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राजनीतिः तबाह फसलों के बीच खड़ा किसान

डीजल की बढ़ती कीमतों ने देश के किसानों की हालत और खराब कर दी है। पिछले साल सितंबर में डीजल सत्तावन से साठ रुपए प्रति लीटर उपलब्ध था। आज डीजल चौहत्तर रुपए प्रति लीटर मिल रहा है। डीजल की कीमतों में बीस से बाईस प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हो गई है। इसका सीधा असर देश के किसानों पर पड़ा है, क्योंकि आज भी देश के बड़े फसली क्षेत्र की सिंचाई डीजल पंप सेटों से हो रही है। इसकी वजह यह है कि देश के ज्यादातर ग्रामीण इलाकों में बिजली की कमी है।

Author September 26, 2018 4:39 AM
न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा करने के बाद भी किसानों को न्यूतनम समर्थन मूल्य का बड़ा लाभ इसलिए नहीं मिलता कि खरीद केंद्रों पर भारी भ्रष्टाचार है

कर्ज के बोझ तले किसानों को अब प्रकृति की मार झेलना पड़ रही है। इन दिनों भारी बारिश ने पंजाब और हरियाणा के किसानों की परेशानी बढ़ा दी है। भारी बारिश के कारण खेतों में तैयार फसलें बर्बाद होने के कगार पर हैं। धान, कपास, मक्का और ईख की खेती को भारी नुकसान पहुंचा है। दिलचस्प बात है कि जिन राज्यों में इस समय बारिश की जरूरत है, वहां बारिश नहीं हुई है। जहां बारिश की जरूरत नहीं थी, वहां भारी बारिश हो गई। पंजाब और हरियाणा में भारी बारिश ने खड़ी फसलें बिछा दीं। बिहार जैसे राज्य में जहां इस समय धान की फसल को पानी की जरूरत थी, वहां बारिश नहीं हुई है, जबकि पंजाब और हरियाणा में बारिश से सबसे ज्यादा नुकसान धान, मक्का और कपास को हुआ है। कई जिलों में धान के खेतों में पानी जमा हो गया है। वहीं भारी बारिश के कारण तैयार धान में नमी का स्तर काफी बढ़ गया है। धान की खरीद के वक्त इसमें नमी का स्तर तय होता है। खरीद एजंसियों ने धान में नमी का अधिकतम स्तर सत्रह प्रतिशत तय कर रखा है।

जबकि इस बारिश से पहले धान में नमी का स्तर पच्चीस प्रतिशत तक पहुंच गया था। अब बारिश के बाद नमी का स्तर पचास प्रतिशत तक पहुंच सकता है। जिस धान में नमी का स्तर पचास प्रतिशत तक पहुंच जाए, उसे बाजार में बेचना मुश्किल होता है। बारिश से नमी का भारी शिकार पंजाब का सबसे बेहतर बासमती धान-1509 हुआ है। बारिश के बाद इसमें नमी का स्तर पचास प्रतिशत तक पहुंचने की संभावना है। बासमती धान-1509 कटाई के बाद बिकने के लिए अमृतसर, तरनतारन और गुरदासपुर की मंडी में पहुंच चुका है। इसी बीच भारी बारिश हो गई। इसलिए किसान काफी परेशान हैं। खुद कृषि विभाग के निदेशक ने नुकसान से इंकार नहीं किया है, पर नुकसान कितना हुआ है, इसका अंदाजा बारिश के बाद ही लग पाएगा। इस साल पंजाब में तीस लाख हेक्टेयर जमीन पर धान की खेती हुई है। इसमें से पांच लाख हेक्टेयर जमीन पर बासमती की खेती की गई है।

भारी बारिश से पंजाब में कपास की खेती को भी काफी नुकसान पहुंचा है। पूरे राज्य में किसानों ने दो लाख चौरासी हजार हेक्टेयर जमीन पर कपास की खेती की है। लेकिन पिछले तीन-चार दिन की भारी बारिश के कारण खेतों में पानी जमा हो गया है। इससे कपास की चुगाई में दिक्कत आ रही है। यही नहीं, कई जगहों पर कपास के पौधे पूरी तरह से नष्ट हो गए हैं। नष्ट हुए पौधों से किसानों को कुछ भी हासिल नहीं होगा। सितंबर के अंत में कपास की चुगाई शुरू हो जाती है, जो एक से डेढ़ महीने तक चलती है। पंजाब के मानसा, बठिंडा, अबोहर, फाजिल्का, मुक्तसर, संगरूर, फरीदकोट, बरनाला आदि इलाके में कपास की चुगाई के लिए किसानों ने राजस्थान से मजदूर भी बुला लिए थे। लेकिन बारिश के कारण ये मजदूर खाली बैठे हैं। कपास की खेती करने वाले किसानों की परेशानी यह है कि जो कपास के पौधे बचे हैं, उनकी ग्रेडिंग नीचे चली जाएगी। अगर उनकी फसल की ग्रेडिंग नीचे चली गई तो प्रति क्विंटल कम से कम हजार रुपए का नुकसान होगा, क्योंकि बारिश के कारण इसमें पीलापन आने की पूरी संभावना होती है।

लेकिन किसानों पर सिर्फ प्रकृति की मार नहीं पड़ी है। प्रकृति की मार से पहले किसानों पर इसी साल बाजार की मार भी पड़ी है। एक तरफ तो फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी कर सरकार ने अपनी पीठ थपथपा ली। लेकिन सरकार की घोषणा के साथ ही बाजार में सक्रिय ताकतों ने किसानों के लिए जरूरी खाद, बीज और कीटनाशकों की कीमतों में बढ़ोतरी कर दी, ताकि न्यूनतम समर्थन मूल्य का लाभ किसानों को न मिले। एक तो वैसे ही न्यूनतम समर्थन मूल्य का लाभ देश के सारे किसानों को नहीं मिलता। दूसरी तरफ खाद, कीटनाशकों और बीज की बढ़ती कीमतों ने किसानों का स्वाद जरूर बिगाड़ा। आखिर खाद, कीटनाशक आदि की कीमतों में बढ़ोतरी की चोट किस पर पड़ी। यूरिया की कीमतों में सिर्फ बढ़ोतरी नहीं की गई, बल्कि कई राज्यों में इस साल इसकी किल्लत भी है। बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में किसानों को यूरिया आसानी से उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। बिहार में कई जगहों से यूरिया की कालाबाजारी की शिकायतें आ रही हैं। किसानों के लिए जरूरी डीएपी खाद की कीमतों में भी पिछले साल के मुकाबले पंद्रह से बीस प्रतिशत का इजाफा है। पिछले साल बाजार में डीएपी की कीमत 21,520 रुपए प्रति टन थी। इस साल डीएपी 26,800 रुपए प्रति टन बाजार में उपलब्ध है। जो जिंक सल्फेट का दस किलो का बैग पिछले साल 280 से 300 रुपए में उपलब्ध था, वह इस साल पांच सौ से साढ़े पांच सौ रुपए में मिल रहा है। इसी तरह कीटनाशकों की कीमतों में भी बीस से पच्चीस प्रतिशत की बढ़ोतरी हो गई।

डीजल की बढ़ती कीमतों ने देश के किसानों की हालत और खराब कर दी है। पिछले साल सितंबर में डीजल सत्तावन से साठ रुपए प्रति लीटर उपलब्ध था। आज डीजल चौहत्तर रुपए प्रति लीटर मिल रहा है। डीजल की कीमतों में बीस से बाईस प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हो गई है। इसका सीधा असर देश के किसानों पर पड़ा है, क्योंकि आज भी देश के बड़े फसली क्षेत्र की सिंचाई डीजल पंप सेटों से हो रही है। इसकी वजह यह है कि देश के ज्यादातर ग्रामीण इलाकों में बिजली की कमी है। इसलिए डीजल की बढ़ती कीमतों का असर सीधा किसानों पर पड़ा है। इंस्टीट्यूट ऑफ इकॉनोमिक ग्रोथ के अध्ययन के मुताबिक देश के सकल फसली क्षेत्र के तीस प्रतिशत हिस्से की सिंचाई डीजल पंप से हो रही है। इसलिए डीजल की बढ़ती कीमतों का शिकार मध्यप्रदेश, बिहार, बंगाल और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य के किसान ज्यादा हो रहे हैं।

बिहार जैसे राज्य में तो सकल फसली क्षेत्र के अट्ठासी प्रतिशत क्षेत्र की सिंचाई डीजल पंप सेट से होती है, जबकि बंगाल में सकल फसली क्षेत्र के इकहत्तर प्रतिशत, उत्तर प्रदेश में पचपन प्रतिशत, मध्य प्रदेश में पचास प्रतिशत फसली क्षेत्र की सिंचाई डीजल पंप सेट हो रही है। महाराष्ट्र, गुजरात, हरियाणा और पंजाब जैसे राज्यों ने डीजल पंपों पर अपनी निर्भरता काफी कम की है, इन राज्यों के ग्रामीण इलाकों में बिजली की स्थिति अच्छी है। ऐसे हालात में न्यूतनम समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी का लाभ किसानों को कैसे मिल पाएगा? इसका वास्तविक लाभ तो बीज, कीटनाशक और खाद उत्पादक कंपनियां ले जाएंगी। इसका लाभ पेट्रोलियम कंपनियों को मिलेगा, राज्यों और केंद्र सरकार को मिलेगा जिन्हें डीजल पर लगने वाले कर से अच्छी आमदनी होती है।

हालांकि कृषि उत्पादों के न्यूतनम समर्थन मूल्य को लेकर सरकार ने अच्छी घोषणा जरूर की है। लेकिन इसका लाभ किसानों को मिले, तभी इस घोषणा का फायदा है। अभी भी किसानों की बड़ी आबादी खुले बाजार पर निर्भर है। उन्हें फसल बेचने के लिए निजी व्यापारियों पर निर्भर रहना पड़ता है, जो न्यूतनम समर्थन मूल्य से काफी कीमत पर फसल को खरीदते हैं, फिर भारी मुनाफा कमाते हैं। सच्चाई तो यही है कि किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य का लाभ पूरी तरह से कभी मिला ही नहीं है। इस बार सरकार ने खरीद के लिए सोलह हजार करोड़ रुपए की व्यवस्था की है, लेकिन साथ ही राज्यों को यह भी कहा है कि केंद्र कुल उत्पाद का पच्चीस प्रतिशत हिस्सा खरीदने में ही राज्यों को सहयोग करेगा। बाकी खरीद का जिम्मा राज्य सरकार का है। दिलचस्प बात है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा करने के बाद भी किसानों को न्यूतनम समर्थन मूल्य का बड़ा लाभ इसलिए नहीं मिलता कि खरीद केंद्रों पर भारी भ्रष्टाचार है।

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