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शिक्षा, शिक्षक और मानकीकरण

नई शिक्षा नीति शिक्षा व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन की मांग करती हुई प्रतीत होती है।

नवनीत शर्मा

विकासशील देशों में शिक्षा और उसके मानकीकरण की मांग प्राय: इसके सहारे मानकीकृत समाज अथवा विकसित राष्ट्रों की कतार में पहुंचने की ललक है। शिक्षण व्यवसाय का मानकीकरण इसका पहला चरण बनता है, जिसके अनुरूप राष्ट्र के विकास में सबसे बड़े बाधक वे अध्यापक हैं जो नागरिकों को ‘मानव संसाधन विकास’ में पर्याप्त योगदान नहीं कर रहे हैं।

नई शिक्षा नीति शिक्षा व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन की मांग करती हुई प्रतीत होती है। यह कई बदलावों को सुझाते हुए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए गुणवान शिक्षक का होना परमावश्यक मानती है। गुणवत्ता से परिपूर्ण शिक्षक के लिए एक मानक निर्धारित करता हुआ दस्तावेज तैयार किया जाए, ऐसी संस्तुति इसी नीति नियामक दस्तावेज का योगदान है। इसी संस्तुति पर पूरे राष्ट्र के लिए एक खाका राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद ने आनन-फानन में तैयार किया। इसमें दावा किया गया है कि इसका निर्माण सभी विद्यार्थियों को उच्चतम गुणवत्ता की शिक्षा के न्याय संगत अवसर उपलब्ध करवाने के नई शिक्षा नीति के उद्देश्य की पूर्ति के लिए किया गया है।

गुणवत्ता की अवधारणा मानकीकरण की अवधारणा की पूर्ववर्ती रही होगी। यह एक समान उच्च स्तरीय व्यवहार या संसाधनों के बंटवारे को लेकर पनपी होगी। मानव व्यवहार की भिन्नता और विकट संभावनाओं के चलते मानक या मानकीकरण की अवधारणा सामाजिक बर्ताव और कौशल पर सिमट गई होगी। मशीन और मशीनीकरण के विकास ने ही मानक और मानकीकरण की अवधारणा को स्थापित किया है।

माना जाता है कि एक जैसा उत्पाद और निरंतर उसी स्तर पर उत्पादन की मशीनी क्षमता ने ही मानकीकरण और उसके अपरिहार्य होने की अवधारणा को पुष्ट किया। प्रेशर कुकर से लेकर मशीन से तैयार स्वेटर का तो मानक हो सकता है, लेकिन कलाकृति रचने से लेकर हाथ से स्वेटर बुनने में यदि हम मानक खोजेंगे और स्थापित करेंगे, तो यह इस उपक्रम के साथ शायद ही न्याय संगत हो।

अध्यापन की प्रक्रिया भी इतने मानवीय संदर्भों से होकर गुजरती है कि उसे एक मशीनीकृत अपराध नहीं माना जा सकता। विद्यार्थी, उसकी सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और भाषायी पृष्ठभूमि, पाठ्यक्रम, पाठ्यवस्तु, जानने के उद्देश्य और मूल्यांकन के साथ ही अध्यापक के सरोकार, उसकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि, विषय, अध्यापन पूर्व प्रशिक्षण और तैयारी आदि इतने सारे सोपान हैं जिनका एक सार होना न तो संभव है, न ही वांछनीय। अध्यापन और मतांतरण का अंतर भी हमें इसके मानक तय करने से लेकर हतोत्साहित ही करेगा। अध्यापन अज्ञात से ज्ञात अथवा सहज से विशिष्ट की छात्र की ज्ञान निर्मिती यात्रा में सहायता करने की प्रक्रिया है, तो उसके मानक शायद ही किसी सार्वभौमिक चरित्र के हो सकते हैं।

विकासशील देशों में शिक्षा और उसके मानकीकरण की मांग प्राय: इसके सहारे मानकीकृत समाज अथवा विकसित राष्ट्रों की कतार में पहुंचने की ललक है। शिक्षण व्यवसाय का मानकीकरण इसका पहला चरण बनता है, जिसके अनुरूप राष्ट्र के विकास में सबसे बड़े बाधक वे अध्यापक हैं जो नागरिकों को ‘मानव संसाधन विकास’ में पर्याप्त योगदान नहीं कर रहे हैं।

आंकड़ों के हवाले से भारतीय संदर्भ में क्रमश: पूर्व प्राथमिक स्तर पर 71.7 प्रतिशत, प्राथमिक स्तर पर 40.6 प्रतिशत और उच्च प्राथमिक स्तर पर 31.3 प्रतिशत अध्यापक अपनी आवश्यक योग्यताओं को पूरा नहीं करते। इसका सीधा संबंध विद्यार्थियों के सीखने की क्षमता पर पड़ता है और वे सामान्य ज्ञान, लेखन और गणना से भी वंचित रह जाते हैं। इन्हीं को आधार बना कर शिक्षक और शिक्षण के मानकीकरण की मांग की जाती है। इस आंकड़े के साथ यह भी जोड़ा जाना चाहिए कि इन ‘अयोग्य’ अध्यापकों की संख्या का बड़ा हिस्सा निजी एवं गैर सहायता प्राप्त विद्यालयों में अध्यापनरत है।

शिक्षा के निजीकरण के तमाम प्रयासों में ऐसा सरकारी दस्तावेज जो मानक सुनिश्चित करने के लिए हो, शायद ही निजीकरण की आर्थिकी में कारगर हो। भारत में वर्तमान में पंद्रह लाख विद्यालय हैं, जिनमें से ग्यारह लाख सरकारी हैं। ‘अयोग्य’ अध्यापकों का बड़ा संख्याबल उन चार लाख निजी विद्यालयों में पढ़ा रहा है जिन पर किसी भी तरह का सरकारी नियंत्रण अथवा अंकुश एक हस्तक्षेप की तरह उनकी निज स्वायत्तता पर हमला माना जाएगा। सरकारी स्कूलों में भी इस दस्तावेज को किस तरह क्रियान्वित किया जाएगा, यह भी एक भिन्न यक्ष प्रश्न है।

यह दस्तावेज पुरजोर तरीके से नव नियुक्त अध्यापकों की उनके वरिष्ठ अध्यापकों द्वारा मार्गदर्शन की वकालत करता है। परंतु सरकारी आंकड़ों के हवाले से ही भारत में लगभग एक लाख दस हजार स्कूल ऐसे हैं जहां पर एक ही अध्यापक है। यह अध्यापक किसको और किसके द्वारा मार्ग निर्देशित होगा, यह विकट प्रश्न है।

लिंगानुपात के आंकड़े से देखा जाए तो प्राथमिक स्तर पर सौ पुरुष अध्यापकों पर पचहत्तर महिला अध्यापक एवं माध्यमिक स्तर पर साठ महिला अध्यापक हैं। इन अध्यापिकाओं का मार्ग निर्देशन और तरक्की पुरुष अध्यापकों के जिम्मे हो जाएगी। यह दस्तावेज मान कर चल रहा है कि अध्यापकों में लैंगिक पूर्वाग्रह नहीं होते, न ही शोषण की नई पटकथा लिखे जाने की कोई संभावना है।

यह आंकड़ा तो कुछ राज्यों में बहुत विकट है, उदाहरणत: बिहार में तो प्रत्येक सौ पुरुषों पर मात्र बीस महिला अध्यापक हैं। इसी तरह जातीय समीकरणों में भी सत्तावन प्रतिशत सामान्य वर्ग के आने वाले अध्यापक मात्र आठ प्रतिशत दलित अध्यापकों का बड़ी सहृदयता से ज्ञान संवर्धन एवं मार्ग निर्देशन करेंगे। यह शायद उस व्यवस्था में भले ही काम करता जिसके कोई सामाजिक-आर्थिक निष्पत्ति न हो, परंतु इस तरह के प्रयास विद्यालयों में एक नए तरह का वर्गानुक्रम एवं वर्णानुक्रम रखेंगे, यह तय है।

अध्यापक अपने व्यावसायिक जीवन में कैसे बढ़ेगा, इसके निश्चय में यह दस्तावेज सुझाता है कि प्राथमिक से माध्यमिक और माध्यमिक से उच्च माध्यमिक अध्यापक होने की जगह प्रत्येक स्तर पर ही तरक्की के पदानुक्रम होने चाहिए। यह दस्तावेज प्रत्येक स्तर पर प्रगामी, प्रवीण, कुशल और मुख्य अध्यापक के क्रम को सुझाता है। उदाहरणत: यदि कोई प्राथमिक अध्यापक बनता है तो वह हमेशा प्राथमिक अध्यापक ही रहेगा। वेतनमान की चर्चा न भी की जाए, तो उच्च माध्यमिक स्तर पर अध्यापक बनने की शैक्षणिक योग्यता प्राथमिक स्तर के प्रगामी स्तर से तो भिन्न ही होगी।

क्या प्राथमिक मुख्य शिक्षक का वेतन कुशल उच्च माध्यमिक अध्यापक की वेतन से अधिक होगा? ऐसे गंभीर प्रश्नों का समाधान इस दस्तावेज में देखने को नहीं मिलता। अध्यापकों की विषय वार भिन्नता को भी सिरे से नजरअंदाज करता है। उदाहरणत: प्रत्येक स्कूल में शारीरिक शिक्षा, संगीत, कला, इतिहास इत्यादि के एक ही अध्यापक होंगे, इस परिस्थिति में वह कौन मुख्य शिक्षक होगा जो नए अध्यापक का हाथ थामेगा? क्या इन विषयों के अध्यापकों का मार्ग निर्देशन गणित अथवा विज्ञान के अध्यापकों से करवाया जाएगा?

अध्यापक एवं अध्यापन के मानकीकरण से पूर्व स्कूल और ज्ञान से संस्थायीकरण के मानक तय किए जाने चाहिए। केंद्रीय विद्यालय और नगर निगम के विद्यालय अथवा ग्रामीण विद्यालय के संसाधन और ढांचागत अंतर को पाटने वाले मानक तैयार किए जाने चाहिए, पाठ्यक्रम निर्माण और मूल्यांकन के मानक और अध्यापकों की चयन प्रक्रिया उनके वेतनमान और सेवा शर्तों के मानक तय किए जाने चाहिए। इन सबकी अनुपस्थिति में अध्यापक और अध्यापन के मानक थोथे ही रहेंगे और नई विसंगतियों को जन्म देंगे।

यह सब होने के बाद ही उस ज्ञान मीमांसा के प्रश्न पर पहुंचा जा सकता है जिसके अंतर्गत ये सवाल हैं कि क्या शिक्षा के मानक और मानकीकरण क्या गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की सुलभता से भिन्न है अथवा गुणवत्ता और मानक क्या मानवीय अभियोजन पर पूर्णत: लागू हो पाएंगे, क्या यह सभी क्रिकेट खेलने वालों से सचिन तेंदुलकर जैसा ही होने / बनने की अपेक्षा नहीं है? भारतीय ज्ञान परंपरा के आलोक में यदि सभी अध्यापक द्रोणाचार्य हो गए तो सावित्रीबाई फुले कौन बनेगा? अंतत: यदि गुरु ‘गोविंद’ है तो क्या मनुष्य अब ‘गोविंद’ के मानक तय करेंगे, अध्यापक और अध्यापन की वृत्ति दोनों एक आंतरिक प्रतिबलन से पनपती है जिसमें आस्था आवश्यक है न कि मानकीकरण।

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