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न्यायिक सक्रियता के पक्षधर

सुधांशु रंजन न्यायिक जीवन में कई शतक लगाने वाले उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति वीआर कृष्ण अय्यर ने जिंदगी की पाली में भी शतक लगा कर दुनिया को अलविदा कह दिया। अपने जीवनकाल में ही एक किंवदंती बने कृष्ण अय्यर ने न्यायिक धारा को मोड़ कर उसे जनोन्मुखी बनाने का काम किया। वैसे तो […]

सुधांशु रंजन

न्यायिक जीवन में कई शतक लगाने वाले उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति वीआर कृष्ण अय्यर ने जिंदगी की पाली में भी शतक लगा कर दुनिया को अलविदा कह दिया। अपने जीवनकाल में ही एक किंवदंती बने कृष्ण अय्यर ने न्यायिक धारा को मोड़ कर उसे जनोन्मुखी बनाने का काम किया। वैसे तो किसी भी महापुरुष के निधन पर ‘अपूरणीय क्षति’ जैसी सामान्योक्ति का इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन कृष्ण अय्यर के मामले में ऐसा ही है। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने लिखा है कि हिंदी साहित्य में कई महान विभूतियां हुर्इं, पर वैसी विभूतियां आगे भी होंगी। लेकिन तीन विभूतियां ऐसी हैं, जिनके बारे में कहना मुश्किल है कि वैसी प्रतिभा का आविर्भाव आगे भी होगा। ये विभूतियां हैं- आचार्य रामचंद्र शुक्ल, आचार्य रघुवीर और महापंडित राहुल सांकृत्यायन। न्यायमूर्ति कृष्ण अय्यर के बारे में भी ऐसा कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी।

वे देश के अकेले व्यक्ति थे, जिन्हें सरकार के तीनों अंगों- विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका- में काम करने का अवसर मिला और हर जगह उन्होंने अपनी छाप छोड़ी। इग्लैंड के लॉर्ड डेनिंग और अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति डगलस की तरह वे वंचितों के मसीहा बने रहे। अदना इंसान को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय दिलाने की तड़प ने उन्हें विशिष्ट बना दिया। आम आदमी के लिए उनकी तड़प उनकी पुस्तक ‘सम हाफ- हिडन आस्पेक्ट्स आॅफ इंडियन सोशल जस्टिस’ (1980) में साफ झलकती है, जिसमें उन्होंने सामाजिक न्याय की अवधारणा को परिभाषित किया।

यह न्याय की उस औपचारिक धारणा के विपरीत है, जिसमें विधि के अनुसार न्याय होता है और सैद्धांतिक रूप से अमीर और गरीब सभी कानून की नजर में बराबर हैं। पर यहां धनवानों की आर्थिक सौदेबाजी की ताकत को नजरअंदाज कर दिया जाता है, जो न्याय प्रक्रिया को प्रभावित करती है। न्यायमूर्ति अय्यर का स्पष्ट मत था कि आधुनिक भारतीय समाज में अदालत को न्याय के तराजू को संतुलित रखना होगा- सिर्फ व्यक्ति और व्यक्ति के बीच नहीं, बल्कि व्यक्ति और राज्य के बीच भी।
15 नवंबर, 1915 को वर्तमान केरल के पलक्कड़ जिले के पालाघाट में जन्मे वैद्यनाथपुरम राम अय्यर कृष्ण अय्यर ने 19 सितंबर, 1938 को मद्रास उच्च न्यायालय में वकालत शुरू की। आदर्शवाद और समाजवादी संवेदना से लबरेज इस युवा अधिवक्ता ने गरीब और जरूरतमंद लोगों की तहेदिल से मदद की, जिसके चलते बहुत कम समय में वे आम आदमी के चहेते बन गए। 1946 के हिंसक आंदोलन में कम्युनिस्टों ने भाग लिया और उन्होंने अदालत में उनकी ओर से मुकदमे लड़े। कम्युनिस्टों ने 1948 के ‘कलकत्ता थीसिस’ में हिंसा का समर्थन किया। इसके बावजूद वे उनकी ओर से अदालतों में पैरवी करते रहे, हालांकि व्यक्तिगत रूप से वे हिंसा के विरुद्ध थे।
कम्युनिस्टों की सक्रिय रूप से मदद करने और उन्हें अपने यहां छिपाने के आरोप में मई, 1948 में उन्हें गिरफ्तार किया गया और उन पर कई मनगढंत आरोप लगाए गए। पर मद्रास सरकार अदालत में कोई ठोस प्रमाण नहीं दे पाई और एक महीने के बाद उनकी रिहाई हो गई। इस दरम्यान जो उन्होंने जेल की दुर्दशा देखी, उससे जेल सुधार उनके जीवन का मनोभाव बन गया।

निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में 1952 में मद्रास विधानसभा और 1957 में केरल विधानसभा के लिए निर्वाचित हुए। 1957 में इएमएस नंबूदिरीपाद के नेतृत्व में जब पहली कम्युनिस्ट सरकार बनी तो उन्हें मंत्री बनाया गया और छह विभागों का प्रभार सौंपा गया। गृहमंत्री के रूप में उन्होंने जेल सुधार और विधिमंत्री के रूप में देश में पहली बार कानूनी सहायता का कार्यक्रम शुरू किया। 1959 में केंद्र सरकार ने केरल सरकार को बर्खास्त कर दिया।

सन 1960 में हुए चुनाव में वे फिर निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में खड़े हुए, लेकिन मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार से सात मतों से हार गए। उन्होंने इसे अदालत में चुनौती दी और विजयी घोषित हुए।

सक्रिय राजनीतिक जीवन के बावजूद 2 जुलाई, 1968 को उन्हें केरल उच्च न्यायालय का स्थायी न्यायाधीश नियुक्त किया गया। शपथ लेते ही उन्होंने कहा कि उनका प्रयास होगा एक ‘जुडिशियल एक्टिविस्ट’ बनने का और अपने पद का इस्तेमाल वे कानून का शासन स्थापित करने के लिए करेंगे, ताकि हर नागरिक को समानता का अधिकार प्राप्त हो सके। पांच वर्ष बाद 17 जुलाई, 1973 को उन्हें उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश बनाया गया।

उनके राजनीतिक अतीत के कारण तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति एसएम सीकरी ने उनके नाम की अनुशंसा नहीं की। केशवानंद भारती मामले में उच्चतम न्यायालय का फैसला केंद्र सरकार को रास नहीं आया और न्यायमूर्ति सीकरी के अवकाश ग्रहण के बाद पहली बार तीन वरिष्ठतम न्यायाधीशों को नजरअंदाज कर न्यायमूर्ति एएन रे को मुख्य न्यायाधीश बनाया गया।

अचानक उच्चतम न्यायालय में कई पद रिक्त हो गए और मुख्य न्यायाधीश रे ने न्यायमूर्ति कृष्ण अय्यर के नाम की अनुशंसा की। उस समय सोली सोराबजी सहित कई अधिवक्ताओं ने उनकी नियुक्ति का विरोध किया था।

यह भी आरोप लगा कि कुछ खास विचारधारा वालों को उच्चतम न्यायालय में भरा जा रहा है। इस आशंका की वजह यह थी कि उस समय मोहन कुमारमंगलम ने ‘प्रतिबद्ध न्यायपालिका’ का नारा दिया था। यानी न्यायाधीश ऐसे हों, जो सरकार की प्रगतिशील नीतियों का समर्थन कर उन्हें आगे बढ़ाने में मदद करें। बैंकों के राष्ट्रीयकरण और प्रीवीपर्स खत्म किए जाने के मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्णयों से सरकार पूरी तरह असंतुष्ट थी।

लेकिन न्यायमूर्ति अय्यर ने अद्भुत निष्पक्षता का परिचय दिया। जब इंदिरा गांधी के चुनाव को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया तो उसके विरुद्ध उच्चतम न्यायालय में इंदिरा गांधी ने अपील दायर की। याचिका में उच्च न्यायालय के निर्णय पर पूर्ण स्थगन आदेश जारी करने की प्रार्थना की गई। कृष्ण अय्यर ने निर्णय दिया कि हालांकि इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री के रूप में काम करती रहेंगी, पर सांसद के रूप में वे काम नहीं कर पाएंगी और संसद के मतदान में हिस्सा नहीं लेंगी। यह निर्णय 24 जून, 1975 को दिया गया और केंद्र सरकार ने 25 जून को आपातकाल की घोषणा की। इसलिए कई लोग ऐसा मानते हैं कि आपातकाल की घोषणा के पीछे उच्चतम न्यायालय का निर्णय एक बड़ा कारक तत्त्व बना।

कृष्ण अय्यर ने जनहित याचिका (पीआइएल) की शुरुआत कर जनता को एक बहुत बड़ी शक्ति दी। तिहाड़ जेल से सुनील बत्रा ने उन्हें एक पत्र भेजा, जिसे उन्होंने याचिका में बदल कर उस पर सुनवाई की। उच्चतम न्यायालय में अपने साढ़े सात वर्षों के कार्यकाल में उन्होंने 724 निर्णयों में हिस्सा लिया और 291 फैसले खुद लिखे, जो मील के पत्थर माने जाते हैं।

कृष्ण अय्यर की न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति से कई सीखें लेनी चाहिए। पहली यह कि व्यक्ति का अपना चरित्र सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण होता है। राजनीतिक संबद्धता या पृष्ठभूमि के बावजूद एक ईमानदार व्यक्ति निष्पक्षता से अपना काम करेगा। दूसरी सीख यह कि केवल वरीयता के आधार पर अगर उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की नियुक्ति होती तो न्यायमूर्ति अय्यर को कभी सर्वोच्च अदालत में बैठने का अवसर नहीं मिलता।

तत्कालीन इस्पात मंत्री मोहन कुमारमंगलम से उनकी मित्रता थी, क्योंकि कुमारमंगलम भी वामपंथी राजनीति से कांग्रेस में आए थे। 1970 के दशक में जब कृष्ण अय्यर केरल उच्च न्यायालय के न्यायाधीश थे तो कुमारमंगलम ने उन्हें फोन किया कि वे उन्हें विधि आयोग का सदस्य बनाना चाहते हैं। न्यायमूर्ति अय्यर को उनका प्रस्ताव अच्छा नहीं लगा। उन्हें लगा कि आयोग में उनकी प्रतिभा का समुचित इस्तेमाल नहीं होगा और उन्होंने अनिच्छा प्रकट की।

इस पर कुमारमंगलम ने रहस्योद्घाटन किया कि दरअसल, वे उन्हें उच्चतम न्यायालय में लाना चाहते हैं और इस कारण उन्होंने विधि आयोग का मार्ग चुना है, क्योंकि कृष्ण अय्यर के उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में मात्र तीन वर्ष हुए थे। इस तरह वे काफी कनिष्ठ न्यायाधीश थे। इस पर वे तैयार हुए और उच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनने के सिर्फ पांच वर्ष बाद उन्हें उच्चतम न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश बनाया गया।

अवकाश ग्रहण के बाद उन्होंने मध्यस्थता (आर्विट्रेशन) का काम नहीं लिया, जबकि अन्य न्यायाधीश इसमें करोड़ों कमा रहे हैं। कृष्ण अय्यर मानवाधिकार और अन्य सामाजिक मुद्दों के लिए लड़ते रहे। इस दरम्यान उन्होंने कुछ सरकारी जांच आयोगों और पंचाटों की अध्यक्षता की, लेकिन वेतन लेने से मना कर दिया। 1984 में एनटी रामाराव के अनुरोध पर उन्होंने भास्कर राव जांच आयोग की अध्यक्षता की, जिसमें भास्कर राव सरकार की अल्प अवधि के दरम्यान आई विभिन्न शिकायतों की जांच करनी थी।

भारत सरकार ने 1986 में जेल में बंद महिलाओं की समस्याओं पर गठित विशेषज्ञ समिति का उन्हें अध्यक्ष नियुक्त किया। इसने महिला बंदियों के ऊपर विस्तृत रिपोर्ट दी। 2000 में उन्हें संविधान समीक्षा आयोग के सलाहकार पैनल का अध्यक्ष बनाया गया, जिसका काम था मौलिक अधिकारों के विस्तार पर विचार करना। सेवामुक्त होने के बाद भी उनका योगदान कम नहीं रहा। 1987 में विपक्ष ने उन्हें राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी बनाया, लेकिन विपक्ष की स्थिति ऐसी नहीं थी कि वह अपने प्रत्याशी को जिता सके। इसलिए अपेक्षानुरूप परिणाम आया और कांग्रेस प्रत्याशी आर वेंकेटरमण विजयी हुए।

उनकी सक्रियता का मुझे निजी अनुभव है। उन्होंने 2012 में प्रकाशित मेरी पुस्तक ‘जस्टिस, जूडोक्रेसी ऐंड डिमॉक्रेसी इन इंडिया’ की प्रस्तावना लिखी। मैं पांडुलिपि लेकर कोच्चि स्थित उनके निवास ‘सद्गमय’ गया और कुछ अंश पढ़ कर सुनाए। सुनने के तुरंत बाद उन्होंने स्टेनो को प्रस्तावना लिखानी शुरू कर दी। कृष्ण अय्यर अपने ऐतिहासिक निर्णयों, मानवतावादी दृष्टिकोण, संवेदनशीलता और सक्रियता के लिए हमेशा याद किए जाएंगे। आस्ट्रेलिया के पूर्व मुख्य न्यायाधीश माइकेल कर्वी ने हाल में मुझे इ-मेल भेजा, जिसमें उन्होंने लिखा कि कृष्ण अय्यर राष्ट्रमंडल देशों के महानतम न्यायाधीशों में एक हैं। यह बिल्कुल सही है, क्योंकि उनके निर्णय पूरे विश्व, खासकर राष्ट्रमंडल देशों में बराबर उद्धृत किए जाते रहे हैं।

मेरे विचार में वे भारत रत्न के हकदार हैं। इसे पाने की उनकी इच्छा भी थी। महान व्यक्तियों में भी मानवीय कमजोरियां तो होती हैं। एक बार कोच्चि में उनके निवास पर उनके सहायक ने मुझसे कहा था उन्हें भारत रत्न दिलाने के लिए मुझे मीडिया में माहौल बनाना चाहिए। यहां खिलाड़ी को भारत रत्न दिया गया। किसी खेल को देखना थोड़ी देर के लिए रोमांचकारी होता है, पर इससे जनता को कोई स्थायी लाभ नहीं मिलता। न्यायमूर्ति कृष्ण अय्यर ने तो न्याय की पूरी धारा को गतिमान करने और उसे बदलने का काम किया।

 

 

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