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गांधी की फिक्र किसे है!

से वानिवृत्त न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर कर संसद द्वारा उनकी निंदा के प्रस्ताव को रद्द करने की प्रार्थना की है। लोकसभा और राज्यसभा ने काटजू की भर्त्सना की थी, क्योंकि उन्होंने अपने ब्लॉग में महात्मा गांधी को ब्रिटिश एजेंट और नेताजी सुभाषचंद्र बोस को जापानी एजेंट कहा था। राष्ट्र के […]

Author July 14, 2015 6:02 PM

से वानिवृत्त न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर कर संसद द्वारा उनकी निंदा के प्रस्ताव को रद्द करने की प्रार्थना की है। लोकसभा और राज्यसभा ने काटजू की भर्त्सना की थी, क्योंकि उन्होंने अपने ब्लॉग में महात्मा गांधी को ब्रिटिश एजेंट और नेताजी सुभाषचंद्र बोस को जापानी एजेंट कहा था।

राष्ट्र के बुद्धिकर्मियों को काटजू के ज्ञान (या अज्ञान) पर तरस खाना चाहिए, क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही के अपने एक निर्णय में कहा था कि महात्मा गांधी और नेताजी सुभाषचंद्र बोस ऐतिहासिक प्रतीक और प्रतिमूर्तियां हैं, जिनकी अवमानना नहीं की जा सकती, जिनके बारे में अपशब्द इस्तेमाल नहीं किए जा सकते हैं। मगर काटजू हैं कि सस्ते छपास की लिप्सा की गिरफ्त ढीली नहीं कर पाते हैं।

इतनी अनर्गल और ऊलजलूल बात एक विधिवेत्ता का बोलना अमेरिकी गांधी मार्टिन लूथर किंग की उक्ति की याद दिलाता है कि अज्ञान और मूढ़ता बड़ी खतरनाक प्रवृत्ति है। इसलिए काटजू की मनोदशा का समीचीन निदान योगदर्शन में है। चित्त की पांच मान्य भूमियों के दूसरे नंबर पर आती है ऐसी दशा, जिसमें तमोगुण के आधिक्य से विवेकशून्यता आ जाती है। जगहंसाई होती है। इसे अखिल भारतीय फॉरवर्ड ब्लॉक के प्रधान सचिव देवव्रत विश्वास ने बताया था कि बुढ़ौती से ग्रसित मार्कंडेय काटजू अपना मानसिक संतुलन गंवा बैठे हैं।

लेकिन मेरे लिए यहां विचारणीय वस्तु काटजू का प्रलाप नहीं है। बल्कि भारतवासियों की तंद्रा और मरियलपन है। मानो शरीर नहीं कंकाल है, जिसमें बिना मगज के खोपड़ी है। वरना राष्ट्रपिता को ब्रिटिश एजेंट कोई कहे और आजाद हिंदुस्तान में उबाल न आए? इससे अच्छा तो गुलाम भारत था, जब बापू की एक आवाज पर जनता लाठी-गोली का सामना करती थी, पुलिसिया यातनाएं झेलती थी, प्रतिरोध में मारती नहीं थी, पर मानती भी नहीं थी। आइंस्टीन ने इस व्यक्ति के बारे में कहा था कि आने वाली पीढ़ियां यकीन नहीं करेंगी कि हाड़-मांस का ऐसा आदमी धरा पर आया भी था। पर आइंस्टीन के समय मार्कंडेय काटजू नहीं थे।

तो बापू का बचाव फिर कौन करे? गांधीवादी लोग भी नहीं। वे तो अहिंसा को कायरता का पर्याय बना बैठे। सहनशीलता है, पर दरअसल कायर हैं। बापू ने कहा था कि असत्य के विरुद्ध लड़ाई में नपुंसक अहिंसा के बजाय हिंसा पसंद करूंगा। ब्रिटिश साम्राज्यवाद से लोहा लेने वाले कांगे्रसियों के वंशज भी आज खामोश हैं। कुजात गांधीवादी लोहिया के लोग भी सत्ता-सुख से सराबोर हो चुके हैं; उनके विरोध के औजार भोथरे हो गए हैं। वरना पचास-साठ लालटोपी धारक काटजू के आवास के सामने धरना देते, पुतला फूंकते। सबसे सहज गांधीवादी तरीका यही है आक्रोश जाहिर करने का। सही कहा उनके मुख्यमंत्री ने कि थाना-जमीन की सियासत से उबरें तो ये युवजन गांधी-लोहिया की सोचें।

तो फिर बापू के बचाव में कौन उठ खडेÞ हों? कम्युनिस्ट? पर वे गांधीजी को वर्ग संघर्ष का विरोधी मानते आए हैं। हालांकि केरल और बंगाल के मार्क्सवादियों का शुमार आज नवधनाढ्यों में होता है। वे तो जवाहरलाल नेहरू को अमेरिकी साम्राज्यवाद का भौंकता कुत्ता कहते थे। (पार्टी पत्रिका: 1947, सितंबर में)। बचे जनसंघी यानी आज के भाजपाई। जिस विचारधारा ने गोली बन कर राष्ट्रपिता की हत्या की वह कितनी मुफीद होगी? अब देखें दलितों के पार्टीजन को। बापू ने समस्त जीवन लगा दिया दलित सेवा में। उसी जाति के कांशीराम ने अपने प्रदर्शनकारियों के जुलूस में कहा था कि राजघाट में शौच करें।

यानी बापू असहाय लगते हैं। उनकी प्रतिमा कोई तोड़ दे, उस पर रंग पोत दे, गंदा कर दे, तो भी न कोई हिंसक प्रदर्शन होता है और न कोई मूक विरोध। जरा भीमराव आंबेडकर की प्रतिमा के साथ कोई ऐसा करके देखे? लखनऊ के गोमतीनगर में मायावती की प्रतिमा का कुछ उग्र युवा समाजवादियों ने अंगभंग कर दिया था। तब क्षमार्थियों में सर्वप्रथम मुलायम सिंह यादव थे। करदाताओं के रुपयों से समाजवादी मुख्यमंत्री ने तत्काल मरम्मत करा दी। सच्चाई यह है कि अधिनायकवादी राष्ट्रों में ही जीवित व्यक्ति की मूर्ति लगाई जाती है। इस सच से भी समाजवादियों ने मुंह फेर लिया था।

कुछ माह बीते हत्यारे गोडसे की मूर्ति लगाने की मुहिम चली। विकृत मन वाले केवल पागलखाने में नही हैं। छुट््टा भी घूमते हैं। गोडसे वाले उन्हीं में हैं। फिर सोचता हूं कि बापू के पक्ष में इन सब तर्कों की जरूरत क्यों है? वे भौतिकता से इतने परे, अध्यात्म के उस चरम पर पहुंच गए थे, जहां शरीर का मोह मायने नहीं रखता।

इसका प्रमाण मेरे मित्रों ने दिया। उन लोगों ने प्लांशेट पर गांधीजी की आत्मा से संपर्क करने का प्रयास किया था। बापू नहीं आए। कोई दूसरी आत्मा आई और उसने कहा कि गांधीजी मरणशील मानव की पहुंच से बहुत दूर हैं। वे दिव्य आत्मा हैं, जो अब नहीं आएंगे। बात सच हो। भले कतिपय आधुनिक जन विश्वास न करें।

लौटें अब मार्कंडेय काटजू के धरातल (या रसातल) पर। भारतीय इतिहास का उनका ज्ञान लचर है। सबसे उग्र और हिंसक साम्राज्यवादी विन्स्टन चर्चिल पुणे की आगा खां जेल में गांधीजी द्वारा सर्वजन हिताय की मांग में किए गए आमरण अनशन पर उनकी मृत्यु की खबर का स्वागत करने के लिए तत्पर थे। ईशू की राह के यात्री गांधी को भगवान ने बचा लिया। चर्चिल को परास्त जो करना था। दलित-सवर्ण सामंजस्य बापू ने दृढ़तर बना दिया।

काटजू को क्या पता है कि बापू कितने बरस ब्रिटिश जेल में रहे? जेल मानवकृत नरक है। यह मैं अपने निजी अनुभव के आधार पर लिख रहा हूं। मार्कंडेय काटजू ने शारीरिक यातना कभी नहीं सही। वे चेन्नई हाइकोर्ट के मुख्य न्यायमूर्ति बन कर गए। उनकी किसी उक्ति पर वकीलों ने हड़ताल कर दी। मुर्दाबाद के नारे गूंजे। वे इलाहाबाद उच्च न्यायालय में भी रहे। वहां बहुत माकूल माहौल नहीं प्राप्त हुआ। अब आरामकुर्सी पर विराजे इस बौद्धिक के कुछ उद्गारों पर गौर करें।

उन्होंने कहा कि उनकी राय में ‘बांटो और राज करो वाली ब्रिटिश नीति के गांधीजी पोषक थे। गांधीजी मुसलिम-विरोधी थे, क्योंकि वे गौभक्त और सनातनी थे। गांधी बंटवारे के कारक थे।’ याद कर लें 1947 का दिन। जब थके-हारे नेता सत्ता पाने के लिए तड़प रहे थे, तब बापू दिल्ली की गलियों में मुसलमानों को हिंदू दंगाइयों से बचा रहे थे। मशहूर पत्रकार लुई फिशर मई, 1942 में सेवाग्राम आए थे। उन्हें अचरज हुआ जब इस हिंदू नेता की झोपड़ी की दीवार पर एक चित्र टंगा था। नीचे लिखा था, यह हमारा शांतिदूत है। चित्र था ईसा मसीह का। ज्ञान और विवेक में काटजू की लुई फिशर से क्या बराबरी हो सकती है?
गांधीजी की चलती तो मौलाना अबुल कलाम आजाद कांग्रेस अध्यक्ष के नाते प्रथम प्रधानमंत्री बनते। लेकिन नेहरू ने अड़ंगा लगा दिया। गांधीजी तो विभाजन रोकने के लिए मोहम्मद अली जिन्ना को प्रधानमंत्री नियुक्त करने का प्रस्ताव वायसराय माउंटबेटन को दे चुके थे। सत्तालोलुप जिन्ना की लार टपक रही थी। पर पाकिस्तान समर्थक माउंटबेटन ने नकार दिया। गांधीजी मुसलिम-विराधी थे तो गोडसे की पिस्तौल उन पर क्यों चली? काटजू ने अगर किताबें मन लगा कर पढ़ी होतीं तो गांधीजी के लिए मुसलिम-विरोध वाला प्रलाप हरगिज न करते।

काटजू ने नैतिकता की गुहार भी लगाई। स्वयं काटजू भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष के रूप में कितने नैतिक रहे? बिहार और तमिलनाडु की गैर-कांग्रेसी सरकारें उन्हें प्रेस की आजादी की विरोधी लगीं। उन्होंने कहा था कि समाजवादी सरकार को उत्तर प्रदेश में और समय मिलना चाहिए। एक न्यायविद के लिए बिना प्रमाण और तर्कों के ऐसा आकलन करना क्या उचित है? वे दिल्ली के मतदाता हैं, इसलिए बोले: बजाय किरण बेदी के युवा शाजिया इल्मी को मुख्यमंत्री के रूप में भाजपा को पेश करना चाहिए था।

डिग्री के बिना सौंदर्यशास्त्र की उन्हें महारत हासिल है। महिलाओं को सुंदर पुष्प मानते हैं, पर कहते हैं कि उन्हें तोड़ नहीं सकता, तारीफ तो कर ही सकता हूं। उम्र सत्तर पार की है। काटजू का सर्वाधिक दिलचस्प बयान था कि नब्बे प्रतिशत भारतीय मूर्ख हैं।

काटजू सदैव बहुसंख्यक वर्ग में ही रहे हैं। पत्नी सुनंदा की हत्या के आरोप में चर्चित कांग्रेसी नेता शशि थरूर के रिश्तेदार काटजू चाहते हैं कि राष्ट्रपति पद पर कैटरीना कैफ सवार हो जाएं, और ‘शीला की जवानी’ वाला गाना गाया जाए। उनके आकलन में साध्वी निरंजन ज्योति, स्मृति ईरानी से ज्यादा लावण्यमयी हैं। पूजापाठ से परलोक सुधारने की आयु वाले काटजू चटखारे लेकर नारी-विषयों पर राय व्यक्त करते हैं।

वे हर विषय पर मत रखते हैं, आलू तक पर। उनका नजरिया सकारात्मक नहीं, आक्रामक रहता है। इससे विवाद उपजता है। नाम होता है। कभी उनकी अरुण जेटली से यारी थी। भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में सार्वजनिक बयान भी दे चुके हैं। पर जब प्रेस परिषद के दुबारा अध्यक्ष नामित नहीं किए गए, तो राग बदल गए। हिंदू सांप्रदायिकता का स्मरण हो चला। खीझ और चिढ़ सोच को विकृत कर देती है।

काटजू ने संसद पर आरोप लगाया कि उन्हें बिना सुने, बिना जवाब तलब किए उनकी निंदा कर दी गई। गौर कीजिए कि खुद काटजू ने प्रेस परिषद में सुनवाई के अधिकार का कैसे हनन किया। खाप पंचायत बना दी थी परिषद को। श्रमजीवी पत्रकारों के दो संगठनों को कारण बताने का हक बिना दिए, बिना उनके पक्ष को सुने, उनकी दरख्वास्त खारिज कर दी। आज दिल्ली उच्च न्यायालय में काटजू के निर्णय को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई हो रही है।

दिग्भ्रमित व्यक्ति कभी-कभी यथार्थ की बात भी करने लगता है। अपनी याचिका में काटजू ने सर्वोच्च न्यायालय से मांग की है कि उन्हें ल्यूनाटिक एक्ट (अस्थिर मानसिकता अधिनियम) के तहत कैद कर लिया जाए। तो इसे आत्मानुभूति कहा जाए या इलहाम!

के. विक्रम राव

 

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