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परदेस में पहचान का प्रश्न

अभिषेक कुमार आजादी के बाद पहला मौका था जब दुनिया भर में बसे आप्रवासी भारतीय अपने मूल देश के प्रधानमंत्री के आगमन की खबर पाकर जोर-शोर से उनके स्वागत के लिए जुटते दिखाई दिए। पहले अमेरिका और फिर आॅस्ट्रेलिया में बसे आप्रवासी भारतीयों ने नरेंद्र मोदी के स्वागत में दिन-रात एक कर दिया। ऐसा हुजूम […]

Author December 8, 2014 11:18 AM

अभिषेक कुमार

आजादी के बाद पहला मौका था जब दुनिया भर में बसे आप्रवासी भारतीय अपने मूल देश के प्रधानमंत्री के आगमन की खबर पाकर जोर-शोर से उनके स्वागत के लिए जुटते दिखाई दिए। पहले अमेरिका और फिर आॅस्ट्रेलिया में बसे आप्रवासी भारतीयों ने नरेंद्र मोदी के स्वागत में दिन-रात एक कर दिया। ऐसा हुजूम उमड़ा और ऐसे नाच-गाकर स्वागत हुआ कि विदेशी मीडिया और विदेशी नेतागण भी मोदी के सम्मोहन में बंध गए। पर क्या यह स्वागत प्रधानमंत्री मोदी के व्यक्तित्व का कमाल था या फिर भारत को लेकर दुनिया में बदलती छवि का नतीजा। कहीं इस आलोड़न के पीछे कोई तीसरी अहम वजह तो नहीं, यानी यह खुद उस आप्रवासी भारतीय समाज की छटपटाहट का प्रस्फुटन तो नहीं है, जिसकी पीड़ा अलग-अलग देशों और मोर्चों से जताई तो जाती रही, लेकिन हमेशा अनसुनी रह गई। इस बार बहुमत से भारत की केंद्रीय सत्ता में आए प्रधानमंत्री से उन्हें बहुत आशाएं हैं, इसीलिए वे उन नरेंद्र मोदी के लिए भी पलक-पांवड़े बिछा रहे हैं, जिनकी न तो वैश्विक नेता के रूप में कोई बड़ी पहचान है और न ही एक वैचारिक नेता के रूप में उनकी कोई खास छवि है।

एक नेता के रूप में नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व में क्या आकर्षण है इसकी जांच-परख करना थोड़ी जल्दबाजी होगी, क्योंकि अभी उनकी सरकार और खुद मोदी के खाते में कोई बड़ी उपलब्धि दर्ज नहीं हुई है। राजनेता के तौर पर मोदी का व्यक्तित्व कितना करिश्माई है इस पड़ताल की भी अभी शुरुआत भर हुई है। जैसे-जैसे देश की राजनीति के बड़े प्रश्न उनके सामने आएंगे और उनमें उनकी परीक्षा होगी, उन नतीजों पर ही मोदी का आभामंडल तय हो सकेगा। पर इन फैसलों से पहले ही विदेशी जमीन पर मोदी को लेकर जैसा उत्साह दिखा है, उससे यह सवाल तो पैदा हुआ ही है कि आखिर क्या वजह है, जो अमेरिका से लेकर आॅस्ट्रेलिया के आप्रवासी भारतीय अपने नेता के पीछे खड़े होने और उससे हाथ मिलाने का अवसर चूकना नहीं चाहते हैं।

कुछ लोग मोदी के ऐसे अपूर्व स्वागत में विदेशों में कार्यरत संघ परिवार के कार्यालयों की भूमिका देख रहे हैं और इसके पीछे भारी खर्च से अपनाई गई रणनीति का हवाला दे रहे हैं। यानी उनके मत में आप्रवासी भारतीयों का अपने मूल देश के प्रधानमंत्री के लिए ऐसा समर्थन स्वत:स्फूर्त नहीं है। इस मत को कुछ अंशों में स्वीकार कर भी लें तो लगता है कि कोई ऐसी बात जरूर है, जो आप्रवासी भारतीयों को एक सूत्र में लाकर मोदी के पास खींच रही है। असल में, इसके पीछे उन लाखों आप्रवासी भारतीयों की अनसुनी रह गई व्यथाओं की अंतहीन कहानियां हैं, जो बेहतर कामकाज और जिंदगी के मोह में जैसे-तैसे पराई जमीन पर चले तो गए, लेकिन वहां पहुंच कर उन्हें दुतरफा प्रताड़नाएं झेलनी पड़ीं। कभी वे विदेशी धरती पर दोयम दर्जे के नागरिक बन कर रह गए तो कभी उन पर बदले हालात में नए कायदे-कानूनों की ऐसी मार पड़ी कि वे न घर के रहे न घाट के।

इन लाखों आप्रवासी भारतीयों को यह दुख भी सालता रहा है कि विदेश में बचत कर जमा की गई जो पूंजी वे स्वदेश में अपने आत्मीय जनों को भेजते रहे हैं और जिस बहाने भारत का विदेशी मुद्रा भंडार भरा रहा है, कोई मुसीबत पड़ने पर उनका वह देश भी ज्यादातर मौकों पर मूकदर्शक ही बना रहा।

इस अरसे में रोजी-रोजगार के लिए विदेश गए (आप्रवासी) भारतीयों पर क्या कुछ नहीं गुजरा है। कहीं उन्हें घृणित नस्लवाद का सामना करना पड़ा तो कहीं स्थानीय दबावों के कारण छंटनी प्रक्रिया का सामना करना पड़ा। स्थानीय जनता के दबावों में अमेरिका और ब्रिटेन जैसे बहुसंस्कृतिवादी मुल्कों में भी आव्रजन कानूनों में सख्ती लाने की मांग उठती रही है ताकि भारत-बांग्लादेश और गरीब यूरोपीय मुल्कों के नागरिक वहां प्रवेश न कर पाएं।

ईरान-इराक जैसे देशों में तो आप्रवासियों के आतंकी संगठनों के कब्जे में पड़ जाने की घटनाएं भी जब-तब प्रकाश में आती रही हैं। मामला अकेले सऊदी अरब या अमेरिका का नहीं है, आॅस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और जर्मनी जैसे विकसित देशों में भी प्रवासियों के प्रति जो घृणा दिखाई देने लगी है उसके पीछे भी रोजगार और संसाधनों का संकट जिम्मेदार है।

जिस अमेरिका में प्रशिक्षित-कुशल पेशेवरों की पूरी दुनिया से भारी मांग है, वहां भी सख्त आव्रजन कानून लागू करने की मांग उठती रही है। वह तो भला हो बराक ओबामा का, जिन्होंने हाल में अमेरिका में रह रहे एक करोड़ दस लाख अवैध आप्रवासियों में से पचास लाख को वैध तौर पर देश में रहने की छूट देने का एलान किया है। आप्रवासन नीति (इमिग्रेशन पॉलिसी) में हालिया सुधारों का लाभ अमेरिका में गैरकानूनी रूप से रह रहे करीब साढ़े चार लाख भारतीयों को मिलेगा। इनमें से भले ही बहुतेरे लोगों के पास वहां टिके रहने का कोई वैध दस्तावेज न हो, पर सच तो यह है कि अमेरिका के विकास में उनका भी एक योगदान रहा है।

वहां की अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने में उनके श्रम का भी महत्त्व है जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती। नई नीतियों के तहत ऐसे लोगों को तब तक जबरन स्वदेश वापस नहीं भेजा जाएगा, जब तक यह साबित न हो जाए कि वे किसी आपराधिक गतिविधि में शामिल थे। हालांकि इस छूट का लाभ केवल वही लोग उठा पाएंगे, जो पिछले पांच साल से अमेरिका में हैं।

विकसित देशों में अच्छे रोजगार का जो आकर्षण है, उनके कारण लाखों युवा उन देशों में जा पहुंचे हैं। कई बार ऐसे लोग कबूतरबाजी (गैरकानूनी माइग्रेशन) के रैकेट में फंस कर अवैध ढंग से वहां पहुंचते हैं और कई बार वीजा खत्म हो जाने के बाद भी अच्छे रोजगार और अच्छी जीवनशैली के मोह में वहां से वापस नहीं आना चाहते। ऐसा नहीं कि ये लोग अमेरिका या किसी अन्य विकसित मुल्क में जाकर गैरकानूनी काम करते हैं या आपराधिक गतिविधियों में लिप्त होते हैं, लेकिन दुनिया भर में बढ़ रहे आतंकवाद के खतरे के मद््देनजर अवैध ढंग से रहने वाले ऐसे आप्रवासियों पर स्थानीय जनता और सरकारों की नजर रही है। जनता ऐसे लोगों के खिलाफ इसलिए है, क्योंकि ये लोग स्थानीय रोजगारों और संसाधनों पर दबाव पैदा करते हैं, जबकि सरकारों को राजनीतिक कारणों से भी ऐसे लोगों के खिलाफ नीतियां बनाने को मजबूर होना पड़ता है। सऊदी अरब में पिछले साल लागू हुए निताकत श्रम कानून को इसकी सबसे बड़ी नजीर माना जा सकता है, जिसे स्थानीय आबादी को रोजगार में अहमियत देने के लिए लाया गया और इसकी सबसे बड़ी मार वहां अवैध दस्तावेजों के सहारे रह रहे हजारों भारतीय कामगारों पर पड़ी।

लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है, जिस पर शुक्र है कि बराक ओबामा की नजर गई। यह पहलू प्रवासियों की योग्यता और मेहनत से ताल्लुक रखता है। विकसित देशों में भारतीय आइटी पेशेवरों का महत्त्व इसीलिए बढ़ा कि वे उच्च शिक्षा, योग्यता रखते हैं और साथ में कम वेतन पर अधिक मेहनत से काम करते हैं। साथ में, जिन देशों में श्रमिकों की कमी है, वहां जाकर भी भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश के युवा ही काम करते रहे हैं। लेकिन कोई सामाजिक-आर्थिक संकट पैदा होने पर सबसे पहले इन्हीं प्रवासियों को वापस खदेड़ने की कोशिशें होने लगती हैं।

अमेरिकी इतिहास में यह शायद पहला मौका होगा, जब किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने आप्रवासन नीति में सुधार का फायदा अपने यहां अवैध रूप से रह रहे प्रवासियों को दिलाने की कोशिश यह कहते हुए की है कि प्रवासी हमारे देश के विकास के लिए मेहनत करते हैं और वे अपना परिवार चलाने के लिए बेहद मुश्किल और कम कमाई वाले काम भी करते हैं। यही नहीं, वे हमारे गिरजाघरों में प्रार्थना करते हैं और जिंदगी को लेकर उनकी उम्मीदें, सपने और देशभक्ति हमारी जैसी ही है। हमारी अर्थव्यवस्था में योगदान देने के कारण वे हमारे देश और जीवन का हिस्सा हैं, लिहाजा उन्हें यहां रहने का मौका देना चाहिए।

यों तो किसी भी देश के लिए अवैध ढंग से सरहद पार कर घुसपैठ कर चुके लाखों लोगों का पता लगाना काफी मुश्किल है, पर अगर यह जानकारी कर ली जाए, तो भी उन्हें पकड़ कर देश से बाहर करना व्यावहारिक नहीं है। अक्सर ऐसे लोगों का पता लगाने में दशकों का समय लग जाता है और तब तक ऐसे लोगों की अगली पीढ़ी वहां के माहौल में रच-बस जाती है। ऐसे लोगों को स्वदेश वापस भेजने की प्रक्रिया की जटिलता का हवाला देते हुए ओबामा ने इसे एक मानवीय त्रासदी करार दिया है।
मगर अलग-अलग देश में जब आप्रवासी भारतीय नरेंद्र मोदी के आगमन पर उत्साहपूर्वक एकजुट होते नजर आ रहे हैं तो इसका मतलब सिर्फ यह नहीं है कि वे अपने मुल्क के प्रधानमंत्री से दोहरी नागरिकता या वीजा में कुछ छूट की मांग कर रहे हों या उन देशों की सरकारों पर उनके हित में कोई दबाव बनाने को कहते हों। यह गोलबंदी एक वृहद इच्छा की तरफ संकेत करती है। यह इच्छा आप्रवासी भारतीयों की एक संयुक्त पहचान बनाने और उस आधार पर उनके योगदान को रेखांकित किए जाने से संबंधित है।

असल में, ब्रिटेन, अमेरिका या आॅस्ट्रेलिया में बसा भारतीय समाज वहां भी पंजाबी, गुजराती, तमिल, मलयाली या बंगाली समुदायों में बंटा हुआ है और इसीलिए वह एकजुट भारतीय समुदाय के रूप में कोई बात या मांग वहां की सरकारों के पास पर्याप्त दबाव के साथ नहीं पहुंचा पाता।

वहां ऐसा कोई मंच नहीं है जहां ये भारतीय के रूप में इकट्ठा हों और खुद से जुड़ी जरूरी चीजों पर संगठित राय जाहिर कर सकें। जाहिर तौर पर उन्हें इसका खमियाजा कभी कड़े आव्रजन कानूनों की मार के रूप में तो कभी रोजगारों में कटौती के रूप में उठाना पड़ता है। यह बात अब आप्रवासी भारतीयों की समझ में आ गई है। इसीलिए मोदी के आगमन के बहाने अब वे अपनी मूल सांस्कृतिक पहचानों से ऊपर उठ कर संगठित भारतीय की पहचान के रूप में सामने आ रहे हैं। इस तरह अनजाने में ही सही, पर नरेंद्र मोदी के विदेश दौरों का एक लाभ तो यह हुआ है कि विदेश में बसने के बावजूद अलग-अलग सांस्कृतिक खांचों में बंटा भारतीय समाज एकजुट हो रहा है और यह दावा पेश कर रहा है कि उन देशों की विकास प्रक्रिया में उनका भी भारी योगदान है। इस आधार पर वृहद योजनाओं या नीतियों में यह भारतीय समाज अपना हिस्सा मांग और यह दबाव बना सकता है कि कोई देश चोरी-चुपके उसे अपने अधिकारों से बेदखल नहीं कर सकता।

सच है कि देश से बाहर जो करीब सवा दो करोड़ भारतीय आप्रवासी के रूप में अलग-अलग देशों में मौजूद हैं, अगर उनकी कोई एक मजबूत सांगठनिक पहचान बनती है तो वे अपनी प्रतिभा, मेहनत, पैसे और रसूख के बल पर न केवल अपने लिए ज्यादा अधिकार मांग सकते हैं, बल्कि भारत की वैश्विक छवि में भी उल्लेखनीय सुधार कर सकते हैं।

 

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