छोटे उद्यमों की टूटती उम्मीदें

एक सर्वे में कहा गया कि देश में लगभग उनसठ फीसद छोटे नए कारोबार (स्टार्टअप) और एमएसएमई साल के अंत तक अपने कारोबार घटा देंगे, बंद कर देंगे या बेच देंगे।

सांकेतिक फोटो।

सरोज कुमार

एक सर्वे में कहा गया कि देश में लगभग उनसठ फीसद छोटे नए कारोबार (स्टार्टअप) और एमएसएमई साल के अंत तक अपने कारोबार घटा देंगे, बंद कर देंगे या बेच देंगे। ज्यादा चिंताजनक बात तो यह है कि सिर्फ बाईस फीसद एमएसएमई के पास ही तीन महीने से ज्यादा तक संचालन के लिए संसाधन बचे हैं।

छोटे और मझौले उद्योग किसी भी देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ होते हैं। भारत में सूक्ष्म, लघु और मझौले उद्योग (एमएसएमई) देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में तीस फीसद और निर्यात में अड़तालीस फीसद का योगदान करते हैं। एमएसएमई क्षेत्र से लगभग पंद्रह करोड़ लोगों को रोजगार मिलता है जो कुल श्रमशक्ति का चालीस फीसद से ज्यादा ही होगा। एमएसएमई क्षेत्र के बारे में ये उजले आंकड़े सच हो सकते हैं। लेकिन इस सच के पीछे अंधेरा इतना घना है कि सभी आंकड़े उसमें धुंधले लगने लगते हैं। सच तो यह है कि र्थव्यवस्था का यह क्षेत्र इस वक्त गंभीर संकटों से जूझ रहा है। देश जब आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है, तब एमएसएमई क्षेत्र में मातम पसरा हुआ है। लगभग उनसठ फीसद एमएसएमई बंद होने के कगार पर हैं। सरकार, उद्यमी और श्रमिक, हर किसी की उम्मीदें टूटती नजर आ रही हैं।

कुछ महीने पहले तक एमएसएमई के संकटग्रस्त होने के अनुमान लगाए जाते रहे हैं। लेकिन अब अनुमानों के कुछ आंकड़े आने के बाद इस क्षेत्र की तस्वीर साफ होने लगी है। मौजूदा वित्त वर्ष की पहली तिमाही में एमएसएमई से कर्ज किस्त चूक के मामलों में तीव्र उछाल आया है। यानी इस क्षेत्र के उद्यमों को पहली तिमाही के दौरान जो रकम बैंकों को लौटानी थी, वे नहीं लौटा पाए। यह बात सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के प्रथम तिमाही के बहीखाते से सामने आई है। हालांकि इसका एक कारण अधिक कर्ज का वितरण भी रहा। लेकिन इससे भी बड़ा कारण है कारोबार और बाजार की खस्ता हालत। यानी जिस काम में कर्ज का पैसा खर्चा गया, वहां से या तो वह समय पर लौटा नहीं, या खर्च करने और लौटने की प्रक्रिया में पैसा बर्बाद हो गया। ये दोनों स्थितियां किसी उद्यम के लिए अच्छी नहीं कही जा सकतीं। एमएसएमई की हालत पहले ही से ठीक नहीं थी, और फिर महामारी ने तो इसका भट्ठा ही बैठा दिया।

नीतिगत सीमाओं के कारण एमएसएमई क्षेत्र को वे सुविधाएं नहीं मिल पातीं जो बड़े उद्यमों को सुलभ हैं। पूंजी की कमी इस क्षेत्र की सबसे बड़ी समस्या है। आसान कर्ज मिल पाना हमेशा से कठिन रहा है। महामारी के दौरान सरकार ने इस क्षेत्र को राहत देने के लिए आसान ऋण के कुछ प्रावधान किए। इमरजंसी क्रेडिट लाइन गारंटी स्कीम (ईसीएलजीएस) के कारण वित्त वर्ष 2020-21 में एमएसएमई को कुल साढ़े नौ लाख करोड़ रुपए के कर्ज दिए गए, जो 2019-20 के 6.8 लाख करोड़ रुपए से काफी अधिक है। लेकिन लगता है इस कर्ज से उऋण होने की एक नई चुनौती इस क्षेत्र के सामने आ खड़ी हुई है।

इस क्षेत्र के उद्यम अपनी देनदारी नहीं चुका पा रहे हैं। वित्त वर्ष 2021-22 की पहली तिमाही में भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआइ) के नए बकाए का आकार चार गुना बढ़ कर 15,666 करोड़ रुपए हो गया, जो साल भर पहले की समान तिमाही में 3637 करोड़ रुपए था, यानी पांच गुने के आसपास। और इस बकाए का चालीस फीसद से अधिक हिस्सा या 6416 करोड़ रुपए अकेले एमएसएमई क्षेत्र से है। इसी तरह इंडियन बैंक के नए बकाए का उनसठ फीसद हिस्सा या 4204 करोड़ रुपए और केनरा बैंक के नए बकाए का अट्ठावन फीसद या 4253 करोड़ रुपए एमएसएमई क्षेत्र से है। इन आंकड़ों से साफ है कि बैंकों का हजारों करोड़ रुपया एमएसएमई क्षेत्र के कर्ज में फंस गया है। अगर ये उद्योग कर्ज की किस्तें लौटा पाने में सक्षम नहीं होंगे तो इसका सीधा असर बैंकों की सेहत पर दिखेगा जो पहले ही से एनपीए के बोझ तले दबे पड़े हैं।

ऐसा भी नहीं है कि सरकार या सरकारी बैंकों को एमएसएमई क्षेत्र की हालत के बारे में पता नहीं है। भारतीय रिजर्व बैंक ने हालांकि जुलाई की अपनी वित्तीय स्थिरता रपट में कहा था कि बैंकों के एनपीए का आकार बढ़ सकता है, खासतौर से एमएसएमई और खुदरा क्षेत्र के मद में। जबकि बैंकों और गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों के एमएसएमई मद का संकट सुलझाने के लिए आरबीआइ कई पुनर्गठन योजनाएं पहले ही पेश कर चुका है। आरबीआइ ने 2019 से लेकर तीन ऐसी योजनाएं पेश कीं, जिसके तहत एमएसएमई क्षेत्र के पच्चीस करोड़ रुपए तक के संकटग्रस्त कर्ज के पुनर्गठन की अनुमति दी गई। इसके आधार पर बैंकों ने जनवरी 2019, फरवरी 2020 और अगस्त 2020 की पुनर्गठन योजनाओं के तहत कुल 56,866 करोड़ रुपए ऋण का पुनर्गठन किया। लेकिन यह राहत ऊंट के मुंह में जीरे जैसी थी, जिसके कारण यह क्षेत्र वित्तीय संकट से बाहर नहीं निकल पाया।

एमएसएमई की बदतर हालत का अंदाजा कृषि क्षेत्र में बढ़ रही श्रमिकों की संख्या से भी लगाया जा सकता है। श्रमिकों का कारखानों से कृषि क्षेत्र में लगातार पलायन हो रहा है। सीएमआइई के आंकड़े कहते हैं कि वित्त वर्ष 2017-18 में कृषि में कार्यरत श्रमिकों की हिस्सेदारी 35.3 फीसद थी, जो 2019-20 में बढ़ कर 36.1 फीसद, 2019-20 में अड़तीस फीसद और 2020-21 में 39.4 फीसद हो गई। मांग न होने के कारण विनिर्माण क्षेत्र बुरी तरह प्रभावित हुआ है, जिसके कारण इस क्षेत्र में श्रमिकों की हिस्सेदारी 2020-21 में 9.4 फीसद से घट कर 7.3 फीसद पर आ गई। विनिर्माण क्षेत्र के साठ फीसद श्रमिक एमएसएमई के असंगठित क्षेत्र में कार्यरत हैं और यहीं से श्रमिकों का कृषि क्षेत्र में पलायन हो रहा है।

सरकार ने जुलाई, 2019 में घोषणा की थी कि अगले पांच सालों में एमएसएमई क्षेत्र का जीडीपी में योगदान बढ़ा कर पचास फीसद किया जाएगा और पांच करोड़ नई नौकरियां पैदा की जाएंगी। संभवत: इसी क्रम में इस साल जुलाई में खुदरा कारोबार को भी एमएसएमई में शामिल किए जाने की घोषणा की गई। लेकिन इसके पहले मई, 2021 में आई लोकलसर्किल्स की एक सर्वे रपट में कहा गया कि देश में लगभग उनसठ फीसद छोटे नए कारोबार (स्टार्टअप) और एमएसएमई साल के अंत तक अपने कारोबार घटा देंगे, बंद कर देंगे या बेच देंगे। ज्यादा चिंताजनक बात तो यह है कि सिर्फ बाईस फीसद एमएसएमई के पास ही तीन महीने से ज्यादा तक संचालन के लिए संसाधन बचे हैं। जबकि लगभग इकतालीस फीसद के पास या तो पूंजी खत्म हो चुकी है या एक महीने से भी कम अवधि की बची है।

सर्वे में अट्ठासी फीसद उद्यमों ने अपने कारोबार बचाने के लिए सरकार से उन वस्तुओं की कीमतें बढ़ाने की मांग की थी, जिन्हें बनाने में इस्पात और तांबा लगता है और पीएसयू को उसकी आपूर्ति करार के तहत की जाती है। लगभग बानवे फीसद उद्यमों ने कहा था कि सरकार पीएसयू के साथ हुए सभी करारों को पूरा करने के लिए तीन से छह महीने का समय बढ़ाए, ताकि उन्हें तरलता से जुड़ा कोई नुकसान न हो। सरकार शेयर बाजार में तेजी और पहली तिमाही के जीडीपी के आंकड़े (20.1 फीसद) से उत्साहित हैं और उसके आधार पर मान रहे हैं कि सब कुछ सही रास्ते पर है। लेकिन सही बात तो यह है कि एमएसएमई शेयर बाजार से बाहर हैं और जीडीपी के आंकड़े में भी एमएसएमई का असंगठित क्षेत्र शामिल नहीं है। दूसरी ओर पहली तिमाही के बेरोजगारी के आंकड़े (9.68 फीसद) आईना दिखाते हैं। आंकड़ों का उद्देश्य सच को जानना और उसके अनुसार कार्रवाई करना होना चाहिए। लेकिन आंकड़े जब चेहरा बचाने का साधन बन जाएं तो जमीन पर जो बचता है, वह नाउम्मीदी के अलावा कुछ नहीं होता। यही नाउम्मीदी एमएसएमई क्षेत्र में पसरी पड़ी है।

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