राजनीतिः घातक रोगों का फैलता दायरा - Jansatta
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राजनीतिः घातक रोगों का फैलता दायरा

गरीबी व गंदगी से होने वाली बीमारियों पर कुछ हद तक काबू पाया गया है। जबकि कैंसर एक नई चुनौती बनकर उभरा है। इसका इलाज महंगा होना भी एक बड़ी समस्या है। सरकार कम कीमत पर सुविधाएं मुहैया कराकर रोगियों की मदद कर सकती है। वैकल्पिक चिकित्सा को बढ़ावा देकर भी कैंसर रोगियों की जान बचाई जा सकती है।

देश में टीबी और संक्रामक बीमारियों का खौफ कुछ कम हुआ है। लेकिन जानलेवा कैंसर, हृदय रोग और मधुमेह जैसी बीमारियां बढ़ी हैं। केंद्रीय स्वास्थ्यमंत्री जेपी नड्डा ने राज्यसभा में जो ताजा आंकड़े पेश किए हैं उनसे पता चलता है कि टीबी जैसी पारंपरिक बीमारियों का खौफ कुछ कम हुआ है। जबकि कैंसर और मधुमेह के रोगियों की तादाद में इजाफा हुआ है। इन आंकड़ों के अनुसार देश में कैंसर खासकर फेफड़ों के कैंसर के मामलों की संख्या तेजी से बढ़ी है। 2012 में फेफड़ों के कैंसर के 76,783 मामले पाए गए थे जो 2013 में बढ़ कर 79,833 और 2014 में 83,035 हो गए।
अगर हर तरह के कैंसर की बात करें तो 2013 में इसके 10,86,783 मामले पाए गये थे जो 2015 में बढ़ कर 11,48,692 हो गए। इसी तरह मधुमेह पीड़ितों की संख्या 2013 में 6.5 करोड़ थी जो 2014 में 6.68 करोड़ और 2015 में 6.91 करोड़ हो गई। इसके विपरीत टीबी के रोगियों की संख्या 2014 में प्रति लाख आबादी पर 167 पाई गई, जबकि 1990 में यह 216 थी। देश में हर साल लगभग पांच लाख लोगों की मौत कैंसर से हो जाती है। जबकि टीबी से मरने वालों की संख्या दो लाख बीस हजार के आसपास ही है।
इन आंकड़ों पर गौर करने से पता चलता है कि गरीबी और गंदगी से होने वाली बीमारियों पर कुछ हद तक काबू पाया गया है। जबकि जानलेवा कैंसर एक नई चुनौती बनकर उभरा है। फिर, हृदय रोग से मरने वालों की संख्या आज भी भारत में सबसे अधिक है। हृदय रोग से मरने वालों की संख्या प्रति एक लाख की आबादी पर लगभग 613 है। कैंसर के मामले में मौत की संख्या प्रति एक लाख पर 145 है। लेकिन हृदय रोग कई कारणों से हो सकता है और अंतत: हर व्यक्ति की मौत तो हृदय की धड़कन बंद होने से ही होती है।
देश में जिस तेजी से कैंसर लोगों को अपना शिकार बना रहा है उतनी तेजी से हम उसके उपचार की व्यवस्था नहीं कर पा रहे हैं। इलाज की तमाम सुविधाओं के बावजूद इस बीमारी पर हम लगाम नहीं लगा पा रहे हैं। इस बीमारी का इलाज महंगा होना भी एक बड़ी समस्या है। कीमोथेरेपी, रेडिएशनथेरेपी, बायोलाजिकल थेरेपी और स्टेम सेल ट्रांसप्लांट से कैंसर का इलाज होता है लेकिन रोगी को इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है। अपने देश में गरीब मरीज यह कीमत अदा नहीं कर सकते हैं। इसके लिए सरकार रोगियों को कम कीमत पर सुविधाएं मुहैया कराकर उनकी मदद कर सकती है। इसके अलावा वैकल्पिक चिकित्सा की कुछ पद्धतियों को बढ़ावा देकर भी कैंसर रोगियों की जान बचाई जा सकती है।
शरीर में विषबेल की तरह फैलने वाली यह बीमारी तेजी से बढ़ रही है, वहीं इससे लड़ने और इस पर विजय पाने के चिकित्सीय उपाय भी दुनिया भर में हो रहे हैं। भारत सहित दस देशों के वैज्ञानिकों की अलग-अलग टीमें कैंसर के जीनों के रहस्य जानने में जुटी हैं। कैंसर के मोर्चे पर कुछ दवाएं भी बनाई गई हैं। एक विदेशी कंपनी रॉश ने कैंसर के इलाज के लिए हर्सेप्टिन नामक दवा बनाई है। इसकी एक खुराक की कीमत एक लाख तीस हजार रुपए है। एक रोगी को इसकी पंद्रह-बीस खुराकों की जरूरत पड़ सकती है। लेकिन विकासशील देशों की गरीब जनता इतनी महंगी दवाओं से अपना इलाज कराने की स्थिति में नहीं है। इसका उपाय भारतीय वैज्ञानिकों ने खाद्य पदार्थों की पोषक ऊर्जा से सस्ती दवा बना कर किया है।
देश में वैकल्पिक चिकित्सा के क्षेत्र में कई दशकों से काम करने वाली संस्था डीएस रिसर्च सेंटर ने खाद्य पदार्थों की पोषक ऊर्जा से तैयार की गई अपनी औषधि ‘सर्वपिष्टी’ से सैकड़ों मरणासन्न कैंसर रोगियों का इलाज करके दुनिया को चौंका दिया है। डीएस रिसर्च सेंटर के वैज्ञानिकों ने अपनी औषधि से ठीक हुए नौ सौ से अधिक कैंसर रोगियों की सूची तीन चरणों में पूरे नाम-पते सहित विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) को खुद ही भेज कर अपनी औषधि के परिणामों की जांच कराए जाने की मांग की है।
पश्चिम बंग के जाधवपुर विश्वविद्यालय के नैदानिक अनुसंधान केंद्र (सीआरसी) के निदेशक डॉ टीके चटर्जी के अनुसार, डीएस रिसर्च सेंटर की पोषक ऊर्जा से तैयार की गई औषधि ‘सर्वपिष्टी’ के पशुओं पर किए गए परीक्षण के परिणाम उत्साहजनक पाए गए हैं। फिर, यदि पशुओं के शरीर पर सर्वपिष्टी का प्रयोग किये जाने के बाद सीआरसी ने उत्साहजनक परिणाम प्राप्त किए हैं तो ऐसे ही परिणाम मानव शरीर पर प्रयोग करने से भी प्राप्त किए जा सकते हैं, जो कैंसर उपचार के इतिहास में युगांतकारी घटना होगी। सीआरसी विभिन्न रोगों के लिए दवाइयों का नैदानिक परीक्षण करता है। इसी सिलसिले में उसने सर्वपिष्टी का भी नैदानिक परीक्षण किया था। किसी दवा की प्रभावकारिता का स्तर सुनिश्चित करने के लिए सामान्यत: दो प्रकार का परीक्षण किया जाता है- पहला, औषधीय (फार्माकोलॉजिकल) परीक्षण, और दूसरा, विष विद्या संबंधी (टोक्सीकोलॉजिकल) परीक्षण।
ये परीक्षण आयातित सफेद चूहों पर किए गए। पशु शरीर में कैंसर कोशिकाओं को प्रविष्ट कराया गया और जब ट्यूमर निर्मित हो गया तब दवा देना शुरू किया गया। ‘पोषक ऊर्जा’ के परीक्षण की स्थिति में चौदह दिनों बाद जो प्रतिक्रियाएं देखी गर्इं उनमें कोशिकाओं की संख्या स्पष्ट रूप से कम होना शुरू हो गई थीं। पशु शरीर में कोई अल्सर पैदा नहीं हुआ। ट्यूमर की विकास दर छियालीस प्रतिशत तक कम हो गई थी और दवा की विषाक्तता लगभग शून्य थी। ऐसे सकारात्मक परिणाम हाल के समय में नहीं देखे गए थे। इस औषधि में कैंसर को रोकने और उससे लड़ने की अपरिमित संभावनाएं हैं। लेकिन यह औषधि अभी बाजार में नहीं आई है। सरकार इस दिशा में पहल कर सकती है। इससे लाखों कैंसर रोगियों की जान बचाई जा सकती है।
विश्व में पहली बार टीबी के मरीजों की संख्या में कमी दर्ज की गई है। पर भारत में बड़ी संख्या में टीबी के ऐसे मरीज सामने आए हैं जिन पर परंपरागत औषधियां काम नहीं कर रही हैं। देश में ‘मल्टी ड्रग रजिस्टेंट’ (एमडीआर) टीबी के बढ़ते मरीजों की संख्या को देखते हुए सरकार ने इसका सर्वे कराने का फैसला किया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूएसएआइडी (यूनाटेड स्टेट्स एजेंसी फॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट) की मदद से देश के चौबीस राज्यों में किए जाने वाले इस सर्वे में एक सौ बीस टीबी यूनिटों के कुल 5,214 मरीजों को शामिल किया जाएगा। इस के जरिये टीबी के नए मरीजों और वैसे मरीजों जिन पर दवा का असर नहीं हो रहा यानी दवा के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर चुके इलाजरत मरीजों में एंटी-टीबी ड्रग रजिस्टेंट की मौजूदगी के बारे में पता लगाया जाएगा।
मधुमेह के बढ़ते मरीजों और उनमें तेजी से हो रही टीबी की बीमारी स्वास्थ्य के क्षेत्र की अगली बड़ी चुनौती बन सकती है। यह खतरा इसलिए बड़ा है क्योंकि दुनिया भर में लगभग दो अरब लोगों में टीबी के रोगाणु पहले से चुपचाप छिपे बैठे हैं। भारत में भी एक तिहाई से ज्यादा आबादी इस सुप्त संक्रमण का शिकार है। ऐसे में तुरंत सावधान न होने पर यह दोहरी महामारी स्वास्थ्य क्षेत्र की सबसे बड़ी चुनौती बन सकती है। श्वास संबंधी बीमारियों पर दिल्ली में आयोजित पैंतालीसवें ‘यूनियन वर्ल्ड लंग हेल्थ कांफ्रेंस’ में वैज्ञानिकों और डॉक्टरों ने सबसे ज्यादा चिंता इसी खतरे को लेकर जताई है। विशेषज्ञों के अनुसार अगर दोनों बीमारियों के गठजोड़ को तुरंत नहीं तोड़ा गया तो अब तक टीबी नियंत्रण को लेकर जो काम हुआ है वह बेकार चला जाएगा। धीमी रफ्तार से ही सही, टीबी के मरीजों की संख्या अभी घट रही है, लेकिन इससे यह संख्या बढ़ने का खतरा है।
इसी तरह वर्ल्ड डायबिटीज फाउंडेशन के पूर्व प्रमुख डॉक्टर अनिल कपूर कहते हैं कि यह खतरा इसलिए बड़ा है, क्योंकि मधुमेह के आधे मरीजों का तो पता ही नहीं चल पाता है। लखनऊ के सिविल अस्पताल के क्षय रोग के विशेषज्ञ डॉ अशोक यादव के अनुसार, ‘भारत के संदर्भ में टीबी के लिए सबसे बड़ा कारण कुपोषण को पाया गया है। सिर्फ आठ से नौ फीसद मामलों में मधुमेह इस बीमारी का कारण बनता है।’
पर यह तथ्य शर्मसार करता है कि विकास के तमाम दावों के बावजूद देश में दुनिया के एक तिहाई टीबी मरीज हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार भारत में बाईस लाख टीबी के रोगी हैं। वर्ष 2012 में टीबी की बीमारी से तेरह लाख लोगों की मौत हुई। उनमें से एक चौथाई भारत के लोग थे। यह बेहद चिंता की बात है और इस बीमारी के खिलाफ राष्ट्रव्यापी मुहिम चलाने की सख्त आवश्यकता महसूस की जा रही है। यह ठीक है कि सरकारी स्तर पर इस दिशा में काफी प्रयास किए जा रहे हैं लेकिन इस अभियान में निजी क्षेत्र की बड़ी भूमिका हो सकती है। वैसे पिछले आठ साल में इस दिशा में हुए प्रयासों के सार्थक परिणाम सामने भी आए हैं। लेकिन अभी बहुत कुछ होना बाकी है। वैसे तो इस रोग से गरीबी का गहरा रिश्ता है और खानपान की कमियों के चलते यह रोग पनपता है। लेकिन अगर समाज में जागरूकता का संचार हो तो इस रोग से बचने का रास्ता निकल सकता है।

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