ताज़ा खबर
 

मजमे का मनोविज्ञान

नाज़िम नक़वी जनसत्ता 7 अक्तूबर, 2014: हमारे एक पत्रकार मित्र ने, जो स्वभाव से बहुत विनोदी हैं, सोलह मई के दिन एक कोरे कागज पर लिखा ‘आज भारत बदला’। मैंने देखा उनके यह लिखते ही उस कागज पर एक उजाला-सा हुआ। दरअसल यह उजाला, संकेत था एक अनवरत इंतजार के अचानक खत्म होने का। नए […]

Author October 7, 2014 11:13 AM

नाज़िम नक़वी

जनसत्ता 7 अक्तूबर, 2014: हमारे एक पत्रकार मित्र ने, जो स्वभाव से बहुत विनोदी हैं, सोलह मई के दिन एक कोरे कागज पर लिखा ‘आज भारत बदला’। मैंने देखा उनके यह लिखते ही उस कागज पर एक उजाला-सा हुआ। दरअसल यह उजाला, संकेत था एक अनवरत इंतजार के अचानक खत्म होने का। नए प्रतीक, नए प्रतिमान, नए विचार… नहीं नहीं, कुछ भी नया नहीं, वही प्रतीक, वही प्रतिमान, वही विचार। तो फिर बदला क्या? पोशाक बदल गई, गिलास बदल गए, पैमाना बदल गया। गालिब ने घबरा कर पूछा, और शराब? फिराक मुस्कराए, वो कैसे बदलेगी, शराब, शराब ही रहेगी।

नरेंद्र भाई मोदी के सत्ता में आते ही परिवर्तन का शंखनाद किया जा चुका है। अट्टालिकाओं को झाड़ा-पोंछा जा रहा है। सड़कों को साफ किया जा रहा है। अस्त-व्यस्त को चुस्त-दुरुस्त किया जा रहा है। उम्मीदों की सुनामी आ चुकी है। गैर-जरूरी चीजें तात्कालिक जरूरतें बन गई हैं, इसलिए जरूरतों को जरा पीछे धकेल दिया गया है।

परिवर्तन का जश्न जारी है। ‘अभी तो छह महीने भी नहीं हुए हैं’, ऐसा संघ प्रमुख मोहन भागवत ने दशहरे के दिन संघ के स्थापना दिवस के अपने पारंपरिक भाषण में कहा। हमारा इतिहास-बोध हमसे कहता है कि किसी भी विपरीत विचार में, जब तक उसके नतीजे न प्रकट हों, बला की उत्तेजना होती है। आप किसी को सारी सुख-सुविधाएं देकर कैद कर दीजिए तो उसे अपनी आजादी सबसे मूल्यवान लगने लगती है और वह मौका पाते ही सब कुछ तज कर आजाद होने के लिए अंधेरे में ही निकल पड़ता है। इसके विपरीत किसी को पूरी आजादी देकर जीने के लिए छोड़ दीजिए तो वह सांसारिक सुविधाओं का बंदी बनने को आतुर रहता है और चाहता है कि उसके बंदीगृह के बाहर से उखाड़ी गई उसकी नेम-प्लेट दुबारा जड़ दी जाए।

आइए मजबूत जनादेश मिल गया है तो अब राष्ट्रीयता की बात करें। यही सबसे जरूरी भी है, उसे पाने के लिए जिसका सपना देखा गया है। वे कारण जो बाधा हैं, जो विषमताएं बढ़ाते हैं, उन्हें पहचान कर दूर किया जाए। क्योंकि बकौल प्रेमचंद, जो बयासी वर्ष पहले आगाह कर चुके हैं कि ‘‘हम मुंह से चाहे राष्ट्रीयता की दुहाई दें, दिल से हम सभी संप्रदायवादी हैं और हर बात को संप्रदाय की आंखों से देखते हैं। क्या यह सत्य नहीं है कि जब कोई सांप्रदायिक दंगा हो जाता है तो हम तुरंत यह जानने को उत्सुक हो जाते हैं कि उस दंगे में कितने हिंदू हताहत हुए और कितने मुसलमान। यह मनोवृत्ति राष्ट्रीयता का गला घोंटती है।’’ इस घुटन भरे वातावरण के लिए वे जिम्मेदार उस तंगखयाली को ठहराते हैं जो सांप्रदायिक माहौल में रहने की वजह से धर्म और समाज के ठेकेदारों में आ जाती है। बयासी साल पहले जो लिखा गया था वह लगता है अभी लिखा गया है। फिराक फिर संजीदा हो गए, शराब तो शराब ही रहेगी।

इसका आभास मोहन भागवत को भी है, बल्कि अब तो जिम्मेदारी भी और बढ़ गई है। नागपुर से अपने पहले राष्ट्रीय प्रसारण में उन्होंने अपनी इस जिम्मेदारी का अहसास कुछ यों कराया- ‘‘…एक सत्य का साक्षात्कार हमारे त्रृषि-मुनियों ने कर लिया, उनको यह जोड़ने वाला तत्त्व, उसका अनुभव हो गया, वह अनुभव क्या था, वह अनुभव यह था कि एक ही चैतन्य विविध रूप लेकर सृष्टि के रूप में प्रगट हुआ है, नाम रूप अलग है, परंतु मूल एक ही है, वो एक ही प्रकट हुआ है अनेक के रूप में, और इसलिए आपस में कोई संघर्ष नहीं है, ये जो विविध नाम-रूप दिखते हैं उसका सम्मान करो, उसका स्वीकार करो, जो एक चैतन्यमय सत्य है उसका साक्षात्कार करो, सारी विविधताओं का सम्मान है और स्वीकार है।’’ निदा फाजली अपने एक दोहे में सत्य के इस सार को यों बयान करते हैं- अल्लाह वो कुरआन में, रामायन में राम। जितनी जग में बोलियां, उतने उसके नाम।

प्रेमचंद भी इसी हकीकत को उजागर कर रहे हैं, लेकिन आज के संदर्भ में उनका दायरा थोड़ा सिमटा हुआ है। यह दायरा हिंदू-मुसलमान तक सीमित है। ‘‘हिंदू मुसलमान न कभी दूध चीनी थे, न होंगे और न होने चाहिए। दोनों की अलग-अलग सूरतें बनी रहनी चाहिए और बनी रहेंगी। जरूरत सिर्फ इस बात की है कि उनके नेताओं में परस्पर सहिष्णुता और उत्सर्ग की भावना हो। आमतौर पर हमारे नेता वे सज्जन होते हैं जो अपने संप्रदाय की मुसीबतों और शिकायतों का हमेशा बहुत सरगर्मी से रोना रोया करते हैं। वे अपने संप्रदाय के लोगों की दृष्टि में लोकप्रिय बनने के लिए उनकी भावनाओं को उकसाते हैं और समझौते के मुकाबले, जो उनके इस विलाप को बंद कर दे, ऐसे झगड़ों को कायम रखना जरूरी समझते हैं।’’

मगर संघ प्रमुख के सामने वक्त का तकाजा यह है कि इस दायरे को बड़ा किया जाए। जात-पांत, संप्रदाय, भाषा, प्रांत, मत, पक्ष, इन सारे भेदभावों को इस दायरे में लाया जाए। छुआछूत और भेदभाव के जाल को तोड़ना मुमकिन नहीं तो सब अपने परों को आजमाएं, और जाल समेत उड़ जाएं। जाल से बचना छोड़िए, शिकारी से बचिए। जब भेदभाव स्वार्थ-सिद्धि का जरिया न रहेंगे तो डारविन की थ्योरी के हिसाब से लुप्त हो जाएंगे या बीपीएल जैसी श्रेणी के हो जाएंगे।

सत्य का यह साक्षात्कार हो तो चुका था इतिहास-पूर्व प्राचीनकाल में, लेकिन इस विचार पर विचार करने का समय अब आया है। चलिए देर आए दुरुस्त आए का मुहावरा भी हमने ही गढ़ा है, किसी और ने नहीं। तो अब समझदारी यही है कि यकीन कीजिए कि जिस जोड़ने वाले तत्त्व से राष्ट्रीयता को पाया जा सकता है, वह मिल गया है। अब जो पहला काम है वह यह कि समाज को उसकी जिम्मेदारियों से रूबरू करा दिया जाए। हर सरकार की यही मनोकामना होती है कि उसके कार्य को अवाम का सहयोग भी मिले और समर्थन भी। जब तक आप इसको कायम रखेंगे, आपका इकबाल बना रहेगा। हमने अभी-अभी गुजरे समय में दो ऐतिहासिक समर्थन देखे हैं। एक केजरीवाल का, जिन्होंने अपनी मनोकामनाओं का गला अपने ही हाथ से घोंट दिया। दूसरा जनादेश मोदी का।

इतने बड़े जनादेश में जनता के सहयोग और समर्थन की लालसाएं भी उसी अनुपात में बड़ी होती हैं। प्रधानमंत्री अपनी पूरी क्षमता के साथ जनता से अपना संवाद बनाए हुए हैं। धीरे-धीरे लोग उनके तेवर, तर्क और तत्परता के कायल होते जा रहे हैं। लेकिन चिंता का विषय यह है कि सबकुछ गालिब के तमाशे जैसा होता जा रहा है। हर आंख अब उस केंद्र पर टिकने लगी है जहां से कुछ होने के संकेत मिले हैं। मजमे का मनोविज्ञान यही है।

जाहिर है, केंद्र में सिर्फ और सिर्फ मोदी हैं। ऐसे में राष्ट्रीयता के सवाल पर जनता की सहभागिता मांगना और उसे एक आंदोलन बना डालने के नतीजे किसी भी हाल में बुरे नहीं हो सकते। स्वच्छता की जिम्मेदारी जाति आधारित न होकर सबकी हो, यह कह कर और करके प्रधानमंत्री एक बहुत बड़े तबके को एक बड़ा संदेश दे रहे हैं। उनके समर्थन में खड़े लोग भी ऐसी राष्ट्रव्यापी योजनाओं में अपनी भागीदारी महसूस कराना चाहते हैं। समर्थन का सिंद्धांत भी यही होता है। ‘‘सामाजिक भेदभाव तो कोई सरकार मन से नहीं हटा सकती, व्यवस्थाएं खड़ी कर सकती है, लेकिन जब तक मन से जाता नहीं हैं, व्यवस्थाओं का कोई उपयोग नहीं है। मन से भेदभाव हटाने का काम केवल समाज कर सकता है। हम अपने मन से प्रारंभ करें।

प्रत्येक भारतवासी भारत मां का पुत्र मेरा अपना भाई है ऐसे मैं व्यवहार करूंगा, मेरे मन में भी भावना नहीं आएगी भेद की, यही अपने घर में कीजिए, हमारे घर में, परंपरा से हो सकता है कुछ ऐसी कुरीतियां चलती होंगी, अंधविश्वास चलते होंगे, सबको साफ करना पड़ेगा, और घर में भी सबके प्रति समानता का वातावरण और व्यवहार, मन वचन और कर्म से प्रकट हो, इसको देखना पड़ेगा। अपने मित्रों में, परिचितों में, उनके घरों में यही हो, ऐसे संबंध रखने पड़ेंगे। बात करनी पड़ेगी। मंदिर, श्मशान और पानी की जगह सब हिंदुओं के लिए एक होनी चाहिए, इसका प्रयास करना पड़ेगा।’’ इससे पहले कि कोई पूछ बैठे कि हां भाई बताओ क्या किया, उसी से पूछ बैठिए कि बंधु तुमने क्या किया। कल्पना कीजिए कि संघ प्रमुख की यह बात मान ली जाए तो कितना बड़ा परिवर्तन देखने को मिल सकता है। यह प्राप्त कर लेने के बाद तरक्की के पायदान पर चीन से आगे जाने की बात महज एक खानापूर्ति ही रह जाएगी। एक-हुक्म या एकता दरअसल एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।

अभी अपने एक लेख में मेघनाथ देसाई ने सुझाव दिया कि स्वच्छता के इस अभियान को अगर कामयाब करना है तो इसमें सड़कों पर मांग रहे भिखारियों को (जिनमें बच्चों की तादाद ज्यादा है) और ऐसी महिलाओं को जो उनके नेतृत्व के लिए आग आना चाहें (क्योंकि महिलाओं को सफाई की समझ ज्यादा होती है), एक निर्धारित पारश्रमिक के तहत सफाई करने के काम से जोड़ लिया जाए। कल्पना कीजिए कि ऐसा हो जाए तो शहरों, कस्बों और गावों में एक ऊर्जा दौड़ जाएगी। मनरेगा के शुरुआती दिनों जैसी ऊर्जा। इस ऊर्जा की नई सरकार को सख्त जरूरत है क्योंकि उसे वादा निभाना है। लेकिन इसके लिए उसे, उस समाज को भी जवाबदेह बनाना है जो भिक्षुता और फकीरी को मरने नहीं देता।

हमारे गांव में घर-घर मांगने वाले एक पारंपरिक परिवार के पास दो-तीन कमरों का एक ठीक-ठाक कच्ची दीवारों वाला मजबूत घर है। उसके बच्चे बिना भीख मांगे अपनी मेहनत पर गुजारा कर सकते हैं, और करते भी हैं। लेकिन उसकी मजबूरी है कि वह भीख मांगता है क्योंकि अगर वह ऐसा न करे तो गांव वाले अपने बचे-खुचे को किसे दान करके पुण्य कमाएं! और यही किया जा रहा है। प्रधानमंत्री हों या संघ प्रमुख, सब इस जवाबदेही की जरूरत को समझ रहे हैं। उम्मीद है कि कदम आगे बढ़ेंगे तो कारवां बनता जाएगा।

फिलहाल तो सारे सियासी समीकरण, दो राज्यों के चुनावों तक सीमित हो गए हैं। हर दल की राष्ट्रीय ऊर्जा जीत और हार के दांव में फंसी हुई है। दिल्ली दरबार में महाभारत जारी है। पांसा फेंटा जा रहा है। और जनता…? बकौल निदा फाजली- एक बकरे ने दूसरे से पूछा/ हमारी कीमतें बहुत बढ़ गई हैं/ दूसरे ने कहा/ ये सब बदली हुई/ सियासत का नतीजा है/ पहला बोला/ सियासत कोई भी हो हमें तो/ कटना ही है/ दूसरे ने सर झुकाया/ हां! ये सही है/ कभी मजहब के नाम पर/ कभी भोजन के लिए।

 

फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App