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राजनीति: कैसे बनेगा निवेशकों में भरोसा

मौजूदा संकट के कारण डेट फंड योजनाओं के जोखिम को लेकर निवेशकों के मन में नकारात्मक धारणा बन गई है। इसका असर दूसरी म्युचुअल फंड योजनाओं से निकासी के रूप में देखने को मिल सकता है। और अगर ऐसा हुआ तो नगदी की समस्या दूर करने को लेकर सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक के लिए मुश्किलें खड़ी हो जाएंगी।

स्टेट बैंकऑफ इंडिया।

म्युचुअल फंड कारोबार की शीर्ष दस में एक अग्रणी कंपनी फ्रैंकलिन टेंपलटन ने पिछले महीने अपनी छह डेट फंड योजनाओं को जिस तरह अचानक बंद कर दिया, उससे निवेशकों की नींद उड़ गई। इससे एक बार फिर यह सवाल खड़ा हो गया कि निवेशकों की पैसे की सुरक्षा का क्या होगा। हालांकि कंपनी ने सभी निवेशकों को पूरा पैसा लौटाने का भरोसा दिया है, लेकिन निवेशकों के मन में बैठा डर कैसे निकलेगा, यह कहीं ज्यादा बड़ी चिंता का विषय है। फ्रैंकलिन टेंपलटन ने फ्रैंकलिन इंडिया लो ड्यूरेशन फंड, फ्रैंकलिन इंडिया डायनामिक एक्रुअल फंड, फ्रैंकलिन इंडिया क्रेडिट रिस्क फंड, फ्रैंकलिन इंडिया शॉर्ट टर्म इनकम प्लान, फ्रैंकलिन इंडिया अल्ट्रा शॉर्ट बॉन्ड फंड और फ्रैंकलिन इंडिया इनकम आॅपर्चुनिटीज फंड को बंद कर दिया।

मौजूदा समय में इस म्युचुअल फंड कंपनी की बाजार में निवेश की कुल चालीस योजनाएं चल रही हैं, जिसका कुल असेट अंडर मैनेजमेंट यानी एयूएम 11।6 लाख करोड़ रुपए का है। इसमें बंद की गई योजनाओं की रकम 25,856 करोड़ रुपए थी। कंपनी की मानें तो उसने कोई चूक नहीं की है और न ही निवेशकों का पैसा डूबा है। ऐसा कदम नगदी संकट के चलते उठाना पड़ा है। पर निवेशक अब अपने निवेश की निकासी नहीं कर सकेंगे। इतना ही नहीं, एसआइपी, एसडब्ल्यूपी और एसटीपी के जरिए भी निवेशक कोई लेन-देन नहीं कर सकेंगे। निवेशकों के भय की मूल समस्या यहीं से शुरू होती है। एक अनुमान के अनुसार डेट फंड योजनाओं को बंद करने से तीन लाख दस हजार आम निवेशक और लगभग दस हजार कॉरपोरेट निवेशक प्रभावित होंगे।

फ्रैंकलिन टेंपलटन देश के म्युचुअल फंड उद्योग की कुल चवालीस कंपनियों में से आठवें स्थान पर है। कंपनी के अनुसार बाजार में छाई अव्यवस्था और नगदी के बढ़ते संकट के कारण उसने इन योजनाओं को बंद कर दिया। अभी समस्या तब खड़ी हुई कि पूर्णबंदी के कारण कारपोरेट निवेशकों और अधिक आय वाले निवेशकों ने अपनी नगदी की जरूरतों को पूरा करने के लिए लगातार अपने म्युचुअल फंड के यूनिटों को भुनाना सुरू कर दिया। लेकिन नगदी नहीं होने के कारण कंपनी निवेशकों का निवेश लौटाने में असमर्थ है।

इसके अलावा, कम अवधि वाले कई डेट फंड जो परिपक्व हो गए थे, उनके निवेशक निकासी के लिए कंपनी पर दबाव बना रहे थे। जैसा कि कहा जा रहा है कि फ्रैंकलिन टेंपलटन को ये योजनाएं इसलिए भी बंद करनी पड़ीं क्योंकि खराब रेटिंग वाली कंपनियों और प्रतिभूतियों में निवेश हो रहा था। आज ऐसी कंपनियां दिवालिया होने के कगार पर हैं और उनके बांडों की रेटिंग को कूड़ा-करकट घोषित कर दिया गया है। फ्रैंकलिन टेंपलटन ने इस साल 31 मार्च तक 62.8 फीसद असेट्स, जो कम अवधि वाले थे, को ए रेटिंग वाले बांडों में निवेश किया था और 45.76 फीसद का निवेश एए वाले रेटिंग बांडों में किया था। बंद की गई डेट फंड योजनाओं का निवेश वोडाफोन आइडिया और यस बैंक द्वारा जारी बांडों में भी किया गया था। चूंकि, इन दोनों कंपनियों की आर्थिक हालात पहले से ही खस्ताहाल है, इसलिए इन कंपनियों के बांडों में किए गए निवेश के डूबने की संभावना बढ़ गई।

जो हो, फ्रैंकलिन टेंपलटन की इन योजनाओं को बंद होने से लगभग अट्ठाईस लाख करोड़ रुपए के म्युचुअल फंड उद्योग पर से निवेशकों के भरोसे को झटका लगा है। पूर्णबंदी के कारण म्युचुअल फंड की कई योजनाओं के निवेशक पहले से नुकसान में हैं और अब फ्रैंकलिन टेंपलटन के इस कदम से और बड़ा झटका लगा है। ऐसे में समस्या पूरे म्युचुअल फंड उद्योग के सामने खड़ी हो गई है कि कैसे दूसरी कंपनियों के निवेशकों को नगदी निकासी से रोका जाए। ज्यादातर निवेशकों को लग रहा है कि कहीं उनके निवेश का हाल भी इसी तरह न हो जाए। इसलिए म्युचुअल फंड कंपनियों के सामने सबसे बडजी चुनौती अपने निवेशकों के भरोसे को बनाए रखने की है। इस घटना का असर यह हुआ है कि निवेशक घबराहट में अच्छी रेटिंग वाले म्युचुअल फंड बांड को भी बेचने में लग गए हैं और इसका नतीजा यह होगा कि आने वाले दिनों में बाजार में नगदी की समस्या गहरा सकती है।

ऐसा नहीं है कि इस तरह का संकट कोई पहली बार आया है। पहले भी गलत निवेश की वजह से म्युचुअल फंड उद्योग मुश्किलों में फंस चुका है। फ्रैंकलिन टेंपलटन के ताजा निर्णय के पीछे भी यह एक बहुत बड़ी वजह है। इस कंपनी ने कम रेटिंग वाली कंपनियों और प्रतिभूतियों में निवेश कर रखा है, जहां पैसा डूबने का खतरा है। लिहाजा, म्युचुअल फंड कंपनियों को कम रेटिंग वाली प्रतिभूतियों में निवेश करने से परहेज करना चाहिए। गौरतलब है कि ह्लएएएह्व रेटिंग वाली प्रतिभूतियों में निवेश करना सुरक्षित माना जाता है। इसके अलावा, ज्यादातर डेट फंड योजनाओं द्वारा किए जाने वाले निवेश की श्रेणियों में जोखिम को परिभाषित नहीं किया जाता है, जिससे निवेश के डूबने की संभावना बनी रहती है।

कुछ फंड जैसे, क्रेडिट रिस्क फंड और कॉरपोरेट बांड फंड क्रेडिट एक्सपोजर के जोखिम को पारिभाषित करते हैं। कॉरपोरेट बांड फंड के मामले में अस्सी फीसद परिसंपत्तियां उच्च रेटिंग वाली प्रतिभूतियों में निवेश की जानी चाहिए। निवेश को कम एवं ज्यादा जोखिम में विभाजित करने से निवेश के सुरक्षित रहने की संभावना बढती है। इस आलोक में नियामकीय संस्थाओं को भी चाहिए कि वे जोखिम को कम करने की दिशा में काम करें और निवेशकों के हितों की रक्षा के लिए समय-समय पर जरूरी कदम उठाती रहें।

इस तरह के संकट से बचने के लिए निवेशकों को भी सतर्क रहने की जरूरत है। म्युचुअल फंड में निवेश करने से पहले निवेशकों को चाहिए कि वे फंड का चुनाव सही तरीके से करें। डेट फंड में निवेश करने वाले निवेशकों को चाहिए कि वे देख लें कि डेट फंड के प्रबंधक किन रेटिंग वाली प्रतिभूतियों में निवेश कर रहे हैं। अगर वे खुद बारीकियों को समझने में असमर्थ हों तो किसी वित्तीय सलाहकार से सलाह लेनी चाहिए। अच्छी रेटिंग वाली डेट फंड के डूबने की संभावना बहुत ही न्यून होती है। हाँ, इक्विटी फंड में जोखिम ज्यादा रहता है। इसलिए इस फंड में निवेश करने से पहले वित्तीय सलाहकार की मदद ले लेनी चाहिए। निवेशकों को खुद भी इनकी समझ रखनी चाहिए और नियमित रूप से वित्तीय हलचलों पर पैनी निगाह रखनी चाहिए।

मौजूदा संकट के कारण डेट फंड योजनाओं के जोखिम को लेकर निवेशकों के मन में नकारात्मक धारणा बन गई है। इसका असर दूसरी म्युचुअल फंड योजनाओं से निकासी के रूप में देखने को मिल सकता है। अगर ऐसा हुआ तो नगदी की समस्या दूर करने को लेकर सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक के लिए मुश्किलें खड़ी हो जाएंगी।
हालांकि केंद्रीय बैंक ने म्युचुअल फंड उद्योग को राहत देने के लिए पचास हजार करोड़ रुपए की नगदी सुविधा उपलब्ध कराई है, जिसका संचालन बैंकों के माध्यम से होगा। वित्तीय क्षेत्र में गहराते संकट से भारतीय रिजर्व बैंक भी डरा हुआ है और वह बाजार में सीधे नगदी डालने से बच रहा है। वित्त वर्ष 2008-09 और वर्ष 2013 में वित्तीय अस्थिरता के कारण बाजार में खलबली मची थी, लेकिन इस बार जोखिम को सही तरह से आकलित नहीं कर पाने के कारण निवेशकों को नुकसान हुआ है। इसलिए आने वाले दिनों में म्युचुअल फंड योजनाओं से जोखिम को कम करने के लिए सरकार और केंद्रीय बैंक को सतत प्रयास करना होगा, तभी निवेशकों के हितों की रक्षा संभव हो पाएगी।

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