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विदेश निवेश में कितनी हकीकत

जब से लंदन की एक डाटा कंसल्टेंसी फर्म ने दुनिया की प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआइ) सूची में भारत को अव्वल बताया है तब से इस मुद्दे पर खासा विवाद खड़ा हो गया है।

Author October 16, 2015 10:02 AM

जब से लंदन की एक डाटा कंसल्टेंसी फर्म ने दुनिया की प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआइ) सूची में भारत को अव्वल बताया है तब से इस मुद्दे पर खासा विवाद खड़ा हो गया है। फर्म के अनुसार, आज भारत बहुराष्ट्रीय कंपनियों के निवेश का सबसे पसंदीदा देश है। एफडीआइ के मामले में उसने चीन और अमेरिका को पीछे छोड़ दिया है। चालू वित्तवर्ष की पहली छमाही में भारत को इकतीस अरब डॉलर का विदेशी निवेश मिला, जबकि चीन को मिला अट्ठाईस अरब डॉलर। इस हिसाब से चीन हमसे तीन अरब डॉलर पीछे है, लेकिन भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) के आंकड़े इस दावे की पुष्टि नहीं करते। देश के केंद्रीय बैंक के अनुसार इस साल जनवरी से जून माह के बीच केवल 20.6 अरब डॉलर का विदेशी निवेश आया है। अगर इस अवधि में देश से बाहर गए 1.6 अरब डॉलर को निकाल दिया जाए तो विशुद्ध रकम उन्नीस अरब डॉलर ही बचेगी। इस प्रकार लंदन की फर्म और आरबीआइ के आंकड़ों में बारह अरब डॉलर का भारी अंतर है, जिसे केवल चूक नहीं माना जा सकता।

हाल ही में एफडीआइ पर जारी विश्व बैंक की रिपोर्ट भी कुछ और दास्तान बयान करती है। रिपोर्ट के अनुसार पिछले वर्ष एफडीआइ के मामले में भारत का दुनिया में नौवां स्थान था। 131.8 अरब डॉलर के साथ अमेरिका पहले नंबर पर था, जबकि 119.6 अरब डॉलर के साथ चीन दूसरे स्थान पर। इस सूची में हांगकांग तीसरे (116.0), ब्राजील चौथे (96.9) और सिंगापुर पांचवें (67.5) स्थान पर हैं। पिछले वर्ष भारत में महज 34.4 अरब डॉलर का निवेश आया। यह रकम इससे पिछले साल (2013) के मुकाबले छब्बीस फीसद अधिक है, फिर भी सिंगापुर जैसे नन्हे-से देश के मुकाबले लगभग आधी है।

करीब पच्चीस बरस पहले जब हमने अपनी अर्थव्यवस्था खोली थी, तब से अब तक का सफर भी देखें तो दृश्य सुखद नहीं है। वर्ष 1990 में भारत को केवल बीस करोड़ डॉलर का एफडीआइ मिला था, जबकि चीन को साढ़े तीन अरब डॉलर का। पिछली चौथाई सदी में विदेशी निवेश आकर्षित करने के मोर्चे पर चीन ने 116.1 अरब डॉलर की शानदार छलांग लगाई है, जबकि हमारे यहां एफडीआइ में 34.2 अरब डॉलर का इजाफा हुआ है। इससे पता चलता है कि चीन से हम कितने पीछे हैं।

ऐसे में अचानक भारत को अव्वल बताने की बात कैसे गले उतर सकती है? गहराई में जाने पर गड़बड़ी पकड़ में आती है। लंदन की फर्म ने इकतीस अरब डॉलर का जो आंकड़ा दिया है, वह संभावित ‘ग्रीन फील्ड’ निवेश का है। जब कोई बहुराष्ट्रीय कंपनी किसी देश की सरकार की कर-छूट नीति या अन्य रियायतों से प्रभावित होकर वहां कोई नई परियोजना शुरू करने का भरोसा दिलाती है या अपने कारोबार में विस्तार करती है, उसे ग्रीन फील्ड निवेश कहा जाता है। इस हकीकत की अनदेखी नहीं की जा सकती कि संभावित परियोजना और वास्तविक परियोजना में उतना ही अंतर होता है जितना एक सपने और सच में। इसीलिए आरबीआइ के आंकड़े वास्तविकता के निकट हैं। यहां एक और बात का जिक्र जरूरी है। एफडीआइ का पैसा केवल नई परियोजनाओं में नहीं लगता, देश के शेयर बाजार में भी भारी मात्रा में विदेशी धन आता है। इस वर्ष के प्रथम छह माह में भारत के शेयर बाजार में लगने वाली विदेशी पूंजी सत्रह अरब डॉलर आंकी गई। अगर परियोजनाओं और शेयर बाजार में लगे पैसे को जोड़ा जाए तब भी कुल रकम साढ़े इकतीस अरब डॉलर बैठती है।

अगर वर्ष 2014 और 2015 के एफडीआइ आंकड़ों की तुलना की जाए तब भी एफडीआइ का नजारा बहुत उत्साहजनक नहीं है। पिछले वर्ष के प्रथम छह माह में 17.8 अरब डॉलर का एफडीआइ आया था जो इस साल की इसी अवधि से 2.8 अरब डॉलर कम है। हां, गए साल देश से बाहर जाने वाला एफडीआइ नौ अरब डॉलर था, जो इस वर्ष घटकर 1.6 अरब डॉलर रह गया। इसका कारण दुनिया के देशों की कमजोर आर्थिक स्थिति है और इसी वजह से इस साल हमारा विशुद्ध एफडीआइ आंकड़ा बेहतर नजर आता है।

इससे भी ज्यादा परेशानी की बात चीन से की गई बेतुकी तुलना है। चीन के नेशनल स्टेस्टिस्टिकल ब्यूरो के अनुसार इस साल की प्रथम छमाही में वहां विदेशों से 68.4 अरब डॉलर का निवेश आया, जो हमसे तीन गुना अधिक है। इस दृष्टि से भारत को पड़ोसी चीन से आगे बताना प्रोपोगंडा ही कहा जाएगा। भारत सरकार के डिपार्टमेंट आॅफ इंडस्ट्रियल पालिसी प्रमोशन (डीआइपीपी) के अनुसार उक्त अवधि में सबसे ज्यादा पैसा आइटी सेक्टर में आया। इसके बाद आॅटोमोबाइल, ट्रेड और वित्त संस्थानों का स्थान है। चिंता की बात यह है कि इन सभी क्षेत्रों में रोजगार की गुंजाइश सीमित होती है।

एफडीआइ के मामले में हमारी सरकार को तमाम कोशिशों के बावजूद अपेक्षित सफलता नहीं मिल पा रही है। आर्थिक हालात खराब होने के कारण पिछले वर्ष दुनिया में एफडीआइ का प्रवाह आठ फीसद गिरा। वर्ष 2013 में कुल एफडीआइ प्रवाह 13.6 खरब डॉलर था, जो 2014 में घट कर 12.6 खरब डॉलर रह गया। इस दृष्टि से हमारे देश में विदेशी पूंजी की आवक में वृद्धि उल्लेखनीय उपलब्धि कही जाएगी। लेकिन इसका श्रेय अकेले मौजूदा सरकार को नहीं जाता क्योंकि पिछले वर्ष के पांच महीने केंद्र में मनमोहन सरकार भी थी।

विकास के नाम पर आंख मूंद कर देश के व्यापारियों को छूट देना और विदेशी निवेशकों को न्योतना शुभ संकेत नहीं है। विदेशों से आने वाले धन की पड़ताल होना जरूरी है। पिछले दो वर्ष के बीच आए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को टटोलने से पता चलता है कि इस दौरान सर्वाधिक धन मारीशस से आया है। मारीशस की गिनती ‘टैक्स हैवन’ देशों में होती है और वहां से आए पैसे को संदेह की दृष्टि से देखा जाता है। वर्ष 2013-14 में देश को कुल चौबीस अरब डॉलर का एफडीआइ मिला जिसमें पच्चीस फीसद अकेले सिंगापुर से आया। इस दौरान मारीशस से बीस प्रतिशत (4.85 अरब डॉलर) निवेश हुआ। शेष दुनिया से बची पचपन प्रतिशत रकम आई।

एक और बात महत्त्वपूर्ण है। सरकार हर वर्ष यह तो बताती है कि कितना विदेशी निवेश हुआ, लेकिन इसका हिसाब कोई नहीं देता कि विदेशी कंपनियां हर साल कितना पैसा कमा कर बाहर ले गर्इं। मोटा अनुमान है कि अमेरिकी कंपनियां उन्हीं देशों में पैसा लगाती हैं जहां एक डॉलर लगा कर वे तीन डॉलर कमा सकें। अब सरकार को बहुराष्ट्रीय कंपनियों की कमाई और बाहर जाने वाले धन का आंकड़ा भी जारी करना चाहिए। काले धन के खिलाफ लड़ाई, भ्रष्टाचार पर नियंत्रण और देशी-विदेशी धन का रंग परखने के लिए जरूरी है कि ‘मेक इन इंडिया’ अभियान आंख पर पट्टी बांध कर न चलाया जाए। मैकेंजी ग्लोबल इंस्टिट्यूट की ताजा रिपोर्ट के अनुसार पिछले वर्ष टैक्स काटने के बाद दुनिया की बड़ी कंपनियों का मुनाफा बीस खरब डॉलर से बढ़ कर बहत्तर खरब डॉलर हो गया है। जब पूरा विश्व मंदी की चपेट में हो, तब भीमकाय कंपनियों का बढ़ता मुनाफा चौंकाता है। इसका एक ही कारण है और वह है उन्हें मिली भारी कर-छूट।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ताबड़तोड़ विदेशी दौरे किए। जापान, चीन, रूस, अमेरिका आदि देशों को भारत में निवेश का न्योता दिया है। निवेश का माहौल अनुकूल बनाने के लिए कई कदम भी उठाए हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनियों का भरोसा जीतने के लिए कई कानूनों में बदलाव किया और कर-ढांचे में सुधार का संकेत दिया है। मोदी का ‘मेक इन इंडिया’ नारा विदेशी निवेश और तकनीकी के हस्तातंरण पर आश्रित है लेकिन निवेश के आश्वासनों को जमीन पर उतारने के लिए लंबा सफर तय करना होगा। देश में उद्योग बैठाने के लिए सबसे पहले आधारभूत संरचना का ढांचा दुरुस्त करना जरूरी है। फैक्टरियों के लिए बिजली, पानी, सड़क और जमीन मुहैया करानी होगी, कुशल कामगारों की फौज खड़ी करनी पड़ेगी। इन सारे कामों को अंजाम तक पहुंचाना आसान नहीं है। इसके लिए भारी मात्रा में घरेलू पूंजी की भी जरूरत है।

पिछले पच्चीस बरसों में हमारे देश की हर सरकार ने ‘ट्रिकल डाउन’ सिद्धांत पर आंख मूंद कर अमल किया है। कॉरपोरेट और उद्योगों को खरबों रुपए की कर-रयायत दी और गरीब आदमी पर प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष करों का बोझ बढ़ा दिया, जिस कारण पूरा समाज आय-विषमता के मकड़जाल में जकड़ता चला गया है। ट्रिकल डाउन थ्योरी की जनक और मुक्त बाजार की पैरोकार बिरादरी का मानना है कि धनी वर्ग के हाथ में पूंजी इकट्ठा होना देश-हित में है। यह वर्ग पैसे को उत्पादन में लगाता है, जिससे लोगों को रोजगार मिलता है और उनकी आमदनी बढ़ती है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (आइएमएफ) के एक ताजा अनुसंधान ने ट्रिकल डाउन थ्योरी की धज्जियां उड़ा दी हैं।

फिलहाल विश्व व्यापार में यूरोपीय संघ और दुनिया के अग्रणी उन्नीस देशों की अस्सी फीसद हिस्सेदारी है। दुनिया का सबसे बड़ा निर्यातक देश चीन है। उसका बारह प्रतिशत बाजार पर कब्जा है जबकि भारत की हिस्सेदारी महज 1.7 फीसद है। वर्ष 2002 में चीन का विश्व-व्यापार में पांच प्रतिशत और भारत का 0.8 प्रतिशत हिस्सा था। दस वर्ष में उसका निर्यात ढाई गुना बढ़ा जबकि हमारा लगभग दो गुना। आज अमेरिका (8.6 प्रतिशत), जर्मनी (7.9 प्रतिशत), जापान (3.9 प्रतिशत) भी चीन से काफी पीछे हैं। पहले भारत को इन देशों को पछाड़ना होगा, उसके बाद ही चीन को टक्कर देने की बात सोची जा सकती है।
धर्मेंद्र सिंह

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