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स्वामी अग्निवेश जनसत्ता 22 सितंबर, 2014: तात्त्विक दृष्टि से देखा जाए तो सृष्टि और समाज में मूल द्वंद्व सकारात्मक और नकारात्मक तरंगों और ऊर्जाओं के बीच है। प्रकृति और मानव जगत के आपसी रिश्ते को हमें बार-बार समझने की जरूरत है, लेकिन जो दिखाई देता है वह यह कि जैसा हमारे जीवन और समाज में, […]

Author September 23, 2014 9:12 AM

स्वामी अग्निवेश

जनसत्ता 22 सितंबर, 2014: तात्त्विक दृष्टि से देखा जाए तो सृष्टि और समाज में मूल द्वंद्व सकारात्मक और नकारात्मक तरंगों और ऊर्जाओं के बीच है। प्रकृति और मानव जगत के आपसी रिश्ते को हमें बार-बार समझने की जरूरत है, लेकिन जो दिखाई देता है वह यह कि जैसा हमारे जीवन और समाज में, वैसा ही प्रकृति में भी सौंदर्य और विद्रूप, प्रकाश और अंधकार का द्वंद्व व्याप्त है। तूफान और जलजले से आने वाली तबाही और गंदगी, हिंसा और अन्यायपूर्ण किसी भी प्रकार की स्थिति को हम सौंदर्य से जोड़ कर नहीं देख सकते। हो सकता है बम विस्फोट के धुएं और लपटों को टीवी स्क्रीन पर देख कर बहुतों को रोमांच होता हो। कोरी संवेदना के धरातल पर इसे किंचित स्वाभाविक भी कहा जा सकता है। लेकिन मानवीय चेतना तो उसकी भयावहता आंकने में है। और यह समझने में कि यह विस्फोट और यह तबाही नकारात्मक है, जिस पर न खुशी जाहिर की जा सकती है न गर्व किया जा सकता है। ये जो रंग-बिरंगे विस्फोटों और तबाहियों के लोमहर्षक, रोमांचकारी दृश्य दिखाए जा रहे हैं, इनके पीछे का सच पैसे से लेकर प्रतिभा और संसाधनों के दुरुपयोग तक और घर-मकान से लेकर जान-माल की क्षति तक बहुत ही भयावह और मनुष्यता-विरोधी है।
यहां तक समझना बुनियादी बात है, क्योंकि सकारात्मकता की दिशा में हम यहीं से कदम उठाते हैं। यह कदम इस मकसद से उठाते हैं कि घर-आंगन से लेकर देश-दुनिया तक हिंसक गतिविधियों या हिंसाचार का विरोध हो और सर्वत्र अहिंसा की स्थापना हो, उसे बढ़ावा मिले। यह अहिंसा परंपराबद्ध कोई पुरानी धार्मिक चीज नहीं है कि जिसका उपदेश बुद्ध, महावीर से लेकर महात्मा गांधी तक धर्मप्राण सभी आत्माएं करती आई हैं। यह वस्तुत: सभ्यता और इंसानियत की कसौटी है, तभी हम इस पर इतना सोचते और संघर्ष करते हैं। प्राय: सभी काल और देश में इसके पक्ष में बोलने और काम करने वाले महान व्यक्ति होते आए हैं। शायर कहता है-
सभ्य होने का दम नहीं भरिए
खून का खेल अभी जारी है।

असभ्यता से सभ्यता की ओर बढ़ते हुए हम वस्तुत: हिंसा से अहिंसा की ओर ही बढ़ रहे होते हंै, अन्यथा हमारा जीवन अगर एक चेतना-यात्रा है, तो वह और किसलिए? यह बोध होना स्वयं में एक महत्त्वपूर्ण बात है, लेकिन इससे भी अधिक महत्त्व की बात है कि इस बोध का जन-जन तक प्रसार और संक्रमण हो, हिंसा को अहिंसा पराजित कर दे और वह हमारा मूल्य और आदर्श बन सके। अगर ऐसा सोचा जाता है और इसके लिए प्रयास किया जाता है तो हम स्वयं को सकारात्मकता की दिशा में यकीनन मजबूत होता पाएंगे। मजे की बात यह कि इसके लिए किसी विचारधारा और गुरुडम की भी जरूरत नहीं है। हम बहुत सरल तरीके से चीजों को सकारात्मक-नकारात्मक या अहिंसा-हिंसा में बांट सकते हैं और अपनी चेतना से उनमें से एक के साथ अपना रिश्ता जोड़ सकते हैं।
जाहिर है, यह काम हम हिंसा की परख और पहचान के बिना नहीं कर सकते। प्रत्यक्ष हिंसा तो हम सभी देख लेते हैं, लेकिन अप्रत्यक्ष हिंसा का संसार कुछ कम बड़ा नहीं है और सूक्ष्म इतना है कि बहुधा हम नजरअंदाज कर देते हैं। सांविधानिक तौर पर हिंसा की परिभाषा बहुत स्थूल होती है।
कानून और अदालत के विचार के दायरे में आने वाली हिंसा के सभी रूपों को देखा और गिना जा सकता है, लेकिन यही अदालत और कानून जब हिंसा के समर्थन में या फिर हिंसक व्यवस्था के स्तंभ के रूप में काम कर रहे होते हैं तो उन्हें कोई नहीं देखता। क्या ऐसा नहीं कहा जाना चाहिए कि हम्मूराबी से लेकर नेपोलियन बोनापार्ट तक और मनु से लेकर डॉ आंबेडकर तक आज तक जितने भी संविधान लिखे-लिखाए गए हैं, वे सभी हिंसा की नुमाइंदगी करते हैं, क्योंकि उनके तैयार किए जाने में केवल और केवल पुरुषों की भूमिका है? हो सकता है थोड़ी-बहुत कहीं स्त्रियों की भी भूमिका रही हो, पर अपवादों और अनुकंपाओं से इतिहास नहीं बना करते।
यह एक अकाट्य तथ्य है कि जिस सभ्यता और समाज में हम रह रहे हैं उसका नेतृत्व और नियंत्रण पुरुषों के हाथ में रहा है। खैर यह तो इतिहास की बात है। आज भी अगर हम गौर करें तो दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की संसद में ऐसे नेता हैं जो कहते हैं कि स्त्रियों को तैंतीस प्रतिशत आरक्षण दिया जाना सही और शुभ नहीं होगा, और वे इसके विरोध में आत्महत्या तक करने के लिए तैयार हैं। क्या हमने कभी सोचा है कि अगर हम सभी क्षेत्रों में स्त्रियों का अधिकार इक्यावन प्रतिशत कर दें तो हम सकारात्मकता की दिशा में सदियों का अपेक्षित एक महान लक्ष्य सहज ही पा जाएंगे।
कोई-सी भी बात हो, संदर्भ हो, दो व्यक्तियों के आपसी रिश्तों से लेकर व्यापक सामाजिक संदर्भ तक कोई-सा परिदृश्य हो, हिंसा-अहिंसा के बारे में अगर हमारी दृष्टि स्पष्ट है तो यह समझा जा सकता है कि सकारात्मकता और नकारात्मकता को समझने में हम समर्थ हैं। जैसे कबीर ने प्रेम को और गांधी ने अहिंसा को ही ब्रह्मार्थक शब्द मान लिया था, उस भाव से देखने पर हिंसा और अहिंसा के सारे संदर्भ हमारे सामने स्पष्ट होते जाएंगे। वस्तुत: तब हम यह देख पाएंगे कि जिस व्यक्ति का रुझान प्रेम और कला-संस्कृति तथा श्रम की ओर है उसकी प्रवृत्ति में हिंसा कम से कम पाई जाती है। बरक्स इसके राजनीतिक और आर्थिक रुझान वाले व्यक्ति अधिक हिंसक होते हैं। ऐसा कह कर हम किसी वर्ग विशेष का अपमान नहीं कर रहे, बल्कि यह एक तथ्य है और विज्ञान भी कि प्रेम की मिट्टी में झूठ और हिंसा के झंखाड़ और कटीले पेड़ नहीं उगते, ये फसलें बेशक राजनीति के खेतों में उगती हैं या उगाई जाती हैं।
मौलाना अबुल कलाम आजाद ने ‘गुबारे-खातिर’ में फारसी के एक शायर को उद्धृत किया है, जो कहता है मुझसे प्यार और मुहब्बत के किस्सों के सिवा और कुछ मत पूछ कि तुम्हारे इतिहास में खून के छीटों के अलावा और कुछ नहीं। कहने की जरूरत नहीं कि यह इतिहास राजसत्ता और अर्थसत्ता का इतिहास है। धर्म और विज्ञान- इन दोनों के दामन भी खून के छींटों से कम नहीं रंगे हैं, लेकिन गौर से देखने पर वहां राजनीति और अर्थसत्ता ही नजर आएंगी, अन्यथा प्रकृतित: धर्म और विज्ञान का हिंसा से कोई लेना-देना नहीं है। धर्म की चेतना तो सभ्यता की मूल चेतना है, जबकि विज्ञान की सार्थकता मनुष्य जाति की उच्चतर और व्यापकतर सेवा में है। लेकिन इतिहास हमें बताता है कि धर्म और विज्ञान जब-जब, जहां-जहां जिस अनुपात में राज्याश्रित हुए हैं, वे हिंसक हुए हंै और उनका इस्तेमाल राजसत्ता को बनाए रखने के लिए हुआ है। बेशक कुछ अच्छे उदाहरण भी इतिहास में मिलते हैं, जब धर्म और विज्ञान का सदुपयोग राजसत्ता द्वारा किया गया।
बहरहाल, आज की हिंसा बहुत मायावी है, इसे हम सभी महसूस करते हैं। इसके असंख्य रूप हैं। राजनीतिक-दार्शनिक विश्लेषक बड़े मजे में कह सकते हैं कि यह अमेरिकी साम्राज्यवाद का दौर है जिसके दो बाजू हैं- भूमंडलीकृत बाजारवाद और आतंकवाद। भूमंडलीकरण बाजारवाद और आतंकवाद के सहारे ही विस्तार पाता गया है और कहना मुश्किल है कि इन दोनों में से किसने अधिक हिंसा फैलाई है। यों आतंकवाद के कुछ दूसरे रूप भी हैं जिन्हें साम्राज्यवाद-विरोधी आतंकवाद कहा जा सकता है।
जो भी हो, आतंकवाद से जुड़ी जो हिंसा और उसके तकनीकी रूप हैं, घटनाएं हैं, प्रक्रियाएं हैं, और चेहरे हैं, उन्हें हम सब देखते हैं, जानते हैं, लेकिन बाजारवाद ने जिन नैतिक मूल्यों को हमसे छीना है, रिश्ते-नातों को जिस तरह एक सस्ते वातावरण में सिमटने-बिखरने को विवश कर दिया है, संवेदना की जगह यांत्रिकता का वर्चस्व और जन-गण से जुड़े जमीनी मुद््दों और समस्याओं की उपेक्षा कर वैचारिक, बौद्धिक विमर्श मात्र को हमारा यथार्थ बना दिया है, इन सब में व्याप्त हिंसा का हम सही-सही मापन नहीं कर सकते। सबसे खतरनाक स्थिति होती है मानवीय संवेदना और मनुष्योचित व्यवहार-चेतना का मर जाना- और आज का भूमंडलीकृत बाजारवाद यह उपलब्धि हासिल करके ठहाके लगाता प्रतीत होता है।
आज से दो सौ साल पहले हमारे देश के एक बड़े कवि मिर्जा गालिब ने कहा था- ‘बस कि दुश्वार है हर काम का आसां होना/ आदमी को भी मयस्सर नहीं इन्सां होना।’ और उसके बाद हंसराज रहबर ने भी कहा- ‘तलाशे-अजमते-आदम नहीं है/ बड़ा इस गम से कोई गम नहीं है।’ ये अभिव्यक्तियां आज सिर चढ़ कर बोल रही हैं। सब कुछ का विकास हो रहा है, लेकिन मनुष्यता और मानवीय संवेदना की कीमत पर। क्या हम इसे सकारात्मक स्थिति कह सकते हैं? यह मनुष्य का समाज है और बेशक ईश्वरीय प्रेरणा और शक्ति से, सब कुछ अर्जित किया हुआ मनुष्य ही का है, ऐसे में विकास किसी भी क्षेत्र का हो उसे सार्थक होने के लिए, सकारात्मक कहलाने के लिए मनुष्यता और लोकतंत्र की कसौटी पर खरा उतरना ही होगा, अन्यथा वह विकास नहीं, कुछ और है।
क्या यह कोई विकासमान चेतना का स्वर है कि हमारे समाज में घोषणा की जाती है- ‘आज हमारे पास इतनी आणविक-परमाणविक शक्ति इकट्ठी हो गई है कि जिससे पृथ्वी को सात बार नष्ट किया जा सकता है।’ यह तो कुछ ऐसा ही विकास है कि कोई हट्टा-कट्टा युवक अपनी पसलियां चमका कर कहे, ‘मेरे बाजुओं में इतनी ताकत आ गई है कि इससे मैं सात बार अपनी बूढ़ी मां का गला घोंट सकता हूं।’ यह है नकारात्मक विकास और मानवीय चेतना के पतन का चरमोत्कर्ष। अगर हमारी सभ्यता का अर्थात हमारे ज्ञान-विज्ञान का सकारात्मक विकास हुआ होता तो हम कहते- आज हम विज्ञान और तकनीकी में इतने उन्नत हो गए हैं कि हम अपनी पृथ्वी को सात गुना अधिक खुशहाल बना सकते हैं। काश, कभी हम इसी सकारात्मक मुहावरे में बात करने योग्य समाज बना सकें।

 

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