सरकारी शाहखर्ची और बदहाल किसान

बुंदेलखंड में बारिश और सिंचाई के अभाव में लगभग पांच लाख परिवार तबाह हो गए।

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बुंदेलखंड वह इलाका है, जिसकी देश और दुनिया में सूखा, समस्याग्रस्त इलाके के तौर पर पहचान है। (चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतीकरण के लिए किया गया है।)

संजीव पांडेय

वर्ष 2014 और 2015 भारतीय किसानों के लिए बुरे थे। दो सालों तक लगातार खराब मानसून के चलते देश के ग्यारह राज्यों के ढाई सौ से ज्यादा जिलों में सूखे की स्थिति रही। इस स्थिति में भी बिहार के औरंगाबाद जिले के चिल्हकी गांव के किसान खुशहाल थे। वे आज भी खुशहाल हैं। औरंगाबाद-डाल्टेनगंज रोड पर स्थित पिछड़ी जाति बहुल इस गांव की खुशहाली का कारण गांव के ही कुछ दिहाड़ी मजदूर हैं, जो कुछ साल पहले तक हरियाणा के कृषि फार्मों में मजदूरी करते थे। उन्होंने वहां कृषि फार्म में स्ट्रॉबेरी की खेती करना सीखा और वापस अपने गांव जाकर स्ट्रॉबेरी उगाने का फैसला किया। ये मजदूर अपने गांव में एक-दो एकड़ के सीमांत किसान थे। अब उन्हें देख कर गांव के कई किसानों ने स्ट्रॉबेरी की खेती शुरू कर दी है। इस स्ट्रॉबेरी के खरीदार कोलकाता के व्यापारी हैं, जो किसानों को अग्रिम धनराशि दे जाते हैं। बिहार सरकार इस गांव की खेती से इतनी प्रसन्न है कि इसे आदर्श गांव घोषित कर दिया है।

आज पूरे देश के किसान बदहाल हैं। इनकी बदहाली के कारण कई हैं। खुद किसान गलतियां कर रहे हैं। उधर सरकारों ने खराब मानसून के बावजूद इनकी बदहाली रोकने के लिए कोई उपाय नहीं किया। सरकार बड़े घरानों के कर्ज वसूली पर चुप्पी साधे रहती है, वहीं किसानों की कर्ज माफी पर रिजर्व बैंक से लेकर सरकार तक सख्त हो गई है। जबकि किसानों की बदहाली को ठीक करने के लिए सरकारों को फिजूलखर्ची और भ्रष्टाचार रोकना होगा। इस तरह बचाई गई धनराशि किसानों के कल्याण पर खर्च की जा सकती है। हाल ही में उत्तर प्रदेश में एक मंत्री ने जयप्रकाश नारायण अंतराष्ट्रीय केंद्र का दौरा किया। यहां बनाए जा रहे अतिथि गृह में महंगे पत्थर और महंगे वृक्ष लगाए जाने पर खुद मंत्री हैरान थे। अतिथिगृह में विएतनामी पत्थर लगाए जा रहे थे। एक पत्थर की कीमत नौ सौ रुपए थी। यही नहीं, यूरोप से महंगे पेड़ मंगवाए गए थे। एक पेड़ की कीमत लाखों में बताई गई। उत्तर प्रदेश के किसानों का हाल काफी अरसे से बुरा है।

बुंदेलखंड में बारिश और सिंचाई के अभाव में लगभग पांच लाख परिवार तबाह हो गए। पर उत्तर प्रदेश में सरकार का ध्यान बुंदेलखंड में भूख से मर रहे किसानों की तरफ नहीं था। बल्कि बुंदेलखंड से कुछ दूरी पर आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस-वे बनाने पर था, जिसकी उपयोगिता पर ही सवाल है। इस एक्सप्रेस-वे पर तेरह हजार करोड़ रुपए तब खर्च किए गए, जब इसके समांतर राष्ट्रीय राजमार्ग-2 स्थित है। एक्सप्रेस-वे बनाने का एक उद्देश्य सरकार ने किसानों का कल्याण भी बताया था। सवाल है कि जिस राज्य में किसान भूख और कर्ज से परेशान हों, वे महंगे एक्सप्रेस-वे पर कैसे सफर करेंगे? आंकड़े बताते हैं कि 2016 में बुंदेलखंड में सूखे के कारण कुछ महीनों में ही तीन लाख पशुओं की मौत हो गई थी। क्योंकि सूखे के कारण इलाके में चारे का अभाव था। इस इलाके के लाखों लोग पलायन कर रोजी-रोटी के चक्कर में महानगरों में पहुंच गए। उनके पास खाने के लाले थे। दूसरी तरफ सरकारें किसानों के विकास का तर्क देकर एक्सप्रेस-वे का निर्माण करती रहीं। देश की बदहाली बुलेट ट्रेन और एक्सप्रेस-वे से दूर नहीं होगी। देश की बदहाली कृषि क्षेत्र का विकास ही दूर करेगा, जिसके ऊपर देश की पचास प्रतिशत आबादी निर्भर करती है।

देश के कई राज्यों में किसानों की हालत खराब है। लेकिन सरकारों की शाहखर्ची में कोई कमी नहीं आई है। जब किसानों की कर्ज माफी की बात होती है तो सरकारी खजाना खाली होने का बहाना बनाया जाता है। कहा जाता है कि अगर कर्ज माफ होंगे तो सरकारों को अन्य विकास योजनाओं में कटौती करनी होगी। दूसरी तरफ रिजर्व बैंक और कर्ज देने वाले बैंकों का तर्क होता है कि किसानों की कर्ज माफी से गलत संदेश जाएगा। जो व्यक्ति कर्ज लौटाना चाहता है, वह भी ऐसे फैसले से कर्ज वापस नहीं करता। यह तर्क अजीब है। क्या चार-पांच लाख करोड़ रुपए का कर्ज डकारने वाले देश के पूंजीपतियों ने कर्ज न लौटाने की प्रेरणा किसानों से ली है? पंजाब में मुख्यमंत्री के काफिले में इस्तेमाल होने वाली गाड़ियों पर पिछले दस सालों में करीब सौ करोड़ रुपए खर्च किए गए। जब मुख्यमंत्री पर शाही खर्च हो रहा है, तो राज्य की नौकरशाही पीछे कैसे रहती! जिन अधिकारियों को दस लाख रुपए तक की गाड़ी इस्तेमाल करने की अनुमति थी, उनके लिए सरकारी खजाने से पंद्रह लाख रुपए कीमत वाली इनोवा और अन्य लग्जरी गाड़ियां खरीदी गर्इं। यही नहीं, पंजाब के कई इलाकों को दुबई की तर्ज पर विकसित करने के लिए हाई-वे के बीच और किनारे पर महंगे पेड़ लगाए गए। इन पेड़ों पर आए खर्च से सरकारी अधिकारियों की जेबें काफी भर गई थीं। क्योंकि इन पेड़ों पर भी करोड़ों रुपए खर्च किए गए। जबकि एक तरफ राज्य के किसानों पर साठ हजार करोड़ रुपए के करीब कर्ज है। कर्ज के बोझ तले दब कर हजारों किसान आत्महत्या कर चुके हैं।

पंजाब की राह पर महाराष्ट्र भी है। यहां हजारों किसान कर्ज के कारण आत्महत्या कर चुके हैं। किसानों की कर्ज माफी के लिए सरकार के पास पैसे नहीं हैं। वहीं राज्य में छत्तीस सौ करोड़ रुपए की लागत से शिवाजी मेमोरियल बनाया जा रहा है। किसानों की हालत सुधारने के लिए सरकारों को विशेष प्रयास करना होगा। किसानों की कर्ज माफी को लेकर पूरे देश में कदम उठाने का वक्त आ गया है। अगर किसान बर्बाद हुए तो देश के चमकते महानगर भी बर्बाद हो जाएंगे। उत्तर प्रदेश सरकार ने किसानों की कर्ज माफी का फैसला कर साहसिक कदम उठाया है। देश के दूसरे राज्यों में बदहाल होते किसानों का कर्ज जल्द माफ होना चाहिए। वहीं समय रहते किसानों को भी चौकस रहना होगा। कई राज्यों में किसानों की दुर्दशा का कारण अकेला कर्ज नहीं है। इसका उदाहरण पंजाब और हरियाणा के किसान हैं। समय रहते किसानों ने अपनी उत्पादन प्रणाली नहीं बदली तो स्थिति शायद ही बदले।
हरित क्रांति की शुरुआत के बाद के चार दशक बहुत अच्छे थे। इसके प्रभाव में गेहूं और चावल के उत्पादन ने शुरुआती चार दशक में पंजाब के किसानों की तकदीर बदल दी। लेकिन उस समय देश खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर नहीं था। समय के साथ देश के दूसरे राज्यों में चावल और गेहूं का अच्छा उत्पादन शुरू हुआ। यहीं से पंजाब और हरियाणा के किसानों की दुर्दशा शुरू हो गई। आज जब पंजाब की जरूरत फल और सब्जी की खेती है, तब भी किसान चावल और गेहूं की खेती कर रहे हैं। चावल की खेती पंजाब और हरियाणा के किसानों के लिए घाटे का सौदा है। लागत से कम पैसे किसानों को मिल रहे हैं। वहीं हरियाणा और पंजाब के पर्यावरण को भी भारी नुकसान पहुंचा है।

अगर 2008 से लेकर 2012 तक के आंकड़ों को देखें तो पंजाब और हरियाणा के सीमावर्ती जिलों में प्रति वर्ष भूजल आधा मीटर तक नीचे गया है। एक किलो चावल के उत्पादन में तीन हजार लीटर तक पानी का इस्तेमाल हो रहा है। पंजाब का अनुभव बताता है कि देश के कई राज्यों के किसानों को कृषि में लाभ के लिए सब्जी और फलों की खेती बढ़ानी होगी। दुग्ध उत्पादन के क्षेत्र में भी किसानों को काम करना होगा। दुग्ध उत्पादन के क्षेत्र में सरकार का सहयोग जरूरी है। क्योंकि किसानों को इस क्षेत्र में लाभ पहुंचाने के लिए संगठित क्षेत्र की मदद की जरूरत होगी।

 

 

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