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राजनीति: खेतों को बचाने की चुनौती

टिड्डियों के दल उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब सहित कुल दस राज्यों में अपनी संहारक दस्तक दे चुके हैं। फौरी हिदायत के तौर पर सरकारी प्रशासन किसानों से अपील कर रहा है कि वे फिलहाल ढोल-नगाड़े, बर्तन आदि बजा कर खेतों को टिड्डियों के हमले से बचाएं। कीटनाशकों के छिड़काव की सलाह भी दी जा रही है, लेकिन यह तभी मुमकिन है जब उनके हमले का पहले से कोई अंदेशा हो।

Author Published on: June 3, 2020 5:11 AM
फसलों को नुकसान पहुंचा रही टिड्डी।

अभिषेक कुमार सिंह
प्रकृति में संतुलन बनाए रखने के पक्षधरों का हमेशा मत रहा है कि दुनिया के छोटे से छोटे जीव और कीट-पतंगों तक का अपना महत्त्व है। प्रकृति में इनका होना इसका बात का संकेत है कि यह दुनिया रहने लायक बनी रहेगी। लेकिन जब इन्हीं में से कुछ कीट हमारी सभ्यता के दुश्मन बन जाएं और खेती से लेकर हमारी जिंदगी तक इनकी मार से भयाक्रांत हो उठे, तब क्या हो। इन दिनों उत्तर भारत के करीब दस राज्यों के किसान टिड्डी दल के अचानक हमले के आगे निहत्थे साबित हो रहे हैं और उन्हें कोई रास्ता नहीं सूझ रहा है कि धरती की हरियाली पर आई इस आपदा से आखिर किस प्रभावी तरीके से निपटा जाए।

कैसी विडंबना है कि एक तरफ जब पूरी दुनिया आंख से नहीं दिखने वाले कोरोनाविषाणु के संक्रमण से जूझ रही है, तो महज दो ग्राम वजनी टिड्डी के विशालकाय दलों ने देश के सामने एक नई चुनौती पैदा कर दी है। खेती-किसानी की मुश्किलें वैसे ही कम नहीं हैं। इस पर चंद मिनटों के हमले में पूरे के पूरे खेत सफाचट कर डालने वाले टिड्डी दलों के हमले ने किसानों की कमर तोड़ कर रख दी।

महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान से शुरू होकर टिड्डियों के दल उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब सहित कुल दस राज्यों में अपनी संहारक दस्तक दे चुके हैं। फौरी हिदायत के तौर पर सरकारी प्रशासन किसानों से अपील कर रहा है कि वे फिलहाल ढोल-नगाड़े, बर्तन आदि बजा कर खेतों को टिड्डियों के हमले से बचाएं। कीटनाशकों के छिड़काव की सलाह भी दी जा रही है, लेकिन यह तभी मुमकिन है जब उनके हमले का पहले से कोई अंदेशा हो।

छिटपुट तौर पर टिड्डियां हर साल ही फसलों को भारी नुकसान पहुंचाती रही हैं। अमूमन मानसूनी बारिश के बाद खाली पड़ी राजस्थान-गुजरात की रेगिस्तानी जमीन में पैदा होने वाली टिड्डियों का हमला सर्दी आते-आते मंद पड़ जाता है। ऐसे हालात कम ही बनते हैं कि वे दो-तीन राज्यों की सरहद पार कर दस राज्यों के नीले आकाश पर खौफ बन कर छा जाएं। लेकिन जलवायु परिवर्तन के कारण हालात बदल गए हैं। जो समस्या पहले अमूमन जुलाई-अगस्त में पैदा होती थी, इस बार अनुकूल मौसम मिलने पर टिड्डियों की भारी-भरकम फौज मई-जून में ही पैदा हो गई।

ईरान के रास्ते पाकिस्तान और फिर वहां से भारत में दाखिल होने से पहले टिड्डियों के दल ने करीब दो साल से उत्तरी अफ्रीका के इथियोपिया, केन्या और सोमालिया आदि देशों में आतंक मचा रखा था। वहां टिड्डी दल लाखों हेक्टयेर फसल चौपट करने के जिम्मेदार माने गए और इन हमलों को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र की ओर से यह चेतावनी जारी की गई थी कि अगर जल्द ही इन पर काबू नहीं पाया गया तो दुनिया के बड़े इलाकों में लोग दाने-दाने को मोहताज हो सकते हैं। खासतौर से ईरान और पाकिस्तान में इनके हमलों की ज्यादा आशंका थी।

असल में मई, 2018 के मेकुनू चक्रवाती तूफान से यमन, संयुक्त अरब अमीरात, अरब और यमन तक फैले रब-अल-खली मरुस्थल में काफी बारिश हुई। फिर उसी साल अक्तूबर में लुबान तूफान ने अरब प्रायद्वीप में टिड्डियों के माफिक स्थितियां बना दीं। इसके बाद 2019 के जनवरी-फरवरी में अफ्रीका और एशिया से लगे लाल सागर के तटीय इलाकों में अच्छी बारिश ने फिर टिड्डियों को पनपने का मौका दिया। खाने की तलाश में टिड्डी दल अरब की हवाओं के साथ ईरान पहुंचे, जहां पहले से हो चुकी बारिश ने टिड्डियों की पैदावार में भरपूर मदद दी। अप्रैल से जून, 2019 में ये दक्षिण एशिया में पाकिस्तान और सरहद से लगे भारत के थार रेगिस्तान आ गईं।

संयुक्त राष्ट्र की संस्था खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) ने बीते कुछ महीनों के दौरान दक्षिण एशिया में बारिशों के कई दौर और सर्दियों में उनके प्रजनन को देख कर भी कहा था कि पाकिस्तान और इससे सटे सीमावर्ती भारतीय राज्यों में गर्मियों के मौसम में इनका नए सिरे से प्रजनन होगा और तब टिड्डी दल बड़े पैमाने पर हमला कर सकते हैं।

कहा जा रहा है कि ये टिड्डियां पाकिस्तान की तरफ से भी आई हैं। सामान्य स्थितियों पाकिस्तान में भावी फसलों को बचाने के लिए खेतों की गहरी खुदाई और रसायनों के छिड़काव से टिड्डियों की पैदावार पर अंकुश लगाया जाता है, लेकिन इस बार वहां यह काम नहीं हुआ। कहने को तो पाकिस्तान ने टिड्डियों की समस्या को आपात स्थिति घोषित कर दिया था, लेकिन उनकी असरदार रोकथाम नहीं होने से उनका प्रजनन बड़े पैमाने पर हुआ। इसके बाद पाकिस्तान में पैदा हुई टिड्डियां अनुकूल हवा और मनमाफिक दिशा मिलने से सरहद पार कर भारतीय क्षेत्रों में घुस आईं और भारी तबाही का सबब बन गईं।

टिड्डियां खेती ही नहीं, हर किस्म की हरियाली के लिए कितना बड़ा खतरा हैं। हरे पत्ते, अनाज की बालियां, बीज, झाड़ियां और सड़क किनारे लगाए गए हरे पौधे आदि सभी कुछ इनका भोजन होता है। एक टिड्डी दल जो तीन से पांच वर्ग किलोमीटर लंबा-चौड़ा होता है, कुछ ही मिनटों में पूरा खेत साफ कर देता है। एक वर्ग किलोमीटर में करीब चालीस लाख टिड्डियां होती हैं। यह झुंड एक बार में खेतों इतना भारी नुकसान पहुंचा देता है, जिसमें एक दिन में पैंतीस हजार लोगों का पेट भरने लायक अन्न साफ हो जाता है।

ऐसा नहीं है कि इस आसमानी आफत की कोई सूचना पहले से हमारे सरकारी तंत्र को नहीं थी। पिछले साल मई में और फिर इस साल के आरंभ में जनवरी-फरवरी के दौरान राजस्थान और गुजरात में टिड्डियों ने हमला किया था। इस नुकसान की सूचना देते हुए केंद्रीय कृषि मंत्री ने सात फरवरी को राज्यसभा में बताया था कि राजस्थान के बारह जिलों में टिड्डियों ने डेढ़ लाख हेक्टेयर फसलों को नुकसान पहुंचाया है और गुजरात में बीस हजार हेक्टेयर खेती चौपट हो गई थी।

उनके आकलन के मुताबिक राजस्थान और गुजरात में सरसों, अरंडी और गेहूं की तैंतीस फीसदी फसल नष्ट हुई, जिससे डेढ़ लाख किसानों को डेढ़ सौ करोड़ रुपए का नुकसान उठाना पड़ा। उसी दौरान राजस्थान के कृषि मंत्री ने केंद्र सरकार को चिट्ठी लिख कर टिड्डियों को राष्ट्रीय आपदा घोषित करने की मांग की थी। हालांकि उस वक्त दावा किया गया कि सरकार-प्रशासन की सतर्कता के चलते टिड्डियों को लगभग खत्म कर दिया गया, लेकिन मई में कई गुना ताकत से टिड्डियों के हमले से साबित हुआ कि उनके खात्मे का अंदाजा बिल्कुल गलत था।

यहां अहम सवाल है कि इस आपदा से आखिर कैसे निपटा जाए। इस बारे में पहली जरूरत तो यह है कि किसानों को टिड्डियों से हुए नुकसान की फौरन भरपाई की जाए। सरकार को इस नुकसान के आंकड़े जुटाने में मुश्किल नहीं होगी, क्योंकि इसका हिसाब-किताब उन्हें ग्रामीण पंचायतों से हाथों-हाथ मिल सकता है। कीटनाशकों के छिड़काव और बर्तन, ढोल बजा कर टिड्डियों को भगाने के तरीकों के बारे में किसानों को जागरूक किया जाए।

खेती के विशेषज्ञ इसका एक प्रभावी उपाय यह सुझाते हैं कि जिन इलाकों में टिड्डियां अंडे देती हैं, वहां खेतों की गहरी खुदाई की जाए। इससे टिड्डियों के अंडे नष्ट हो जाते हैं और उनकी क्रमिक पैदावार की संभावनाएं बहुत क्षीण रह जाती है। ज्यादा बेहतर यह होगा कि मौसमी बदलावों के बारे में सचेत करने वाला हमारी प्रणाली ज्यादा प्रभावी ढंग से काम करे और व्यापक फलक पर कहें तो जलवायु परिवर्तन के कारकों को थामने के उपाय आजमाएं। ये सारे प्रयास ही किसानों को टिड्डियों के हमले से बचाने में कारगर हो सकते हैं।

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