ताज़ा खबर
 

विकास में भ्रष्टाचार का हिस्सा

धर्मेंद्रपाल सिंह यह बात काफी पहले पता चल चुकी थी कि उदारीकरण का दौर शुरू होने के बाद से देश में अमीरों और गरीबों के बीच की खाई निरंतर चौड़ी होती जा रही है। ग्लोबल वेल्थ डाटा बैंक की ताजा रिपोर्ट (2014) से कुछ और चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। पता चला है कि […]

Author December 20, 2014 1:22 PM

धर्मेंद्रपाल सिंह

यह बात काफी पहले पता चल चुकी थी कि उदारीकरण का दौर शुरू होने के बाद से देश में अमीरों और गरीबों के बीच की खाई निरंतर चौड़ी होती जा रही है। ग्लोबल वेल्थ डाटा बैंक की ताजा रिपोर्ट (2014) से कुछ और चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। पता चला है कि देश की कुल संपत्ति में भारत की सबसे गरीब आबादी का हिस्सा महज 0.2 प्रतिशत है, जबकि संपन्न दस फीसद लोगों के पास चौहत्तर फीसद संपत्ति है। सर्वाधिक अमीर एक प्रतिशत यानी लगभग सवा करोड़ लोग राष्ट्र की आधी संपत्ति के मालिक हैं। सन 2000 में देश के दस प्रतिशत अमीरों के पास 65.90 प्रतिशत संपत्ति थी। यानी पिछले चौदह बरस में उनकी धन-दौलत में लगभग आठ फीसद इजाफा हुआ है। इस तरह पिछले दो दशक में हुए तेज आर्थिक विकास का ज्यादा लाभ प्रभावशाली और अमीर जमात को ही पहुंचा है। यह स्थिति तब है जबकि दुनिया की कुल कंगाल (गरीबी रेखा से नीचे) आबादी का बीस प्रतिशत हिस्सा अकेले हिंदुस्तान में रहता है।

इस कड़वे सच को सामने रख कर ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘मेक इन इंडिया’ नारे पर विचार किया जाना चाहिए। भारत को बतौर ‘मैन्युफैक्चरिंग हब’ बनाने के लिए मोदी सरकार ने अपनी प्राथमिकता सूची जारी की है। इसमें पच्चीस क्षेत्रों की निशानदेही की गई है, जिनमें चौदह उद्योगों से जुड़े हैं, पांच सेवा क्षेत्र, चार परिवहन क्षेत्र और दो बायोटेक्नोलॉजी और अंतरिक्ष से ताल्लुक रखते हैं। सरकारी वेबसाइट पर पूरी सूची तो है, लेकिन यह नहीं बताया गया है कि तय लक्ष्य अर्जित करने के लिए क्या रणनीति अपनाई जाएगी और उस पर कैसे अमल होगा।

वैसे ध्यान से देखने पर मोदी और मनमोहन सिंह सरकार की औद्योगिक नीति में कोई मूल भेद नहीं दिखता। दोनों का खुली अर्थव्यवस्था में अटूट विश्वास है और दोनों पश्चिम की आर्थिक नीतियों की अंधसमर्थक हैं। दोनों का मानना है कि तेज आर्थिक विकास के भरोसे ही गरीबी से लड़ा जा सकता है। इस लक्ष्य को अर्जित करने के लिए यूपीए सरकार के शासनकाल में विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) का शिगूफा छोड़ा गया था। सन 2005 में सेज एक्ट लाया गया और अगले वर्ष से इस पर अमल शुरू हो गया। लोगों को सपना दिखाया गया कि चीन की तर्ज पर हिंदुस्तान में भी विशेष आर्थिक क्षेत्र बनेंगे। वहां बड़े पैमाने पर उत्पादन होगा, अरबों डॉलर का माल निर्यात होगा, खरबों डॉलर का विदेशी पूंजी निवेश होगा और लाखों लोगों को रोजगार मिलेगा। इस महत्त्वाकांक्षी योजना के नाम पर देश भर के लाखों किसानों से हजारों एकड़ जमीन जबरन हड़प ली गई। पूरे देश में छह सौ पैंतीस सेज को मान्यता दी गई, लेकिन अधिसूचित हुए केवल आधे (तीन सौ बानबे) से कुछ अधिक। महज एक सौ बावन पर काम शुरू हुआ, जिनमें से ज्यादातर सूचना और प्रौद्योगिकी क्षेत्र से जुड़े थे।

हाल ही में संसद के पटल पर सेज से जुडी नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट रखी गई है। इसने समस्त सरकारी दावों की धज्जियां उड़ा कर रख दी है। बताया गया है कि वर्ष 2007-2013 के बीच सेज के नाम पर सरकार से औद्योगिक घरानों ने तिरासी हजार एक सौ चार करोड़ रुपए की सुविधाएं तो ले लीं, लेकिन बदले में काम न के बराबर हुआ। कॉरपोरेट जगत ने दावा किया था कि सेज की बदौलत लगभग चालीस लाख नए रोजगार सृजित होंगे, जबकि हकीकत यह है कि लक्ष्य के मुकाबले मात्र आठ प्रतिशत (दो लाख चौरासी हजार सात सौ पचासी) नई नौकरियां आर्इं। रिपोर्ट से पता चलता है कि कई औद्योगिक घरानों ने तिकड़म कर सेज के नाम पर ली गई जमीन का भूमि उपयोग बदलवा कर भारी मुनाफा कमाया। अब सरकार को इस रिपोर्ट का बारीकी से अध्ययन कर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए। साथ ही भविष्य के लिए नियम-कायदे दुरुस्त किए जाना भी जरूरी है।

पिछले कुछ बरस में हुए 2-जी, कोयला घोटालों और अब सेज के खुलासे से पता चलता है कि देश का पूरा अर्थतंत्र कितना सड़ चुका है। इस खराब स्थिति के लिए नेताओं और अफसरों के साथ-साथ उद्योग और कॉरपोरेट घराने भी दोषी हैं, जो अपने लाभ के लिए भ्रष्टाचार को बढ़ावा देते हैं। आर्गेनाईजेशन फॉर इकनॉमिक कोआपरेशन ऐंड डेवलपमेंट (ओइसीडी) की रिपोर्ट के अनुसार कर चोरी के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियां आंतरिक ऋण और जटिल वित्तीय व्यवस्था का सहारा लेती हैं। ग्लोबल फाइनेंशियल इंटीग्रीटी रिपोर्ट (दिसंबर, 2013) के अनुसार औद्योगिक घरानों की कर चोरी से भारत में साठ प्रतिशत काला धन पैदा होता है।

भ्रष्टाचार और राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण ही आज बैंकिंग क्षेत्र लहूलुहान है। पिछले चार साल में सार्वजनिक बैंकों की अनुत्पादक परिसंपत्तियों (एनपीए) में चार गुना इजाफा हो चुका है। अकेले सन 2012-13 में बैंकों के 1.64 लाख करोड़ रुपए फंसे पड़े थे, जो कोयला खदान अबंटन और 2-जी घोटाले की रकम को टक्कर देते हैं। फिलहाल बैंकों के पास जनता का कुल अठहत्तर लाख सड़सठ हजार नौ सौ सत्तर करोड़ रुपया जमा है, जिसमें से साठ लाख छत्तीस हजार अस्सी करोड़ रुपए उन्होंने बतौर कर्ज दे रखा है। कर्जे का बड़ा भाग कॉरपोरेट घरानों और बड़े उद्योगों के पास है।

अनेक बड़े उद्योगों ने बैंकों से अरबों रुपए का ऋण ले रखा है, जिसे वे लौटा नहीं रहे हैं। इसी कारण बैंकों की एनपीए 4.4 फीसद के खतरनाक स्तर पर पहुंच चुकी है। आल इंडिया बैंक एम्पलाइज एसोसिएशन ने एक सूची जारी की, जिसमें एक करोड़ रुपए से ज्यादा रकम के चार सौ छह बकायादारों के नाम हैं। इस सूची में अनेक प्रतिष्ठित लोग और संगठन हैं।

बैंकों में आम जनता का पैसा होता है, लेकिन जब बकायादार कई साल तक कर्ज नहीं लौटाता तब बैंक उसे बट््टेखाते में डाल देते हैं। कर्ज डूबने का अर्थ आम आदमी के पेट पर लात मारना है। पिछले पांच वर्ष में बैंक दो लाख चार हजार पांच सौ उनचास करोड़ रुपए के कर्ज को बट््टेखाते में डाल चुके हैं। इसका अर्थ है कि हर साल बैंकों का चार खरब से ज्यादा पैसा डूब जाता है। गरीबों को दी जा रही सब्सिडी पर शोर मचाने वाली जमात बरसों से हो रहे इस महाघोटाले पर मौन क्यों है? सार्वजनिक बैंक किसान, मजदूर या अन्य गरीब वर्ग को कर्ज देते समय कड़ी शर्त लगाते और वसूली बेदर्दी से करते हैं। लेकिन जिन बड़े घरानों पर अरबों रुपए की उधारी है, उनसे नरमी बरती जाती है। बैंक अपने बड़े खाता धारकों की जालसाजी बताने में हिचकते हैं। ऋण पुनर्निर्धारित कर उन्हें बचाने का प्रयास किया जाता है।

बैंक में जालसाजी के बढ़ते मामले, इस बात का प्रमाण हैं कि यह धंधा सुनियोजित है। पिछले तीन साल में गलत कर्ज मंजूरी और जालसाजी से बैंकों को बाईस हजार सात सौ तैंतालीस करोड़ रुपए का चूना लग चुका है। मतलब कि हर दिन बैंकों का 20.76 करोड़ रुपए डूब जाता है। इस दौरान जालसाजी और पद दुरुपयोग के आरोप में छह हजार कर्मचारियों को निलंबित किया जा चुका है। यानी हर दिन पांच से ज्यादा कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई हुई है। इन कर्मचारियों में बैंक अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक तक शामिल हैं।

एक बार फिर अमीरों और गरीबों के बीच की बढ़ती खाई पर लौटते हैं। फोर्ब्स की ताजा सूची के मुताबिक हमारे देश में अरबपतियों की सूची पहली बार सौ से ऊपर पहुंच गई है। इसमें रिलायंस समूह के मालिक मुकेश अंबानी का नाम सबसे ऊपर है। उनकी दौलत 23.6 अरब डॉलर (14.16 खरब रुपए) है। महज एक साल में उनकी संपत्ति में 2.6 अरब डॉलर (1.56 खरब रुपए) का इजाफा हुआ है। गुजरात के उद्योगपति गौतम अडानी एक साल में ग्यारह स्थान की छलांग लगा कर ग्यारहवें स्थान पर आ गए हैं। उनकी दौलत एक वर्ष में 2.6 अरब डॉलर (1.56 खरब रुपए) की वृद्धि के साथ 7.1 अरब डॉलर (4.26 खरब रुपए) हो गई है। जब देश मंदी के दौर से गुजर रहा हो तब अरबपतियों की संपत्ति में भारी इजाफा चौंकाता है। भारतीय कुबेरों की फेहरिस्त के साथ-साथ भूख सूचकांक में देश की स्थिति जानना दिलचस्प होगा। अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान द्वारा छिहत्तर देशों के जारी ताजा भूख सूचकांक में भारत का स्थान पचपनवां है। हम अपने पड़ोसी देश नेपाल (चौवालीवां स्थान) और श्रीलंका (उनतालीसवां स्थान) से भी पीछे हैं। भारत में भूख की स्थिति अब भी गंभीर श्रेणी में है।

सिर्फ सरकारी नीति बनाने या नारे लगाने से ‘मेक इन इंडिया’ का सपना साकार नहीं हो सकता। इसके लिए उद्योग जगत की कार्यशैली में पारदर्शिता और जवाबदेही की दरकार है। व्यवसाय जगत में व्याप्त भ्रष्टाचार और अनैतिक आचरण पर अंकुश लगाने के लिए वर्ष 2013 में कंपनी कानून में संशोधन किया गया। नए कानून के अनुसार हर बड़ी कंपनी के बोर्ड में स्वतंत्र निदेशकों की नियुक्ति और एक निगरानी तंत्र बनाने का प्रावधान है। इस पर ईमानदारी से अमल हो तो अनेक गड़बड़ियां थम सकती हैं। जड़ पर हमला करके ही भ्रष्टाचार पर काबू पाया जा सकता है और भ्रष्टाचार नियंत्रित किए बिना देश के विकास का सपना साकार नहीं हो सकता।
भ्रष्टाचार के कारण आज हमारे देश में किसी नए आदमी के लिए उद्योग लगाना या व्यापार करना बहुत कठिन है। धंधा जमाने के लिए नए आदमी को केंद्र और राज्य सरकारों से लगभग दो सौ तरह की अनुमति लेनी पड़ती है। किसी देश में व्यापार करना कितना आसान है, विश्व बैंक ने इसका एक सूचकांक तैयार किया है। इस सूचकांक में भारत को एक सौ बयालीसवां स्थान दिया गया है, जो पाकिस्तान (128), श्रीलंका (90), दक्षिण अफ्रीका (43) और रवांडा (46) से भी बदतर है। मोदी का लक्ष्य अगले दो वर्ष में देश को प्रथम पचास देशों में लाना है।

लेकिन मेक इन इंडिया के नाम पर आंखें बंद कर देश के व्यापारियों को छूट देना और विदेशी निवेशकों को न्योतना शुभ संकेत नहीं समझा जा सकता। विदेशों से आने वाले धन की पड़ताल होना बहुत जरूरी है। अप्रैल से सितंबर, 2014 के बीच आए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआइ) को टटोलने से पता चलता है कि इस दौरान सर्वाधिक धन (4.19 अरब डॉलर) मॉरीशस से आया। मॉरीशस टैक्स हैवन श्रेणी में है और वहां से आए पैसे को संदेह की दृष्टि से देखा जाता है। वर्ष 2013-14 में देश को कुल चौबीस अरब डॉलर की एफडीआइ मिली, जिसमें पच्चीस फीसद अकेले सिंगापुर से आई। इस दौरान मारीशस से बीस प्रतिशत (4.85 अरब डॉलर) निवेश हुआ। शेष दुनिया से बची पचपन प्रतिशत रकम आई।

एक और महत्त्वपूर्ण बात है। सरकार हर वर्ष यह तो बताती है कि कितना विदेशी निवेश हुआ, लेकिन इसका हिसाब कोई नहीं देता कि विदेशी कंपनियां हर साल कितना पैसा कमा कर बाहर ले गई। अब सरकार को बहुराष्ट्रीय कंपनियों की कमाई और बाहर जाने वाले धन का आंकड़ा भी जारी करना चाहिए। काले धन के खिलाफ लड़ाई और भ्रष्टाचार पर नियंत्रित के लिए देशी-विदेशी धन का रंग परखना जरूरी हो चला है। ‘मेक इन इंडिया’ अभियान आंख पर पट््टी बांध कर नहीं चलाया जाना चाहिए।

 

 

फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App