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राजनीतिः कृषि निर्यात पर टिकी उम्मीदें

कृषि निर्यात ही एकमात्र ऐसा उपाय है जिसके जरिए बिना महंगाई के रोजगार और राष्ट्रीय आय में बढ़ोतरी की जा सकती है। कृषि निर्यातकों के हित में मानकों में बदलाव किया जाना चाहिए, जिससे कृषि निर्यातकों को कार्यशील पूंजी आसानी से मिल सके। इसके अलावा सरकार को अन्य देशों की मुद्रा के उतार-चढ़ाव, सीमा शुल्क के कारण आने वाली मुश्किलों को दूर करने और सेवा कर जैसे कई मुद्दों पर भी ध्यान दिए जाने की जरूरत है।

Author October 29, 2018 3:25 AM
विभिन्न निर्यातों में कृषि निर्यात सबसे जोखिमभरे होते हैं, अतएव देश से खाद्य निर्यात क्षेत्र के समक्ष जो समस्याएं और चुनौतियां हैं, उनके समाधान के लिए रणनीतिक कदम जरूरी होंगे।

जयंतीलाल भंडारी

आज जब देश के सामने निर्यात घटने और विदेश व्यापार घाटा बढ़ने जैसे हालात हैं तो ऐसे में कृषि निर्यात बढ़ाने की संभावनाओं को टटोला जाना चाहिए। हाल में सरकार ने कृषि निर्यात को मौजूदा तीस अरब डॉलर से बढ़ा कर 2022 तक साठ अरब डॉलर तक पहुंचाने और भारत को कृषि निर्यात वाले दुनिया के दस प्रमुख देशों में शामिल कराने का लक्ष्य रखा है। हालांकि यह लक्ष्य चुनौतीपूर्ण है, लेकिन इस समय भारत में कृषि निर्यात की विभिन्न अनुकूलताओं के कारण इस लक्ष्य को हासिल कर पाना कठिन भी नहीं है। वर्ष 2017-18 में देश में रेकार्ड कृषि उत्पादन हुआ। भारत दुनिया का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश है। भैंस के मांस, पालतू पशुओं और मोटे अनाज के मामले में भी भारत सबसे बड़ा उत्पादक है। फलों और सब्जियों के उत्पादन में भारत दुनिया में दूसरे स्थान पर आता है।

इस समय देश में छह करोड़ आठ लाख टन गेहूं और चावल का भंडार है। यह जरूरी बफर स्टॉक के मानक से दोगुना है। दूध का उत्पादन आबादी बढ़ने की दर से चार गुना तेजी से बढ़ रहा है। चीनी का उत्पादन चालू वर्ष में तीन करोड़ बीस लाख टन होने की उम्मीद है, जबकि देश में चीनी की खपत ढाई करोड़ टन है। देश में फलों और सब्जियों का उत्पादन मूल्य 3.17 लाख करोड़ रुपए सालाना तक पहुंच गया है। इसी तरह कृषि क्षेत्र के महत्त्वपूर्ण हिस्से दूध उत्पादन क्षेत्र में भी भारत की स्थिति मजबूत है। वैश्विक रेटिंग एजंसी क्रिसिल का कहना है कि भारत में दूध उत्पादन, संग्रहण और वितरण के क्षेत्र में विभिन्न सुविधाओं के लिए 2021 तक करीब एक सौ चालीस अरब रुपए का निवेश होगा। इससे दूध उत्पादन, निर्यात और इस क्षेत्र में रोजगार के बेहतर मौके सृजित होंगे। कृषि मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2016-17 के दौरान देश में दूध उत्पादन 16.54 करोड़ टन था, जो वर्ष 2017-18 में बढ़ कर 17.63 करोड़ टन रहने का अनुमान है। यह भी कहा गया कि ‘विजन-2022’ दस्तावेज के मुताबिक वर्ष 2021-22 तक दूध उत्पादन 25.45 करोड़ टन रहने का अनुमान है। केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा दूध निर्यात के लिए दी जा रही विशेष सबसिडी से भारत के दूध की वैश्विक बिक्री में तेजी आई है।

निसंदेह कृषि और दूध उत्पादन क्षेत्र में जबर्दस्त उत्पादन देश के लिए निर्यात की नई संभावनाएं प्रस्तुत कर रहा है। भारत से कृषि निर्यात बढ़ने के तीन प्रमुख कारण स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं। पहला कारण पिछले दिनों सरकार द्वारा घोषित किए गए उदार कृषि निर्यात संबंधी नए प्रोत्साहन हैं। दूसरा कारण, अमेरिका द्वारा चीन से आयातित नई कृषि वस्तुओं पर पच्चीस फीसद आयात शुल्क लगाने के बाद चीन द्वारा भी अमेरिका की कई वस्तुओं पर पच्चीस फीसद आयात शुल्क लगा दिया गया है। इन उत्पादों में सोयाबीन, तंबाकू, फल, मक्का, गेहूं , रसायन आदि शामिल हैं। चीन द्वारा लगाए गए आयात शुल्क के कारण अमेरिका की ये सारी वस्तुएं चीन के बाजारों में महंगी हो गई हैं।

चूंकि ये अधिकांश वस्तुएं भारत भी चीन को निर्यात कर रहा है और भारतीय वस्तुओं पर चीन ने कोई आयात शुल्क नहीं बढ़ाया है, ऐसे में ये भारतीय कृषि वस्तुएं चीन के बाजारों में कम कीमत पर मिल रही हैं। इससे चीन को भारत के निर्यात बढ़ेंगे। तीसरा बड़ा कारण यह है कि इस साल भारत और चीन के बीच आयोजित संयुक्त आर्थिक समूह बैठक में भारत से चीन को कृषि निर्यात बढ़ाने का परिदृश्य उभरा है। इस बैठक में चीन के वाणिज्य मंत्री ने कहा था कि चीन जहां भारत-चीन व्यापार में बढ़ते हुए घाटे को कम करने पर ध्यान देगा, वहीं चीन भारत से मंगाए जाने वाले कृषि उत्पादों जैसे अनाज, सरसों, सोयाबीन, बासमती और गैर-बासमती चावल, फल, सब्जियों व अन्य ऐसी मदों पर आ रही निर्यात मुश्किलों को कम करने की ओर ध्यान देगा। इसमें भी कृषि निर्यात के लिए चीन के बाजार में नए संभावनाएं बनी हैं।

गौरतलब है कि सरकार ने कृषि निर्यात बढ़ाने के लिए जो विशेष प्रोत्साहन घोषित किए हैं, उनसे मूल्यवर्धित कृषि निर्यात को बढ़ावा दिया जा सकेगा। साथ ही कृषि निर्यात प्रक्रिया के बीच खराब होने वाले सामान, बाजार पर नजर रखने के लिए संस्थापक व्यवस्था और साफ-सफाई के मसले पर ध्यान केंद्रित किया जा सकेगा। निर्यात किए जाने वाले कृषि जिंसों के उत्पादन व घरेलू दाम में उतार-चढ़ाव पर लगाम लगाने के लिए कम अवधि के लक्ष्यों और किसानों को मूल्य समर्थन मुहैया कराने और घरेलू उद्योग को संरक्षण दिया जा सकेगा। साथ ही, कृषि निर्यात प्रोत्साहनों के द्वारा राज्यों की कृषि निर्यात में ज्यादा भागीदारी, बुनियादी ढांचे, लॉजिस्टिक्स में सुधार और नए कृषि उत्पादों के विकास में शोध एवं विकास गतिविधियों पर जोर दिया जा सकेगा।

चूंकि विभिन्न निर्यातों में कृषि निर्यात सबसे जोखिमभरे होते हैं, अतएव देश से खाद्य निर्यात क्षेत्र के समक्ष जो समस्याएं और चुनौतियां हैं, उनके समाधान के लिए रणनीतिक कदम जरूरी होंगे। खाद्य निर्यात से संबंधित सबसे बड़ी चुनौती अपर्याप्त परिवहन, भंडारण क्षमता नहीं होने के कारण खेत से खाद्य वस्तुएं निर्यात बाजारों और कारखानों से प्रसंस्कृत वस्तुएं विदेशी उपभोक्ता तक पहुंचने में बहुत अधिक नुकसान होने से संबंधित है और कृषि निर्यात से संबंधित नई तकनीक व प्रक्रियाओं, सुरक्षा और पैकेजिंग की नियामकीय व्यवस्था संबंधी कमी तथा कुशल श्रमिकों की कमी भी खाद्य निर्यात को प्रभावित कर रही है। विभिन्न देशों द्वारा लागू किए गए कृषि व्यापार संबंधी कड़े तकनीकी नियमों के कारण भी भारतीय खाद्य निर्यात की क्षमता प्रतिबंधित हुई है। कृषि मदों पर गैर-शुल्क बाधाएं, खाद्य गुणवत्ता सुरक्षा और स्वास्थ्य संबंधी मुद्दे अमेरिका और यूरोपीय संघ जैसे प्रमुख बाजारों में खाद्य उत्पादों के निर्यात में बढ़े अवरोधक बने हुए हैं।

चूंकि कृषि निर्यात ही एकमात्र ऐसा उपाय है जिसके जरिए बिना महंगाई के रोजगार और राष्ट्रीय आय में बढ़ोतरी की जा सकती है। कृषि निर्यातकों के हित में मानकों में बदलाव किया जाना चाहिए, जिससे कृषि निर्यातकों को कार्यशील पूंजी आसानी से मिल सके। इसके अलावा सरकार को अन्य देशों की मुद्रा के उतार-चढ़ाव, सीमा शुल्क के कारण आने वाली मुश्किलों को दूर करने और सेवा कर जैसे कई मुद्दों पर भी ध्यान दिए जाने की जरूरत है। साथ ही, निर्यात बढ़ाने के लिए विशिष्ट फूड पार्कों को विश्वस्तरीय बुनियादी सुविधाओं से संपन्न बनाया जाना चाहिए, और यहां शोध सुविधाओं, परीक्षण प्रयोगशालाओं, विकास केंद्रों की स्थापना की जानी चाहिए। बेहतर खाद्य सुरक्षा और गुणवत्ता प्रमाणन व्यवस्था, तकनीकी उन्नयन, लॉजिस्टिक सुधार, पैकेजिंग गुणवत्ता और ऋण तक आसान पहुंच से खाद्य निर्यात क्षेत्र में आमूल-चूल परिवर्तन लाया जा सकता है। देश के खाद्य प्रसंस्करण निर्यात को प्रोत्साहित करने के लिए वैश्विक मूल्य-शृंखलाएं स्थापित करने के मद्देनजर ढांचागत और संस्थागत सहायता आवश्यक होगी। खाद्य निर्यात क्षेत्र के आकार और बढ़ोतरी की संभावनाओं को देखते हुए भारत की उद्योग और व्यापार नीति की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निश्चित करनी होगी। यह भी जरूरी है कि केंद्र सरकार के द्वारा राज्य सरकारों को पृथक-पृथक राज्य निर्यात नीति तैयार करने के लिए प्रोत्साहित किया जाए।

सरकार ने कृषि निर्यात बढ़ाने के लिए जो रियायतें व प्रोत्साहन घोषित किए हैं, वे कारगर तरीके से कृषि निर्यातकों तक पहुंचेंगे। साथ ही, सरकार कृषि निर्यात की डगर पर आ रही मुश्किलों का प्राथमिकता से समाधान करेगी। इसके साथ ही अमेरिका और चीन के बीच जो व्यापार युद्ध शुरू हुआ है, उससे इन दोनों देशों में भारत से कृषि निर्यात बढ़ने की संभावनाओं के नए मौके का लाभ उठाना होगा। ऐसे प्रभावी प्रयासों से देश के कृषि निर्यात में वृद्धि हो सकेगी, देश में रोजगार बढ़ेंगे और देश का व्यापार घाटा कम किया जा सकेगा।

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