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राजनीति: एनपीए का संकट और समाधान

रिजर्व बैंक की वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट के मुताबिक सरकारी बैंकों की स्थिति निजी बैंकों से ज्यादा खराब हो सकती है। दबावग्रस्त परिसंपत्तियों की वजह से कमजोर बैंक मार्च,2021 तक न्यूनतम पूंजी स्तर का पालन करने में चूक कर सकते हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार तिरपन देशी-विदेशी बैंकों की पूंजी पर्याप्तता अनुपात कम होकर 14.1 फीसद रह सकता है, जो सितंबर 2019 में 14.9 फीसद था।

Banking sectorरिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास। (फाइल फोटो)

वित्त वर्ष 2021-22 के लिए पेश किए गए बजट में बैंकिंग क्षेत्र को मजबूत बनाने के लिए बैड बैंक बनाने की घोषणा की गई है। बैड बैंक जैसे निकाय का गठन समय की मांग है, क्योंकि कोरोना महामारी की वजह से आमजन और कारोबारियों की आय में भारी कमी आई है और इस वजह से वे कर्ज और ब्याज चुकाने में असमर्थ हैं। इससे बैंकों की गैर निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) में भारी इजाफा होने का खतरा मंडरा रहा है। बैड बैंक बनाने के आलोक में सरकार परिसंपत्ति पुनर्गठन कंपनी (एआरसी) और परिसंपत्ति प्रबंधन कंपनी (एएमसी) का गठन करेगी।

इन कंपनियों के गठन का उद्देश्य बड़े दबावग्रस्त ऋण खातों का समाधान निकालना है, जिन्होंने एक से से अधिक बैंकों से कर्ज ले रखे हैं। एआरसी दबावग्रस्त परिसंपत्तियों के समाधान के लिए काम करेगी, जबकि एएमसी दबावग्रस्त परिसंपत्तियों के मूल्यांकन, विपणन, परिसंपत्ति की वास्तविक मूल्य की वसूली आदि का काम करेगी। बैड बैंक में सरकार कोई निवेश नहीं करेगी और न ही इसमें सरकार की कोई हिस्सेदारी (शेयर होल्डिंग) होगी। बैड बैंक बाजार भाव पर बैंकों से उनका डूबा कर्ज खरीदेगा, जिससे अधिक एनपीए वाले बैकों की बैलेंस शीट अच्छी हो जाएगी और उन्हें अपने कारोबार के लिए पूंजी जुटाने में आसानी होगी।

बैड बैंक के कई मॉडल हो सकते हैं। सभी सरकारी बैंकों के लिए एक बड़ा बैड बैंक हो सकता है या फिर एक की जगह कई बैड बैंक बनाए जा सकते हैं। फिर भी, मौजूदा परिवेश में ऐसा लग रहा है कि यह बैंक 15:85 मॉडल पर काम करेगा और इसमें सभी बैंकों के एनपीए खातों को एक जगह लाया जाएगा। इस मॉडल के तहत बैड बैंक से एनपीए वाले बैंक पंद्रह फीसद नकदी के रूप में भुगतान हासिल करेंगे, जबकि पिच्यासी फीसद बैड बैंक को मिलेगा। इस बैंक में शुरूआत में दो से सवा दो लाख करोड़ रुपए तक की एनपीए राशि शामिल की जा सकती है।

बैड बैंक की स्थापना दो से तीन महीने के भीतर किए जाने का अनुमान है। इस बैंक के अस्तित्व में आने पर बैंक गुणवत्तायुक्त परिसंपत्ति पर विशेष ध्यान दे पाएंगे, जिससे मानक खातों के एनपीए में तब्दील होने की संभावना कम हो जाएगी। बैलेंस शीट साफ-सुथरी होने से रेटिंग एजेंसियों, देसी व विदेशी निवेशकों, जमाकतार्ओं आदि पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा और बैंक अपने कारोबार को आगे बढ़ाने की दिशा में काम कर सकेंगे।

भारतीय रिजर्व बैंक के नियामकीय राहतों को वापस लेने के बाद महामारी के कारण बही-खातों में संपत्ति का मूल्य घट सकता है, जिसके कारण बैंकों को पूंजी की कमी का सामना करना पड़ सकता है। एक अनुमान के अनुसार बैंकों का सकल एनपीए सितंबर 2021 तक बढ़ कर साढ़े तेरह फीसद हो सकता है, जो एक साल पहले साढ़े सात फीसद था। सरकार का भी मानना है कि सर्वोच्च अदालत द्वारा कर्ज की अदायगी में दी गई राहत के मामले में फैसला सुनाने के बाद बैंकों के एनपीए खातों की संख्या बढ़ सकती है। एनपीए बढ़ने पर बैंकों को अपनी पूंजी के एक बड़े हिस्से का प्रावधान एनपीए की मद मेँ करना होगा। इससे उनकी कर्ज देने की क्षमता में कमी आएगी और कारोबार व मुनाफे पर भी बुरा असर पड़ेगा। वैश्विक रेटिंग एजेंसी एसएंडपी की रिपोर्ट ‘द स्टेट्स फ्रैक्चर्स इन इंडियन फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशंस’ के अनुसार भी आगामी बारह से अठारह महीनों में एनपीए बढ़ कर कुल कर्ज का दस से ग्यारह फीसद तक पहुंच सकता है, जबकि 30 जून 2020 को यह आठ फीसद था।

वित्त वर्ष 1996-97 में सूक्ष्म, लघु और मझौले (एमएसएमई) और बड़े उद्योगों को दिए गए कर्ज में एनपीए का प्रतिशत सोलह था। हालांकि, बाद में अर्थव्यवस्था में आई तेजी और सरकारी बैंकों द्वारा उठाए गए सुधारवादी कदमों से एनपीए घटा। वर्ष 2007 में एनपीए का स्तर घट कर 2.6 फीसद रह गया। पुन: वैश्विक स्तर पर आई वित्तीय संकट की वजह से एनपीए के स्तर में बढ़ोतरी हुई और 2017-18 तक एनपीए का स्तर बढ़ कर ग्यारह फीसद के स्तर पर पहुंच गया। हालांकि, सामान्य तौर पर हुई एनपीए की वसूली और ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) की मदद से हुई एनपीए की वसूली से वित्त वर्ष 2019-20 में एनपीए का स्तर घट कर साढ़े आठ फीसद के स्तर पर पहुंच गया। चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में कर्ज पुनर्गठन और कर्जों की किस्त एवं ब्याज के भुगतान पर लगे रोक से बैंकों को एनपीए की मद में बड़ी राशि का प्रावधान करना पड़ा है। प्रमुख निजी बैंकों की सितंबर तिमाही के आय विश्लेषणों से पता चलता है कि समग्र आधार पर आकस्मिक प्रावधान, परिसंपत्ति गुणवत्ता में कमी की वजह से किए गए। कोरोना महामारी से बैंकों के परिचालन लाभ का लगभग सत्ताईस फीसद हिस्सा प्रभावित हुआ है।

रिजर्व बैंक की वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट के मुताबिक सरकारी बैंकों की स्थिति निजी बैंकों से ज्यादा खराब हो सकती है। रिपोर्ट बताती है कि दबावग्रस्त परिसंपत्तियों की वजह से कमजोर बैंक मार्च,2021 तक न्यूनतम पूंजी स्तर का पालन करने में चूक कर सकते हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार तिरपन देशी-विदेशी बैंकों की पूंजी पर्याप्तता अनुपात कम होकर 14.1 फीसद रह सकता है, जो सितंबर 2019 में 14.9 फीसद था। निजी बैंक पूंजी बढ़ा चुके हैं या पूंजी बढ़ाने की दिशा में काम कर रहे हैं। कोरोना महामारी के कारण सरकार की वित्तीय स्थिति भी संतोषजनक नहीं है। ऐसी स्थिति में भी सरकार सरकारी बैंकों के पुनर्पूंजीकरण की कोशिशें कर रही है। लेकिन सभी कमजोर बैंकों का पुनर्पूंजीकरण करना लगभग नामुमकिन है। ऐसे में जिन बैंकों को पूंजी नहीं मिलेगी, उनकी वित्तीय स्थिति का खराब होना लगभग तय है। इस रिपोर्ट में निजी बैंकों का एनपीए अनुपात 3.1 से 4.5 फीसद के बीच बढ?े का अनुमान जताया गया है।

एनपीए की वसूली में तेजी लाने के लिए नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) ढांचे को और मजबूत करने और दबावग्रस्त परिसंपत्तियों के तेजी से समाधान के लिए ई-कोर्ट प्रणाली शुरू करने की घोषणा बजट में की गई है। इस नई संकल्पना की मदद से अदालत में चल रहे मुकदमों का जल्दी निपटारा किया जाएगा, जिससे बैंकों के एनपीए स्तर में कमी आएगी। एमएसएमई क्षेत्र के एनपीए की वसूली के लिए सरकार अलग ढांचा बनाएगी, क्योंकि 31 मार्च 2021 से एमएसएमई क्षेत्र के एनपीए के नए मामलों के एनसीएलटी में दर्ज करने पर लगी पाबंदी को हटाने का प्रस्ताव है। मौजूदा प्रावधान की वजह से एनपीए की वसूली में कमी आई है, लेकिन नए प्रस्ताव से इसमें तेजी आने की उम्मीद है।

अर्थव्यवस्था के विकास में मूल बाधा पूंजी की कमी है और बैड बैंक एनपीए खातों में से वसूली करके पूंजी की उपलब्धता को सुनिश्चित करने का काम करेंगे। पूंजी होने पर ही बैंक जरूरतमंदों को कर्ज दे सकते हैं। इसी वजह से बैड बैंक की जरूरत बैंकिंग क्षेत्र में लंबे समय से महसूस की जा रही थी। माना जा रहा है कि इस बैंक के अस्तित्व में आने के बाद बैंक अपने कारोबार को बढ़ाने की तरफ ध्यान दे सकेंगे। साथ ही ग्राहक सेवा में भी सुधार कर सकेंगे, जिससे बैंकों के मुनाफे में वृद्धि तो होगी ही, उन पर ग्राहकों, निवेशकों और रेटिंग एजेंसियों का भरोसा भी बढ़ेगा।

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