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आय में नैतिकता का प्रश्न

शीतला सिंह नोएडा विकास प्राधिकरण ने आखिरकार अरबपति इंजीनियर यादव सिंह को निलंबित कर दिया। इसे लेकर कुछ संवाद माध्यम ऐसे खबरें परोस रहे हैं जैसे कोई अनहोनी हो गई हो। निलंबन और बहाली तो कर्मचारियों की होती ही रहती है, लेकिन मूल प्रश्न यह है कि आखिर राजकीय कर्मचारी अकूत धन-संपत्ति कैसे अर्जित कर […]

Author December 19, 2014 11:00 PM

शीतला सिंह

नोएडा विकास प्राधिकरण ने आखिरकार अरबपति इंजीनियर यादव सिंह को निलंबित कर दिया। इसे लेकर कुछ संवाद माध्यम ऐसे खबरें परोस रहे हैं जैसे कोई अनहोनी हो गई हो। निलंबन और बहाली तो कर्मचारियों की होती ही रहती है, लेकिन मूल प्रश्न यह है कि आखिर राजकीय कर्मचारी अकूत धन-संपत्ति कैसे अर्जित कर लेते हैं। चाहे वे शीर्ष पद पर हों या फिर बहुत छोटे कर्मचारी, अपनी आय से हजारों गुना अधिक संपत्ति के स्वामी कैसे बन जाते हैं। मध्यप्रदेश में एक लेखपाल और एक चपरासी के घर छापे पड़े तो वे भी करोड़ों की संपत्ति के मालिक मिले। उत्तर प्रदेश में मंडी समिति के एक कर्मचारी के पास विमान और हेलिकाप्टर तक थे, मगर वह आज किसी जेल में नहीं है।

सवाल है कि यह प्रवृत्ति सिर्फ सरकारी कर्मचारियों में है या सेवाकार्य के नाम पर राजनीति में लगे लोग भी इन प्रवृत्तियों से ग्रस्त हैं। छोटे से राज्य झारखंड के एक मुख्यमंत्री तो अरबों की संपत्ति के स्वामी निकले। वे किसी दल के नहीं थे, लेकिन विभिन्न राजनीतिक दलों के समर्थन से मुख्यमंत्री बनने में सफल हो गए थे। उनकी अकूत संपत्ति ही प्रभाव अर्जित करने का मूल कारण थी। इसी प्रकार विभिन्न राजनीतिक दलों के पार्टी अध्यक्ष से लेकर मंत्री तक घूसखोरी करते रंगे हाथों पकड़े गए और जेलों तक पहुंचे हैं, जिनमें भाजपा के बंगारू लक्ष्मण भी शामिल थे। कांगे्रस के शासनकाल में संचारमंत्री रहे सुखराम भी इसी तरह पकड़े गए थे। इस प्रकार यह सिलसिला शुरू से लेकर आज तक चलता आ रहा है।

आश्चर्य का करण तो यह है कि इस प्रवृत्ति पर रोक कैसे लगे, इसका कोई उपाय नहीं ढूंढ़ा जा सका है। क्या अपार संपत्ति अर्जन की कोई सीमा निर्धारित होनी चाहिए या नहीं। जब जोत हदबंदी कानून बन रहा था तब भी सवाल उठा कि क्या अधिक जोत वाले किसान ही सामाजिक न्याय में सबसे बड़े बाधक हैं या वे जिनकी संपत्ति अरबों-खरबों में है, जिनके पास मुंबई जैसे महानगर में सत्ताईस मंजिला इमारत- जिसके ऊपर छोटे विमान तक उतर सकें- और सुख साधन के समस्त उपकरण मौजूद हैं। क्या यह मान लिया जाए कि उन्हें सारी संपत्ति बिना कानून तोड़े, सामाजिक अन्याय या अनुचित साधनों का इस्तेमाल किए हासिल हो पाई है। अगर नहीं तो फिर इसे रोकने के उपाय होने चाहिए या नहीं।

मुख्य प्रश्न तो यह है कि हमारी सरकारें समाज का भावी स्वरूप कैसा बनाना चाहती हैं। फिलहाल कानून है कि दस लाख रुपए से अधिक वार्षिक आय वालों को आयकर के रूप में तीस प्रतिशत का भुगतान करना पड़ेगा, मगर विचित्र है कि यही कानून दस अरब रुपए की आय वालों पर भी लागू है। यानी यह मान लिया जाए कि असीमित संपत्ति अर्जित करने से समाज को कोई नुकसान नहीं पहुंचने वाला है। फिर तो समतावादी समाज-व्यवस्था को संविधान से ही अलग कर देना चाहिए- तब ‘समरथ को नहिं दोष गोसार्इं’ वाली स्थिति होगी। फिर अंगुली उठाने का कोई कारण ही नहीं बचेगा।

सवाल यह भी है कि इस तरह अकूत संपत्ति अर्जित करने वाले ही दोषी हैं या इस समाज-व्यवस्था के सर्जक, निर्णायक और नियंता। फिर आखिर इसमें अधिक दोष किसका है। क्या चोरी, बेईमानी, दगाबाजी, घूसखोरी, करवंचना यह सब नए अपराध नहीं हैं? क्या इन सबको प्रश्रय तब मिलता है जब चुनाव के माध्यम से निर्वाचित होने वाले, जिन्हें जनप्रतिनिधि कहा जाता है, इतने भ्रष्ट हो जाते हैं कि बिना काली कमाई और कालेधन के अधिकतर चुनाव जीत ही नहीं सकते। जब जनप्रतिनिधित्व कानून में निर्धारित अधिकतम चुनाव खर्च की सीमा में वैकल्पिक व्यवस्था भी जोड़ दी जाए, तब तो यही लगता है कि यह सब मिलीभगत से हो रहा है।

आखिर विभिन्न व्यवस्थाओं के दावेदार और अलग पार्टियां बना कर परिवर्तनकामिता का संदेश देने वाले भ्रष्ट लोग जब सबके प्यारे बन जाते हैं तब कारणों की खोज बड़ी मुश्किल नहीं रह जाती। इसलिए भ्रष्टाचार भी मानवीय प्रवृत्तिजन्य कारणों से ही पनपता है और उसे रोकने के लिए व्यवस्था का संचालन करने वाले क्या चूक जानबूझ कर करते हैं या उनसे अनजाने में हो जाती है। पिछली सरकार में जब संचार मंत्रालय ने कंपनियों को अधिकार बांटे या फिर कोयला खदानों का आबंटन किया गया तो इस बात पर विचार करने की जरूरत नहीं समझी गई कि इनकी एवज में सरकार का लाभ कितना हो। राज्यों में दूसरी पार्टियों की सरकारों में से भी किसी को इसकी जरूरत महसूस नहीं हुई। फिर वही प्रश्न उठता है कि राजनीतिक विचारधारा का आवरण बनावटी है या वास्तविकता और अच्छे समाज की कल्पना पर आधारित राजनीतिक नैतिकताएं कैसे बनीं, बिगड़ीं और चल रही हैं।

इसलिए भावी समाज बनाने की चिंताएं, जिसमें सभी यही घोषित करते हैं कि हमारा लक्ष्य तो अंतिम व्यक्ति को लाभ पहुंचाना है, निरर्थक और बेकार क्यों बन जाता है। गरीबी-अमीरी पर चर्चा तो होती है, लेकिन इसके लिए सीमा निर्धारण क्यों नहीं। सरकारी वेतनमानों में भी उपलब्धियों का निर्धारण का अंतर कितना होगा, क्या एक और सौ का अनुपात भी निरर्थक है? लेकिन देखा तो यही गया है कि जो लोग परंपरागत व्यवस्था को बनाए रखना चाहते हैं, उसमें परिवर्तन के नाम पर कट््टर रुख अपनाते हैं। उनका लक्ष्य सीमित वर्ग के स्वार्थों की रक्षा करना है।

समाज की आदिम व्यवस्था से चलते हुए जिस पूंजीवादी व्यवस्था को हमने स्वीकार किया है उसके लिए किन्हीं आचार संहिताओं, नैतिकताओं के बंधन की आवश्यकता है या नहीं! प्रतिस्पर्धाएं तो विकास के लिए आवश्यक हैं, लेकिन इसमें से अनैतिक प्रतिस्पर्धा को अलग किया जाएगा या नहीं! इसलिए समाज से पहले मानवीय प्रवृत्तियों और उनका अनुचित विकास कैसे रुके, क्या यह मात्र कानून से संभव है? अगर यह मान लिया जाए कि सरकार के पास नियामक शक्ति के रूप में नियम और कानून बनाने का ही अधिकार है, तो यही लगता है कि तब इसे रोकना आसान नहीं होगा, क्योंकि इसमें मानवीय प्रवृत्तियों का अध्ययन जो शामिल नहीं है। राग, द्वेष, घृणा, लालच में से उचित अनुचित का निर्धारण और नियमन करने के लिए आखिर क्या रास्ता अपनाया गया है? यही कारण तो है कि समाज का कोई वर्ग और समुदाय इससे मुक्त नहीं हो पाया।

हमने कानून बना कर न्याय की परिकल्पना और उसके निर्णय का अधिकार जिस न्यायपालिका को सौंप दिया, जिस पर सभी भरोसा करते हैं, उसमें भी तो कलुषित प्रवृत्तियों की उपस्थिति को स्वीकार करके ही लगभग सात सौ न्यायिक अधिकारियों पर मुकदमे चल रहे हैं। वे सभी नीचे की अदालतों के नहीं हैं, उनमें कई तो उच्च और सर्वोच्च न्यायालय तक से जुड़े रहे हैं। जब सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों पर भी अंगुली उठे, उनके खिलाफ संसद में महाभियोग लगे और वह भी बहुमत के बावजूद पारित न हो पाए और मतदान भी जाति, धर्म, संप्रदाय, क्षेत्र आदि की प्रवृत्ति देखी जाए, तो मुक्ति के उपाय कहां और किस ओर देखें।

युग और उनके चुनावों में मूल्य और वांछित उपयोगी क्रिया की तलाश तो होती ही रहती है, क्योंकि युग और पूर्णता एक दूसरे के समानार्थी नहीं हैं। नया युग आवश्यकता के कारण ही तो बनता है, लेकिन युग को रोका या स्थिर नहीं किया जा सकता।

यही कारण है कि युग परिवर्तन के बावजूद नए विचारों का जन्म होता रहता है। इसे रोका भी नहीं जाना चाहिए, क्योंकि स्थिरता दोषों और विकारों को जन्म देती है। जैसे गंगा की पवित्रता उसका सतत प्रवाह ही है। लेकिन हम उसे अवांछित मान कर बांधने का काम तब करते हैं, जब वह हमारे घरों और सीमाओं में बाढ़ बन कर प्रवेश करती है।

अगर असीमित संपत्ति का अर्जन, धारण और उपभोग देश की समृद्धि और विकास के लिए आवश्यक तत्त्व है तो यह भी सोचने की जरूरत है कि जब यही व्यवस्था का निर्णायक तत्त्व हो जाएगा तो गुणों और मूल्यों की खोज का आग्रह निरर्थक बन जाएगा। फिर हम यह प्रयत्न क्यों नहीं करते कि ऐसी भावी व्यवस्था की कल्पना करें, जिससे घोषित लक्ष्यों की पूर्ति हो सके। जब पूंजी ही समाज का निर्णायक तत्त्व बन जाएगी, तो अरबों रुपए की संपत्ति अर्जित और संचित करने वाले अपनी कला से इसका उपयोग करेंगे ही। इसलिए भ्रष्टाचार के नाम पर रोना क्या एक दिखावा नहीं है!

चूंकि इसकी वजह कहीं जड़ में ही तो नहीं विद्यमान है, इसलिए अगर इसे वास्तव में कम करना है तो हमें चुनाव आदि सब पर होने वाले खर्च, निर्वाचन में बहुमत का निर्धारण से जुड़े प्रश्नों के बारे में सोचना पड़ेगा। लेकिन लगता तो यही है कि देश पहले की अपेक्षा भ्रष्टाचार के मामलों में तेजी से प्रगति कर रहा है। पहले कुछ मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के जो आरोप लगे वे लाखों में थे, तब भी उन्हें बख्शा नहीं गया, आज अरबों और खरबों रपए वालों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। इसीलिए आखिर हमने जो कानून बना रखे हैं, उसके नियंत्रकों पर कितना भरोसा बचा है।

कहा जा सकता है कि आज भी इसमें बड़ी उम्मीदें हैं और कई प्रश्न ऐसे आए, जिनका निर्णय सराहनीय रहा है। तब भी तो रोग का बढ़ना हमारी संतुष्टि का कारण नहीं हो सकता। इसलिए समाज-व्यवस्था के परिवर्तन की बात ही सोचनी पड़ेगी, केवल कुछ लोगों को अलग कर दंडित करके हम भविष्य को दूषित होने को लेकर चिंतित होने से नहीं बच सकते।

हमें भावी मानव जीवन के लिए आवश्यकता के अनुरूप साधनों की तलाश तो करनी पड़ेगी। लेकिन शरीर की भांति अगर उसका कोई अंग अतिविकसित हो जाएगा तो उसे रोकना और स्वास्थ्य के अनुकूल आॅपरेशन भी करना पड़ेगा। हाथीपांव बनाना हमारी गतिमानता को रोकेगा। आज जिस प्रकार पूंजी के वर्चस्व को स्वीकार करके इसे बढ़ाने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं उसमें यह भी ध्यान रखने की जरूरत है कि इसके चलते कहीं ऐसी प्रवृत्तियां तो नहीं पैदा हो रही हैं, जो हमारे जीवन के रंग-रूप को प्रभावित कर रही हैं। जिन्हें हम गुण और मूल्य के रूप में जानते हैं, वे नष्ट तो नहीं होने लगे हैं। हमें मूल्य में भी परिवर्तन से एतराज नहीं, लेकिन उनकी भावी जीवन में उपयोगिता कितनी होगी!

 

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