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यूरोप का भौगोलिक विस्तार

आज के विश्व को समझने के लिए उसके आर्थिक स्वरूप के पार झांकना आवश्यक है। सामान्यत: हमारी सारी बहस अमेरिका-यूरोप के आर्थिक वर्चस्व पर टिकी रहती है।

Author Updated: June 19, 2015 5:58 PM

आज के विश्व को समझने के लिए उसके आर्थिक स्वरूप के पार झांकना आवश्यक है। सामान्यत: हमारी सारी बहस अमेरिका-यूरोप के आर्थिक वर्चस्व पर टिकी रहती है। उसे इसी सीमित दायरे में बांधे रखने के लिए यह दोहराया जाता रहता है कि आज अमेरिका और यूरोप का आर्थिक वर्चस्व है, कल नहीं रहेगा। चीन एक आर्थिक शक्ति के रूप में चुनौती बन गया है।

कल भारत भी इस दौड़ में आगे बढ़ते हुए बराबर की शक्ति होगा। इस तरह पिछली दो शताब्दियों की औद्योगिक क्रांति से हुई आर्थिक प्रगति ने जो असंतुलन पैदा कर दिया है वह कुछ सीमा तक दूर हो जाएगा। भारत और चीन, जहां विश्व की सैंतीस प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है, औद्योगिक विकास में आगे बढ़ेंगे तो विश्व लगभग एक जैसा दिखने लगेगा।

हमें विश्व में आज जो विषमता दिखाई देती है वह केवल विकास की दौड़ में आगे-पीछे होने का परिणाम नहीं है। अब तक पूंजीवादी और साम्यवादी सभी विचारधाराओं ने उसे इसी रूप में चित्रित करने का प्रयत्न किया है। सारे विमर्श को इसी सीमित दायरे में रख कर उन्होंने पश्चिमी वर्चस्व के अधिक महत्त्वपूर्ण पहलुओं से हमारा ध्यान हटा दिया है।

हमने यह देखना लगभग छोड़ दिया है कि पश्चिमी वर्चस्व की वाहक शक्तियां आर्थिक नहीं सामरिक थीं। उन्होंने जिस राजनीतिक उपनिवेशीकरण का रास्ता खोला था उसे इतिहास ने समेट दिया। लेकिन उस दौर में यूरोपीय जाति को भूगोल के एक बड़े भाग पर नियंत्रण का अवसर मिल गया। यह नियंत्रण उसने स्थानीय आबादी का आपराधिक रूप से विनाश करके प्राप्त किया था।

यूरोप के पास विश्व की अपनी 6.8 प्रतिशत भूमि ही है। पोप एलेक्जेंडर षष्टम ने 4 मई 1493 को एक आदेश जारी किया। ‘पैपल बुल’ के रूप में प्रसिद्ध इस आदेश के द्वारा उन्होंने स्पेनी और पुर्तगाली शासकों को यह अधिकार दिया कि वे विश्व के पूर्व और पश्चिम नए क्षेत्रों को खोजें, उन्हें विजित करें, उन पर अपना आधिपत्य स्थापित करें और उन्हें ईसाई बनाएं।

इसके परिणामस्वरूप अमेरिका की दस करोड़ आबादी का लगभग सफाया करके यूरोप ने उस पर अपना आधिपत्य स्थापित किया था। अठारहवीं शताब्दी में दक्षिणी अमेरिका में गुलामों की स्थिति को लेकर जो बहस हुई थी, उसमें चर्च की ओर से उनके गुलाम होने को गौण और ईसाई होने को प्रधान बताते हुए गुलामी की व्यवस्था का समर्थन किया गया था। अमेरिकी कोर्ट आज भी उस पैपल बुल के आधार पर गोरे लोगों के स्वामित्व को दी जाने वाली चुनौतियों को अस्वीकार कर देते हैं।

पिछले पांच सौ वर्षों में यूरोपीय जाति ने विश्व-भूगोल में अपने 6.8 प्रतिशत भाग को बढ़ा कर लगभग चालीस प्रतिशत कर लिया है। आज उसके नियंत्रण में विशाल अमेरिकी महाद्वीप है, जो विश्व-भूगोल का 28.5 प्रतिशत है।

वास्तव में अमेरिका पर नियंत्रण ने ही यूरोपीय लोगों को एक पिछड़ी जाति से एक संपन्न और अग्रणी जाति में बदल दिया। इसी से उन्होंने फिर आॅस्ट्रेलिया को समेट लिया, जो विश्व-भूगोल का 5.9 प्रतिशत है। अगर यूरोप के नियंत्रण में अमेरिका न आया होता तो उसकी जनसंख्या बढ़ने की अधिक गुंजाइश नहीं थी। अमेरिका ने उन्हें पेट भर भोजन उपलब्ध कर दिया।

अमेरिका के एक स्वतंत्र देश घोषित होने से पहले यूरोप को वहां से सत्रह सौ टन सोना और तिहत्तर हजार टन चांदी प्राप्त हुई, जिसके आधार पर वे भारत और चीन से व्यापारिक संबंध जोड़ पाए। वरना उनके पास बेचने के लिए कुछ नहीं था।

अपने इस भौगोलिक विस्तार के आधार पर यूरोपीय जाति पिछले ढाई सौ वर्षों में अपनी आबादी दस गुना बढ़ाने में समर्थ हो गई है। यह वृद्धि किसी भी और जाति से अधिक है। हालांकि पिछले पचास-साठ वर्षों में अन्य जातियों ने भी अपनी जनसंख्या में अभूतपूर्व वृद्धि की है। लेकिन जहां अन्य जातियां अपने परंपरागत क्षेत्र में ही सीमित हैं, यूरोपीय लोग एक विशाल क्षेत्र में फैल गए हैं और आधी से अधिक जनसंख्या यूरोप से बाहर फल-फूल रही है। विशेषकर संयुक्त राज्य अमेरिका में संपन्नता सबसे अधिक है और जनसंख्या का घनत्व सबसे कम। भारत में एक वर्ग किलोमीटर में 383 लोग रहते हैं तो अमेरिका में केवल 32 व्यक्ति। आॅस्ट्रेलिया का घनत्व तो और भी कम है और संपन्नता यूरोप में बसे लोगों से अधिक।

अमेरिकी आबादी भी यूरोप की तरह औद्योगिक क्रांति के दौर में ही बढ़ी है। 1820 में जब औद्योगिक क्रांति आरंभ हुई, अमेरिकी आबादी ढाई करोड़ थी। आज पूरे अमेरिकी महाद्वीप की आबादी नब्बे करोड़ के आसपास है। आरंभ से ही उसका विस्तार दक्षिणी अमेरिका में अधिक हुआ, जबकि संपन्नता औद्योगीकरण के कारण उत्तरी अमेरिका में अधिक रही। लेकिन मुख्य बात यह है कि एक जाति के रूप में आज वे विश्व की सबसे बहुसंख्यक जाति हैं और उन्होंने अपने मूल क्षेत्र से लगभग छह गुने भूभाग पर बलात अधिकार कर लिया है। यूरोप से बाहर उनका जिन क्षेत्रों पर नियंत्रण हुआ है वे खनिज संपदा और उर्वरा-शक्ति के लिहाज से विश्व के सबसे संपन्न क्षेत्र हैं। आॅस्ट्रेलिया में केवल तटीय क्षेत्र पर खेती संभव है, लेकिन खनिज संपन्नता में वह बहुत आगे है। अमेरिका तो यूरोपीय जाति को सभी तरह की संपन्नता जुटा रहा है।

अब तक यह भ्रम फैलाया जाता रहा कि अमेरिकी महाद्वीप एक अज्ञात क्षेत्र था और वहां आदिम जीवन जीने वाली थोड़ी-सी जनसंख्या थी। लेकिन अब यह सिद्ध हो चुका है कि 1500 के आसपास अमेरिकी महाद्वीप की जनसंख्या यूरोप से कम नहीं थी और दक्षिणी अमेरिका में दो उन्नत सभ्यताएं थीं। अपने आग्नेय अस्त्रों के बल पर यूरोपीय आक्रांताओं ने वहां की अधिकांश आबादी का पचास वर्षों के भीतर सफाया कर दिया। निश्चय ही सब युद्ध में नहीं मारे गए। बहुत-से पराजय, भुखमरी और महामारी के शिकार हुए। उनके संघर्ष की कथा पढ़नी हो तो हावर्ड फास्ट के उपन्यास ‘माइ ग्लोरियस ब्रदर्स’ को पढ़ना चाहिए। अमेरिका और आॅस्ट्रेलिया दोनों ही जगह पहुंच कर यूरोपियों ने नृशंसता का एक नया इतिहास रचा था।

यूरोपीय जाति का यह भौगोलिक विस्तार अनदेखा नहीं किया जा सकता। न सिर्फ उसकी आर्थिक समृद्धि, उसकी सामरिक अजेयता भी उसी पर टिकी हुई है। आज अमेरिका ही यूरोपीय जाति की अग्रणी सामरिक शक्ति है। इस शक्ति का उदय जघन्य पाप से हुआ है। इस पाप की स्मृति न केवल गैर-यूरोपीय लोगों में बनी रहेगी बल्कि यूरोपीय बौद्धिक जगत भी अपने इतिहास के इस पाप की ग्लानि से मुक्त नहीं हो पाएगा। अमेरिका इसीलिए जातीय मिश्रण की बात सबसे अधिक करता है, हालांकि उससे वह उतना ही डरता भी है।

आज यूरोपीय जाति की वृद्धि दर थम गई है। औद्योगिक जीवन शैली का यह अवश्यंभावी परिणाम है। लेकिन विश्व की अन्य जातियों की जनसंख्या अब भी बढ़ रही है और अनेक की बहुत तेजी से। इस बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए भूमि की उपलब्धता सिकुड़ती जा रही है, जबकि यूरोपीय जाति को औरों से कहीं अधिक भूमि उपलब्ध है। यूरोपीय जाति ने अपने अधिकार के क्षेत्र की किलेबंदी कर रखी है। वे अपने क्षेत्रों में बाहरी लोगों के प्रवेश पर अनेक तरह के निषेध लागू किए हुए हैं। यह जानते हुए कि विश्व के चौंतीस प्रतिशत भूगोल पर उन्होंने बलात अधिकार किया था, क्या आने वाली पीढ़ियां इसे पचा पाएंगी?

यूरोपीय जाति का यह भौगोलिक विस्तार केवल एक ऐतिहासिक विसंगति नहीं है। इस विस्तार ने उसकी अग्रणी सामरिक शक्ति यानी संयुक्त राज्य अमेरिका को विश्व भर में अपना सामरिक प्रतिष्ठान खड़ा करने की सुविधा उपलब्ध कर दी है। आज अमेरिका एक सौ पचास देशों में अपने सैनिक अड््डे बनाए हुए है। अमेरिका से बाहर उसके 1 लाख 60 हजार सैनिक तैनात हैं, जिनमें केवल 66 हजार यूरोप की सुरक्षा के लिए हैं। अस्सी हजार केवल पूर्व एशिया में हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अब तक जितने भी युद्ध हुए हैं, उनमें अमेरिका की अग्रणी भूमिका रही है।

अक्सर यह कहा जाता है कि विश्व में शांति बनाए रखने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय पुलिस वाले की आवश्यकता होती है। लेकिन अब तक के राजनीतिक इतिहास में हम अमेरिका और उसकी सहयोगी यूरोपीय शक्तियों को सबसे निरंकुश शासकों का संरक्षण करते हुए ही पाते हैं। हमारे बगल में पाकिस्तान को शह देने में भी अमेरिकी भूमिका ही रही है। संसार के सबसे बड़े माफियाओं और नशीली वस्तुओं के तस्करों के सूत्र आप यूरोप-अमेरिकी हाथों में ही पाएंगे। यह विडंबना ही है कि जिस शक्ति का उदय सबसे अमानुषिक साधनों से हुआ हो, वह संसार भर को आज मानवता का पाठ पढ़ाती घूम रही है।

यूरोपीय जाति का आज जो वर्चस्व है वह केवल विश्व-व्यापार में उसके सर्वाधिक भाग के कारण नहीं है। विश्व-व्यापार में उसकी अग्रणी भूमिका इसलिए है कि वह आज विश्व की सबसे संख्या-बहुल और संपन्न जाति है। यह संख्या बहुलता और संपन्नता उसे अपने भौगोलिक विस्तार के बल पर मिली है। इसलिए जब तक विश्व की एक तिहाई भूमि पर उसका यह अनुचित और अनधिकृत नियंत्रण बना रहता है और उसे चुनौती नहीं दी जाती तब तक विश्व की विषमता दूर नहीं होगी।

इस भौगोलिक विस्तार और संपन्नता के कारण ही वह अपनी सामरिक अजेयता बनाए रखने की स्थिति में है। अमेरिका और आॅस्ट्रेलिया के प्राकृतिक साधनों पर वास्तव में पूरे विश्व का अधिकार बनता है। एक संतुलित विश्व की खातिर पूरी दुनिया में जनसंख्या का यथासंभव संतुलित वितरण होना चाहिए। उसके पहले कदम के तौर पर अमेरिका और आॅस्ट्रेलिया को गैर-यूरोपीय जातियों के लिए अधिक सुगम बनाया जाना चाहिए। आज नहीं तो कल, यह मांग अवश्य उठेगी और तब उसकी उपेक्षा करना अमेरिकी जाति के लिए आसान नहीं रह जाएगा।

बनवारी

 

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