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दुनिया मेरे आगेः शिक्षा की सूरत

कुछ समय पहले हमारी कक्षा में एक विषय पर कई दिनों तक विवाद रहा कि किसी देश का विकास वहां की शिक्षा से संभव है या वहां की सशक्त सेना से!

Author Published on: September 19, 2018 4:46 AM
देश के नागरिकों के विकास का मूल आधार शिक्षा है। शहरों के निजी स्कूलों और शिक्षा के स्तर को देख कर शायद कुछ तय नहीं किया जा सकता।

जीनत

कुछ समय पहले हमारी कक्षा में एक विषय पर कई दिनों तक विवाद रहा कि किसी देश का विकास वहां की शिक्षा से संभव है या वहां की सशक्त सेना से! मेरे मन में यह सवाल लगातार कौंधता रहा कि अगर सशक्त सेना से देश का विकास संभव है तो हमारा देश अभी भी भुखमरी, गरीबी और बेरोजगारी की चपेट में क्यों है! अगर ऐसा है तो यह कैसे संभव है कि पिछले ढाई-तीन दशकों के दौरान कुछ लोग लगभग चार हजार करोड़ की लागत से बने घर तक पहुंच गए और देश के तमाम जनजातीय समूहों की दशा लगातार खराब होती गई है। उन परिवारों को कैसे देखेंगे जिनमें बच्चों की पढ़ाई-लिखाई तो दूर, सबके लिए दो जून की रोटी का इंतजाम आज भी मुश्किल बना हुआ है। सरकारी उदासीनता के कारण हालत यह है कि विकास का मूल आधार अधर में लटकने लगा है। सवाल है कि जिस देश में एक बड़ी आबादी अनपढ़ रहेगी, उसके विकास की उम्मीद कैसे की जा सकती है।

देश के नागरिकों के विकास का मूल आधार शिक्षा है। शहरों के निजी स्कूलों और शिक्षा के स्तर को देख कर शायद कुछ तय नहीं किया जा सकता। भारत का निर्माण सिर्फ चार महानगरों के संयोग से नहीं होता, बल्कि उनतीस राज्यों और सात केंद्र शासित प्रदेशों के पिछड़े इलाकों से होता है, जहां ऐसे तमाम स्कूल हैं, जिनमें एक ही शिक्षक पहली से पांचवीं कक्षा को सालों से पढ़ा रहा है। दूसरी ओर, भावनात्मक मुद्दों के बरक्स वास्तविक विकास के सारे सवाल हाशिये पर दिख रहे हैं। लेकिन यह सब क्यों है, इसे समझने के लिए हमें बेहतर शिक्षा की जरूरत है। लेकिन अच्छी गुणवत्ता वाली शिक्षा उपलब्ध कराने में हमारी तमाम सरकारें नाकाम और उदासीन रही हैं। आज जरूरी मुद्दों पर आम लोगों की समझ का साफ नहीं हो पाना कमजोर और कम गुणवत्ता वाली शिक्षा का ही परिणाम है।

ऐसे मामले आम हैं, जहां किसी मशहूर और सबसे अच्छे माने जाने वाले शिक्षा संस्थान में पढ़ने आए बहुत सारे विद्यार्थियों की समझ बच्चे की तरह होती है। मैं जानना चाहती हूं कि देश की शिक्षा व्यवस्था विद्यार्थियों का मानसिक विकास करने के मामले में क्यों पीछे हट जाती है। क्या यह तय करना उसकी जिम्मेदारी नहीं है कि किताबों में जो बात कही गई है, उसके मायने क्या हैं और उसे किताब में शामिल करने का कारण क्या है? हम अपने जीवन में उसे कैसे लागू करें? आखिर इन चीजों के पीछे कैसी दोहरी मानसिकता काम करती है? या फिर क्या जानबूझ कर मस्तिष्क की किसी नस को दबा दिया गया है? शिक्षा के मुद्दे को उठाया तो जा रहा है, लेकिन उसके सफल होने की कोई गारंटी नहीं है। आज गांवों और शहरों में भी यह मानसिकता बनने लगी है कि पढ़ने से आखिर होगा क्या! पढ़ कर भी बच्चे कलेक्टर नहीं बन पाएंगे तो इसके पीछे समय बर्बाद करके क्या लाभ! शायद यह वजह भी है कि ग्रामीण इलाकों में मां-बाप बच्चों की पढ़ाई बीच में ही छुड़वा देते हैं।

दरअसल, अपने बच्चों को प्रारंभिक शिक्षा के लिए मां-पिता इस उम्मीद से भेजते हैं कि उन्हें अपना नाम लिखना तो आ ही जाएगा। लेकिन ऐसा सोचने वाले लोगों को मेरा एक सुझाव है कि उच्च स्तर की शिक्षा की आवश्यकता सब जगह होती है। इस ओर सरकारों की उदासीनता जगजाहिर रही है। मेरी समझ के मुताबिक अगर ऐसा ही चलता रहा तो फिर इस तरह की बहसों का होना और उसमें इस बात पर अड़ जाना ताज्जुब की बात नहीं होगी कि देश के विकास के कारकों में सेना का सशक्त का होना अकेला सबसे महत्त्वपूर्ण कारक है। अंदाजा लगाया जा सकता है कि ऐसी राय रखने वाले विद्यार्थी कल के शिक्षक बनेंगे तो उनसे पढ़ने वाले विद्यार्थियों को ज्ञान के रूप में क्या मिलेगा।

सच यह है कि स्कूलों या शिक्षा संस्थानों का निर्माण किया गया है, लेकिन उनमें से ज्यादातर सिर्फ औपचारिकता निभा रहे हैं। केवल आंकड़ों में विकास को दिखाने का काम चल रहा है। आज बात की जा रही है कक्षा को ‘स्मार्ट क्लास’ में बदलने की। तो यह जानना आवश्यक है कि इसके जरिए कितने स्कूलों को ‘स्मार्ट क्लास’ में बदला जा सकेगा। विकास का पैमाना केवल दिल्ली या मुंबई नहीं, बल्कि इसके इतर भी है। केवल दिल्ली के बाहरी इलाकों में जाने पर पता चलता है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था कैसी है।

मुझे अक्सर ऐसा लगता है कि आने वाले दिनों में ‘स्मार्ट शिक्षा’ का पैमाना यह माना जाएगा कि शिक्षक की आवश्यकता नहीं होगी, केवल पेनड्राइव से काम चल जाएगा। महानगरों में शिक्षा डिजिटल रूप से चलेगी। फिलहाल चल रहे स्कूलों-कॉलज केवल आंकड़े को बढ़ा रहे हैं। सत्र पूरा कब होगा, उसकी परीक्षाएं कब होंगी, यह तक सुनिश्चित नहीं हो पा रहा है। दावा था कि शिक्षा में गुणवत्ता निजीकरण से बढ़ेगी, लेकिन सच यह है कि हालात में और ज्यादा गिरावट दर्ज की जा रही है।

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