ऊर्जा संकट और विकल्प

बिजली से चलने वाले वाहनों और सौर ऊर्जा पर चल रही कोशिशें कुछ राहत भरे नतीजे ला सकती हैं।

सोलर प्‍लेट।

संजय वर्मा

बिजली से चलने वाले वाहनों और सौर ऊर्जा पर चल रही कोशिशें कुछ राहत भरे नतीजे ला सकती हैं। लेकिन इस पूरे प्रकरण में जो सबसे मुश्किल काम है, वह तकनीक का हस्तांतरण है। जब कोयले से बनने वाली बिजली की जगह सौर पैनल लगेंगे तो बराबर मात्रा में बिजली पाने में भारी निवेश और जरूरत के मुकाबले कम उत्पादन के जोखिम को सहना पड़ेगा।

विज्ञान कहता है कि ऊर्जा के बिना जीवन संभव नहीं। अर्थशास्त्र कहता है कि विकास के लिए जिस चीज की सबसे ज्यादा जरूरत है, वह ऊर्जा ही है। हमारे देश में कोयले की कमी के फौरी संकट और भावी आशंकाओं के बीच यह चर्चा उठी है कि अगर आबादी की बढ़ती जरूरतों के बरक्स विकास की रफ्तार को कायम रखना है तो हमें भारी मात्रा में ऊर्जा यानी बिजली की जरूरत होगी। लेकिन बिजली पैदा करने के विकल्पों पर गौर करने पर पता चलता है कि यह काम आसान नहीं है। जिस तरह से कोयले के संकट को सीधे तौर पर बिजली की कमी से जोड़ा जा रहा है, उसमें यह जानना जरूरी हो गया है कि हमारे पास आखिर बिजली बनाने के कितने और कैसे विकल्प हैं। अहम सवाल यह भी है कि क्या ऐसे विकल्पों से निकट भविष्य में हमारी जरूरतों के मुताबिक बिजली मिलती रहेगी।

बिजली उत्पादन का मौजूदा परिदृश्य देखें तो पता चलता है कि इसके लिए हम स्वदेशी और आयातित कोयले पर निर्भर हैं। लेकिन यह निर्भरता कई मुश्किलों का सबब बन रही है। कोयले के घटते स्रोत (घरेलू खदानें और विदेश से आयात) जल्द ही ऐसी स्थितियां पैदा कर सकते हैं, जिनमें हमें विद्युत उत्पादन के दूसरे स्रोतों पर आश्रित होना पड़ेगा। दूसरी समस्या यह है कि वायु प्रदूषण और जलवायु संकट की चुनौतियों के मद्देनजर कोयले से बनने वाली बिजली के विकल्प तलाशने की मजबूरी खड़ी हो गई है। देश में ऐसी कई योजनाओं पर काम भी चल रहा है जिनमें कोयले वाली बिजली से हट कर पनबिजली या परमाणु बिजली या फिर सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा आदि के उत्पादन पर जोर दिया जा रहा है।

कोयले की जगह लेने वाले सारे विकल्पों के अपने-अपने आकर्षण हैं, लेकिन व्यावहारिकता की कसौटी पर सभी में कोई न कोई दिक्कतें हैं। इससे यह संभव लगता नहीं है कि ये विकल्प जल्द ही कोयले की जगह ले पाएंगे। बिजली उत्पादन के लिए कोयला कितना बड़ा सहारा है, इसकी पुष्टि इस तथ्य होती है कि फिलहाल भारत में सबसे ज्यादा यानी उनसठ फीसद बिजली कोयले से बनाई जा रही है। इसे तापीय (थर्मल) बिजली कहा जाता है। इसके बाद दूसरा स्थान हाइड्रो इलेक्ट्रिक यानी जलविद्युत का है। जलविद्युत परियोजनाओं से देश में सत्रह फीसद बिजली बनाई जाती है। बाकी बची नौ फीसद बिजली जीवाश्म ईंधन या प्राकृतिक गैस से, तीन फीसदी परमाणु बिजलीघरों में और करीब बारह फीसदी बिजली अक्षय ऊर्जा के स्रोतों यानी सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा से मिलती है।

मामला अकेले बिजली उत्पादन की सहूलियत का नहीं है। उत्पादित बिजली की कीमत भी एक बड़ा पहलू है। सबसे सस्ती बिजली कोयले से मिलती है। लेकिन हाल में जिस तरह कोयले संकट गहराया और ताप बिजलीघरों ने विदेश से आयातित महंगे कोयले से बिजली बनाई तो उससे बनी बिजली की कीमत भी बढ़ गई। विद्युत वितरण कंपनियों ने महंगी बिजली खरीदने से इनकार कर दिया। अगर आगे चल कर विद्युत आपूर्ति कायम रखने के लिए उन्हें यह बिजली खरीदनी पड़ी तो साफ है कि कंपनियां इसका बोझ उपभोक्ताओं पर डालेंगी। ऐसी स्थिति में दो या तीन गुना ज्यादा कीमत उपभोक्ताओं को चुकानी पड़ सकती है।

परमाणु बिजलीघरों से मिलने वाली बिजली के बारे में भी कहा जाता है कि दूसरे स्रोतों की तुलना में यह भविष्य में काफी सस्ती पड़ेगी, लेकिन फिलहाल देश में इसका उत्पादन पैदावार दो से तीन फीसद ही है। इसके अलावा परमाणु र्इंधन के लिए हमारा देश न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप (एनएसजी) की मेहरबानी पर निर्भर है। एक अन्य बेहतर विकल्प सौर ऊर्जा के रूप में मिल सकता है।

भारत एक वैश्विक सौर गठबंधन समूह (एसएजी) का भी सदस्य है और देश में सौर ऊर्जा संयंत्र लगाने के लिए कई योजनाओं पर काम चल रहा है। लेकिन अक्षय ऊर्जा का यह स्रोत अभी बहुत भरोसा नहीं पैदा कर पाया है। जिन तटीय इलाकों में विशालकाय सौर ऊर्जा संयंत्र लगाए गए हैं, वहां आने वाले चक्रवाती तूफानों के कारण इनके क्षतिग्रस्त होने की खबरें अक्सर मिलती रही हैं। यही नहीं, सौर बिजली की कीमत अभी भी कोयले से मिलने वाली बिजली के मुकाबले चौदह फीसद तक महंगी है। हालांकि आम लोगों को अपने घरों की छतों पर सौर पैनल लगाने को उत्साहित किया जा रहा है, लेकिन पैनल लगाने की शुरुआती कीमत आम लोगों को इस बारे में ज्यादा प्रेरणा नहीं दे पाई है। जीवाश्म र्इंधन और प्राकृतिक गैस से चलने वाले बिजलीघरों की बात की जाए, तो इससे जुड़ा तथ्य यह है कि इन बिजलीघरों, कारखानों और वाहनों को चलाने में जीवाश्म र्इंधन का इस्तेमाल होता है और भारत अपनी जरूरत का अस्सी फीसद तेल विदेशों से आयात करता है।

हमारा देश कुछ समय पहले तक इसके लिए इराक और सऊदी अरब पर निर्भर था। अब भारत अपनी जरूरत के तेल का बारह फीसद ईरान से आयात कर रहा है। वर्ष 2018 में भारत ने ईरान से सात अरब डालर का तेल आयात किया था। असल में ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध लगाए जाने के बाद मई, 2019 से वहां से भारत को तेल आपूर्ति तकरीन ठप्प हो गई, जिससे तेल के लिए सऊदी अरब और इराक पर निर्भरता बढ़ी। हालांकि इन सारी समस्याओं के समाधान की कुछ राहें भी खुली हैं। जैसे हाल में देश में राष्ट्रीय हाइड्रोजन मिशन को हरी झंडी दिखाई गई है।

इस योजना का उद्देश्य देश को ग्रीन हाइड्रोजन का निर्यातक देश बनाने का है। हाइड्रोजन ऐसा र्इंधन है जो स्वच्छ है और एक बार दक्षता हासिल होने के बाद इससे अनंत काल तक असीमित ऊर्जा पाई जा सकती है। समस्या दबाव डाल कर इसका भंडार करने की है, क्योंकि यह अत्यंत विस्फोटक होने के कारण दुर्घटना का कारण भी बन सकती है। उम्मीद है कि राष्ट्रीय हाइड्रोजन मिशन में इससे जुड़ी सभी समस्याओं का समाधान निकाल लिया जाएगा। हाइड्रोजन र्इंधन के अलावा स्वच्छ ऊर्जा के जिन अन्य स्रोतों का उल्लेख सरकार के स्तर पर किया जा रहा है, उनमें बिजली से चलने वाली कार, बस और ट्रक अग्रणी हैं।

इसके अलावा ईंधन के रूप में गैस के इस्तेमाल और पेट्रोल में एथेनाल के मिश्रण से तैयार होने वाले ईंधन से वाहन चलाने की योजना भी उल्लेखनीय हैं। गन्ने के शीरे से निकाला गया एथेनाल एक स्वच्छ र्इंधन है, लिहाजा इसे जला कर बनाई जाने वाली बिजली कई मायनों में दूसरे विकल्पों से बेहतर मानी जाती है। भारत में भी एथेनाल से ऊर्जा हासिल करने का चलन शुरू हो चुका है। कुछ राज्यों में प्रायोगिक तौर पर बसें और ट्रेनें तक एथेनाल से चलाई जा रही हैं। आने वक्त में निश्चित ही मोटर वाहनों को एथेनाल मिश्रण वाले र्इंधन वाले इंजनों से युक्त किया जा सकता है जिससे तेल पर हमारी निर्भरता कुछ कम होगी।

बिजली चालित वाहनों और सौर ऊर्जा पर चल रही जोर-आजमाइश कुछ राहत भरे नतीजे ला सकती है। लेकिन इस पूरे प्रकरण में जो सबसे मुश्किल काम है, वह तकनीक का हस्तांतरण है। जब बिजली कोयले की जगह सौर पैनल लगेंगे तो बराबर मात्रा में बिजली पाने में भारी निवेश और जरूरत के मुकाबले कम उत्पादन के जोखिम को सहना पड़ेगा। इससे आर्थिक विकास की रफ्तार में कमी आ सकती है और फैक्ट्रियों के संचालन की गति धीमी पड़ने से लेकर रोजगार का संकट भी आ सकता है। लेकिन ध्यान रखना होगा कि जब लक्ष्य बड़े हों, धरती को भावी पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखने जैसे उद्देश्य सामने हों तो इन चुनौतियों से हर हाल में निपटने का खतरा उठाना ही होगा।

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