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राजनीतिः बैटरी चालित वाहन ही समाधान

इलेक्ट्रिक वाहनों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनके उपयोग से किसी भी तरह का उत्सर्जन नहीं होता है और न ही ये प्रदूषण का स्तर बढ़ाते हैं। इलेक्ट्रिक गाड़ियां परंपरागत वाहनों की तुलना में लगभग तीन से साढ़े तीन गुना अधिक ऊर्जा कुशल होती हैं। वैश्विक स्तर पर इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने के लिए कई देशों ने साथ मिल कर वर्ष 2030 तक इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री को तीस फीसद तक बढ़ाने के प्रयास का लक्ष्य रखा है।

Author August 1, 2018 3:13 AM
हम जिन गाड़ियों का उपयोग करते हैं, उनके इंजन से निकलने वाला धुआं मोटे तौर पर चार तरह के प्रदूषक फैलाता है।

सौरभ जैन

परिवहन क्षेत्र में होने वाले उत्सर्जन ने भारत में प्रदूषण को बढ़ाया है। यह गंभीर स्थिति है। दुनिया के बीस सबसे प्रदूषित शहरों में चौदह शहर भारत के हैं। ये आंकड़े दुनिया के लिए चिंता का विषय हैं, किंतु सबसे ज्यादा चिंता भारत को करनी है कि इस स्थिति पर नियंत्रण के क्या उपाय किए जाएं? केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2010 तक परिवहन क्षेत्र में एक सौ अट्ठासी मीट्रिक टन कार्बन डाई ऑक्साइड का उत्सर्जन हुआ था। इसमें सड़क परिवहन का योगदान सत्तासी फीसद रहा था। वर्तमान में भारत की तेल आयात करने की निर्भरता लगभग अस्सी फीसद है। परिवहन क्षेत्र तेल का सबसे बड़ा उपभोक्ता वर्ग है। पेट्रोलियम योजना और विश्लेषण इकाई के मुताबिक तेल खपत में डीजल और पेट्रोल क्रमश: चालीस फीसद और तेरह फीसद अपनी भूमिका को निभाते हैं। वर्ष 2014 में परिवहन क्षेत्र से सत्तर फीसद डीजल और सौ फीसद पेट्रोल की मांग की गई थी। अत: स्पष्ट है कि जब परिवहन क्षेत्र में इतनी मात्रा में र्इंधन का उपयोग होगा तो उत्सर्जन के कारण प्रदूषण स्तर में बढ़ोतरी होनी ही है।

हम जिन गाड़ियों का उपयोग करते हैं, उनके इंजन से निकलने वाला धुआं मोटे तौर पर चार तरह के प्रदूषक फैलाता है। कार्बन मोनोक्साइड, हाइड्रोकार्बन, नाइट्रोजन ऑक्साइड और पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) यानी ठोस कण। पेट्रोल इंजन कार्बन मोनोक्साइड और हाइड्रोकार्बन का उत्सर्जन ज्यादा करते हैं और डीजल इंजन नाइट्रोजन ऑक्साइड और ठोस कणों का उत्सर्जन करते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भारत स्टैंडर्ड-3 अर्थात बीएस-3 वाहनों की बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया है। इसके स्थान पर बीएस-4 मानक वाले वाहनों की ही बिक्री हो रही है। तात्पर्य यह है कि बीएस-4 इंजन से पर्यावरण को बीएस-3 इंजन के मुकाबले कम नुकसान हो। चूंकि र्इंधन का उपयोग हो रहा है तो प्रदूषण होना स्वाभाविक है, किंतु उसकी मात्रा को कम किए जाने का प्रयास इस माध्यम से पहले किया गया है।

वर्तमान में सबसे बड़ा संकट उत्सर्जन से होने वाले पर्यावरण प्रदूषण को रोकने और एक विकल्प खोजने का है जिससे र्इंधन के आयात को भी कम किया जा सके और वायु प्रदूषण से बचा जा सके। इस दिशा में एक विकल्प के रूप में इथेनॉल का प्रयोग भी पेट्रोल और डीजल की निर्भरता को कम कर सकता है। पेट्रोल और डीजल की दिनों-दिन बढ़ रही कीमतों के बीच वैकल्पिक र्इंधन के रूप में इथेनॉल का प्रयोग करने से प्रदूषण पर तो लगाम लगेगी ही, साथ ही इथेनॉल वर्तमान में उपलब्ध र्इंधनों से कम से कम तीस फीसद सस्ता होने के कारण आम उपभोक्ताओं को बड़ी राहत दिला सकता है। ऊर्जा के क्षेत्र में इथेनॉल का इस्तेमाल पर्यावरण को बचाने में वरदान साबित हो सकता है। नीति आयोग के अनुसार, इथेनॉल का इस्तेमाल करने पर अगले पांच-सात वर्षों में डीजल की खपत में कम से कम बीस फीसद तक की कमी की जा सकती है जिससे सालाना छब्बीस हजार करोड़ रुपए की बचत होने का अनुमान है।

इथेनॉल हाइड्रोजन आधारित र्इंधन है, जिसे प्राकृतिक गैस, कोयला, बायोमास, शहरों के ठोस कचरे, कार्बन डाईऑक्साइड से बनाया जा सकता है। इथेनॉल डीजल का विकल्प भी बन सकता है। इसे रसोई गैस और पेट्रोल में मिला कर उनकी कीमत भी कम की जा सकती है और विमानों के परिचालन में भी इसका उपयोग हो सकता है। चीन, इटली, स्वीडन, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, इजराइल, जापान और कई यूरोपीय देशों में इथेनॉल का उपयोग किया जा रहा है। चीन में तो परिवहन क्षेत्र में दस फीसद इथेनॉल का उपयोग हो रहा है। पेट्रोल में यदि पंद्रह फीसद इथेनॉल मिलाया जाता है तो इससे प्रदूषण तैंतीस फीसद कम होता है। यदि डीजल के स्थान पर इसका उपयोग किया जाता है, तो अस्सी फीसद प्रदूषण कम हो सकता है। रसोई गैस में इथेनॉल मिला कर सालाना छह हजार करोड़ रुपए की बचत हो सकती है। शहरी क्षेत्र में वाहनों के कारण करीब चालीस फीसद या उससे भी अधिक प्रदूषण होता है।

इस दिशा में दूसरा सबसे सशक्त उपाय इलेक्ट्रिक वाहनों का उपयोग है। इलेक्ट्रिक वाहन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनके उपयोग से किसी भी तरह का उत्सर्जन नहीं होता है और न ही ये प्रदूषण का स्तर बढ़ाते हैं। इलेक्ट्रिक गाड़ियां परंपरागत वाहनों की तुलना में लगभग तीन से साढ़े तीन गुना अधिक ऊर्जा कुशल होती हैं। वैश्विक स्तर पर इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने के लिए कई देशों ने साथ मिल कर वर्ष 2030 तक इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री को तीस फीसद तक बढ़ाने के प्रयास का लक्ष्य रखा है। नीदरलैंड, आयरलैंड और नार्वे सहित कुछ देश तो ऐसे हैं जिन्होंने सार्वजनिक यातायात के रूप में सौ फीसद इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री का लक्ष्य रखा है।

भारत भी इलेक्ट्रिक वाहनों के इस्तेमाल की दिशा में कदम उठा रहा है। राष्ट्रीय इलेक्ट्रिक मॉबिलिटी मिशन प्लान (एनईएमएमपी) और फेम इंडिया (एफएएम) जैसी पहल भी भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों के बाजार का निर्माण करने के प्रयास के तौर पर की जा रही है। इस प्रयास में सहायता देने के लिए भारी उद्योग विभाग, भारतीय मानक ब्यूरो, ऑटोमोटिव रिसर्च ऐसोसिएशन इलेक्ट्रिक वाहनों के आपूर्ति उपकरण की डिजाइन और निर्माण के मजबूत बुनियादी ढांचे और तकनीकी मानक की स्थापना की दिशा में तेजी से काम कर रहे हैं। कर्नाटक अपनी इलेक्ट्रिक वाहन नीति-2017 जारी कर चुका है। बाकी राज्य भी इस दिशा में सक्रिय हैं। हालांकि इलेक्ट्रिक वाहन का व्यवस्थित उपयोग तब ही संभव हो पाएगा, जब सक्षम शहरी नियोजन, परिवहन और बिजली क्षेत्रों के बीच बेहतर तालमेल बने।

इन सब प्रयासों के बावजूद भारत में कई समस्याएं हैं, जो इलेक्टिक वाहनों को बढ़ावा देने में बड़ी बाधाएं हैं। तकनीकी और भौतिक समस्याओं का सबसे ज्यादा प्रभाव इलेक्ट्रिक वाहनों के क्षेत्र में महसूस हो रहा है। इसके अलावा देश के बिजली ग्रिड वाहनों के लिए बिजली संबंधी जरूरतें पूरी कर पाने में सक्षम नहीं हैं। बैटरी निर्माण में प्रयुक्त होने वाले पदार्थ जैसे लिथियम, निकल, कोबाल्ट, ग्रेफाइट का आयात करना पड़ता है। भारत में लिथियम का बहुत कम ज्ञात भंडार है। इन समस्याओं का प्रभाव इलेक्ट्रिक वाहनों को बनाने वाले संयंत्रों पर पड़ेगा। इसलिए कच्चे माल की आपूर्ति सुनिश्चित करने की जरूरत है। जब तक तकनीक के क्षेत्र में आ रही समस्याओं का समाधान नहीं किया जाता, तब तक इलेक्ट्रिक वाहनों की दिशा में बढ़ने का सपना साकार नहीं हो पाएगा। हालांकि भारत इस दिशा में तेजी से प्रयास कर भी रहा है। भारत और फ्रांस ने अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन जैसे संगठन की शुरुआत की है। इस संगठन के सदस्य राष्ट्र जैसे- आस्ट्रेलिया, चिली, ब्राजील, घाना और तंजानिया में लिथियम का भंडार है। ये देश भारत को कच्चे माल की आपूर्ति कर सकते हैं।

देश में भी सरकारी स्तर पर इलेक्ट्रिक वाहनों के प्रयोग को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने सरकारी कुनबे में इलेक्ट्रिक कारों का उपयोग करने की बात कही है। बिजली मंत्रालय भी इलेक्ट्रिक वाहनों के बैटरी चार्जिंग स्टेशनों के लिए लाइसेंस लेने के प्रावधान को नकार चुका है। इससे भी देश में इलेक्ट्रिक वाहनों के उपयोग को बल मिलने की संभावना है। कई वाहन निर्माता कंपनियां भी इस दिशा में प्रयत्नशील हैं और आने वाले समय में इलेक्ट्रिक कारों के प्रयोग के बढ़ने की पूरी संभावना है। एक कार निर्माता कंपनी का अनुमान है कि वर्ष 2030 तक देश में सारी गाड़ियां इलेक्ट्रिक ही होंगी। उम्मीद है कि यह अनुमान सही साबित हो, क्योंकि वायु प्रदूषण के कारण देश में सालाना चार लाख लोगों की मौत होती है। वायु प्रदूषण के बढ़ते प्रभावों से उत्पन्न समस्याओं के समाधान हेतु यह जरूरी भी है।

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