ताज़ा खबर
 

मूकदर्शक मानसिकता की जड़ें

राजेंद्र चौधरी पिछले दिनों हरियाणा में बस में हुई छेड़छाड़ की घटना, राष्ट्रीय मीडिया में भी छाई रही। जहां सबने एक मत से दोनों युवतियों के हौसले की दाद दी, वहीं बस में बैठी बाकी सवारियों के मूकदर्शक बैठे रहने की सर्वत्र आलोचना हुई। लोगों का अपने आसपास होती ऐसी घटना के प्रति मूकदर्शक बने […]

Author December 11, 2014 2:03 PM

राजेंद्र चौधरी

पिछले दिनों हरियाणा में बस में हुई छेड़छाड़ की घटना, राष्ट्रीय मीडिया में भी छाई रही। जहां सबने एक मत से दोनों युवतियों के हौसले की दाद दी, वहीं बस में बैठी बाकी सवारियों के मूकदर्शक बैठे रहने की सर्वत्र आलोचना हुई। लोगों का अपने आसपास होती ऐसी घटना के प्रति मूकदर्शक बने रहना, वास्तव में चिंतनीय है। इस बारे में कोई दो राय नहीं हो सकती। पर लोगों के मूकदर्शक बने रहने के लिए जिम्मेवार कौन है, इस पर अलग-अलग राय हो सकती है।

आमतौर पर मीडिया में हुई चर्चा में मूकदर्शक बने रहने को बस में बैठी सवारियों की व्यक्तिगत कमी के तौर पर देखा गया है। मूकदर्शकों को इतना शर्मशार किया गया है कि वे तो कुछ बोलने की हिम्मत ही नहीं जुटा सकते। मगर हमें अपने आप को उन मूकदर्शकों के स्थान पर रख कर सोचना चाहिए कि क्या यह उन लोगों की व्यक्तिगत कमजोरी थी? उनकी जगह अगर कुछ अन्य लोग होते, तो क्या हम यह पूरे विश्वास के साथ कह सकते हैं कि वे निश्चित तौर पर मूकदर्शक न रहते? इसका उत्तर देने के साथ ही हमें एक और प्रश्न पर भी विचार करना चाहिए। बस की घटना में मूकदर्शक बने बैठे रहे लोग, क्या बाकी जगह पर सक्रिय हस्तक्षेप करते हैं?

बाकी जगह अन्याय होते देख लोग आमतौर पर चुप रह जाते हैं या अपने पर होते अन्याय को सहन कर जाते हैं, तो ज्यादा संभावना यही है कि वे हिंसात्मक घटना में जरूर मूकदर्शक बने रहेंगे। किसी भी दफ्तर में एक छोटे-से काम के लिए रोज-रोज चक्कर काटने को अभिशप्त लोग विरोध करना, अपनी आवाज उठाना भूल जाते हैं। रोजाना हर जगह नियमों की अवहेलना देखने वालों से, अवहेलना करने वालों से, यातायात के नियमों का पालन करने की अपेक्षा कैसे की जा सकती है?

मूकदर्शक बनने की मानसिकता क्यों बनती है, इस पर हमें विचार करना होगा। क्या बस वाली घटना हमारे देश के सब राज्यों में यही रूप लेती? देश के कुछ राज्यों में रहने-घूमने का मेरा अनुभव तो यही कहता है कि नहीं, सब जगह ऐसा नहीं होता। शायद कुछ राज्य तो ऐसे हैं जहां बस में, खुलेआम इस तरह की छेड़छाड़ की घटना होती ही नहीं। अगर सब राज्यों में घटना का यह स्वरूप नहीं हो सकता, तो क्या इससे यह निष्कर्ष निकाला जाए कि हरियाणा (या उत्तर भारत?) के लोग तुलनात्मक रूप से ज्यादा डरपोक और स्वार्थी किस्म के हैं इसलिए वे मूकदर्शक बन देखते रहे? जाहिर है, ऐसा निष्कर्ष सही नहीं होगा। किसी क्षेत्र-विशेष के लोगों पर हम इस तरह का ठप्पा नहीं लगा सकते। इसका अर्थ हुआ कि समस्या कहीं और है।

निंदा करने से पहले, जरा सोच कर देखें कि बस में बैठे लोग, जिनमें महिलाएं भी रही होंगी, क्यों मूकदर्शक बने रहे? वे सब के सब छेड़छाड़ के समर्थक, उसमें रस लेने वाले, तो नहीं ही रहे होंगे। मूकदर्शकों में महिलाएं भी रही होंगी। फिर भी वे चुप क्यों रहे? शायद वे डर के कारण, चुप रहने की आदत पड़ जाने के कारण चुप रहे होंगे। डर में ज्यादा हिस्सा शायद इस बात का होगा कि बस से उतरने के बाद क्या होगा। अगर छेड़छाड़ करने वालों ने दुश्मनी बांध ली, बाद में पीछे पड़ गए, तो क्या होगा। सरकार और पुलिस में बिल्कुल विश्वास न होना, उनसे न्याय की कोई आशा न होना, इस डर का मुख्य कारण है (पुलिस कार्रवाई में हुई देरी इसका जीता-जागता सबूत है)।

अगर यह विश्वास हो कि प्रशासन में शिकायत करने पर, ऊपर शिकायत करने पर कार्रवाई होगी, तो न केवल मूकदर्शक, बल्कि वारदात करने वाले भी अपवाद होंगे। दोनों प्रवृत्तियों के पीछे एक ही कारण है, सामान्य कानून-व्यवस्था में अविश्वास। छात्र को विश्वास हो कि अध्यापक से शिकायत करने पर उससे झगड़ा करने वाले के खिलाफ जरूर सख्त कार्रवाई होगी, तो उसके कानून को अपने हाथ में लेने की संभावना काफी कम होगी।

आज की तारीख में जहां लोग मूकदर्शक बने खड़े रहते हैं, वहां शासन-प्रशासन में, नियम-कायदे से चलने में विश्वास खत्म हो गया है, चुप रहने की आदत पड़ गई है। हरियाणा में रोज-रोज होती सड़क जाम की खबरें इसका एक उदाहरण हैं।

बिजली-पानी न मिलने पर लोग तभी सड़क जाम करते हैं जब उन्हें यह लगता है कि सामान्य शिकायत से कुछ नहीं होगा। हरियाणा के किसी शहर में आने पर मुख्यमंत्री से मिलने वालों की भीड़ यही बताती है कि मुख्यमंत्री से नीचे कोई सुनवाई ही नहीं है। यह और बात है कि जहां मुख्यमंत्री से नीचे बात नहीं बनती, वहां मुख्यमंत्री (या प्रधानमंत्री) के स्तर पर बात पहुंचने से भी पूरी बात बनती नहीं, व्यक्तिगत काम या कोई एक-आध काम भले हो जाए।
दरअसल, लोगों का मूकदर्शक बने रहना एक बड़ी सामाजिक समस्या की ओर इंगित करता है।

मूकदर्शक बने रहे बस-यात्री तो उस समस्या का ऊपरी चिह्न मात्र हैं। शिकायत करने पर कार्रवाई होने का उम्मीद न होना जहां लोगों को मूकदर्शक बनाता है वहीं बाहुबलियों को पनपने का मौका मिलता है। बहुत सारे मामलों में लोग फरियाद लेकर सक्षम अधिकारी के पास जाने के बजाय किसी स्थानीय ‘दादा’ की शरण में जाते हैं। जो अधिकारी और नेता मूकदर्शकों को शर्मिंदा कर रहे हैं, इस स्थिति के लिए असली जिम्मेवार वे स्वयं हैं। मूकदर्शकों को कठघरे में खड़ा करके शासन और राजनीतिक दल अपनी जिम्मेदारी से बच रहे हैं।

समस्या के सही कारणों की पहचान केवल सैद्धांतिक मसला नहीं है। समस्या की सही समझ हमें सही निदान की ओर ले जाती है और सतही समझ से सतही उपाय निकलते हैं। वर्तमान संदर्भ में, बसों में अतिरिक्त सुरक्षा गार्ड लगाने की मांग सतही समझ को ही दर्शाती है। कहां-कहां अतिरिक्त सुरक्षा गार्ड लगाएंगे? फिर तो शीघ्र ही महिलाओं को घर में बंद रखना एकमात्र रास्ता बच रहेगा! यही सबसे किफायती सुरक्षा कवच साबित हो सकता है और आजकल खर्च कम करना तो सरकारी नीति का मूल मंत्र है!

बिना बुनियादी इलाज किए, यानी हर स्तर पर प्रशासन को सुधारे बगैर, पारदर्शी और जवाबदेह बनाए बगैर, समस्या का निदान नहीं हो सकता। जिस समाज में महिला जनप्रतिनिधि के स्थान पर उसके परिवार के पुरुष खुले तौर पर औपचारिक बैठकों में शामिल होते हों, दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करते हों, वहां यह आशा करना कि छेड़छाड़ या भ्रूण हत्या नहीं होगी, मुगालते में रहना है। जहां ‘खेमका’ और ‘चतुर्वेदी’ अपवाद होते हों, जहां अधिकारियों को नेताओं का मुंह देख कर नोट लिखने की आदत हो, वहां आपको मूकदर्शक ही मिलेंगे। हां, वहां भी हर कोई मूकदर्शक नहीं होता, यह अलग बात है।
जरा उस व्यक्ति की मन:स्थिति के बारे में सोच कर देखिए, जिसे मन मसोस कर इस घटना का मूकदर्शक बनना पड़ा होगा।

उसके मन पर क्या बीत रही होगी? उसके आत्मसम्मान को कितनी चोट लगी होगी। मूकदर्शक को भी अपराधी के तौर पर न देख कर पीड़ित के तौर पर देखना शायद ज्यादा मुनासिब होगा, विशेष तौर से जब तक मूकदर्शक अपवाद न बन जाएं। इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि तात्कालिक उपाय नहीं किए जाने चाहिए, या अपराधियों को शीघ्र सख्त सजा नहीं मिलनी चाहिए। न ही यह अभिप्राय है कि महिला (और दलित तथा आदिवासी) को विशेष सुरक्षा की जरूरत नहीं है। पर सामान्य प्रशासन में सुधार किए बिना, उसे जवाबदेह बनाए बिना, केवल पुलिसिया कार्रवाई से काम नहीं चलने वाला।

तात्कालिक रूप से छात्राओं और महिलाओं के लिए विशेष बसें चलनी ही चाहिए, मगर सुबह-शाम बसों में लटक कर, उनकी छतों पर चढ़ कर, स्कूल-कॉलेज पहुंचने का जुगाड़ करने वाले युवकों से (जो हरियाणा में रोज का दृश्य है) समवेदना की बहुत ज्यादा आशा नहीं करनी चाहिए। अपने रोजमर्रा के जीवन में आदतन सब कुछ चुपचाप सहन कर जाने वालों से यह आशा नहीं करनी चाहिए कि हिंसा के मामले में वे मूकदर्शक बने नहीं रहेंगे। इन युवतियों का बोलना स्वागत-योग्य है। पर यह अपवाद है और अपवाद ही रहेगा, अगर मूकदर्शक बनाने वाली परिस्थितियों को बदलने के प्रयास नहीं होते।

ये प्रयास करने की जिम्मेदारी राजनीतिक पार्टियों की है। राजनीतिक पार्टी बनाने का उद््देश्य चुनाव लड़ कर सरकार बनाना भर नहीं होता (कम से कम सिद्धांत तो यही कहता है, वास्तविकता चाहे कुछ हो)। राजनीतिक पार्टी बनाने का उद््देश्य समाज में एक खास तरह का बदलाव लाना, समाज को एक खास दिशा में ले जाना होता है। चुनाव लड़ना, सरकार बनाना तो उस रास्ते का एक पड़ाव मात्र होना चाहिए। न केवल प्रशासनिक व्यवस्था को सुचारु बनाना राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी है, बल्कि समाज की मानसिकता बदलना भी उन्हीं का काम है।

जनता (मूकदर्शकों) की कमी निकाल कर पार्टियां अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकतीं। जनता के अंदर की कुरीतियों के खिलाफ आंदोलन करना भी पार्टियों की बुनियादी जिम्मेदारी है। जाहिर है, यह जिम्मेदारी केवल शासक पार्टी की नहीं, सभी राजनीतिक दलों की है। मूकदर्शक होने को एक व्यक्तिगत दोष के तौर पर देख कर न केवल राजनीतिक दल, बल्कि समाज के सभी प्रभुत्वशाली तबके अपनी जिम्मेदारी से बच रहे हैं।

अंतिम बात। मूकदर्शकों को एक ओर छोड़ कर हम छेड़छाड़ करने वालों पर आएं। छेड़छाड़ को किसी भी परिस्थिति में उचित नहीं ठहराया जा सकता। यह निंदनीय है और इसकी सजा मिलनी चाहिए। पर क्या चौबीसों घंटे महिला को मात्र एक शरीर के रूप में प्रस्तुत करने वाले अपनी जिम्मेदारी से बच सकते हैं? जैसे हत्या या आत्महत्या के अपराध के लिए उकसाने वाला भी कानूनी रूप से दोषी होता है, उसी प्रकार महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराधों के लिए वह प्रवृत्ति भी जिम्मेवार है जो हर रोज महिलाओं को बस पर एक शरीर के तौर पर देखती-दिखाती है। विज्ञापनों, फिल्मों और टीवी कार्यक्रमों में महिलाओं का चित्रण तो इसका एक उदाहरण मात्र है।

क्या यह मात्र व्यक्तिगत पसंद-नापसंद, चुनाव की आजादी और उपभोक्ता की स्वतंत्रता को दर्शाता है? या यह छेड़छाड़, महिलाओं का कला, साहित्य और मीडिया में एकांगी चित्रण और उनका पहनावा, ये सब के सब महिला विरोधी विचारधारा के वर्चस्व को प्रतिबिंबित करते हैं?

 

फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App