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केम छो अमेरिका

पुष्परंजन जनसत्ता 30 सितंबर, 2014: अब मोदीजी राजनीति के रॉकस्टार हैं। संयुक्त राष्ट्र महासभा में हिंदी में धाराप्रवाह बोलते हुए उन्होंने पाकिस्तान को धोया, संयुक्त राष्ट्र की जिम्मेदारी को याद दिलाया। रविवार को मेडिसन स्क्वायर गार्डन (एमएसजी) में जो उत्तेजना थी, उससे कहीं अधिक जोश में भौकालग्रस्त हमारे चैनल वाले थे। भारतीय चैनलों के पत्रकार […]

Author September 30, 2014 10:43 AM

पुष्परंजन

जनसत्ता 30 सितंबर, 2014: अब मोदीजी राजनीति के रॉकस्टार हैं। संयुक्त राष्ट्र महासभा में हिंदी में धाराप्रवाह बोलते हुए उन्होंने पाकिस्तान को धोया, संयुक्त राष्ट्र की जिम्मेदारी को याद दिलाया। रविवार को मेडिसन स्क्वायर गार्डन (एमएसजी) में जो उत्तेजना थी, उससे कहीं अधिक जोश में भौकालग्रस्त हमारे चैनल वाले थे। भारतीय चैनलों के पत्रकार चीख रहे थे…‘किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने ऐसा शो नहीं किया’…‘इंडिया इज रॉकिंग’…‘मोदी इज रॉकिंग’! इस शोर में अमेरिकी-भारतीय गुट का विरोध तूती की आवाज बन कर रह गया जो 2002 के दंगे पर सवाल उठा रहे थे। न्यूयार्क की अदालत का समन इसलिए असर नहीं कर रहा था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोेदी को राजनयिक छूट हासिल है। वैसे मनमोहन सिंह अप्रैल 2006 में इस तरह का कूटनीतिक-सांस्कृतिक शो जर्मनी के हनोवर में कर चुके हैं। लेकिन मनमोहन सिंह की शिथिल कूटनीति के बरक्स मोदी हाइपरएक्टिव (अतिक्रियाशील) कूटनीति प्रस्तुत कर रहे थे। मोदी के इस सफल शो का श्रेय किसे दें? इवेंट मैनेजरों को, कॉरपोरेट को, अमेरिका केचार सौ से अधिक आप्रवासी भारतीय संगठनों को, या फिर वहां पर बसे करीब तैंतीस लाख अमेरिकी-भारतीयों को?

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अमेरिका में तीसरा बड़ा प्रवासी समूह भारतवंशियों का है। पहले नंबर पर चीनी मूल के आप्रवासी (करीब चालीस लाख) हैं, दूसरे नंबर पर फिलीपीनो-अमेरिकी (करीब पैंतीस लाख) हैं, तीसरे स्थान पर भारतवंशी हैं। कैलिफोर्निया, न्यूयार्क, न्यूजर्सी, टेक्सास और हवाई, पांच ऐसे राज्य हैं जहां छप्पन प्रतिशत भारतीय समुदाय के लोग रहते हैं। न्यूयार्क और न्यूजर्सी को तो गुजरातियों का गढ़ कहा जाता है, जहां दो लाख से अधिक गुजराती समाज के लोग हैं।

‘एमएसजी’ में मोदी उन्माद पैदा करने के लिए गुजराती भाइयों ने दिन-रात एक कर दिया था। पीआइओ कार्डधारकों को आजीवन वीजा, अमेरिकी नागरिकों को हवाई अड््डे पर उतरते ही वीजा देने की घोषणा कर मोदी यह विश्वास दिलाना चाहते थे कि मैं पेचीदगियों को मिनटों में समाप्त करने वाला ‘मैन इन एक्शन’ प्रधानमंत्री हूं। लेकिन क्या अमेरिका ऐसी ही वीजा की सुविधा भारतीय पर्यटकों को हवाई अड्डे पर उतरते ही दे देगा? यह वही अमेरिका है, जिससे कूटनीतिक वीजा पाने के लिए मोदी तरस गए थे। अगर अमेरिका में बसा आम भारतीय अपने देश में निवेश करने लगे तो समझ लेना चाहिए कि मोदी का जादू चल गया है। एक चैनल पर भारतीय आप्रवासी ने सही सवाल उठाया कि हम अपनी उम्र भर की कमाई किस गारंटी पर भारत में लगा दें, क्या अदालतें इसकी सुरक्षा दे सकती हैं? फिर भी, मोदी अगर ‘इंडिया इंक’ को अपने घर में पैसे लगाने का आह्वान कर रहे हैं, तो यह एक अच्छी शुरुआत है।

अब तक विदेश नीति को हम शुष्क, पेचीदा और गंभीर विषय मानते रहे हैं। मोदी ने एमएसजी में यह शो करके दुनिया को बता दिया है कि कूटनीति को सरल तरीके से, अलग-अलग रंग भर कर, कला और संस्कृति के माध्यम से भी प्रस्तुत किया जा सकता है। उसकी मार्केटिंग की जा सकती है। ऐसे शो में पचास से अधिक सीनेटर, कांग्रेसमैन और कॉरपोरेट प्रमुख पहुंच जाएं तो निश्चित रूप से यह निवेश और भारत-अमेरिका के रणनीतिक निर्णयों को प्रभावित करता है। इससे पहले साठ हजार अमेरिकी युवाओं को सेंट्रल पार्क में संबोधित कर मोदी उन्हें आईने में उतार चुके थे। संयुक्त राष्ट्र महासभा के उनहत्तरवें सत्र के लिए दुनिया भर से आए एक सौ चालीस देशों के शासनाध्यक्षों के लिए क्या यह सबक है? चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग को कहीं इसका अफसोस नहीं हो रहा हो कि काश, अमेरिका में ऐसा शो मैं भी कर लेता।

संभव है फिलीपींस के शासनाध्यक्ष आप्रवासी अमेरिकी-फिलीपीनों के बूते ऐसे रॉक शो पर विचार कर रहे हों। नवाज शरीफ को इसकी खलिश होगी कि संयुक्त राष्ट्र में अलापा गया ‘राग कश्मीर’ मोदी-मोदी के शोर में दब कर रह गया। इस शो के बाद पाकिस्तान के सुर ढीले पड़ गए हैं। मोदी ने बिना तोप और तलवार निकाले कश्मीर पर पाक की बोलती बंद कर दी। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं निकाल लेना चाहिए कि पाकिस्तान, कश्मीर पर अपनी कारस्तानी बंद कर देगा। फिलहाल, पाक विदेश मामलों के सलाहकार सरताज अजीज फिर से भारत से बातचीत बहाल करना चाहते हैं।
यों, संयुक्त राष्ट्र में सऊदी अरब भी मसला-ए-कश्मीर पर पाकिस्तान का साथ दे रहा था। तुर्की के विदेशमंत्री मेवलुत काओसोगलू ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के सत्र के दौरान बयान दे डाला कि इस्तांबुल, कश्मीर समस्या के शांतिपूर्ण समाधान के लिए पहल कर सकता है। आर्गेनाइजेशन आॅफ इस्लामिक कोआॅपरेशन (ओआइसी) ने जम्मू-कश्मीर संपर्क समूह बनाया हुआ है, उसकी बैठक में तुर्की के विदेशमंत्री मेवलुत अपना यह उद््गार व्यक्त कर रहे थे।

इस तरह का बयान देते वक्त तुर्की के विदेशमंत्री भूल जाते हैं कि उनका देश मानवाधिकार हनन के मामले में काली सूची में दर्ज है। कुर्दों पर सबसे अधिक सितम ढाने, सैकड़ों पत्रकारों को जेल में बंद करने और हजारों राजनीतिक हत्याओं के कारण तुर्की को यूरोपीय संघ का सदस्य बनाने से मना कर दिया गया। अब यही तुर्की कश्मीर पर पंचायत करना चाहता है! चीन में उइगुर आतंकवाद को उकसाने और उन्हें पनाह देने वाला प्रमुख देश तुर्की ही है।
दरअसल, कश्मीर को पाक नेताओं ने कॉमेडी बना कर रख दिया है। 1965 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में जुल्फिकार अली भुट्टो ने कश्मीर पर जितना आक्रामक भाषण दिया था, उसे यूट्ब पर सुनें तो लगेगा कि इस बार के महासभा के सत्र में नवाज शरीफ ने जन्नतनशीं जुल्फिकार अली भुट्टो के मुकाबले कुछ भी नहीं कहा। कोई ऐसा साल नहीं है, जब संयुक्त राष्ट्र में पाक शासनाध्यक्षों ने ‘राग कश्मीर’ न अलापा हो। पिछले पैंसठ सालों से पाक अधिकृत कश्मीर का कोई प्रतिनिधि नेशनल असेंबली के लिए निर्वाचित होकर गया ही नहीं। पाकिस्तानी संसद में मिनिस्ट्री आॅफ कश्मीर अफेयर्स, गिल्गिट-बाल्टिस्तान (केएजीबी) नामक एक महकमा बनाया गया है, जिसके मंत्री हैं, चौधरी मुहम्मद बर्जिस ताहिर। कमाल की बात यह है कि चौधरी मुहम्मद बर्जिस कश्मीरी हैं ही नहीं। उनसे पहले मियां मंजूर अहमद बट्टू केएजीबी के मंत्री थे। बट्टू भी पंजाब से ताल्लुक रखते थे। कश्मीरियों पर पंजाब के मंत्री इसलिए थोपे जाते हैं, क्योंकि पाकिस्तान के सियासतदानों को उन पर भरोसा नहीं रहा है।

पाकिस्तान भले ‘पीओके’ को आजाद कश्मीर कहता रहा है, लेकिन सच यह है कि यह पूरा इलाका पिछले पैंसठ सालों से उसकी गुलामी को झेल रहा है। इस्लामाबाद को तो छोड़िए, दुनिया के किसी भी देश में ‘आजाद कश्मीर’ का दूतावास नहीं है। पीओके के लोग पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा तक नहीं खटखटा सकते। हर माह मानवाधिकार हनन के दर्जनों मामले पाक कब्जे वाले कश्मीर की वादियों में ही दफन हो जाते हैं।
‘आजाद कश्मीर’ के प्रधानमंत्री की औकात इतनी भर है कि एक अदना सा इंस्पेक्टर उसे घसीट कर इस्लामाबाद ले जाता है। 29 जून 1990 से 5 जुलाई 1991 तक राजा मुमताज हुसैन राठौर ‘आजाद कश्मीर’ के प्रधानमंत्री थे। 1991 में सरकार से खटपट हुई और उन्हें गिरफ्तार कर इस्लामाबाद ले जाया गया। राजा फारूक हैदर, दस महीने के लिए (22 अक्टूबर 2009 से 29 जुलाई 2010 तक) आजाद कश्मीर के प्रधानमंत्री बने। मंगला बांध से पैदा बिजली में हिस्सेदारी के सवाल पर विवाद के बाद प्रधानमंत्री हैदर को गिरफ्तार कर इस्लामाबाद लाया गया।

मोदीजी के रणनीतिकारों को चाहिए कि दुनिया के समक्ष पाकिस्तान के हिस्से वाले कश्मीर से लेकर बलूचिस्तान तक के सच को प्रस्तुत करें। ऐसा नहीं कि अमेरिकियों को इसका पता नहीं है कि पाकिस्तान अपने कब्जे वाले कश्मीर में क्या कर रहा है।

ओबामा कश्मीर-रुदन पर गौर इसलिए नहीं कर रहे हैं कि उन्हें अफगानिस्तान में भारत जैसा ताकतवर एशियाई साझेदार चाहिए, जो समय-समय पर पाकिस्तान और चीन को जवाब दे सके। मोदी जिस तरह से संयुक्त राष्ट्र में हिंद महासागर-प्रशांत सुरक्षा की बात कर रहे थे, वह अमेरिका का बहुप्रतीक्षित एजेंडा रहा है। ओबामा, इस्लामी आतंकवाद की समाप्ति का शंख फूंक चुके हैं, मोदी को उस अभियान का हिस्सा तब बनना चाहिए जब दाऊद इब्राहिम, हाफिज सईद जैसे आतंकियों को भारत को सौंपे जाने के वास्ते अमेरिका, पाकिस्तान पर दबाव बनाए। अमेरिका को एक सशक्त सहयोगी चाहिए तो उसे भारत के विरुद्ध पाकिस्तान में षड्यंत्र करने और पनाह पाने वालों के समूल नाश में सहयोगी बनना होगा।

अगर ओबामा को पर्यावरण की चिंता है, तो गंगा की सफाई की चिंता पूरी दुनिया को करनी होगी। मोदी ने स्वच्छ गंगा अभियान को अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठा कर एक अच्छी शुरुआत की है। लेकिन गंगा सफाई के नाम पर, जेब की सफाई करने वालों पर नजर रखनी होगी। मोदी की अमेरिका यात्रा की सफलता अमेरिकी कंपनियों के ग्यारह शीर्ष सीइओ, इंडिया इंक की घर वापसी और ओबामा के रणनीतिक सहयोग पर निर्भर करती है। अमेरिका इस समय संयुक्त अरब अमीरात और चीन के बाद, भारत का तीसरा सबसे बड़ा व्यापरिक साझेदार है। ‘यूएस ट्रेड रिप्रजेंटेटिव’ के आंकड़ों के अनुसार, ‘2012 में भारत-अमेरिका के बीच 93 अरब डॉलर का व्यापार हुआ। 2013 में भारत, अमेरिका का दसवां सबसे बड़ा निर्यातक देश रहा।’ क्या ओबामा भारत का नंबर एक बिजनेस पार्टनर बनना चाहते हैं? भारत को इस समय ऊर्जा और इंफ्रास्ट्रचर की जबर्दस्त जरूरत है। इन दोनों के बगैर ‘मेक इन इंडिया’ मात्र नारा बन कर रह जाएगा।

अमेरिका सिविल नाभिकीय ऊर्जा संयंत्र भारत में लगाने को आतुर है, लेकिन उसमें सबसे बड़ी बाधा जापान है। अमेरिकी और फ्रेंच कंपनियां जो रिएक्टर सप्लाई करती हैं, उसमें जापानी उपकरण लगे होते हैं। मोदी अपनी टोक्यो यात्रा में अगर जापान से सिविल नाभिकीय समझौता करने में सफल हो जाते, तो यह बाधा नहीं रहती। इस बाधा को ओबामा और मोदी मिलकर कैसे पार पाते हैं, इस पर पूरी दुनिया की नजर है। मोदी को शायद इस कारण चीन से सिविल नाभिकीय समझौता करना पड़ा था। प्रधानमंत्री मोदी एशिया से बाहर कूटनीतिक आॅर्बिट (ग्रहपथ) पर चल पड़े हैं। उन्हें अभी यूरोप को अपने आईने में उतारना है। अफ्रीका और मध्यपूर्व उनके समक्ष हैं। क्या उनके ‘इवेंट मैनेजर’, मेडिसन स्क्वायर गार्डन के मोदी-शो को दोहराते रहेंगे?

 

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