा क्षेत्रों के साथ-साथ लिंग समावेशन निधि का सृजन किया जाएगा। इन प्रयासों से भारत की सभी लड़कियों और ट्रांसजेंडर विद्यार्थियों को भी समान गुणवत्ता की शिक्षा प्रदान करने की क्षमता में मदद मिलेगी।

शिक्षक के बिना शिक्षा के वास्तविक लक्ष्य हासिल नहीं किए जा सकते। एक शिक्षक शिक्षा प्रणाली का आधार है। गांधीजी की मान्यता थी कि शिक्षकों को युवाओं की आकांक्षाओं का मार्ग प्रशस्त करते हुए विद्यार्थियों के हृदय और आत्मा को स्पर्श करना चाहिए। शिक्षक को पर्याप्त रूप से भुगतान किया जाना चाहिए। नई शिक्षा नीति की सिफारिशों के अनुसार 2022 तक शिक्षा मंत्रालय शिक्षकों के लिए राष्ट्रीय व्यावसायिक मानकों का विकास करेगा। मानकों में कार्यकाल, व्यावसायिक विकास प्रयास, वेतन वृद्धि, प्रोन्नति सहित शिक्षक करियर प्रबंधन से संबंधित विभिन्न पहलुओं को निर्धारित करने में मदद मिलेगी।

गांधीजी द्वारा निरूपित विभिन्न प्रकार की शिक्षा प्रणालियां आज भी अर्थवान हैं। ये हमारे लिए इक्कीसवीं सदी की आकांक्षाओं को पूरा करने की नींव हैं। इस शिक्षा नीति में ‘पांच आई’ का समावेश है- इंडियन (भारतीय), इंटरनेशनल (अंतरराष्ट्रीय), इंपैक्टफुल (प्रभावकारी), इंटरएक्टिव (अंत:क्रियात्मक) और इन्क्लूसिव (समावेशी)। इसीलिए हमें गांधीजी के विचारों, शब्दों और कर्मों द्वारा चिष्टिनत आत्मनिर्भर युवा विद्यार्थियों की शिक्षा और सर्वांगीण विकास के लिए सभी राज्यों, शिक्षाविदों, कुलपतियों, शिक्षकों और अभिभावकों को आमंत्रित कर गांधी जयंती की एक सौ इक्यावनवीं वर्षगांठ को प्रतीकात्मक और यादगार बनाना चाहिए। इस काम की शुरुआत एक प्रतिज्ञा के रूप में होनी चाहिए, वैसी ही प्रतिज्ञा जैसे कि नई तालीम के तत्कालीन प्रचारकों ने ली थी- ‘शिक्षा में सत्य और अहिंसा की भावना को सांस लेने के समान और बच्चों तथा वयस्कों को एक ऐसा समाज बनाने के लिए तैयार करना, जिसमें स्वतंत्रता, नैतिक और भौतिक प्रगति जिम्मेदारी के साथ लोगों के हाथों में पहुंचे’।
(लेखक केंद्रीय शिक्षामंत्री हैं)

Next Stories
1 राजनीतिः मुद्दा आतंकवाद की परिभाषा का
2 राजनीति: धरती के दोहन से बढ़ते संकट
3 राजनीति: शांति की कठिन डगर
ये पढ़ा क्या?
X