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राजनीतिः ऊर्जा संकट और जैव र्इंधन

जैव र्इंधन प्रौद्योगिकियों को अपना कर कृषि अवशिष्टों को एथनॉल में बदला जा सकता है और यदि इसके लिए बाजार विकसित किया जाए तो कचरे का मूल्य मिल सकता है जिसे किसान जला देते हैं। साथ ही, अतिरिक्त उत्पादन चरण के दौरान उनके उत्पादों के लिए उचित मूल्य नहीं मिलने की आशंका बनी रहती है। इसलिए अतिरिक्त अनाजों को एथनॉल में परिवर्तित करने से किसानों के अतिरिक्त आय बढ़ाई जा सकती है।

रजनीश भगत

तकनीक के मामले में मनुष्य सभ्यता की शुरुआत से ही विकासशील रहा है। इसीलिए नित नए-नए आविष्कार, खोज और अनुसंधान होते रहे हैं। विकास में सबसे बड़ी सहायक ऊर्जा होती है और ऊर्जा के सीमित विकल्प ने मनुष्य को इसके नए-नए विकल्प खोजने को मजबूर किया है। जैव र्इंधन का प्रयोग स्वच्छ ऊर्जा के मामले में भारत की बहुत बड़ी उपलब्धि है। हाल में भारत के विमानन इतिहास में पहली बार जैव र्इंधन के इस्तेमाल से देहरादून से दिल्ली तक विमान उड़ाने में जो कामयाबी हासिल हुई है, वह स्वच्छ ऊर्जा के विकास और इस्तेमाल की दिशा में पहला बड़ा कदम है। पेट्रोलियम मंत्रालय, भारतीय पेट्रोलियम संस्थान (देहरादून), भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (कानपुर), विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग और वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआइआर) जैसे कई संस्थानों के सहयोग और समन्वय ने जैव र्इंधन के क्षेत्र में मिसाल कायम की है। अमेरिका, नीदरलैंड और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में पहले से ही जैव र्इंधन का इस्तेमाल विमान उड़ाने में किया जा रहा है। भारत ने भी अब इसमें अपनी क्षमता साबित कर दी है और आने वाले समय में जैव र्इंधन से विमान उड़ने लगेंगे।

यह जैव र्इंधन वास्तव में है क्या? धरती के गर्भ में दबे जीवाश्मों से जो र्इंधन जैसे- पेट्रोल, डीजल, कोयला प्राप्त होता है, जीवाश्म र्इंधन कहलाता है। इस र्इंधन को प्राकृतिक रूप से बनने में सदियां लग जाती हैं। यदि इसी प्रक्रिया को वैज्ञानिक तरीके से कुछ दिनों या घंटो में संपन्न कर लिया जाता है तो इस तरह से प्राप्त र्इंधन को जैव र्इंधन कहते हैं। वास्तव में जैव र्इंधन पौधों या पदार्थों से बने होते हैं, जो बायो एथेनॉल, बायो डीजल, बायो सीएनजी के रूप में उपयोग में लाए जाते हैं। ये पर्यावरण के अनुकूल होते हैं। जैव र्इंधन कई मामलों में ऊर्जा का काफी अच्छा स्रोत हैं। जैव र्इंधन के स्रोतों में एथेनॉल प्रमुख है जो गन्ने से हासिल होता है। इसी तरह बायो डीजल का उत्पादन जटरोफा से होता है।

जैव र्इंधन की अवधारणा उतनी ही पुरानी है जितनी कार की। बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में जब हेनरी फोर्ड ने कार का अविष्कार किया था तो उसे एथेनॉल से चलाने की भी योजना थी। लेकिन तब सुलभ और सस्ते पेट्रोलियम र्इंधन के सामने जैव र्इंधन की कल्पना साकार नहीं हो सकी। वर्तमान समय में कई शोध आए हैं, जिसमें कुछ ही दशकों में पेट्रोलियम पदार्थ के समाप्त होने की आशंका जताई गई है। साथ ही पर्यावरणीय दुष्प्रभाव, महंगी होती कीमत ने भी पेट्रोलियम पदार्थों के विकल्प तलाशने को मजबूर कर दिया है। पूरी दुनिया में खोज और अनुसंधान जारी है। संयुक्त राष्ट्र की अंतराष्ट्रीय ऊर्जा एजंसी और खाद्य एवं कृषि संगठन ने भी जैव र्इंधन को बढ़ावा देने का प्रयास किया है।

भारत सरकार द्वारा 2003 में एथनॉल मिश्रित पेट्रोल कार्यक्रम शुरू किया गया था। इसका उद्देश्य पेट्रोल के साथ एथनॉल को मिश्रित करना था, ताकि इसे जैव र्इंधन की श्रेणी में लाया जा सके और र्इंधन आयात में कटौती करके लाखों डॉलर विदेशी मुद्रा बचाई जा सके। जैव र्इंधन कृषि क्षेत्र को भी बढ़ावा देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। वर्तमान में इस कार्यक्रम के तहत पेट्रोल में दस फीसद एथनॉल मिलाने की इजाजत है, जिसे बढ़ा कर बीस फीसद किए जाने की योजना है। ब्राजील जैसे देश में तो अस्सी फीसद एथनॉल और बीस फीसद पेट्रोल मिला कर जैव र्इंधन बनाया जा रहा है और उपयोग किया जा रहा है।

केंद्र सरकार ने कुछ महीने पहले ही राष्ट्रीय जैव र्इंधन नीति-2018 को मंजूरी दी है। इस नीति में जैव र्इंधनों को ‘आधारभूत जैव र्इंधनों’ यानी पहली पीढ़ी के जैव एथनॉल और जैव डीजल और ‘विकसित जैव र्इंधनों’ यानी दूसरी पीढ़ी के एथनॉल, निगम के ठोस कचरे से प्राप्त र्इंधन, तीसरी पीढ़ी के जैव र्इंधन, जैव सीएनजी आदि को श्रेणीबद्ध किया गया है, ताकि प्रत्येक श्रेणी में उचित आर्थिक प्रोत्साहन बढ़ाया जा सके। गन्ने का रस, चीनी वाली वस्तुओं जैसे चुकंदर, स्टार्च वाली वस्तुएं जैसे- मक्का, मनुष्य के उपभोग के लिए अनुपयुक्त अनाज जैसे खराब गेहूं, टूटा चावल, सड़े हुए आलू के इस्तेमाल की अनुमति देकर एथनॉल उत्पादन के लिए कच्चे माल का दायरा बढ़ाया गया है। गैर-खाद्य तिलहनों, इस्तेमाल किए जा चुके खाना पकाने के तेल से जैव डीजल उत्पादन के लिए आपूर्ति श्रृंखला तंत्र स्थापित करने को प्रोत्साहन दिया गया है।

चीन और अमेरिका के बाद भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोग करने वाला देश है। वर्तमान में भारत कच्चे तेल की आवश्यकता की पूर्ति के लिए लगभग बयासी फीसद और प्राकृतिक गैस के मामले में लगभग चवालीस फीसद आयात पर निर्भर है। कच्चे तेल के आयात पर देश तकरीबन आठ लाख करोड़ रुपए खर्च करता है। अगर एथनॉल का उत्पादन तेजी से होने लगे तो कच्चे तेल के आयात को कम किया जा सकता है। ऐसे में जैव र्इंधन के उपयोग को बढ़ा कर विदेशी मुद्रा भी बचाई जा सकती है। जैव र्इंधन को इक्कीसवीं सदी का र्इंधन कहा जाता है। स्वच्छ र्इंधन और कच्चे तेल के आयात की निर्भरता को कम करने में जैव र्इंधन भारत के लिए मील का पत्थर साबित होगा।

पेट्रोलियम पदार्थों की तुलना में जैव र्इंधन से बेहद कम पर्यावरण प्रदूषण होता है। फसल अवशेष जलाने में कमी लाने और कृषि अवशिष्ट को जैव र्इंधनों में बदल कर ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन में और कमी लाई जा सकती है। आज पर्यावरण प्रदूषण वैश्विक स्तर पर चिंताजनक है। भारत के संदर्भ में यह चिंता बढ़ना स्वाभाविक है, क्योंकि विश्व आर्थिक मंच के साथ येल और कोलंबिया विश्वविद्यालयों की रिपोर्ट के मुताबिक पर्यावरण प्रदर्शन सूचकांक में भारत निचले पांच देशों में से एक है। इस सूचकांक में शामिल कुल एक सौ अस्सी देशों में भारत एक सौ सतहत्तरवें स्थान पर है।

जैव र्इंधन प्रौद्योगिकियों को अपना कर कृषि अवशिष्टों को एथनॉल में बदला जा सकता है और यदि इसके लिए बाजार विकसित किया जाए तो कचरे का मूल्य मिल सकता है जिसे किसान जला देते हैं। साथ ही, अतिरिक्त उत्पादन चरण के दौरान उनके उत्पादों के लिए उचित मूल्य नहीं मिलने की आशंका बनी रहती है। इसलिए अतिरिक्त अनाजों को एथनॉल में परिवर्तित करने से किसानों के अतिरिक्त आय बढ़ाई जा सकती है। सरकार के एक बड़े लक्ष्य किसानों की आय 2022 तक दुगुनी करने में यह कदम बेहद मददगार साबित हो सकता है। पेट्रोलियम र्इंधन की तुलना में जैव र्इंधन कम प्रदूषण फैलाता है। वर्तमान में तेल विपणन कंपनियां करीब दस हजार करोड़ रुपए के निवेश से बारह दूसरी पीढ़ी की जैव र्इंधन रिफाइनरियां स्थापित करने की प्रक्रिया में है। साथ ही देश में जैव रिफाइनरियों से ग्रामीण क्षेत्रों में आधारभूत संरचना में निवेश के लिए प्रोत्साहित किया जा सकेगा। इससे रोजगार के नए अवसर विकसित होंगे।

भारत के संदर्भ में जैव र्इंधन सामरिक महत्त्व भी रखता है। इसे बढ़ावा देने से मेक इन इंडिया, कौशल विकास, स्वच्छ भारत अभियान जैसे कार्यक्रम को बढ़ावा मिलेगा। अगर भविष्य में ऐसी नौबत आने का खतरा हो कि तेल संपन्न देश भारत को निर्यात बंद कर दें तो उस स्थिति से निपटने के लिए जैव र्इंधन किसी वरदान से कम नहीं होगा। हमारी धरती पर जैव र्इंधन के असंख्य स्रोत मौजूद हैं जिन पर लगातार काम चल रहा है। जरूरी है कि हमारे पास देशी संसाधन उपलब्ध हों और ऊर्जा के क्षेत्र में हम आत्मनिर्भर हों। यदि निकट भविष्य में पेट्रोल और डीजल पर निर्भर देश की कुल ऊर्जा जरूरत में से पचास फीसद हिस्सा जैव र्इंधन का उपयोग होने लगे तो यह ऊर्जा क्षेत्र में बड़ी क्रांति होगी। लेकिन यह भी ध्यान रखने की जरुरत है कि यह सतही तौर पर जितनी आसान लग रहा है, हकीकत में उतना आसान नही है। इसके लिए छोटे-छोटे लक्ष्य निर्धारित करने की आवश्यकता है।

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