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राजनीति: फ्रांस में बिखरता बहुलतावाद

इस्लामी उभार को फ्रांस के आम नागरिक संदेह की दृष्टि से देखने लगे हैं। उनका मानना है कि इस्लामी धर्मवाद, राष्ट्रवाद को पीछे छोड़ कर फ्रांस पर लगातार हावी हो रहा है। यह बेहद खतरनाक है और इससे राष्ट्र की मूल संस्कृति और धर्मनिरपेक्षता की भावना के खत्म होने का संकट बढ़ता जा रहा है।

फ्रांस में आतंकी घटना के बाद रोष जताते लोग। एजेंसी।

ब्रह्मदीप अलूने

बहुलवादी देशों में एकीकृत समाज का निर्माण कैसे किया जाए, यह चुनौती आधुनिक विश्व के सामने बड़ा संकट बन कर उभरेगी, इसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की गई होगी। दरअसल यूरोप के सबसे बड़े बहुलवादी देश फ्रांस में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अंतर्द्वंद्व सभ्यता और सांस्कृतिक संघर्ष का कारण बन गया है। इसके परिणाम बेहद भयावह होकर वहां के बहुलवादी परिवेश को प्रभावित कर रहे हैं।

इस आशंका से कतई इंकार नहीं किया जा सकता कि यह संकट आने वाले समय में और हिंसक व विध्वंसक रूप ले सकता है। इन दिनों फ्रांस में जिस तरह की हिंसक घटनाएं देखने को मिल रही हैं, वे इसका स्पष्ट संकेत हैं। इसी हफ्ते फ्रांस के नीस शहर में चर्च पर हमला कर तीन लोगों का गला रेत दिया गया। इससे पहले का एक शिक्षक की गला रेत कर हत्या कर दी गई थी।

इस शिक्षक को एक इस्लामिक कट्टरपंथी ने इसलिए मार दिया था क्योंकि वह एक पत्रिका में प्रकाशित उन कार्टूनों की चर्चा कर रहे थे जिन्हें फ्रांस में रहने वाला इस्लामिक समुदाय अपनी धार्मिक भावनाओं के खिलाफ मानता रहा है।फ्रांस में मुसलिम समुदाय की आबादी कुल जनसंख्या का दस फीसद है। इन्हें आमतौर पर पिछड़ा और अशिक्षित माना जाता है।

एक शिक्षक की हत्या के बाद फ्रांस में धर्म निरपेक्षता को लेकर एक बार फिर से बहस छिड़ गई है और इसका नतीजा इस्लामिक शिक्षा और समाज को प्रतिबंधित करने जैसा भी हो सकता है। हालांकि ऐसा भी नहीं है कि विवादित शार्ली आब्दो पत्रिका ने इस्लाम धर्म को विशेष रूप से निशाना बनाया हो।

यह पत्रिका इसके पहले भी अति दक्षिणपंथी ईसाई, यहूदी और इस्लामिक मान्यताओं पर प्रहार करने को लेकर विवादों में रही है। लेकिन साल 2015 में पैगंबर मोहम्मद को लेकर बनाए गए कार्टूनों की कड़ी प्रतिक्रिया हुई और इसके कार्यालय पर हमला कर कई लोगों को मार डाला गया था। इस घटना के बाद फ्रांस की सरकार ऐसे नियमों को सख्ती से लागू कर रही है जिससे देश में धार्मिक तनाव बढ़ रहा है।

फ्रांस में सार्वजनिक स्थानों पर बुर्का पहनने पर पाबंदी लगा दी गई है। मुसलिम समुदाय इसे धार्मिक सिद्धांतों में राज्य के हस्तक्षेप के रूप में देख रहा है। मुसलमानों का कहना है कि हिजाब लड़कियों की सांस्कृतिक पहचान है और यह कुरआन में बताए गए नियमों के दायरे में आता है। फ्रांस के भ्रातृत्व के सिद्धांत को दुनिया में बड़ा आदर्श माना जाता है, जिसके अनुसार वर्ग-विभेद होते हुए भी सभी के मध्य समतामूलक और मानवतावादी विचारों का प्रसार किया जाना चाहिए।

लेकिन इस्लामिक अलगाव के खतरों से फ्रांस की राजनीतिक सत्ता इतनी बैचेन है कि वह बहुलवादी सिद्धांतों के साथ समझौता करने को तैयार नजर आ रही है। अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर छिड़ी बहस के बीच फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने अपने देश में धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को बचाने के लिए सख़्त कानून लाने की बात कही है।

दुनिया भर में उदारवादी लोकतंत्र को रास्ता दिखाने वाले ब्रिटेन के यूरोपियन संघ से अलग होने के फैसले के पीछे भी मुसलमानों के अप्रवासन को बड़ी समस्या को माना गया। मध्यपूर्व और अफ्रीका के गृहयुद्ध से पनपे संकट में शरणार्थियों के लिए जर्मनी ने उदारता से अपने दरवाजे खोले। ब्रिटेन में जर्मनी की इस उदारता की कड़ी प्रतिक्रिया हुई। मुक्त आवाजाही के कारण यूरोप के अन्य देशों के नागरिक ब्रिटेन में आकर रोजगार तलाशने लगे और स्थानीय लोगों में प्रवासियों के प्रति असंतोष उत्पन्न हुआ।

यह समस्या साल 2011 में तब पैदा हुई जब ब्रिटेन में जनगणना करने वाले विभाग आॅफिस फॉर नेशनल स्टेटिस्टिक्स द्वारा जनसंख्या के आंकड़ों से यह पता चला कि ब्रिटेन की जनसंख्या (छह करोड़ 32 लाख) में ब्रिटेन के स्थानीय निवासियों का अनुपात 2001 की जनगणना के सत्तासी फीसद के मुकाबले घट कर अस्सी फीसद हो गया है। आंकड़ों के अनुसार ब्रिटेन के मुख्य प्रांतों- इंग्लैंड और वेल्स में हर आठवां व्यक्ति विदेश में जन्मा व्यक्ति है।

इस बदलाव का मुख्य कारण अप्रवासियों का ब्रिटेन आना बताया गया। पिछले कुछ सालों में बड़ी संख्या में मुसलिम शरणार्थियों ने यूरोप का रुख किया है। इससे यूरोप का समाज आशंकित है। सीरिया के उत्तर पश्चिम के युद्धग्रस्त इलाके से प्रभावित लाखों लोग विस्थापित होकर तुर्की सीमा की ओर भाग रहे है। तुर्की ने यूरोपीय संघ को चेतावनी दी है कि यदि इस संकट से सही तरीके से समाधान नहीं निकाला गया तो वह शरणार्थियों के लिए यूरोप के द्वार खोल देगा।

इस समय तुर्की में करीब चालीस लाख से ज्यादा सीरियाई शरणार्थी हैं। यूरोप के एकमात्र मुसलिम राष्ट्र तुर्की की भूमिका भी परेशान करने वाली है और वह अपने देश में इस्लामिक कट्टरपंथ को बढ़ावा दे रहा है।

दुनिया में धर्म को लेकर यूरोप का समाज जिस तरह दो भागों में बंट रहा है, उससे लोकतंत्र और मानवाधिकारों के प्रति उसकी प्रतिबद्धता पर भी संकट गहरा गया है। इस सबके बीच फ्रांस की चिंता में अपनी राष्ट्रीय पहचान भी है। राष्ट्रीयता लोगों की एक आत्मिक और सांस्कृतिक भावना है, जिससे वे लोग एक सूत्र मे बंधे रहते हैं और स्वयं को दूसरों से पृथक मानते हैं।

प्रत्येक राष्ट्र की अपनी विशिष्टता होती है जो अपने भूभाग की सर्वोच्चता के लिए संघर्षशील होता है। लेकिन इस्लामिक उभार को फ्रांस के आम नागरिक संदेह की दृष्टि से देखने लगे हैं। उनका मानना है कि इस्लामिक धर्मवाद, राष्ट्रवाद को पीछे छोड़ कर फ्रांस पर लगातार हावी हो रहा है। यह बेहद खतरनाक है और इससे राष्ट्र की मूल संस्कृति और धर्मनिरपेक्षता की भावना के खत्म होने का संकट बढ़ता जा रहा है।

इसके पहले फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति जैक शिराक ने कहा था कि देश के धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों को बनाए रखने के लिए यह जरूरी है कि धार्मिक चिन्हों के इस्तेमाल पर पाबंदी लगाई जाए, ताकि राजनीति और धर्म को अलग-अलग रखा जा सके।

फ्रांस की सरकार इस्लामिक मूल्यों को लेकर लगातार मुखर हो रही है। लेकिन दुनिया के कई इस्लामिक देशों की नीतियां भी कम खतरनाक नहीं हैं। अन्य देशों के मुकाबले इस्लामिक देशों में धर्म को लेकर अभिव्यक्ति को कड़े प्रतिबंधों से जूझना पड़ता है। दुनिया के उनचास मुसलिम बहुल देशों में से बत्तीस में ईशनिंदा के कानून के तहत लोगों को दंडित किया जाता है।

इनमें से छह देशों में ईशनिंदा की सजा मौत है। पाकिस्तान जैसे देशों में ईशनिंदा कानून के दुरुपयोग की शिकायतें मिलती रही हैं और आमतौर पर यह सामने आया है कि कट्टरपंथी इन कानूनों के जरिए गैर इस्लामिक धर्मावलंबियों को निशाना बनाते हैं।

मध्ययुग के महान राजनीतिक विचारक और दार्शनिक सेंट थॉमस एक्विनास ने कहा था कि किसी भी राज्य में सरकार वहां के नागरिकों की भौतिक, ईश्वर और आध्यात्मिक आवश्यकताओं की पूर्ति करती है। ऐसे में फ्रांस समेत दुनिया की अन्य सरकारों को भी यह समझना होगा कि वे अल्पसंख्यक आबादी को देश की मुख्यधारा में पूरी तरह से जोड़ने की कोशिश करें।

इसमें कोई संदेह नहीं कि किसी भी देश की अपनी सांस्कृतिक पहचान होती है और उसमें विरोधी-समाज का उभरना बहुलवादी समाज की चुनौतियों को बढ़ाता है। इससे निपटने के लिए आधुनिक शिक्षा और रोजगार बड़े महत्त्वपूर्ण परिणाम दे सकते है। फ्रांस में रहने वाले मुसलमान मूलत: मोरक्को, अल्जीरिया, माली और ट्यूनीशिया जैसे पिछड़े देशों से हैं।

कई पीढ़ियों से फ्रांस में रहने वाले यह मुसलमान गरीबी और पिछड़ेपन से अभिशप्त हैं। ऐसे समाज में अभिव्यक्ति को लेकर सजग रहने की जरूरत से भी इंकार नहीं किया जा सकता। बहरहाल, अभिव्यक्ति के अंतर्द्वंद्व से बहुलवाद को चुनौती न मिले, इसे लेकर सतर्क रहना राज्य की जिम्मेदारी है। वर्तमान में दुनिया के कई देशों की सरकारें इसकी गंभीरता को नजरअंदाज कर मानवीय संकट और संघर्ष को बढ़ा रही हैं।

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