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धार्मिक स्वतंत्रता का अर्थ

विष्णु नागर जनसत्ता 26 सितंबर, 2014: भारत ही नहीं, दुनिया भर में धार्मिक कट्टरता और भयंकर पाखंड के इस दौर में मुंबई उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति अभय ओका और न्यायमूर्ति एएस चांदूरकर के पीठ के इस निर्णय पर भले ही ज्यादा ध्यान न दिया जाए या इससे मौजूदा संकीर्ण धार्मिक-सांप्रदायिक सोच में कोई परिवर्तन न […]

Author September 26, 2014 11:38 AM

विष्णु नागर

जनसत्ता 26 सितंबर, 2014: भारत ही नहीं, दुनिया भर में धार्मिक कट्टरता और भयंकर पाखंड के इस दौर में मुंबई उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति अभय ओका और न्यायमूर्ति एएस चांदूरकर के पीठ के इस निर्णय पर भले ही ज्यादा ध्यान न दिया जाए या इससे मौजूदा संकीर्ण धार्मिक-सांप्रदायिक सोच में कोई परिवर्तन न आए, फिर भी यह फैसला स्वागत-योग्य है कि सरकार किसी व्यक्ति को बाध्य नहीं कर सकती कि वह किसी सरकारी फॉर्म या शपथपत्र में अपना धर्म घोषित करे। अगर वह लिखता है कि ‘कोई धर्म नहीं’ यानी धर्म में उसका विश्वास नहीं है, तो इसे स्वीकार करना होगा, यही उसका धर्म है। यह हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार है कि वह किसी खास धर्म में विश्वास रखे या न रखे, उसका अनुपालन करे या न करे या धर्ममात्र में उसकी आस्था न हो।

भारत एक धर्मनिरपेक्ष-लोकतांत्रिक देश है जिसका अपना कोई सरकारी तौर पर घोषित धर्म नहीं है। अत: सरकार धार्मिक स्वतंत्रता के संविधान प्रदत्त अधिकार के इस्तेमाल से किसी को रोक नहीं सकती, चाहे वह किसी खास धर्म में रहने या उसे छोड़ने का सवाल हो या किसी भी धर्म में विश्वास न रखने का प्रश्न हो। देश में ऐसा एक भी कानून नहीं है जो लोगों को किसी न किसी धर्म में विश्वास रखने को मजबूर करता हो। संविधान तो व्यक्ति को अनुच्छेद 25 में धार्मिक विश्वासों, उनके प्रचार और उनका परिपालन करने की स्वतंत्रता देता है।

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बहुतों को और खासकर केंद्र की सत्ता में बैठे लोगों को नागवार गुजरने वाली इतनी सारी और इस तरह कई और बातें अदालत को इसलिए कहनी पड़ीं कि रणजीत मोहिते, किशोर नजारे और सुभाष रणावरे नामक तीन लोगों ने एक जनहित याचिका दायर करके प्रार्थना की थी कि हम ‘फुल गास्पेल चर्च ऑफ गॉड’ के सदस्य हैं। हम ईसा मसीह में तो विश्वास रखते हैं मगर किसी धर्म में नहीं, ईसाई धर्म में भी नहीं। चार हजार सदस्यों के इस चर्च के हम सदस्य सरकारी गजट में यह सूचना प्रकाशित करवाना चाहते थे कि हम किसी धर्म को नहीं मानते। धर्म के कॉलम में हमें लिखने की छूट दी जानी चाहिए- कोई धर्म नहीं।’ उनकी यह बात नहीं मानी गई। उलटे अदालत में केंद्र सरकार और महाराष्ट्र सरकार ने इसका विरोध करते हुए कहा कि किसी को ऐसी घोषणा करने की छूट नहीं दी जा सकती क्योंकि सरकारी फॉर्म में ‘धर्म नहीं’ को धर्म या धर्म का एक प्रकार नहीं माना जा सकता।
फिलहाल तो कानून के मोर्चे पर यह लड़ाई केंद्र सरकार और राज्य सरकार हार गई हैं और एक तरह से खासकर हिंदुत्ववादी भी इस चपेट में आ गए हैं, जो आजकल धर्म-परिवर्तन की मुहिम में जोर-शोर से लगे हुए हैं और ‘लव जिहाद’ का हल्ला मचाए हुए हैं। उन्हें भी अदालत ने आईना दिखा दिया है, हालांकि आईना देखने में वे विश्वास नहीं रखते। इसके लिए उन्हें बाध्य भी नहीं किया जा सकता क्योंकि मई में केंद्र में हुए सत्ता परिवर्तन के बाद देश में उनकी राजनीति, समाज नीति, संस्कृति नीति का झंडा फहरा रहा है। उनके इरादों को पंख लग गए हैं। उन्हें लगता है कि उनके मंसूबे पूरे करने के दिन आ गए हैं। बहरहाल, मोदी की सरकार शायद भविष्य में इस निर्णय के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय जाना पसंद करे।

वैसे अपने आप में यह भी खासा दिलचस्प लगता है कि एक खास चर्च से जुड़े लोग ईसा मसीह को तो मानते हैं मगर उनसे जुड़े ईसाई धर्म को नहीं, क्योंकि उनका मानना है कि ईसा मसीह ने कहीं भी ईसाई धर्म चलाने की बात नहीं कही थी।

यह बात वैसे तो संभवत: हर बड़े धर्म प्रवर्तक के बारे में कही जा सकती है, मगर फिर भी उनके नाम पर चले सारे धर्म आज बहुत ताकतवर हैं बल्कि जिन प्रवर्तकों ने खुद ईश्वर पर विश्वास नहीं किया था, उस पर सवालिया निशान लगाए थे, उन्हें भी बाद में भगवान बना दिया गया। संगठित होते-होते ये धर्म इतने ताकतवर हो गए हैं कि कोई अपनी मर्जी से अपना धर्म चुने या उसे खारिज कर दे, इसकी कल्पना करना भी लोगों के लिए मुश्किल है।
धर्म के खेल निराले होते हैं जो इसके संस्थागत रूप लेने के साथ हमेशा से हर जगह खेले जाते रहे हैं। इस खेल में न जाने कितनों की बलि ली गई है, न जाने कितनों को दंडित-प्रताड़ित-अपमानित किया गया है, न जाने कितनी खूनी लड़ाइयां लड़ी गई हैं और आज भी दुनिया भर में यह सब भरपूर है। आज भी सबसे ज्यादा हिंसा धर्म के नाम पर ही होती है।

इसके बावजूद यह भी स्वीकार किया गया है और व्यवहार में लाया गया है कि कोई कितना ही छोटा समूह या व्यक्ति हो, अगर वह धर्म में विश्वास नहीं करता तो यह उसकी उसी तरह की स्वतंत्रता है जैसे कि किसी भी धर्म में विश्वास करने या धर्म बदलने की स्वतंत्रता होती है। आज भी किसी कमजोर को किसी धर्मविशेष को मानने या न मानने के लिए विवश तो किया जा सकता है और किया भी जा रहा है, मगर व्यक्ति की धर्म को न मानने की स्वतंत्रता जरूर सुरक्षित है क्योंकि सौभाग्य से कोई अपने घर में क्या करता है या क्या नहीं करता है या वह मंदिर या मस्जिद जाता है या नहीं जाता है, इसका कोई लेखाजोखा नहीं रखा जाता। किसी का नास्तिक होना अभी अपराध की श्रेणी में नहीं आया है, हालांकि हालात ऐसे ही रहे तो पता नहीं कल संविधान-कानून को धता बताते हुए धर्मध्वजाधारी यह भी करने लग जाएं। जंगलराज में कुछ भी हो सकता है।

यह दिलचस्प है कि सरकारी फॉर्मों में भले न हो मगर 2011 की जनगणना के फॉर्म में अपना धर्म घोषित करने या न करने की स्वतंत्रता लोगों को दी गई थी। उसमें साफ लिखा गया था कि अपने धर्म को घोषित करना या न करना स्वैच्छिक है। उस फॉर्म में तमाम धर्मों के नामों के ऊपर पहले नंबर पर ‘कोई धर्म नहीं’ का विकल्प दर्ज था। फिर यह स्वतंत्रता सरकारी फॉर्मों में क्यों नहीं है, यह समझ से परे है।

किसी व्यक्ति के किसी धर्म को मानने या उसे छोड़ कर दूसरा धर्म मानने या किसी भी धर्म को न मानने से धर्मनिरपेक्ष राज्य को क्या फर्क पड़ता है? जो स्वतंत्रता संविधान व्यक्ति को देता है, उसमें उसे परोक्ष रूप से भी बाधक क्यों बनना चाहिए? उसकी इस मामले में कोई हैसियत होनी ही क्यों चाहिए? इस मामले में राज्य को भी क्यों आड़े चाहिए, बल्कि राज्य का कर्तव्य तो उस स्वतंत्रता की रक्षा करना है जो हमारे संविधान ने भारत के सभी नागरिकों को दी हुई है।

बहरहाल, सरकारी फॉर्म में धर्म के कॉलम में ‘कोई धर्म नहीं’ लिखने की स्वतंत्रता जिनके लिए अर्थ रखती है, उनके लिए यह निर्णय महत्त्वपूर्ण है। हालांकि ऐसे लोग भारत में बहुत थोड़े हैं, अल्पसंख्यकों में भी अल्पसंख्यक हैं। भारत की शायद नब्बे प्रतिशत आबादी धार्मिक है या वह मानती है कि वह धार्मिक है, उसके लिए अदालत में उठा यह सवाल कोई खास मायने नहीं रखता। वैसे यहां इस बात का उल्लेख जरूरी है कि अमेरिकी कानून तो सरकारी या किसी भी तरह की नौकरी में इससे बहुत आगे की छूट व्यक्ति को देता है।

उसमें नस्ल, रंग, लिंग, वैवाहिक स्थिति, विकलांगता, जेनेटिक जानकारी, लंबाई, वजन, संपत्ति संबंधी दायित्व, राष्ट्रीयता आदि-आदि की सूचना मांगी नहीं जा सकती और अमेरिका का हर मामले में अनुकरण करने को उत्सुक भारत में धर्म को न मानना इतना बड़ा मसला बना दिया गया है कि सरकार तक इसमें बाधक है।
जिस देश के सबसे बड़े धर्म- हिंदू धर्म- में और बहुत से अन्य धर्मों में नास्तिकता की एक लंबी परंपरा रही हो, आज उसी देश में यह समझाना मुश्किल हो गया है कि धार्मिक होना जैसे किसी के लिए महत्त्वपूर्ण हो सकता है, उसी तरह किसी के लिए अधार्मिक होना भी हो सकता है। अधार्मिक होना भी ठीक उसी तरह व्यक्ति-विशेष के विश्वासों और अधिकार का मामला है जिस तरह किसी के राजनीतिक विश्वासों और अधिकार का मामला होता है।
जिस तरह लोगों के अलग-अलग राजनीतिक विश्वासों से साधारण भारतीय को आपत्ति नहीं है, उस पर सवाल नहीं उठाए जाते, वैसे ही धार्मिक विश्वासों पर भी सवाल क्यों उठाए जाने चाहिए, जब तक कि यह कानूनी ढंग से साबित न हो जाए कि इसके लिए लालच या भय का सहारा लिया गया है।

क्यों धार्मिक विश्वासों को तो विश्वास माना जाता है, उनके बदलने पर हंगामा किया जाता है मगर राजनीतिक विश्वासों को मजाक बना कर रख देने की पूरी स्वतंत्रता हरेक को है। नेता दिन में चार बार, चार तरह के राजनीतिक विश्वासों वाली पार्टियां बदले, कोई दिक्कत नहीं, जबकि किसी लोकतंत्र में इस तरह की हरकतों को बेहद गंभीरता से लिया जाना चाहिए और जो अपनी राजनीतिक सुविधा या महत्त्वाकांक्षा के कारण अपने राजनीतिक विश्वास कपड़ों की तरह बदलते हैं उन्हें और उनके परिवारजनों को राजनीति करने के अधिकार से वंचित किया जाना चाहिए।

इसके विपरीत धार्मिक विश्वास बदलने के मामले में गरीब से गरीब आदमी भी बहुत सोच-समझ कर, संभल कर कदम बढ़ाता है क्योंकि इससे कई पारिवारिक-सामाजिक व्यवहार भी जुड़े होते हैं, कई बार उसकी अस्मिता जुड़ी होती है। जबकि राजनीतिक विश्वासों के मामले में ऐसा कोई संकट नहीं झेलना पड़ता। मगर अंध धार्मिक विश्वासों पर जरा भी चोट लगने या न लगने पर भी हिंसा भड़का दी जाती है। वैसे तो आज यह समझाना तक मुश्किल लगता है कि गांधीजी जैसा भी धार्मिक व्यक्ति, हिंदू हो सकता है, आजादी मिलने के बाद जिसकी पहली प्राथमिकता यह होती है कि हिंदू-मुसलिम दंगे रुकें। हालांकि वही गांधी एक हिंदू कट्टरपंथी की गोलियों का निशाना बने और खुशी मनाने वालों ने इसे ‘गांधी वध’ कहा। फिर इक्कीसवीं सदी में वे ही गांधी-गांधी जाप बेशर्मी से करने लगते हैं और यह सब चलता रहता है।

 

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