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विदेश व्यापार की चुनौतियां

कोविड-19 और उसके बाद यूक्रेन युद्ध के बाद बने हालात के बीच भारत के सामने बड़ी चुनौती को विदेश व्यापार बढ़ाने की है।

जयंतीलाल भंडारी

भारत को विदेश व्यापार के लिए सही, नीतिगत कदम उठाने की जरूरत है, ताकि टिकाऊ विकास के लिए काम हो सके। आर्थिक सुधारों के रास्ते पर बढ़ कर ही इस लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है। अब जमाना डिजिटल अर्थव्यवस्था का है। इसलिए इस राह में आने वाली बाधाओं को भी दूर करना होगा।

भारत के विदेश व्यापार को लेकर हाल में जो रिपोर्टें आई हैं, उनमें दो बातें रेखांकित होती हैं। पहली यह कि आर्थिक और वित्तीय चुनौतियों के बीच भी भारत के लिए विदेश व्यापार की स्थितियां अनुकूल हैं। इस समय विकसित, विकासशील और पड़ोसी देशों के साथ भारत के विदेश व्यापार समझौतों और व्यापार वार्ताओं का नया अध्याय लिखा जा रहा है। दूसरी बात यह कि भारत का विदेश व्यापार बढ़ाने के लिए अब खुली और निर्बाध व्यापार नीति के साथ-साथ जरूरी आयात की नीति पर ध्यान देना होगा।

पिछले हफ्ते ब्रिक्स देशों (ब्राजील, रूस, भारत चीन और दक्षिण अफ्रीका) की चौदहवीं शिखर बैठक हो चुकी है। ब्रिक्स देशों के साथ भारत का वैश्विक व्यापार तेजी से बढ़ रहा है। वैश्विक आबादी में इन देशों की कुल हिस्सेदारी इकतालीस फीसदी है। वैश्विक जीडीपी में ब्रिक्स समूह का योगदान चौबीस फीसद और वैश्विक व्यापार में भागीदारी सोलह फीसद है। ब्रिक्स बिजनेस फोरम को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा भी कि भारतीय अर्थव्यवस्था में कोरोना काल के बाद जो सुधार और नवाचार हो रहा है, वह ब्रिक्स देशों के उद्यमियों और कारोबारियों के लिए भारत में निवेश करने का सबसे अच्छा मौका है।

कुछ समय पहले अमेरिका के नेतृत्व में भारत सहित तेरह देशों के कारोबारी संगठन हिंद-प्रशांत आर्थिक फोरम (आइपीईएफ) का गठन हुआ। इसी महीने 11 जून को पेरिस में हुई अनौपचारिक बैठक के बाद इसके सदस्य देशों के साथ भारत से निर्यात बढ़ने और विदेश व्यापार को नई गति मिलने की संभावनाएं प्रबल हुई हैं। वस्तुत: आइपीईएफ पहला बहुपक्षीय करार है, जिसमें भारत शामिल हुआ है। इसमें अमेरिका, भारत, जापान, आस्ट्रेलिया ब्रुनेई, इंडोनेशिया, दक्षिण कोरिया, मलेशिया, न्यूजीलैंड, फिलिपींस, सिंगापुर, थाईलैंड और वियतनाम शामिल हैं।

इस फोरम में भारत के शामिल होने के बाद भारत-अमेरिका व्यापार और आर्थिक संबंधों का नया दौर शुरू हुआ है। दोनों देशों के बीच आर्थिक साझेदारी तेजी से बढ़ती जा रही है। गौरतलब है कि अमेरिका में दो सौ भारतीय कंपनियां काम कर रही हैं और भारत में दो हजार से ज्यादा अमेरिकी कंपनियां सक्रिय हैं। अब दोनों देशों के बीच आर्थिक साझेदारी तेजी से बढ़ेगी।

पिछले महीने वाणिज्य मंत्रालय की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2021-22 में अमेरिका और भारत के बीच 119.42 अरब डालर का द्विपक्षीय व्यापार हुआ, जो 2020-21 में 80.51 अरब डालर था। भारत से अमेरिका को निर्यात 2021-22 में बढ़ कर 76.11 अरब डालर हो गया, जबकि 2020-21 में यह 51.62 अरब डालर था। वर्ष 2021-22 में अमेरिका से भारत का आयात बढ़ कर 43.31 अरब डालर हो गया, जो पूर्ववर्ती वर्ष में उनतीस अरब डालर था। खास बात यह है कि अमेरिका उन गिने-चुने देशों में है जिनके साथ भारत व्यापार अधिशेष की स्थिति में है और अब अमेरिका चीन को पीछे करते हुए भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बन गया है।

कोविड-19 और उसके बाद यूक्रेन युद्ध के बाद बने हालात के बीच भारत के सामने बड़ी चुनौती को विदेश व्यापार बढ़ाने की है। पिछले महीने अमेरिका, भारत, जापान और आस्ट्रेलिया के रणनीतिक मंच क्वाड के दूसरे शिखर सम्मेलन में चारों देशों ने जिस समन्वित शक्ति का शंखनाद किया और बुनियादी ढांचे पर पचास अरब डालर से अधिक रकम लगाने का वादा किया, उससे क्वाड भारत के उद्योग-कारोबार के विकास में मील का पत्थर साबित हो सकता है। इसके अलावा हाल के वर्षों में जी-7 और जी-20 देशों के साथ भारत के द्विपक्षीय व्यापार संबंधों में काफी इजाफा हुआ है।

इस सालयानी 2022 में यूरोपीय देशों के साथ किए गए नए आर्थिक समझौतों से भी भारत का विदेश व्यापार बढ़ेगा। यह बात भी महत्त्वपूर्ण है कि भारत ने बहुत कम समय में संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और आस्ट्रेलिया के साथ मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) को मूर्तरूप दिया है। अब यूरोपीय संघ, ब्रिटेन, कनाडा, खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) के छह देशों, दक्षिण अफ्रीका, अमेरिका और इजराइल के साथ एफटीए के लिए प्रगतिपूर्ण वार्ताएं भी नए रास्ते खोल रही हैं।

इस समय भारत ‘पड़ोसी पहले’ और ‘पूर्व की ओर’ नीति के कारगर अमल पर भी तेजी से कामकर रहा है। पिछले महीने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेपाल के प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा के साथ बहुआयामी द्विपक्षीय संबंधों के सभी पहलुओं पर चर्चा की और सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत बनाने, शिक्षा क्षेत्र में सहयोग और पनबिजली क्षेत्र से जुड़ी परियोजनाओं को लेकर छह समझौतों पर हस्ताक्षर भी किए थे। इसी तरह पिछले महीने ही रानिल विक्रमसिंघे ने श्रीलंका का प्रधानमंत्री पद संभालने के बाद भारत के साथ तेजी से आर्थिक सहयोग बढ़ाने के संकेत दिए। भारत ने मार्च-अप्रैल 2022 में श्रीलंका को 2.4 अरब डालर की मदद दी ताकि वह दवाओं, डीजल की आपूर्ति और अन्य जरूरी आयात कर सके।

इसके अलावा भारत के लिए बिम्सटेक (बे आफबंगाल इनीशिएटिव फार मल्टी सेक्टोरल टेक्नोलाजिकल एंड इकोनामिक कोआपरेशन) देशों के साथ व्यापार की जो नई संभावनाएं दिख रही हैं, वे भी विदेश व्यापार में बड़ी भूमिका निभाने वाली हैं। बिम्सटेक के सात सदस्य देशों में से पांच दक्षिण एशिया से हैं जिनमें भारत, बांग्लादेश, भूटान, नेपाल और श्रीलंका शामिल हैं और दो म्यांमा और थाईलैंड दक्षिण-पूर्व एशिया से हैं।

यह संगठन बंगाल की खाड़ी के आसपास के देशों में चीन के ‘वन बेल्ट, वन रोड’ पहल के विस्तारवादी प्रभावों से भारत को मुकाबला करने का अवसर भी प्रदान करता है। बिम्सटेक का पांचवां शिखर सम्मेलन इस साल मार्च में श्रीलंका की मेजबानी में आयोजित हुआ था। इसमें भारत ने बिम्सटेक के सदस्य देशों के बीच परस्पर व्यापार बढ़ाने के लिए मुक्त व्यापार समझौते के प्रस्ताव पर आगे बढ़ने पर जोर दिया था।

जिस तरह देश के विदेश व्यापार में कृषि और खाद्यान्न कारोबार की अहमियत बढ़ गई है, उसे देखते हुए कृषि निर्यात के अधिक रणनीतिक प्रयासों के साथ कृषि का वैश्विक व्यापार बढ़ाना होगा। देश के विदेश व्यापार में कृषि कारोबार की अहम भूमिका है। देश में खाद्यान्न की प्रचुरता है और गेहूं की भी कोई कमी नहीं है, पड़ोसी, गरीब और अन्य देशों को उनकी खाद्य सुरक्षा जरूरतों को पूरा करने के लिए भारत गेहूं का निर्यात कर रहा है।

वर्ष 2021-22 में भारत से सत्तर लाख टन से अधिक गेहंू के विदेशी सौदों की आपूर्ति की। पिछले वर्ष 2021-22 में भारत से पचास अरब डालर से अधिक मूल्य के कृषि निर्यात किए गए और अब इस वर्ष इनके निर्यात और बढ़ने की संभावना हैं। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि एक सौ चौंसठ देशों के जिस विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) को मृतप्राय मान लिया गया था, उसे जून 2022 में जिनेवा में आयोजित बारहवें मंत्रिस्तरीय सम्मेलन से पुनर्जीवन मिला है। इस सम्मेलन में जिस तरह मत्स्यपालन सबसिडी से लेकर टीका पेटेंट संरक्षण जैसे कई विवादित मुद्दों पर सहमति मिली, इससे भी भारत के विदेश व्यापार की अनुकूलताएं बढ़ेंगी।

वर्तमान वैश्विक हालात में भारत को विदेश व्यापार के लिए सही नीतिगत कदम उठाने की जरूरत है, ताकि टिकाऊ विकास के लिए काम हो सके। आर्थिक सुधारों के रास्ते पर बढ़ कर ही इस लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है। अब जमाना डिजिटल अर्थव्यवस्था है। इसलिए इस राह में आने वाली बाधाओं को भी दूर करना होगा। आत्मनिर्भर भारत अभियान और मेक इन इंडिया के तहत ऐसी वस्तुओं का उत्पादन बढ़ाने की जरूरत है जिनसे आयात घटे और निर्यात बढ़ सके। इससे भारत का बढ़ता हुआ व्यापार भी घाटा कम हो सकेगा।

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