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जल-जागरण की जरूरत

संयुक्त राष्ट्र ने नौ साल पहले ही पीने के साफ पानी को बेहद जरूरी मानव अधिकार मान लिया था। अब नीति आयोग भी बता रहा है कि आज करीब आधा भारत गंभीर जल संकट की चपेट में है, यानी करीब साठ करोड़ लोगों पर मार है और हर साल साफ पानी न मिलने से करीब दो लाख लोग मौत के मुंह में समा जाते हैं। नीति आयोग का ‘जल प्रबंधन सूचकांक-2018’ इशारा करता है कि 2020 तक भारत के इक्कीस शहरों का गर्भ सूख पूरा जाएगा। इससे दस करोड़ लोगों पर सीधा असर पड़ेगा।

सांकेतिक फोटो।

क्षिप्रा माथुर

गांव, खेती, मवेशी और पानी। धरती की सांसें यहीं बंधी हैं और आस के मुहाने यहीं पर खुले हुए हैं। और यहीं कहीं है हमारी पारंपरिक जल संरक्षण तकनीक की संपदा। रेगिस्तान में जहां सूरज की रजत किरणें मिट्टी की चादर पर दरिया होने का छलावा करती हैं, वहीं लाखों मिन्नतों के बाद साल भर में दस-बीस सेंटीमीटर भी बरस जाए तो धरती के हलक में पानी की एक बूंद भी अमृत लगती है। देश के रेगिस्तानों का सूखे और पलायन की त्रासदी ने कभी पीछा नहीं छोड़ा, मगर यहां के फौलादी हिम्मत वाले लोगों ने कभी हार भी नहीं मानी। यहीं बुआई की, यहीं जोता और यहीं अपनी सोच और बसावट के ऐसे निशान छोड़े, जिसका लोहा आज की दुनिया भी मानती है।

पश्चिमी इलाके में धोरों की खूबसूरती और पुरखों की तैयार की जल संरचनाओं के जीवित अवशेष देखने हर साल लाखों देशी-विदेशी सैलानी यहां आते हैं। इतिहास बताता है कि जैसलमेर के करधनी इलाके में पाली से आकर बसे मेहनतकश लोगों ने चौरासी गांवों को आबाद किया था। रेगिस्तान को हरा-भरा बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी उन्होंने और वहीं सिंचाई के लिए ‘खड़ीन’ तैयार किए। ‘खड़ीन’ यानी पानी की आवक का क्रम तय करने का नायाब तरीका, जिससे जमीन में भरपूर नमी रहती है और जिससे सामूहिक खेती भी होती है। यानी पानी सिर्फ खेतों को सहेजने का नहीं, समुदाय को बांधे रखने का भी माध्यम था। इसे तैयार करने वाली इस स्वाभिमानी कौम ने उस इलाके से अपना ठिकाना ही उठा लिया जब उनकी बहू बेटियों पर हुक्मरानों की नीयत खराब होने लगी। ये वे अध्याय हैं, जो समझाते हैं कि राजाओं के सेवक और रक्षक साबित न हो पाने की कमजोरी ने किस तरह हमारे यहां की अद्भुत जल और पर्यावरण गाथाओं का दुखद अंत किया।

आज रेगिस्तान के वासियों को खारे पानी के साथ नहरों का मीठा पानी भी नसीब है, तो ये आधुनिक दौर की अभियांत्रिकी की बदौलत है। मगर आज भी दूर-दराज के गांव-ढाणियों में खड़ीन, बेरियां, जोहड़, बावड़ी, टांके यानी मानव निर्मित पारंपरिक जल-संरचनाएं ही हैं, जो जमीन को नम रखने का अपना धर्म नहीं भूलते, साथ ही फसलों और पशुओं के रखवाले बन कर जीवन की गति बनाए रखने में आज भी खरे हैं। इनमें से जिन जिनको समुदायों ने सहेज लिया, वे फिर भी आज खोजने से मिल जाएंगे, मगर जिन्हें न समुदाय ने बचाया न ही शासन ने जिनका मोल समझा वे अनगिनत आज मिट्टी में दब चुके और ऐसे इलाकों में पानी पाताल तक यानी ‘डार्क जोन’ में है। पंचायती राज की अवधारणा में ग्राम स्वराज समाहित था। और ग्राम स्वराज में समुदाय की भागीदारी। हर गांव का अपना अस्तित्व, अपनी पहचान, अपनी अर्थव्यवस्था, अपने उद्यम और अपने पर निर्भरता। प्राकृतिक संसाधनों को संभाल कर रखना इसी का हिस्सा था। जिस समुदाय ने समझा, संसाधनों को साझा किया, उसका प्रकृति से नाता जुड़ा रहा और जिन्होंने बेकद्री की उन्हें अब नए सिरे से सीखना ही होगा।

किसी समय सरस्वती नदी जैसलमेर से होकर गुजरती थी और अरब सागर से एकाकार होती थी। नदी सूखने पर यहां रेगिस्तान पसर गया और फिर जब इंदिरा गांधी कैनाल की सौगात मिली तो राहत आई। हालांकि नहर ने भी ऐसा कहर ढाया है कि खारे से छुटकारे की खैर मनाते हुए मीठे पानी में घुली बीमारियों को आंख मूंद कर पी जाने के सिवाय कोई चारा नहीं है। सीढ़ियों वाले कुंए यानी स्टेपवैल और घरों, मंदिरों, सामुदायिक स्थानों पर बने टांकों और ताल-तलैया की खूबी यह भी है कि इनका रखरखाव समुदाय साझी जिम्मेदारी समझ कर करता रहा है। उनकी इस पानी पर निर्भरता है, इसलिए भी उनका इन संरचनाओं से लगाव भी है। इस तरह का अपनापन बांध, नहर या पाइपलाइनों से कभी नहीं जुड़ पाता। इन बड़ी योजनाओं की देखभाल शासन-प्रशासन करता है और उनका जनता से नाता, दाता और याचक का बन कर खत्म हो जाता है। अगर नहरों में मृत पशु बहते हैं, गंदे नाले खुलते हैं और रासायनिक कचरा घुलता है, तो कौन-सा समुदाय बोलेगा, कौन सुनवाई करेगा?

अमेरिकी स्पेस एजेंसी ‘नासा’ ने दौसा जिले के आभानेरी की बेहद खूबसूरत ‘चांद बावड़ी’ को अपने चहेते ‘स्टारटॉक प्रोजेक्ट’ का हिस्सा बनाया, मगर राजस्थान के कई सूखे और रेगिस्तानी इलाकों में जल-संचयन की ऐसी अनगिनत मिसालें हैं, जिन तक भले ‘नासा’ की दूरबीन न पहुंचे, नीति बनाने और लागू करने वालों की निगाह तो पहुंचनी ही चाहिए। संयुक्त राष्ट्र ने नौ साल पहले ही पीने के साफ पानी को बेहद जरूरी मानव अधिकार मान लिया था। अब नीति आयोग भी बता रहा है कि आज करीब आधा भारत गंभीर जल संकट की चपेट में है, यानी करीब साठ करोड़ लोगों पर मार है और हर साल साफ पानी न मिलने से करीब दो लाख लोग मौत के मुंह में समा जाते हैं। नीति आयोग का ‘जल प्रबंधन सूचकांक-2018’ इशारा करता है कि 2020 तक भारत के इक्कीस शहरों का गर्भ सूख पूरा जाएगा। इससे दस करोड़ लोगों पर सीधा असर पड़ेगा।

नीतियों के आईने से मुद्दे की तह में झांका जाए तो ‘जल-शक्ति’ मंत्रालय ने लक्ष्य रखा है कि 2024 तक हर घर तक साफ जल पहुंचेगा और जल संसाधनों का प्रबंधन किया जाएगा। केंद्र्रीय बजट में बताया गया कि ‘जल-शक्ति अभियान’ में 256 जिलों के 1539 खंडों में जल संरक्षण, बारिश के पानी का संचयन, परंपरागत जल निकायों के नवीकरण, पानी के दोबारा इस्तेमाल और पेयजल की सफाई पर ध्यान रहेगा। बजट भाषण में आदतें बदलने की बात भी कही थी, तो फिर से गांवों की जीवन-शैली और संसाधनों के समझदारी से उपयोग को अपनाना ही होगा। पारंपरिक जानकारी और तकनीक को पढ़ना और रटना ही नहीं होगा उसके जीते-जागते अंश तैयार करने होंगे। जन-जागरण के लिए उन कहानियों को कहना होगा जो सच्ची हैं और दुनिया भर के लिए बनाए गए टिकाऊ विकास के लक्ष्यों की पगडंडियां हैं। खाट पर बैठ कर नहाना और उस चौथाई बाल्टी पानी को खाट के नीचे रखे तसले में बचा कर फिर से उपयोग में लाना, रामझारे से ओक लगा कर पानी पीना, कम पानी वाली फसलें बोना, पत्तल-दोने-शकोरों में दावत खाना, टांके में इकट्ठा बरसाती पानी को पूजा स्थल की तरह साफ रखना या मवेशियों के चारे और पानी के लिए खेली बनवाना- ये सब रोजमर्रा के जीवन और गांव-नगर नियोजन का हिस्सा था।

अब जब जलवायु की तीव्रता ने हमारे हाथ पैर फुला रखे हैं, हालात बेकाबू होने से रोकने का एक रास्ता तो यही है कि न केवल आदतों में सुधार हो, बल्कि नीतियां बनाने वाले जल-विरासत पर गौर करते हुए संस्थाओं और समुदायों के जरिए जन-जन को जोड़ने में जुट जाएं। जल-स्वावलंबन और फार्म पांड जैसी योजनाओं ने जो जमीनी तब्दीलियां की हैं, उनका कोई आकलन सरकार के पास खुद भी है कि नहीं, लेकिन ये योजनाएं पारंपरिक जल-स्रोतों की सफाई, खुदाई और खेतों के पानी को सहेजने में बेहद कारगर रही हैं। जल-कानून का खाका भी कुछ राज्यों में तैयार नजर आ रहा था, जहां पानी की बर्बादी पर जुर्माने का प्रावधान होना था, लेकिन पानी सहेजने को लेकर संजीदगी का आलम यह है कि पानी की आवक और कुदरती रास्ते में तो रसूखदारों के जमीन-जायदाद हैं। ऐसे में बेमन से बनी नीतियां जमीन पर उतर पाएंगी, इसमें संशय ही है। आखिरकार जल-जवाबदेही का सारा दारोमदार आम जनता पर ही आना है, जिसकी तैयारी में नागरिक समाज से उम्मीदें बंधी रहेंगी।

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