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युद्ध के हासिल और सवाल

अभी तक का तथ्य तो यही है कि युद्धों ने दुनिया और सभ्यता को नुकसान तो बहुत पहुंचाया, परंतु कोई भी ताकतवर अपने से भिन्न मत या कमजोर शक्ति वाले को समाप्त कभी नहीं कर पाया।

नाटो देशों की ओर से यूक्रेन को दी जा रही आर्थिक और सामरिक सहायता से युद्ध अनिर्णय की दिशा में बढ़ता जा रहा है। किसी की जीत-हार होती नहीं दिख रही है। पर युद्ध जितना लंबा खिंचता जा रहा है, उसकी उतनी ही पीड़ा मानवता को भोगनी पड़ रही है।

हिंसा और युद्ध की भयावहता कौन नहीं जानता? इनका सबसे बड़ा इतिहास तो धार्मिक ग्रंथों और कहानियों में ही मिलता है। लगभग सभी धर्मों में कुछ एक अपवाद छोड़ कर आपस में अपने-अपने मतों या पंथों की श्रेष्ठता को लेकर युद्ध हुए हैं। साम्राज्य के मोह में भी दुनिया में बहुत से युद्ध हुए। युद्ध करने वाले एक ही मजहब के रहे या भिन्न मजहब के, इस पर विमर्श संभव है, लेकिन आमतौर पर विपरीत मतों को युद्धों के माध्यम से परास्त करने के उपक्रम होते रहे हैं।

अभी तक का तथ्य तो यही है कि युद्धों ने दुनिया और सभ्यता को नुकसान तो बहुत पहुंचाया, परंतु कोई भी ताकतवर अपने से भिन्न मत या कमजोर शक्ति वाले को समाप्त कभी नहीं कर पाया। भारत के अतीत में देखें तो कृष्ण और जरासंध के बीच युद्ध हुआ, पर भगवान माने जाने वाले कृष्ण की जीत के बाद भी जरासंध के अनुयायी या मानने वाले अभी भी अच्छी खासी संख्या में मौजूद हैं। कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट संप्रदाय के बीच युद्ध हुए, मगर आज भी दोनों ही मतों को मानने वाले मौजूद हैं। शिया और सुन्नी संप्रदाय के बीच युद्ध हुए। लाखों लोग मारे गए। इसके बाद भी दोनों मत को मानने वालों की तादाद कम नहीं है।

कहने का तात्पर्य यह है कि युद्ध या हिंसा न किसी दूसरी विचारधारा या पंथ को समाप्त कर सकी है, न कर सकेगी। प्रथम विश्वयुद्ध में मरने वालों की संख्या एक करोड़ से अधिक थी, जबकि द्वितीय विश्व युद्ध में मरने वालों की संख्या साढ़े पांच करोड़ से ज्यादा रही थी। दूसरे विश्व युद्ध में करीब साढ़े तीन करोड़ लोग जख्मी हुए थे और 1940 के दशक में तीस लाख लोग लापता हो गए थे। धर्म के नाम पर जो युद्ध हुए, उनसे विजेता और पराजित दोनों पक्ष युद्ध के पहले भी रहे और युद्ध के बाद भी। कोई पक्ष अपने प्रतिपक्ष को पूर्ण रूप से समाप्त नहीं कर सका। यानी युद्धों की जीत और हार न स्थायी हुई है, न होगी।

रंगभेद और नस्लभेद के नाम पर दुनिया में कई युद्ध और गृह युद्ध हुए। पर अंतिम निर्णय के दृष्टिकोण को स्वीकार करें तो इनका परिणाम शून्य है। इसके बावजूद दुनिया के सभ्य कहे जाने वाले मुल्क या समुदाय युद्ध क्यों करते हैं, यह खोज का विषय भी है और समझने का भी। एक विदेशी इतिहासकार ने दुनिया के इतिहास और युद्धों का अध्ययन कर बताया कि पिछले लगभग साढ़े तीन हजार वर्षों में दो सौ साठ साल ही ऐसे रहे हैं जिनमें कोई युद्ध नहीं हुए हैं। वरना दुनिया आपस में लड़ती रही है।

इसलिए मन-मस्तिष्क में यह सवाल को कौंधता ही है कि यदि दुनिया में युद्ध नहीं होते तो दुनिया कैसी होती? कितनी विकसित होती? सभ्यता और संपन्नता का रूप कितना भव्य होता? विज्ञान कितना उन्नत होता? ये सब विचारणीय विषय हैं। लेकिन इस इक्कीसवीं सदी में एक और फर्क नजर आ रहा है। युद्ध अब विनाश और क्रूरता की सभी हदें लांघ रहे हैं। प्राचीन काल के युद्धों में एक अलिखित मर्यादा थी कि अंधकार होने या शाम होने के बाद युद्ध रोक दिए जाते थे। युद्ध सैनिकों में होता था, शस्त्रों से होता था, पर विजेता सेना आमजन को तबाह नहीं करती थी।

चाहे रामायण-महाभारत के समय के युद्धों को देखें या उसके बाद के, कुछ समय तक यह परंपरा कायम रही। विदेशी मुगल हमलावर जो वास्तव में आरंभिक दौर में लुटेरे जैसे थे, उन्होंने इन परंपराओं को तोड़ा। चंगेज खां ने जब दिल्ली पर कब्जा किया तब कई लाख लोगों को मारा और लूटा। निहत्थी जनता के कत्लेआम, बर्बरता और लूट की शुरुआत इसी प्रकार हुई। दूसरे विश्व युद्ध में दुश्मन राष्ट्रों को हराने के लिए मित्र राष्ट्रों की ओर से अमेरिका ने जापान पर परमाणु बम गिराए और हिरोशिमा व नागासाकी को तबाह कर दिया।

जहां इस हमले से एक ओर हिटलर और उनके सहयोगियों को जबाव दिया गया और नाजी सेनाओं के मनोबल को तोड़ कर युद्ध जीता गया, वहीं यह भी एक अमानवीय और अमर्यादित युद्ध की ज्यादा भयावह शुरुआत थी। हालांकि बाद में लीग आफ नेशंस और सुंयुक्त राष्ट्र संघ ने भी युद्ध के लिए चार्टर बनाया था और नियम तय किए थे। चूंकि संयुक्त राष्ट्र संघ के पास अपनी कोई शक्ति नहीं है और आर्थिक मामलों में वह बड़े देशों पर ही निर्भर है, इसलिए उसके द्वारा निर्धारित और स्वीकृत मापदंड कमजोर देशों पर तो लागू हो जाते हैं, पर शक्तिशाली देश उन्हें नहीं मानते। दुनिया का जितना पैसा अभी तक युद्धों पर खर्च हुआ है, उसकी गणना अगर की जाए तो इतने पैसे में एक नहीं, कई दुनिया खड़ी हो सकती थीं।

अब रूस ने यूक्रेन पर युद्ध थोपा है। वह कितना क्रूर और भयावह है, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। भले ही संयुक्त राष्ट्र के नियम कहते हों कि आवासीय क्षेत्र या निहत्थे लोगों पर हथियार इस्तेमाल नहीं होने चाहिए, पर रूस यूक्रेन को घुटने टेकने के लिए नागरिक क्षेत्रों पर लगातार बम बरसा रहा है। लगभग पचास लाख लोग यूक्रेन से पलायन कर गए हैं और शरणार्थी जीवन जी रहे हैं। निहत्थे नागरिक जिनका कोई हाथ न युद्ध के कराने में हैं, न जिनकी कोई युद्ध की आकांक्षा, वे सभी इस युद्ध का शिकार हो रहे हैं। हजारों बच्चे मारे गए हैं। युद्ध के नाम पर यह क्रूरता अभूतपूर्व है। तीन महीने हो चुके हैं जंग को चलते हुए, पर इसका अंत नजर नहीं आ रहा। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि यह युद्ध दुनिया को नए सामरिक संतुलन व संगठन बनाने के लिए थोपा गया है। साथ ही एक और नए शीत युद्ध की शुरुआत भी इससे हो गई है।

यूक्रेन का झुकाव अमेरिका और नाटो की ओर था और रूस इसे अपनी सुरक्षा और संपन्नता के लिए बिल्कुल भी मानने को तैयार नहीं था। रूस पर अब तक लगाए गए तथाकथित प्रतिबंध भी कोई परिणाम नहीं दे सके हैं। नाटो देशों की ओर से यूक्रेन को दी जा रही आर्थिक और सामरिक सहायता से युद्ध अनिर्णय की दिशा में बढ़ता जा रहा है। किसी की जीत-हार होती नहीं दिख रही है। पर युद्ध जितना लंबा खिंचता जा रहा है, उसकी उतनी ही पीड़ा मानवता को भोगनी पड़ रही है। लड़ाई तो नाटो और रूस की है और अपने-अपने दबदबे के लिए है, पर मारे तो वे निर्दोष लोग जा रहे हैं जिन्हें शायद यह भी नहीं मालूम होगा कि युद्ध होता क्या है और किसलिए हो रहा है?

रूस-चीन और तटस्थता के नाम पर छिपी पक्षधरता जैसी भूमिका में भारत इस नए सैन्य ब्लाक में अघोषित-अलिखित सहयोगी बना है। माना जा सकता है कि भारत की नीति और चिंताएं पाकिस्तान, पाक अधिकृत कश्मीर और भविष्य की राष्ट्रीय संभावनाओं को लेकर हैं। परंतु भारत और चीन के बीच जो सीमा विवाद है, वह शायद ही कभी चीन को ईमानदारी से भारत के साथ रहने देगा। बल्कि दूसरी तरफ एक और खतरा है कि भविष्य में कहीं भारत दोनों गुटों से अलग-थलग होकर किसी और बड़े नुकसान का शिकार न हो जाए। कुल मिला कर यह स्पष्ट है कि वैश्विक संस्थाएं वैश्विक ताकतों की पिछलग्गू बन कर रह गई हैं। दुनिया को युद्धों, विवादों और आर्थिक शोषण से मुक्ति का वही रास्ता है जो हिंद स्वराज में महात्मा गांधी ने बताया था और जिसे एक कार्यक्रम के रूप में डा. राम मनोहर लोहिया ने बालिग मताधिकार से निर्वाचित विश्व संसद की कल्पना प्रस्तुत की थी। लोहिया की सप्त क्रांतियों में एक क्रांति विश्व संसद के निर्माण की है।

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