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साझी लूट का कारोबार

धर्मेंद्रपाल सिंह जनसत्ता 24 सितंबर, 2014: फरवरी 2012 में जब उच्चतम न्यायालय ने दूरसंचार घोटाले में लिप्त एक सौ बाईस लाइसेंस रद्द किए थे तब निजी ऑपरेटरों ने खूब हल्ला मचाया था। कहा था कि अदालत के फैसले से उद्योग जगत को धक्का पहुंचेगा, निवेशकों का भरोसा डगमगा जाएगा। अब कोयला घोटाले की दोषी कंपनियों […]

Author September 24, 2014 12:50 PM

धर्मेंद्रपाल सिंह

जनसत्ता 24 सितंबर, 2014: फरवरी 2012 में जब उच्चतम न्यायालय ने दूरसंचार घोटाले में लिप्त एक सौ बाईस लाइसेंस रद्द किए थे तब निजी ऑपरेटरों ने खूब हल्ला मचाया था। कहा था कि अदालत के फैसले से उद्योग जगत को धक्का पहुंचेगा, निवेशकों का भरोसा डगमगा जाएगा। अब कोयला घोटाले की दोषी कंपनियों पर जब आबंटन रद्द होने की तलवार लटकी हुई है, तब फिर वैसे ही तर्क दिए जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि अगर आबंटन रद्द हुआ तो बिजली, इस्पात और सीमेंट उद्योग को अपूरणीय क्षति होगी। सार्वजनिक बैंकों का खरबों रुपया डूब जाएगा। निवेश और आर्थिक सुधार की रफ्तार धीमी पड़ जाएगी।

पिछली पच्चीस अगस्त को देश की सर्वोच्च अदालत ने अपने एक ऐतिहासिक निर्णय में 1993 और 2011 के बीच आबंटित सभी 218 कोयला खदानों के आबंटन को गैर-कानूनी घोषित कर दिया था। अदालत ने माना कि ये सारे आबंटन इकतरफा और मनमाने तरीके से हुए थे। इस फैसले के बाद आबंटन रद्द होना स्वाभाविक है।

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भविष्य में प्राकृतिक संसाधनों की लूट पर अंकुश लगाने के लिए दोषी नेताओं, नौकरशाहों और उद्योगपतियों को सबक सिखाया जाना जरूरी है। लेकिन अदालत का फैसला प्रभावित करने के लिए तरह-तरह के तर्क दिए जा रहे हैं। बिजली संकट का भय दिखाया जा रहा है। सरकार ने भी अदालत से छियालीस खदानों का आबंटन रद्द न करने की गुहार लगाई है। कहा है कि चालीस में खनन हो रहा है और छह में शीघ्र उत्पादन शुरू हो जाएगा। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने अदालत को बताया कि जिन कंपनियों को ब्लॉक आबंटित हुए उन्हें उसने सत्तर हजार करोड़ रुपए का कर्ज दे रखा है। आबंटन रद्द होने पर उसका पैसा फंस जाएगा।

सर्वोच्च अदालत का आदेश आने के बाद यह बात तो साफ हो गई है कि 1.86 लाख करोड़ रुपए के कोयला घोटाले के हमाम में अधिकतर राजनीतिक दल नंगे हैं। अठारह बरस तक कोयले की लूट मची। इस दौरान केंद्र में राजग और यूपीए दोनों की सरकारें रहीं। कांग्रेस और भाजपा, गठबंधन सरकारों के मुख्य घटक दल थे। जिन राज्यों में कोयले की खानें आबंटित हुर्इं वहां भी कांग्रेस और भाजपा सत्ता में थीं। घोटाले में जो नाम सामने आए हैं उनमें से कुछ सीधे-सीधे इन राष्ट्रीय दलों से जुड़े हैं। लगता है, इसी कारण दोनों पार्टियों में मौन सहमति बन गई है। अदालत के समक्ष मोदी सरकार के रुख की सच्चाई परखने के लिए यह बताना जरूरी है। छियालीस खदानों का आबंटन रद््द न करने का तर्क इसी मौन सहमति का हिस्सा है।
वर्ष 1993 के बाद जो दो सौ अठारह खदानें आबंटित की गर्इं उनमें से एक सौ उन्नीस निजी कंपनियों और निन्यानवे सार्वजनिक उद्यमों को दी गई थीं। देश में बिजली, इस्पात और सीमेंट उत्पादन में इजाफे के नाम पर ये आबंटन किए गए। लेकिन तथ्य परखने पर पता चलता है कि ऐसा कुछ नहीं हुआ। आज देश में लगभग पैंसठ करोड़ टन कोयले का खनन होता है, जिसमें निजी क्षेत्र का हिस्सा महज पंद्रह फीसद है। भारी संख्या में कोयला खदान कब्जाने के बावजूद अधिकतर निजी कंपनियों ने उत्पादन शुरू नहीं किया। घोटाले का भंडाफोड़ हो जाने पर सरकार ने ऐसे अस्सी आबंटन रद््द कर दिए जहां काम शुरू नहीं हुआ था।

निजी कंपनियों की करतूतों के कारण ही आज देश बिजली संकट से घिरा हुआ है। हमारे यहां साठ प्रतिशत से ज्यादा बिजली कोयले से बनती है। देश में कोयले का पर्याप्त भंडार है, फिर भी इसे आयात करना पड़ रहा है।

कोयले पर निर्भर कुछ बिजलीघर बंद पड़े हैं, अनेक अपनी क्षमता से कम उत्पादन कर रहे हैं। देश को ऐसी दुर्दशा में धकेलने वाली जमात को क्या कोई रियायत दी जा सकती है? निश्चय ही इस प्रश्न का उत्तर नकारात्मक है।

घोटाले की गहराई को समझने के लिए इसकी पृष्ठभूमि को समझना जरूरी है। वर्ष 1972-76 के बीच सरकार ने कोयले का राष्ट्रीयकरण कर दिया था। इसके लिए कोयला खदान अधिनियम में संशोधन किया गया और कोल इंडिया का गठन भी। चुनिंदा निजी कंपनियों को छोड़ कर कोयले के खनन पर सरकार का एकाधिकार हो गया। दुनिया के बड़े कोयला उत्पादक देशों में से भारत एक है और उसके पास सैकड़ों साल तक चलने वाला विशाल कोयला भंडार है। देश के बिजली, इस्पात, सीमेंट जैसे महत्त्वपूर्ण उद्योग कोयले पर निर्भर हैं। राष्ट्रीयकरण के बाद कोयले पर आधारित उद्योगों को इसकी कमी महसूस नहीं हुई।

उदारीकरण का दौर शुरू होने के बाद देश की प्राकृतिक संपदा की लूट का खेल शुरू हो गया। कोयला भी इससे अछूता नहीं रहा। कोयला खदानों के आबंटन के लिए 1992 में कोयला मंत्रालय ने एक छानबीन समिति गठित की। प्राइवेट कंपनियों के लिए आबंटन का प्रावधान किया गया। समिति ने 143 कोल ब्लॉक उन्हें देने का फैसला किया। कोल ब्लॉक की निशानदेही पर सरकार का जो मामूली खर्च आया था, आबंटियों से केवल वही लेने का निर्णय किया गया। यह फैसला देश में सस्ती बिजली, इस्पात और सीमेंट उपलब्ध कराने की आड़ में लिया गया।

गड़बड़ी भांप कर वर्ष 2006 में एक विशेषज्ञ समिति ने कोयला खदानों के आबंटन की प्रक्रिया में सुधार के सुझाव दिए। सुझाव से जुड़ी फाइल कानून मंत्रालय के पास भेजी गई और बरसों वहां अटकी रही। इस बीच खुली नीलामी से कोल ब्लॉक बांटने के बजाय यूपीए सरकार मनमर्जी से अपने चहेतों को विशाल कोयला भंडार आबंटित करती रही। वर्ष 2009 तक यह धांधली चलती रही। इस दौरान कोयला मंत्रालय प्रधानमंत्री के पास भी रहा। शोर मचने पर सरकार ने वर्ष 2010 में माइन ऐंड मिनरल (डेवलपमेंट ऐंड रेगुलेशन) एक्ट, 1957 में संशोधन कर आबंटन की प्रक्रिया में सुधार किया। वर्ष 2004-09 के बीच सरकार ने एक सौ पचपन कोयला भंडारों की रेवड़ी बांटी जिनका लाभ लगभग सौ निजी कंपनियों को पहुंचा। मार्च 2012 में जब सीएजी रिपोर्ट से कोयले की लूट का भेद खुला तो हंगामा खड़ा हो गया। मामला सुप्रीम कोर्ट में गया। जांच शुरू हुई।

जांच और दस्तावेजों से जो तथ्य प्रकट हुए हैं उनसे पता चलता है कि इस घोटाले में कांग्रेस के कई दिग्गज नेता लिप्त हैं। वर्ष 2004 से लेकर 2009 के बीच जब आंख मूंदकर कोयला भंडार बांटे गए तब कोयला मंत्रालय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के पास था। ऐसे में शक की सुई उनकी ओर घूमना स्वाभाविक है। दस्तावेज तो कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उनके राजनीतिक सचिव अहमद पटेल के खिलाफ भी चुगली खाते हैं। घोटाले में मनमोहन सिंह सरकार के सूचना और प्रसारण मंत्री और पर्यटन मंत्री का नाम तो काफी पहले सार्वजनिक हो चुका है।

उद्योगपति और हरियाणा से कांग्रेस के सांसद नवीन जिंदल की कंपनी के खिलाफ सीबीआइ आरोपपत्र दाखिल कर चुकी है। एक और कांग्रेसी सांसद विजय दर्डा और उनके भाई राजेंद्र दर्डा, जो महाराष्ट्र की कांग्रेस सरकार में शिक्षा मंत्री हैं, की कारगुजारी का भी पर्दाफाश हो चुका है। इन नामों के अलावा और भी कई अन्य लोग और बड़ी कंपनियां कोयले की लूट में शामिल हैं। कांग्रेस के साथ-साथ अन्य पार्टियों के कई राजनीतिकों के नाम भी जनता के सामने आ चुके हैं।

सर्वोच्च अदालत की निगरानी में चल रही जांच को पटरी से उतारने के लिए यूपीए सरकार कितनी बेताब थी, इसका पता तो जनता को काफी पहले लग चुका है। जांच की प्रगति से जुड़े सीबीआइ के हलफनामे में तब के कानून मंत्री अश्वनी कुमार और प्रधानमंत्री और कोयला मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों ने संशोधन कर उच्चतम न्यायालय को गुमराह करने का प्रयास किया था। हल्ला मचने पर अश्वनी कुमार को कानून मंत्री का पद छोड़ना पड़ा था।

फिर घोटाले से जुड़ी फाइलें गायब होने की जानकारी सार्वजनिक हुई। इस रहस्य पर सरकार तीन माह से परदा डाले रही, जबकि पुराने रिकॉर्ड रखने के जिम्मेदार कोयला मंत्रालय के विभाग ने पत्र लिख कर सरकार को फाइलें न मिलने की सूचना दे दी थी। बचाव में तर्क दिया जा रहा है कि कोयला मंत्रालय में फाइल न मिलने से जांच पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ेगा। सीबीआइ चाहे तो सीएजी से फाइल ले सकती है क्योंकि उसने फाइलों के आधार पर ही घोटाले का भंडाफोड़ किया था।

यह तर्क लचर था। जरूरी नहीं कि सीएजी के पास पूरे दस्तावेज हों। कोयला भंडार आबंटन के दौरान किसी मंत्री, सचिव या अन्य अधिकारी ने जो टिप्पणी की, वे सब सीएजी के पास मौजूद फाइलों में होना जरूरी नहीं है। कितनी कंपनियों ने आवेदन किया, किस कंपनी की अर्जी क्यों खारिज हुई और किसकी क्यों मंजूर हुई, इसका पता कोयला मंत्रालय की फाइलों से ही चल सकता है। किस कंपनी ने झूठ बोल कर या किसी बड़े नेता की सिफारिश पर कोयला भंडार पाया है, यह रहस्य भी मंत्रालय के कागजात खंगालने से खुल सकता है। अदालत में अपराध सिद्ध करने के लिए पुख्ता सबूत जरूरी होते हैं।

इस घोटाले में कई बड़े लोग और प्रभावशाली उद्योग शामिल हैं। अपने बचाव में वे नामी वकीलों की फौज खड़ी कर सकते हैं। सारे प्रमाण होने के बावजूद उन्हें दोषी ठहराना कठिन है। फाइल गायब होने की घटना से तो लगा कि केस कमजोर करने की पूरी तैयारी हो चुकी है। जब सीबीआइ ने बिरला के खिलाफ मामला वापस लेने की अर्जी अदालत में दी तो इस बात की पुष्टि हो गई। युद्ध का पुराना नियम है कि हारने वाली सेना मैदान खाली करने से पहले सब कुछ बर्बाद कर देती है, फसल जला देती है, कुओं में जहर घोल देती है, घरों में आग लगा देती है। क्या कुछ ऐसा ही हुआ है और हो रहा है?
अभी तक सर्वोच्च न्यायालय आबंटन रद्द करने के मुद्दे पर किसी नतीजे पर नहीं पहुंचा है। मामले की सुनवाई जारी है। अदालत ने सरकार से अपना रुख स्पष्ट करने के लिए हलफनामा मांगा है। शीघ्र सुनवाई होगी। देखना यह है कि अदालत द्वारा गैर-कानूनी घोषित किए जा चुके आबंटन रद््द होने से कैसे बच पाते हैं।

 

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