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खाद्य उपनिवेशवाद का फैलता दायरा

कृषिप्रधान देश भारत भी इस विश्वव्यापी मुहिम से अछूता नहीं है। दाल, खाद्य तेल, चीनी और डेयरी क्षेत्र से जुड़ी भारतीय कंपनियां दुनिया भर में कृषि भूमि का अधिग्रहण कर रही हैं।

Author नई दिल्ली | Published on: March 2, 2016 2:06 AM
food colonialism, Land acquisition bill, land Billखेत में किसान (फाइल फोटो)

उपनिवेशवाद के बारे में कहा जाता है कि यह कभी नहीं मरता, बस इसका रूप बदल जाता है। इसका ज्वलंत उदाहरण है खाद्य उपनिवेशवाद। कॉरपोरेट घरानों की नजर में जो खेतिहर जमीन कुछ साल पहले तक घाटे का सौदा थी वही अब आकर्षण का केंद्र बन चुकी है। बढ़ती आबादी, मध्यवर्ग का विस्तार, शहरीकरण, खान-पान की आदतों में बदलाव, कुदरती आपदाओं में इजाफा, उपजाऊ जमीन और पानी की बढ़ती किल्लत को देखते हुए आने वाले वर्षों में खाद्य पदार्थों की मांग पूरी करना आसान नहीं होगा। दूसरी ओर, जलवायु परिवर्तन के कारण कृषि उत्पादन को लेकर अनिश्चितता साल-दर-साल बढ़ती जा रही है। इसी को देखते हुए बड़े-बड़े कॉरपोरेट घराने, निवेश बैंक, एग्री बिजनेस कंपनियां, तेल निर्यात करने वाले और उभरती अर्थव्यवस्था वाले देश लातिन अमेरिका से लेकर एशिया तक में खेती की जमीन, जंगल और नमभूमि का अधिग्रहण कर रहे हैं।

हाल के वर्षों में लातिन अमेरिका, मध्य एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया व अफ्रीका में खेतिहर जमीन के बड़े-बड़े सौदे अखबारों की सुर्खियां बनते रहे हैं। पिछले डेढ़ दशक में तकरीबन चार करोड़ हेक्टेयर कृषिभूमि या तो खरीदी या पट््टे पर ली जा चुकी है। इसके अलावा डेढ़ करोड़ हेक्टेयर के सौदे अधिग्रहण की प्रक्रिया में हैं। इनमें से आधी जमीन का अधिग्रहण अफ्रीका महाद्वीप में किया गया जबकि दूसरे स्थान पर एशिया है। खेतिहर जमीन का सबसे बड़ा खरीदार अमेरिका है जो खुद खेतिहर जमीन के मामले में संपन्न है। अमेरिका ने सत्तर लाख हेक्टेयर जमीन खरीदी या पट््टे पर ली है। पैंतीस लाख हेक्टेयर जमीन के साथ मलेशिया दूसरे स्थान पर रहा है। यह संख्या तो जमीन अधिग्रहण के अधिकृत आंकड़ों की है। यदि अनधिकृत आंकड़ों को देखा जाए तो जमीन अधिग्रहण का यह आंकड़ा बहुत ज्यादा नजर आएगा और इसमें सबसे बड़ा खिलाड़ी चीन निकलेगा।

कृषिप्रधान देश भारत भी इस विश्वव्यापी मुहिम से अछूता नहीं है। दाल, खाद्य तेल, चीनी और डेयरी क्षेत्र से जुड़ी भारतीय कंपनियां दुनिया भर में कृषि भूमि का अधिग्रहण कर रही हैं। उदाहरण के लिए रुचि सोया और केएस आॅयल ने इंडोनेशिया व मलेशिया में पॉम पेड़ों के फार्म हासिल किए हैं। बंगलुरु स्थित देश की सबसे बड़ी गुलाब निर्यातक कंपनी करुतुरुग्लोबल ने इथियोपिया में 8 लाख्र 40 हजार एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया है। कंपनी यहां मक्का, गेहूं, धान, सब्जियों और गन्ने की खेती करेगी। खुद भारत सरकार भी दालों व खाद्य तेल की कमी दूर करने के लिए विदेशों में पट्टे पर जमीन लेकर इन फसलों की खेती कराने के प्रस्ताव पर लंबे अरसे से विचार कर रही है।

जमीन अधिग्रहण के बाद निवेशक छोटी-छोटी जोतों को बड़े-बड़े कृषि फार्मों में बदल रहे हैं जहां आधुनिक तकनीक की मदद से नकदी फसलों की खेती की जा रही है। इन फसलों में सोयाबीन, मक्का, पाम आॅयल, इमारती लकड़ी और जटरोफा जैसे जैव र्इंधन की खेती हो रही है। इतना ही नहीं, ये कंपनियां तीसरी दुनिया के मीठे पानी के भंडार पर भी अपनी नजरें गड़ाए हैं। कंपनियां उन जमीनों का अधिग्रहण कर बोतलबंद पानी के कारोबार को बढ़ावा दे रही हैं जहां मीठे पानी का भरपूर भंडार है। ये कंपनियां अपनी सुनियोजित रणनीति के तहत खाद्य पदार्थों के कारोबार को इस प्रकार परिचालित कर रही हैं कि छोटे व सीमांत किसानों के लिए खेती-किसानी घाटे का सौदा बन जाए। यह काफी हद तो हो भी चुका है। कृषि क्षेत्र पर कॉररपोरेट शिकंजे की दो तरकीब बहुत जानी-पहचानी है। एक है वायदा बाजार, जहां भविष्य की उपज के भी सौदे होते हैं और उपज की कीमतों के निर्धारण में सट्टेबाजों का खेल चलता है। दूसरी तरकीब है, ठेका या अनुबंध खेती।

खेती-किसानी की आउटसोर्सिंग ने 2007-08 में जोर पकड़ा जब अप्रत्याशित रूप से बढ़ी हुई कीमतों के कारण दुनिया के सैंतीस देशों में खाद्य दंगे भड़क उठे थे। इसी मौके का फायदा उठाने के लिए निजी कपनियों, सट्टेबाजों और निवेश बैंकों ने ‘भूमि हड़प’ के फार्मूले पर काम करना शुरू किया, जिसका नतीजा यह है कि छोटे व सीमांत किसान तेजी से भूमिहीन श्रमिक बन रहे हैं। यह भारत में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में हो रहा है। आज यूरोप में तमाम तरह की सबसिडी के बावजूद हर मिनट में एक किसान खेती-किसानी को अलविदा कह रहा है। अपने देश में भी रोजाना ढाई हजार किसान खेती को अलविदा कह रहे हैं।

विडंबना यह है कि जो खेती आम किसानों के लिए घाटे का सौदा बन चुकी है उसी में बड़ी-बड़ी कंपनियों को मुनाफा नजर आ रहा है। यही कारण है कि ये कंपनियां कृषिभूमि खरीदने से लेकर साग-भाजी बेचने का अधिकार हासिल करने के लिए सरकारों पर दबाव बना रही हैं। नतीजतन मंडी कानून में संशोधन किए जा रहे हैं और भूमि हदबंदी कानूनों में ढील दी जा रही है। इस प्रकार खेती-किसानी पर कॉरपोरेट शिकंजा कसता जा रहा है। बीज, उर्वरक, रसायन, कीटनाशक, मशीनरी आदि में कॉरपोरेट घरानों की घुसपैठ तो वर्षों पहले हो चुकी थी, अब वे वातानुकूलित कमरों से निकल कर धूल-धूसरित पगडंडियों और खेतों में उतर चुके हैं।

जाहिर है, पिछला उपनिवेशवाद जहां सैनिक शक्ति के बल पर स्थापित किया गया था वहीं मौजूदा उपनिवेशवाद का फैलाव चेकबुक के जरिए हो रहा है। कई अर्थशास्त्री जमीन खरीदने व पट्टे पर लेने की इस मुहिम को भूमि हड़प कह रहे हैं, क्योंकि इस प्रक्रिया में छोटे व सीमांत किसान तेजी से भूमिहीन श्रमिक बन रहे हैं। इसीलिए स्थानीय समुदाय इसका विरोध कर रहे हैं। हालांकि इन किसानों को रोजगार, बिजली, सड़क, उत्पादकता व आय में बढ़ोतरी, तकनीकी हस्तांतरण आदि का प्रलोभन दिया जा रहा है लेकिन इससे होने वाले नुकसान के बारे में स्थानीय सरकारें खामोश हैं। फिर मुआवजा, रोजगार, आय आदि के मामले में असंगठित व छोटे किसानों के हितों की अनदेखी की जा रही है। जमीन की बिक्री या उसे पट्टे पर देते समय यह कहा जाता है कि संबंधित भूमि अनुत्पादकहै लेकिन वह गरीबों को आजीविका सुरक्षा देती है।

विदेशी निवेशक अधिग्रहीत भूमि पर सघन खेती करते हैं। इससे जैव विविधता, मिट्टी की गुणवत्ता और भूमिगत जल पर गंभीर असर पड़ता है। वन या चरागाह की जमीन के एकफसली खेती में बदलने से इनकी जैव विविधता खतरे में पड़ सकती है। उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों की मिट्टी सघन खेती के अनुकूल नहीं होती। हालांकि इसे सिंचाई, रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों से खेती के अनुकूल बनाया जा सकता है लेकिन इससे जल भराव, लवणता और मिट्टी के कटाव की समस्याएं बढ़ेंगी। चूंकि इस जमीन पर खेती का उद््देश्य अधिकाधिक लाभ कमाना होता है, इसलिए निवेशक स्थान विशेष की पारिस्थितिकी का उतना ध्यान नहीं रख सकेंगे, जितना स्थानीय किसान रखते।

खेती के घाटे का सौदा बनने और किसानों के खेती छोड़ने का परिणाम मजदूरों की तादाद में इजाफे के रूप में सामने आ रहा है। चूंकि इन मजदूरों के पास कोई हुनर नहीं होता इसलिए शहरों में इनकी स्थिति दिहाड़ी मजदूर से आगे नहीं बढ़ पाती है। इसे भारत के किसी भी महानगर में देखा जा सकता है। इससे यह प्रमाणित होता है कि किसान मजदूर बन रहे हैं अर्थात उनकी दशा में सुधार नहीं बल्कि गिरावट आ रही है। स्पष्ट है भारत समेत तीसरी दुनिया में किसानों के खेती छोड़ने की प्रक्रिया उस तरह सुखदायी नहीं है जिस तरह उन्नीसवीं सदी में यूरोप-अमेरिका में घटित हुई थी। अत: इसे उदारीकरण की उपलब्धि कहना ठीक नहीं होगा।

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि एक ओर उदारीकरण समर्थक किसानों के खेती छोड़ने को विकास प्रक्रिया का अभिन्न अंग बता रहे हैं तो दूसरी ओर वैश्विक संस्थाओं का मानना है कि विकासशील देशों के करोड़ों ग्रामीणों का कल्याण कृषिक्षेत्र के विकास के बिना संभव नहीं है। विश्व बैंक के मुताबिक गरीब लोगों के लिए कृषिक्षेत्र के सकल घरेलू उत्पाद में बढ़ोतरी अन्य क्षेत्रों में निवेश के मुकाबले चार गुना अधिक कारगर है। पूर्वी एशियाई देशों में पिछले पंद्रह वर्षों में कृषिक्षेत्र का विकास गरीबी दूर करने में सहायक सिद्ध हुआ है। देश के पचासी फीसद किसान छोटी जोत वाले हैं और अनुभवों से यह प्रमाणित हो चुका है कि छोटे किसानों की सहायता से आर्थिक विकास के साथ-साथ खाद्य सुरक्षा भी सुनिश्चित होती है।

यहां विएतनाम का उदाहरण प्रासंगिक है। 1979 में यहां की अट्ठावन फीसद जनसंख्या गरीबी रेखा के नीचे गुजर-बसर कर रही थी। 2009 में यह अनुपात घट कर मात्र पंद्रह फीसद रह गया। इस उपलब्धि को विएतनाम ने अपने छोटे किसानों के बल पर हासिल किया है। गौरतलब है कि आज भी विएतनाम की तिहत्तर फीसद जनसंख्या ग्रामीण इलाकों में रहती है और कृषि आय का प्रमुख साधन है। यह भारतीय नीति-निर्माताओं के लिए सीख है जो गरीबी उन्मूलन व खाद्य सुरक्षा के लिए औद्योगीकरण, शहरीकरण और भोजन के अधिकार पर बल देते हैं।

स्पष्ट है, छोटे किसान वैश्विक खाद्यान्न आपूर्ति में महत्त्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं, बशर्ते उनकी भूमि व पानी तक पहुंच बने, स्थानीय स्तर पर वित्तीय सुविधाएं सुलभ हों ताकि वे बीज, उर्वरक, कीटनाशक, मशीनरी आदि खरीद सकें। परिवहन के साधनों के साथ नवीनतम तकनीक उन तक पहुंचाई जाए। इसी प्रकार कृषि विपणन ढांचे में सुधार किया जाए ताकि किसानों को उपज का लाभकारी मूल्य मिल सके। दुर्भाग्यवश खाद्य उपनिवेशवाद की यह नई मुहिम कृषिक्षेत्र की इस अनोखी शक्ति की राह में अवरोध खड़े कर रही है।

(रमेश कुमार दुबे)

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