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रोजगार का गहराता संकट

रोजगार की मांग का मोटा हिसाब लगाएं तो देश में इस समय नौकरी चाहने वालों की संख्या छह करोड़ से कम नहीं बैठेगी। जबकि सरकारी अनुमान में यह आंकड़ा तीन करोड़ बैठता है। ये अनुमान सिर्फ पूर्ण बेरोजगारों की संख्या के हैं। अगर बेरोजगारों के सभी प्रकारों को लेखे में लें तो समस्या और ज्यादा बड़ी दिख सकती है।

Author May 30, 2019 1:44 AM
देश में रोजगार मांगने वाले नए युवाओं की संख्या कम से कम डेढ़ करोड़ प्रति वर्ष की रफ्तार से बढ़ रही है।

सुविज्ञा जैन

इस बात पर कोई विवाद नहीं हो सकता कि देश का एक बड़ा तबका जीवन की न्यूनतम आवश्यकताओं के लिए जूझता दिख रहा है। यह भी निर्विवाद है कि बुनियादी जरूरतें पूरी होने का पैमाना नागरिकों की माली हालत है। इसीलिए प्रतिव्यक्ति आय को देश की खुशहाली का पैमाना मान लेने का चलन है। लेकिन इसमें एक विसंगति है। प्रतिव्यक्ति आय देश की कुल आय को देश की आबादी से भाग देकर निकलती है। यानी यह अंदेशा बना रहता है कि कहीं आर्थिक विषमता की स्थिति तो नहीं है। हर नागरिक तक न्यूनतम संसाधन पहुंचाना अगर लोकतंत्र का मुख्य मकसद है और अगर यह बात सर्वमान्य है तो नई सरकार के लिए सबसे पहला काम इसके अलावा और क्या हो सकता है। इसीलिए आज का सवाल यही बनता है कि संसाधनों के समवितरण के इस मकसद को पूरा करने के लिए सरकार क्या करे?

भारत के लिए बेरोजगारी की समस्या कुछ ज्यादा ही गंभीर है। तब तो और ज्यादा जब हम खुद को एक युवा देश बताते हों। हमारी आधी से ज्यादा आबादी पैंतीस साल से कम उम्र के युवाओं की है। हर साल देश की आबादी डेढ़ करोड़ प्रतिवर्ष की रफ्तार से बढ़ती ही जा रही है। उसी रफ्तार से युवा बेरोजगार बढ़ रहे हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था इस समय इतनी बड़ी आबादी को काम-धंधे में खपा पाने में लाचार है। उद्योग जगत नई नौकरियां पैदा नहीं कर पा रहा है। दूसरी ओर, कृषि प्रधान देश में खेती किसानी में रोजगार बढ़ाने की गुंजाइश लगभग खत्म हो चली है। ग्रामीण युवा अब पुश्तैनी खेती छोड़ कर नौकरी या दिहाड़ी मजदूरी की तलाश में गांव से निकल रहे हैं। रही बात शहरों की, तो भले ही डिग्रीधारी शहरी बेरोजगारों के आंकड़े हमारे पास न हों लेकिन सामान्य पर्यवेक्षण के आधार पर कोई भी कह सकता है कि शहरी बेरोजगारी भयावह रूप लेती जा रही है। ऐसे में शहरी और ग्रामीण बेरोजगारी को जोड़ कर हालात देखें तो कोई भी विवाद में नहीं उलझेगा कि यह समस्या सबसे बड़ी है या नहीं। कुछ महीने पहले बेरोजगारी पर एनएसएसओ (नेशनल सैंपल सर्वे कार्यालय) की रिपोर्ट मीडिया में लीक हो जाने के बाद सनसनी फैल गई थी। इस रिपोर्ट से पता चला था कि पिछले साल बेरोजगारी की दर साढ़े चार दशक में सबसे ऊपर पहुंच गई है। यह आंकड़ा छह दशमलव एक फीसद था। अभी सरकार बेरोजगारी दर निकालने के लिए जो फार्मूला लगाती है वह भी जटिल है। चक्कर यह है कि इस फार्मूले में रोजगार पाए लोगों की संख्या, रोजगार चाहने वालों की संख्या और देश में कार्य करने लायक कुल नागरिकों की संख्या को जोड़, घटा, गुणा, भाग करके निकाला जाता है। इस कवायद में यह सवाल पूछने की गुंजाइश ही कम हो जाती है कि क्या रोजगार मांगने वालों की संख्या वाकई उतनी ही है जितनी बेरोजगारों की वास्तविक संख्या है, क्योंकि कृषि प्रधान देश में गांवों की आबादी देश की कुल आबादी की आधी से ज्यादा है। वहां के युवाओं को रोजगार की मांग रखने के तरीके तक नहीं पता। हालांकि इसी रिपोर्ट के मुताबिक एक और आंकड़ा पता चला था। वह यह कि 2017-18 में 18.7 फीसद शहरी युवक और 27.2 फीसद युवतियां नौकरी ढ़ूंढ़ रहे थे। ये युवा पंद्रह से उनतीस साल के थे। गांवों में यह आंकड़ा क्रमश: 17.4 और 13.6 फीसद बताया गया। यानी इस उम्र के पांच युवाओं में एक नौकरी या काम मांग रहा था। इस उम्र के युवाओं की संख्या कम से कम तीस करोड़ बैठती है। इस तरह से छह करोड़ बेरोजगार तो ये युवा ही हो गए। इस दौरान लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन रेट (कार्यबल भागीदारी में कमी) घटने का भी पता चला था। यह दर बताती है कि काम करने लायक उम्र वाली आबादी में काम पाए और काम चाह रहे नागरिकों का अनुपात क्या है। यह दर घट कर 36.9 फीसद रह गई है। इससे यह पता चलता है कि काम करने लायक उम्र के सभी नागरिकों में 63.1 फीसद लोग ऐसे हैं जो किसी काम में नहीं लगे हैं।

बेरोजगारी के हालात का अंदाजा लगाने के लिए तथ्य और भी हैं। मसलन, देश में रोजगार मांगने वाले नए युवाओं की संख्या कम से कम डेढ़ करोड़ प्रति वर्ष की रफ्तार से बढ़ रही है। सही-सही आकलन में मुश्किल यह है कि सरकार कई बार बेरोजगारी के आंकड़े बताने में अपनी असमर्थता जता चुकी है। खुद नीति आयोग ने कबूल किया था कि ये आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। कितने लोग नौकरियां तलाश रहे हैं, इसका काफी कुछ अंदाजा सरकारी नौकरियों में भर्ती की प्रक्रिया देख कर भी लगाया जा सकता है। भर्ती प्रक्रिया को लेकर युवाओं में भारी असंतोष है। हालांकि ये वे ही थोड़े से बेरोजगार युवा हैं जिन्होंने सरकारी नौकरी में भर्ती की प्रक्रिया से अपने को गुजार लिया है और महीनों से नियुक्ति पत्र के इंतजार में हैं। लेकिन वे युवा जो एक पद के लिए हजार पांच सौ की तादाद में आवेदन करते हैं और नौकरी पाने में नाकाम होते हैं, उनकी संख्या करोड़ों में हैं। मसलन, राजस्थान में एक जगह चपरासी के अठारह पदों के लिए अठारह हजार बेरोजगारों के आवेदन आते हैं। ऐसा लगभग हर राज्य में है। ऐसे ही देश के सबसे बड़े सरकारी पदों का चुनाव करने वाली यूपीएससी की परीक्षा में करीब नौ सौ पदों के लिए दस लाख युवा फॉर्म भरते हैं। असंगठित और निजी क्षेत्र में काम ढूंढ़ रहे युवाओं की संख्या का तो हिसाब ही नहीं है। रोजगार की मांग का मोटा हिसाब लगाएं तो देश में इस समय नौकरी चाहने वालों की संख्या छह करोड़ से कम नहीं बैठेगी। जबकि सरकारी अनुमान में यह आंकड़ा तीन करोड़ बैठता है। ये अनुमान सिर्फ पूर्ण बेरोजगारों की संख्या के हैं। अगर बेरोजगारों के सभी प्रकारों को लेखे में लें तो समस्या और ज्यादा बड़ी दिख सकती है।

मोटे तौर पर देश में बेरोजगारी के चार प्रकार हैं। पहला पूर्ण बेरोजगार, दूसरा आंशिक बेरोजगार, तीसरा छद्म रोजगार में लगे बेरोजगार और चौथा- अपनी क्षमता से कम काम पाए बेरोजगार। इन चार प्रकारों में फिलहाल उन्हें छोड़ा भी जा सकता है जो अपनी योग्यता और क्षमता से कम हैसियत का काम हासिल किए हुए हैं। सर्वेक्षणों के अभाव में इसका आकलन करना है भी बड़ा मुश्किल। देश में भयावह बेरोजगारी के इस दौर में उन्हें जैसा भी काम मिला हुआ है वे मन मसोस के कर ही रहे हैं। लेकिन बाकी तीन प्रकारों के बेरोजगारों की हालत हद से ज्यादा खराब है। आंशिक बेरोजगार वे लोग हैं जिन्हें साल में कुछ दिन ही काम मिलता है। वैसे सरकारी आंकड़ों में इन्हें रोजगार पाए लोगों में ही गिन लिया जाता है। प्रबंधन प्रौद्योगिकी की भाषा में छद्म बेरोजगारी वह होती है जिसमें किसी काम में जरूरत से ज्यादा लोग लगे हों। जैसे दो-चार लोगों के लायक काम में आठ-दस लोग लगे हों। जाहिर है, वहां उनके मेहनताने पाने की गुजाइश नहीं होती। भारत का कृषि क्षेत्र इस समय छद्म बेरोजगारी का सबसे बड़ा शिकार है। गांव के करोड़ों युवा मनरेगा जैसी सीमित योजना में काम न मिलने के कारण थोड़ी-थोड़ी अपने परिवार के बड़ों के साथ फिजूल में काम करते पाए जाते हैं। लब्बोलुआब यह है कि बेरोजगारी के सभी प्रकारों को जोड़ कर समस्या इतनी व्यापक है कि वह शहर गांव, महिला पुरुष, युवा प्रौढ़, प्रशिक्षित, शिक्षित अशिक्षित यानी देश के हर वर्ग को अपनी चपेट में लिए हुए है। इसीलिए सरकार की प्राथमिकता की सूची में सबसे ऊपर बेरोजगारी से निपटने का लक्ष्य होना चाहिए।

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