ताज़ा खबर
 

अनिवार्य मतदान से फायदा या नुकसान

गिरिराज किशोर फेसबुक पर मैंने ग्यारह नवंबर को एक पोस्ट मतदान अनिवार्य बनाने के विरोध में डाली थी। उसके पक्ष या विपक्ष में किसी की कोई प्रतिक्रिया नहीं आई। मुझे आश्चर्य हुआ। मेरी हर पोस्ट पर युवा दक्षिणपंथी जमकर भद्र-अभद्र भाषा में हमला बोलते हैं। सबसे बड़ा अस्त्र उनके पास मुझे राष्ट्रपति द्वारा प्रदान किया […]

Author November 20, 2014 1:29 AM

गिरिराज किशोर

फेसबुक पर मैंने ग्यारह नवंबर को एक पोस्ट मतदान अनिवार्य बनाने के विरोध में डाली थी। उसके पक्ष या विपक्ष में किसी की कोई प्रतिक्रिया नहीं आई। मुझे आश्चर्य हुआ। मेरी हर पोस्ट पर युवा दक्षिणपंथी जमकर भद्र-अभद्र भाषा में हमला बोलते हैं। सबसे बड़ा अस्त्र उनके पास मुझे राष्ट्रपति द्वारा प्रदान किया गया सम्मान होता है। वे समझते हैं कि कांग्रेस की खुशामद करके पद्मश्री सम्मान पाया है। लगता है खुशामद ही उनके लिए कुछ पाने का सबसे बड़ा माध्यम है। कर्म के प्रति समर्पण नहीं। जो फेसबुक देखते हैं वे जानते होंगे। पिछली बार जनसत्ता में मेरा लेख था। गांधीजी की संपत्ति, जो न्यूनतम है, की नीलामी रोकने की अपनी अपील की सरकार द्वारा अनदेखी के विरोध में, जिला अधिकारी से लेकर राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री तक को बार-बार लिख चुका हूं कि मैं पद्मश्री लौटाना चाहता हूं, मुझे समय दें या किसी को भेज कर पद्मश्री अलंकरण मंगवा लें।

वर्तमान प्रधानमंत्री को भी लिख चुका हूं, यह सोच कर कि वे अक्सर गुजरात का नाम इस तरह लेते हैं जैसे वही देश का पर्याय हो गया हो। अभी विदेश में उन्होंने कहा कि वे प्रधानमंत्री बनने से पहले से गांधी में आस्था रखते हैं। इसलिए यह सोच कर कि गुजरात के सबसे महान पुत्र के संदर्भ में कुछ सोचेंगे, उन्हें भी लिखा। पर वे भी मौन रहे। मैं चाहता था कम से कम पद्मश्री किसी आधिकारिक व्यक्ति को ही सौंपूं। चिट्ठी की तरह भेजना देश और राष्ट्रपति पद का असम्मान होगा।

खैर, विषय पर आता हूं। मतदान अनिवार्य बना दिए जाने के बाद तो एक व्यक्ति, जो मतदाता भी है, रही-सही गरिमा भी खो देगा। उसकी थोड़ी-बहुत आवाज जो पांच साल बाद मतदाता के रूप में पहचानी जाती है वह भी नहीं रहेगी। पहले पढ़े-लिखे और राष्ट्रपति से तथाकथित अनुकंपा प्राप्त लोगों के पत्रों का संज्ञान सरकार लेती थी, मतदाता समझ कर ही सही, अब समझा जाएगा कि मतदाता होना कोई अलग पहचान नहीं है, नाम भले न बदला हो पर उसका अर्थ बदल गया। अगर वह मतदान नहीं करेगा तो एक अपराधी की तरह दंडित किया जाएगा। क्या हम देश में जनतंत्र जीवित होने की कसम खा सकेंगे? मतदाता की यह छोटी-सी संवैधानिक स्वतंत्र सत्ता बचेगी? वर्तमान में मतदाता को माना जाता है कि वह वास्तविक सरकार है, भले ही उसे ‘प्रजा’ बना दिया गया हो, वह अपराधी की श्रेणी में खड़ा कर दिया जाएगा।

दरअसल, संविधान में मतदान हर वयस्क नागरिक का अंतर्निहित अधिकार माना गया है, सरकारी कर्मी की तरह ड्यूटी नहीं। अधिकार शब्द के साथ नकारात्मक और सकारात्मक दोनों पक्ष जुड़े हैं। प्रयोग करना या न करना। अपनी थाती का किस रूप में उपयोग करे यह स्वतंत्रता उसके पास संरक्षित है। उस अधिकार द्वारा देश का छोटे से छोटा और बड़े से बड़ा व्यक्ति समान, सगर्वित और अभिनंदित है। वह सत्त्वाधिकार नहीं रहेगा। उसका बपतिस्मा हुक्म के गुलाम के रूप में हो जाएगा। मतदान नाम ही उसे यह सम्मान देता है कि पांच साल में जब समय आता है उसका प्रयोग करे या न करे या किस रूप में करे। दान दे या न दे उस व्यक्ति का अधिकार है जो उसका कर्ता है।

यह संविधान द्वारा प्रदत्त सामान्य आदमी को मिला अनुपम उपहार है। सरकार या संसद उसे क्यों छीनना चाहती है? उसके पीछे कौन-सी महत्त्वाकांक्षा है जो मतदान की वर्तमान संवैधानिक स्थिति को बदलने के लिए मजबूर कर रही है? एक तर्क तो यही है कि संसद या विधानसभाओं में कम प्रतिशत से चुने गए जन-प्रतिनिधि पहुंचते हैं जिससे बहुजन का प्रतिनिधित्व नहीं हो पाता।

यानी कई बार अल्पमत के कारण बड़ी पार्टियों को गठबंधन सरकार बनाने के लिए बाध्य होना पड़ता है। उन्हें पार्टी की नीतियों को लागू करने में कठिनाई होती है। इसका प्रमाण है कि महाराष्ट्र में मोदी-पार्टी यानी भाजपा को पच्चीस साल पुराना अनुबंध तोड़ना पड़ा, क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि उनका भागीदार इतना मजबूत हो कि वह शर्तें रखने की स्थिति में रहे। हालांकि अब भी दोनों के बीच मोलतोल जारी है।

मतदान के आधार पर बहुमत साबित करने के बजाय महाराष्ट्र की नई सरकार ने ध्वनि-मत से बहुमत प्राप्त किया और इसीलिए इतना बड़ा वितंडा खड़ा हुआ। वैसे भी उच्चतम न्यायालय का निर्णय है कि विरोध या आपत्ति किए जाने की स्थिति में ध्वनि-मत निर्णायक नहीं हो सकता। कांग्रेस और शिवसेना ने ध्वनि-मत पर आपत्ति की थी। अध्यक्ष ने अस्वीकार कर दिया। जो पार्टी दिग्विजय की स्थिति में अपने को देखती हो, अगर वह इस तरह के गैर-कानूनी ढंग अपना सकती है तो वह क्या नहीं कर सकती? यह प्रवृत्ति किसी भी पार्टी को तानाशाही की ओर ले जा सकती है।

इस समय विदेश में भले ही सफलता और सम्मान का वातावरण बन रहा हो, पर देश में इस तरह की राजनीति मौलिक अधिकारों और जनतंत्र की सलामती के लिए खतरा है। केंद्र में मिली-जुली सरकारों को कई बार कटु अनुभव हुए हैं। जैसे, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की मंशा के विपरीत वाजपेयी सरकार को राममंदिर का मुद्दा छोड़ना पड़ा था। यूपीए सरकार अपने दस साल के कार्यकाल में सहयोगी दलों के दबाव में काम करती रही और प्रधानमंत्री यही कहते रहे कि यह मिली-जुली सरकार का अभिशाप है। दरअसल, यह दोनों पार्टियों और उनके नेतृत्व की इच्छाशक्ति की कमी थी। दोनों में से कोई सरकार यह नहीं कह सकी कि हम स्वतंत्रतापूर्वक काम नहीं कर पा रहे हैं इसलिए त्यागपत्र देते हैं। मजबूरी मुख्य सत्ताधारी पार्टी की ही नहीं थी, भागीदार पार्टी की भी हो सकती थी, चुनाव में सबको जाना पड़ता।

उपरोक्त अनुभव के कारण, संभवत: वर्तमान सरकार मतदान को अनिवार्य करके, भागीदारी के इस विकल्प को समाप्त कर देना चाहती हो। लेकिन बहुदलीय व्यवस्था में जब तक मतदाताओं के सामने यह स्थिति न खड़ी कर दी जाए कि वे एक ही पार्टी के पक्ष में मत डालने के लिए बाध्य हो जाएं, तब तक सरकार में दूसरी पार्टी की सहभागिता को नकारा नहीं जा सकता। वह तभी संभव है जब सब पार्टियां समाप्त हो जाएं या नगण्य होकर अप्रभावी हो जाएं।

कहीं मैंने पढ़ा था कि जहां एक पार्टी की हुकूमत होती है वहां इस प्रकार के कानून जरूरी हो जाते हैं। असंतुष्ट मतदाता वोट न करें तो सरकार के लिए मुश्किल खड़ी हो सकती है। ऐसे में इस तरह का बाध्यकारी कानून कारगर होता है। दरअसल यह रास्ता तानाशाही को जा सकता है। पिछले चुनाव में सत्तर प्रतिशत तक मतदान हुआ था, तो फिर मतदान को अनिवार्य बनाने की क्या जरूरत आ पड़ी? चुनाव आयोग इस बार कई तरह के प्रयत्नों से मतदाताओं की हिस्सेदारी बढ़ाने में कामयाब हुआ है।
संविधानविद सुभाष कश्यप का भी मत है (जो कि एक चैनल पर उन्होंने कहा) कि मतदान को दंड से जोड़ना प्रतिगामी हो सकता है। अगर संविधान अपने प्रतिनिधि को वापस बुलाने का अधिकार नहीं देता तो मतदान को अनिवार्य बनाना कहां तक उचित और संभव होगा? कश्यपजी का सुझाव था कि संविधान के प्रावधानों को उलट-पुलट किए बिना भी मतदान की अनिवार्यता संभव हो सकती है। अगर पासपोर्ट, राशनकार्ड, बीपीएल कार्ड आदि बनवाने के लिए मतदान का प्रमाणपत्र अनिवार्य कर दिया जाए तो संविधान में इतने गंभीर उलटफेर की जरूरत नहीं पड़ेगी। मैं भी समझता हूं कि अगर सरकार का मंसूबा मतदान बढ़ाने का है तो यह तरीका लोगों के मन में सरकार की नीयत के प्रति शंका उत्पन्न नहीं करेगा।

कुछ लोगों का सोचना है कि यह योजना आरएसएस की है जिसे सरकार कार्यान्वित कर रही है। पहले भी भाजपा की सरकार रही है। यह सवाल कभी नहीं उठा कि हर मतदाता के लिए मतदान करना अनिवार्य कर दिया जाए। इस बार ही क्यों उठा? क्या इसलिए कि इस बार सरकार पर आरएसएस का प्रभाव बढ़ा है?

दो राज्यों में भाजपा को अप्रत्याशित सफलता मिली है। हरियाणा एक छोटा राज्य है, वहां पर मिली सफलता महत्त्वपूर्ण पर सामान्य बात है। लेकिन महाराष्ट्र में मिली सफलता पूर्ण सफलता नहीं कही जा सकती। वहां भाजपा को अपना सबसे दमदार और विश्वसनीय भागीदार खोना पड़ा। यही कारण था कि वहां उच्चतम न्यायालय के निर्देश और जनतंत्रात्मक वैधानिक परंपरा को छोड़ कर ध्वनि-मत के द्वारा सरकार बनानी पड़ी। यानी एक राज्य में सरकार बनाने के लिए ये दो बड़ी कुर्बानियां दींं- एक, विश्वसनीय साथी की, और दूसरी, जनतांत्रिक परंपरा को तोड़ कर अपनी विश्वसनीयता की। इससे पता चलता है कि सत्ता में बने रहना अब भाजपा की सबसे बड़ी प्राथमिकता है। यानी उसके लिए किसी भी हद तक जाया जा सकता है।

कांग्रेस के अच्छे दिनों की एक घटना याद आती है। डॉ संपूर्णानंद ने कांग्रेस के पार्टी-चुनाव के समय घोषणा की थी कि अगर उनके प्रतिद्वंदी चंद्रभानु गुप्त जीत गए तो वे मुख्यमंत्री पद छोड़ देंगे। बाद में आनाकानी होने लगी तो हाइकमान ने उनको पद छोड़ने के लिए मजबूर किया। हालांकि चंद्रभानु गुप्त हाइकमान के कृपापात्र नहीं रहे थे, उन्होंने उन्हें मुख्यमंत्री बनने दिया। बताया जाता है कि पंडित गोविंद वल्लभ पंत स्वर्गवास के समय यह कह रहे थे कि संपूर्णानंद के साथ अन्याय हुआ। शायद उस समय परंपराएं सर्वाधिक प्रिय थीं। बाद में कांग्रेस सरकार ने भी इन परंपराओं से मुंह मोड़ लिया। वर्तमान सरकार भी इस तरह की बातों को उपेक्षा की नजर से देखती है।

गांधी अपना एक साल का गिरमिट पूरा करके, दक्षिण अफ्रीका से जिस समय भारत लौटने वाले थे, अपने विदाई समारोह में, उनकी नजर एक अखबार पर पड़ी, जिसमें लिखा था चुनिंदा भारतीयों को मिला मताधिकार भी समाप्त करने के लिए सरकार विधानसभा में बिल ला रही है। वहीं से भारतीयों के खिलाफ बने काले कानूनों के विरोध में गांधी की लड़ाई शुरू हुई थी जो बीस साल तक चली थी। यहां सरकार संविधान द्वारा मिले मतदान के मुक्त अधिकार को अनिवार्य करके प्रतिबंधित और सीमित कर रही है। सावधान रहना होगा। एक बार बंधी जंजीर सदा का बंधन बन जाएगी। पूरे देश को जागरूक रहना होगा। मोदीजी ने अच्छे दिनों का आश्वासन दिया था वे उस वादे को निबाहें।

 

फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App