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राजनीति: पुतिन की सत्ता और चुनौतियां

दुनिया भर में राष्ट्रवाद के उभार से राजनीतिक सत्ताएं मजबूत हुई हैं और रूस में पुतिन की मजबूती भी राष्ट्रवाद का ही परिणाम है। लेकिन पुतिन की नीतियां अमेरिका की प्रतिद्वंद्विता के चलते चीन, उत्तर कोरिया और ईरान का समर्थन करती हुई दिखाई दे रही हैं और इसके दूरगामी परिणाम बेहद घातक हो सकते हैं।

Author Published on: July 14, 2020 12:23 AM
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन।

ब्रह्मदीप अलूने
सत्ता का तार्किक और वैधानिक रूप इस युग का यथार्थ है, जहां यह विश्वास किया जाता है कि जो व्यक्ति आज्ञा दे रहा है, उसकी सत्ता वैधानिक होनी चाहिए। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन देश की सर्वोच्च सत्ता पर वैधानिक नियंत्रण बनाए रखने के लिए कृतसंकल्प हैं। रूस के संविधान में राष्ट्रपति पद के लिए केवल दो कार्यकाल का प्रावधान है, लेकिन पुतिन चार कार्यकाल पहले ही पूरे कर चुके हैं और अब 2036 तक राष्ट्रपति बने रहने का रास्ता साफ कर लिया है।

दरअसल, पुतिन यह भलीभांति जानते हैं कि वैधता, शक्ति और सत्ता के बीच की कड़ी है। वैधता से ही शक्ति को तार्किकता और स्थायित्व मिलता है और वैधता द्वारा ही जनमत शक्ति को स्वीकार करता है। रूस की जनता पुतिन पर भरोसा करती है और उनके निर्णयों के साथ विश्वासपूर्वक खड़ी भी होती है। साल 2018 में हुए चुनावों में पुतिन ने छिहत्तर फीसद से अधिक वोट हासिल किए थे।

इससे इस बात की एक बार फिर पुष्टि हुई कि पुतिन को अपने देश में बड़े पैमाने पर नागरिकों का समर्थन हासिल है और उनकी लोकप्रियता का कोई जवाब नहीं है। सत्ता पर पुतिन की पकड़ इसी प्रकार बनी रही तो इस बात की प्रबल संभावना है कि वे सोवियत संघ पर तकरीबन तीन दशकों तक राज करने वाले स्तालिन से आगे निकल जाएंगे।

रूस में केजीबी के अधिकारियों को वफादार शख्स के तौर पर देखा जाता रहा है। केजीबी के पूर्व अधिकारी व्लादिमीर पुतिन में रूस के लोग एक ऐसा नेता देखते हैं जिस पर विश्वास किया जा सकता है। रूस में राष्ट्रपति ही सब कुछ है और वही सबसे ताकतवर है। विभाजित सोवियत संघ के सबसे बड़े प्रांत रूस के पहले राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन अपने देश की बेहतरी के लिए अपने बाद बेहतर और दूरदर्शी नेतृत्व चाहते थे।

उन्होंने और उनके निकटतम सहयोगियों ने देश को इक्कीसवीं सदी में ले जाने के लिए रूसी खुफिया एजेंसी केजीबी के पूर्व अधिकारियों को चुना था। उन्हीं में से एक थे व्लादिमीर पुतिन। कुख्यात खुफिया एजेंसी केजीबी का मानना है कि पश्चिमी देशों के गोपनीय अभियानों के कारण सोवियत संघ का विघटन हुआ था। पुतिन केजीबी के अधिकारी रहे हैं और उनके कार्यों में बदला और पुराना गौरव लौटाने की चेष्टा अक्सर दिखाई देती है।

साल 2000 में जब वे रूस की राष्ट्रपति बने, तब उनका देश आर्थिक रूप से बहुत कमजोर हो चुका था और सामरिक तौर पर रूस की स्वीकार्यता भी घट चुकी थी। यह वह दौर था जब अमेरिका ने रूस को क्षेत्रीय शक्ति कह कर उसका मजाक उड़ाया था। लेकिन पुतिन के इरादे कुछ और ही थे। उन्होंने देश में आर्थिक और राजनीतिक सुधारों के साथ वैश्विक स्तर पर रूस के पुराने गौरव को लौटाने के लिए साहसिक प्रयास किए।

गोबार्चोव के बाद बोरिस येल्तसिन के दौर में रूस का समाजवादी ढांचा बिखर कर पूंजीवाद की गिरफ्त में आ गया था और देश में पूंजीपतियों का प्रभाव सत्ता में तेजी से बढ़ता चला गया। पुतिन ने रूस के कुलीन वर्ग को व्यावसायिक मामलों में छूट तो दे दी, लेकिन साथ ही यह भी सुनिश्चित कर दिया कि मुल्क के सियासी मामलों में अब वे दखल नहीं दे सकेंगे।

रूस के वैश्विक प्रभाव और उसकी रणनीतिक नीतियों में पांच सागरों का बड़ा महत्त्व माना जाता है और यह पुतिन की नीतियों में दिखाई भी देता है। मास्को को कैस्पियन, काला, बाल्टिक, श्वेत सागर और लाडोगा झील जैसे पांच सागरों का पत्तन कहा जाता है। इस सागरों से लगते देशों के साथ रूस के संबंध और उसके प्रभाव से रूस के वैश्विक प्रभुत्व का पता चलता है।

यह भी बेहद दिलचस्प है कि यूरोप की बीस फीसद जमीन को सिंचित करने वाली वोल्गा नदी कैस्पियन सागर के पानी का सबसे बड़ा स्रोत है, वहीं अमेरिका की आंख में चुभने वाला ईरान भी कैस्पियन सागर के तट पर है, जिसके रूस के साथ मजबूत संबंध हैं। पिछले साल ईरान, चीन और रूस के बीच हिंद महासागर और ओमान की खाड़ी में चार दिवसीय संयुक्त सैन्य अभ्यास किया था। इसके साथ ही यह भरोसा किया जाता है कि रूस ईरान को सबसे ज्यादा हथियार देने वाला देश भी है।

मध्य पूर्व में रूस का सीरिया पर हस्तक्षेप किसी से छुपा नहीं है। पुतिन ने यह दिखाया है कि उनके देश को विश्वास में लिए बिना इस क्षेत्र की जटिल समस्या को हल नहीं किया जा सकता। बाल्टिक उत्तरी यूरोप का एक सागर है जो लगभग सभी ओर से जमीन से घिरा है। श्वेत सागर रूस का नौसैनिक केंद्र है और इससे वह यूरोप पर दबाव बढ़ाता रहा है। श्वेत सागर एक नहर के जरिये बाल्टिक सागर से जुड़ा है।

रूस ने साल 2014 में यूक्रेन में रूसी अलगाववादी विद्रोहियों के समर्थन में हस्तक्षेप किया था, जिसके कारण वैश्विक तनाव पैदा हो गया था और इसके जवाब में नाटो ने पूर्वी यूरोप में बाल्टिक क्षेत्र में चार हजार सैनिक भेज कर अतिरिक्त सैन्य बल तैनात करके इसका जवाब दिया था। पुतिन नाटो को लेकर बहुत मुखर हैं और चीनझ्रईरान-रूस-उत्तर कोरिया के मजबूत संबंध इसी का जवाब माना जा रहा है। पुतिन की आक्रामक नीतियों से नाटो को सबक मिला है और यूरोप किसी सामरिक संघर्ष का केंद्र न बने, इसको लेकर नाटो सजग है।

चाहे 2008 में जार्जिया पर हमला हो या फिर 2014 में पश्चिमी देशों के कड़े विरोध को दरकिनार कर क्रीमिया पर रूस का कब्जा, या कुर्दों के साथ खड़े होकर मध्य पूर्व में अमेरिका को चुनौती देना हो, इन सभी मामलों में पुतिन ने अपने को पूरी ताकत के साथ पेश किया। चेचेन विद्रोहियों को कुचलने के लिए पुतिन के राजनीतिक और सामरिक कौशल की जनता ने सराहना की और वे एक ऐसे नेता के रूप में पहचान बनाने में सफल रहे जो रूस की जनता की सुरक्षा और बेहतरी के लिए कोई भी कदम उठा सकता है।

पश्चिमी देशों के प्रति रूस की आक्रामक नीति रुसी पसंद करते हैं और इससे पुतिन की लोकप्रियता अपने देश में काफी तेजी से बढ़ी है। कोरोना को लेकर जब अमेरिका सहित दुनियाभर ने चीन पर सवाल खड़े किए, तो पुतिन ने चीन का समर्थन करके यह वैश्विक संदेश देने से गुरेज नही किया कि पूंजीवादी वैश्विक आर्थिक दुनिया में भी वे अपने साम्यवादी सहयोगी को समर्थन दे सकते हैं। यहीं नहीं रूस की जनता में भी यह संदेश गया कि उनका राष्ट्रपति पश्चिमी देशों की कठपुतली की तरह बर्ताव न करके रूस की पारंपरिक पहचान को स्थापित करने के लिए प्रतिबद्ध है।

दुनिया भर में राष्ट्रवाद के उभार से राजनीतिक सत्ताएं मजबूत हुई हैं और रूस में पुतिन की मजबूती भी राष्ट्रवाद का ही परिणाम है। लेकिन पुतिन की नीतियां अमेरिका की प्रतिद्वंद्विता के चलते चीन, उत्तर कोरिया और ईरान का समर्थन करती हुई दिखाई दे रही हैं और इसके दूरगामी परिणाम बेहद घातक हो सकते हैं। अतंरराष्ट्रीय विवादों का समाधान सामूहिक दंड के भय से किया जा सकता है, लेकिन चीन जैसे देश रूस के समर्थन से अतंरराष्ट्रीय विवादों को बढ़ा कर वैश्विक अस्थिरता को बढ़ावा दे रहे हैं।

1960 के दशक में चीन सोवियत संघ को अपना सबसे बड़ा शत्रु बताता था और चीन को दबाए रखने में भारत से रूस की मित्रता लंबे समय तक बड़ी कारगर रही है। अत: पुतिन को चीन की विस्तारवादी नीतियों और गैर जवाबदेह वैश्विक व्यवहार से सावधान रहने की जरूरत है। बहरहाल, रूस की सत्ता पर बरकरार रहने की पुतिन की कोशिशों के बीच उन्हें अपने देश की प्रगति और मजबूती के साथ वैश्विक जिम्मेदारियों को भी समझना होगा।

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