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पूंजीवादी विकास का चरित्र

अरुण माहेश्वरी उबर कांड ने दिल्ली के सत्ता के गलियारों तक में एक भारी हलचल पैदा की है। सारी दुनिया में अभी इस कंपनी का शोर है। मात्र चार साल पहले सैन फ्रांसिस्को में यात्रियों को बड़ी और आलीशान गाड़ियों की सुविधा आसानी से मुहैया कराने के उद््देश्य से बनाई गई इस कंपनी ने देखते […]

Author December 14, 2014 1:04 PM

अरुण माहेश्वरी

उबर कांड ने दिल्ली के सत्ता के गलियारों तक में एक भारी हलचल पैदा की है। सारी दुनिया में अभी इस कंपनी का शोर है। मात्र चार साल पहले सैन फ्रांसिस्को में यात्रियों को बड़ी और आलीशान गाड़ियों की सुविधा आसानी से मुहैया कराने के उद््देश्य से बनाई गई इस कंपनी ने देखते ही देखते सारी दुनिया के पूरे टैक्सी बाजार पर अपना प्रभुत्व कायम कर लेने का आतंक पैदा कर दिया है। अब तक पचास देशों के दो सौ तीस शहरों में इसने अपने पैर पसार लिए हैं और हर हफ्ते इसके दायरे में एक नया शहर आता जा रहा है। चार साल पहले की इस मामूली कंपनी की आज बाजार कीमत चालीस अरब डॉलर कूती जा रही है।

उबर और ऐसी ही सिलिकन वैली की दूसरी तमाम कंपनियों के इस विश्व-प्रभुत्व अभियान ने दुनिया में प्रतिद्वंद्विता बनाम इजारेदारी की पुरानी बहस को फिर एक बार नए सिरे से खड़ा कर दिया है। दिल्ली की सत्ता के गलियारों में गृह मंत्रालय और परिवहन मंत्री के परस्पर-विरोधी बयानों में भी कहीं न कहीं, सूक्ष्म रूप से ही क्यों न हो, उसी वैचारिक द्वंद्व की गूंज सुनाई देती है।

व्यापार और वाणिज्य की दुनिया में यह एक अनोखे प्रकार का घटनाक्रम है। मार्क्स ने पूंजीवाद के तहत पूंजी के संकेंद्रण को पूंजीवाद की नैसर्गिकता बताया था। सामान्य तौर पर मार्क्स के उस कथन की ‘बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है’ की तरह के मत्स्य-न्याय से तुलना की जाती रही है। इसके मूल में संकेंद्रण की प्रक्रिया को दर्शाने वाला मार्क्स का यह कथन था कि संपत्तिहरणकारियों का संपत्तिहरण होता है। लेकिन आज जिस प्रकार कुकुरमुत्तों की तरह विश्व-इजारेदारी कायम करने वाली ढेर सारी कंपनियों का कोलाहल सुनाई दे रहा है, इस प्रकार के नए परिदृश्य का इससे कोई भान नहीं होता था। इस लिहाज से यह एक बिल्कुल नई परिघटना प्रतीत होती है- जिसे आज के अर्थशास्त्री ‘नेटवर्किंग एफेक्ट’ (इंटरनेट की संतानें) बताते हैं। इंटरनेट के ताने-बाने से उत्पन्न एक नई सामाजिक परिघटना। इसी की रोशनी में इजारेदारी बनाम प्रतिद्वंद्विता की बहस ने भी आज एक नया आयाम ले लिया है।

पूंजीवादी अर्थशास्त्री आज तक प्रतिद्वंद्विता को पूंजीवाद की सबसे बड़ी आंतरिक शक्ति, उसकी आत्मा बताते रहे हैं: पूंजीवाद के निरंतर विकास और उसकी सामाजिक प्रासंगिकता का तथाकथित प्रमुख स्रोत; बाजार का मूल तत्त्व। इसके बरक्स पूंजीवाद के पैरोकार इजारेदारी को हमेशा एक सामाजिक बुराई, एक विचलन के तौर पर देखते हैं, जो उनके अनुसार पूंजीवाद की आंतरिक गतिशीलता का, उसकी आत्मा का हनन करती है और व्यापक समाज का भी अहित करती है। अमेरिका सहित सभी विकसित पूंजीवादी देशों के संविधान में इजारेदारी को रोकने के कानूनी प्रावधान हैं और गाहे-बगाहे इन प्रावधानों का अक्सर प्रयोग भी किया जाता रहा है। भारत में भी उन्हीं की तर्ज पर बदस्तूर एमआरटीपी एक्ट बना हुआ है।

अमेरिकी इतिहास में ऐसे कई मौके आए हैं जब राज्य की ओर से सीधे हस्तक्षेप करके आर्थिक इजारेदारियों को तोड़ने के कदम उठाए गए। अमेरिकी राष्ट्रपति थियोडोर रूजवेल्ट को तो इतिहास में ‘ट्रस्ट बस्टर’ अर्थात ‘इजारेदारी भंजक’ की ख्याति प्राप्त है, जिन्होंने 1901-1909 के अपने शासनकाल में चौवालीस अमेरिकी इजारेदार कंपनियों को भंग किया था। अमेरिका में सबसे पहला इजारेदारी-विरोधी कानून शरमन एंटी ट्रस्ट एक्ट 1850 में बना था। उसके बाद क्लेटन एंटी ट्रस्ट एक्ट और फेडरल ट्रेड कमीशन एक्ट (1914), रॉबिन्सन-पैटमैन एक्ट (1936) तथा सेलर-केफोवर एक्ट (1850) आदि कई कानून बने। अमेरिका में कंपनियों की इजारेदाराना हरकतों को लेकर हमेशा अदालतों में कोई न कोई मुकदमा चलता ही रहता है।

मगर आज वेंचर कैपिटल के सहयोग से कुकुरमुत्तों की तरह अमेरिकी गराजों से विश्व-विजय पर निकलने वाली इन नए प्रकार की इजारेदाराना कंपनियों के सिलसिले में यह सवाल उठाया जा रहा है कि क्या सचमुच इजारेदारी पूंजीवाद की आंतरिक ऊर्जा को सोखती है और समाज का अहित करती है? आज की दुनिया की सबसे बड़ी मानी जाने वाली कंपनियां माइक्रोसॉफ्ट, गूगल, एपल, फेसबुक आदि सब रास्ते के छोकरों का ऐसा करिश्मा है जिसकी पहले कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। और आज इन कंपनियों की स्थिति यह है कि इनसे एक स्तर पर सारी दुनिया की सरकारों के खौफजदा होने पर भी, कोई इनसे आसानी से किनारा करने के लिए तैयार नहीं है। सबके लिए ‘न निगलते बने न उगलते बने’ वाली स्थिति बनी हुई है।

खुद अमेरिका में यही हाल है। पिछले दिनों अमेरिकी अदालतों में माइक्रोसॉफ्ट, गूगल आदि को लेकर जितने भी मुकदमे चले, उन सब में न्यायाधीशों ने इन कंपनियों के बारे में कोई साफ राय देने में अपने को लगभग असमर्थ पाया है। इन पर रोक, या इन्हें भंग करने के बजाय अधिकतर फैसले इन्हें आगे एहतियात बरत कर चलने की हिदायत देने तक सीमित रहे हैं। इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है गूगल पर इजारेदारी कायम करने के लिए चलाए गए मुकदमे का परिणाम। इसमें गूगल को सिर्फ डांट पिला कर छोड़ दिया गया। जानकारों का कहना है कि उससे गूगल के काम करने के ढंग में रत्ती भर फर्क नहीं आया है।

सारी दुनिया में इंटरनेट और मोबाइल के जरिए भुगतान करने की सुविधा उपलब्ध कराने वाली कंपनी पे पॉल के संस्थापक पीटर थियेल की अभी इसी सितंबर महीने में किताब आई है- जीरो टु वन (नोट्स आॅन स्टार्ट्स अप आॅर हाउ टु बिल्ड द फ्यूचर)। थियेल ही हैं जिन्होंने जुकरबर्ग के फेसबुक में सबसे पहले निवेश किया था। अपनी इस किताब में थियेल ने प्रतिद्वंद्विता के प्रति सामान्य तौर पर अर्थशास्त्रियों और सरकारों के अति-आग्रह को लताड़ते हुए कहा कि यह सोच कि प्रतिद्वंद्विता से ग्राहक को लाभ होता है, इतिहास के कूड़े पर फेंक देने लायक सोच है।

आज सिलिकन वैली की गूगल, माइक्रोसॉफ्ट की तरह की तमाम कंपनियों के बीच भी कभी-कभी प्रतिद्वंद्विता के जो चिह्न दिखाई देते हैं, वे बेहद कमजोर चिह्न हैं। सचाई यह है कि सिलिकन वैली की तमाम कंपनियां उन क्षेत्रों से अपने को धीरे-धीरे हटा लेती हैं, जिन क्षेत्रों में एक कंपनी ने बढ़त हासिल कर ली है। और जो दूसरे उपेक्षित क्षेत्र, जिनकी ओर अभी दूसरों का ध्यान नहीं गया है, उन पर अपने को केंद्रित करती है। विश्व-विजय में उतर रहे उबर की तरह के नए रणबांकुरे भी अभी किसी क्षेत्र में सीधे ताल ठोंक कर किसी पहले से स्थापित कंपनी से प्रतिद्वंद्विता के लिए काम नहीं कर रहे हैं। इस मामले में उनकी दृष्टि हमारे ‘एक और ब्रह्मांड’ के नायक राधेश्याम जैसी ही है, जिसने स्थापित ब्रांडों से टकराते हुए अपना ब्रांड बनाने के बजाय किसी निर्जन या उजड़े हुए पथ पर ही अपनी बांसुरी की तान छेड़ना श्रेयस्कर समझा। प्रसाधन के आधुनिक क्षेत्र के बजाय पुरातन, आयुर्वेद के क्षेत्र का चयन किया। …आज की लकदक पैकिंग में आयुर्वेदिक उत्पाद- रॉक की थाप पर ‘रघुपति राघव राजा राम’- आधुनिकता की प्रक्रिया में पूर्व-आधुनिक सम्मोहन की छौंक का उत्तर-आधुनिक सौंदर्यशास्त्र …पुरातन के इंद्रजाल पर टिका एक सर्वाधुनिक रास्ता।

फेसबुक को देखिए। छात्रों के एक समूह के बीच आपसी संपर्कों के उद््देश्य से तैयार की गई सोशल नेटवर्किंग साइट रातोंरात सारी दुनिया में अरबों लोगों के बीच संपर्कों की साइट बन गई। यह एक खास सामाजिक परिस्थिति की उपज भी है। जब तक व्यापक पैमाने पर लोगों के हाथ में मोबाइल फोन या टैबलेट, कंप्यूटर न हो, तब तक इस प्रकार के पूरे संजाल और उस पर आधारित इन नई इजारेदारियों की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
बहरहाल, तेजी के साथ कुकुरमुत्तों की तरह पनप रही नाना प्रकार की इजारेदारियों और तमाम सामाजिक संबंधों में आने वाले भूचाल को देखते हुए पिटर थियेल जिस साफगोई के साथ पूंजीवाद के सच का बयान कर रहे हैं, उससे कम्युनिस्ट घोषणापत्र की उस बात की एक साफ झलक मिलती है जिसमें कहा गया था कि ‘जो कुछ भी ठोस है वह हवा में उड़ जाता है, जो कुछ पावन है वह भ्रष्ट हो जाता है, और आखिरकार मनुष्य संजीदा नजर से जीवन के वास्तविक हालात को, मानव मानव के आपसी संबंधों को देखने के लिए मजबूर हो जाता है।’ थियेल जिस संजीदगी से जीवन की मौजूदा वास्तविक स्थिति को देख पा रहे हैं, वह पारंपरिक अर्थशास्त्रियों की दृष्टि पर छाए हुए कोरे भ्रमों से पूरी तरह मुक्त है। थियेल साफ कहते हैं कि ‘प्रतिद्वंद्विता को अमेरिकी एक मिथक बना दे रहे हैं और इस बात का श्रेय लेते है कि वे इसके जरिये समाजवाद से रक्षा कर रहे हैं। सच यह है कि पूंजीवाद और प्रतिद्वंद्विता दो विरोधी चीजें हैं।

पूंजीवाद पूंजी के संचय पर टिका हुआ है, लेकिन वास्तविक प्रतिद्वंद्विता की परिस्थिति में तो सारा मुनाफा प्रतिद्वंद्विता की भेंट चढ़ जाएगा।’ थियेल साफ कहते है ंकि पेटेंट देने के काम के जरिये सरकार का एक विभाग भी तो इजारेदारी कायम करने के काम में ही लगा हुआ है।
‘इकोनोमिस्ट’ पत्रिका के एक ताजा अंक में, इजारेदारियों से आच्छादित इस पूरे आर्थिक परिदृश्य के वृत्तांत के अंत में अमेरिकी सीनेटर जॉन सरमैन के इस कथन को उद्धृत किया गया है कि ‘हमें उत्पादन, परिवहन और जीवन की जरूरत की किसी भी चीज के विपणन के लिए शहंशाह की कामना नहीं करनी चाहिए, भले वे हमारे लिए चीजों को कितना भी आसान क्यों न बनाते हों।’ इस प्रकार, सरमैन अब भी, वही पुराना पूंजीवाद और प्रतिद्वंद्विता, पूंजीवाद और जनतंत्र तथा पूंजीवाद और बहुलतावाद वाला राग ही अलाप रहे हैं, जबकि जो सच सामने आ रहा है वह इन सबके सर्वथा विपरीत है।

पूंजीवाद की नैसर्गिकता प्रतिद्वंद्विता में नहीं, जनतंत्र में नहीं और न ही बहुलतावाद में है। पूंजीवाद का अंतर्निहित सच है इजारेदारी, तानाशाही और एकरूपता। इसीलिए यह सभ्यता के सच्चे जनतंत्रीकरण के रास्ते की एक पहाड़ समान बाधा है, और इसीलिए, यह आश्चर्य की बात नहीं कि अमेरिका के खास हलकों में चीन का शासनतंत्र आजकल काफी चर्चा में है! दिल्ली की सत्ता के गलियारे में भी उबर पर पाबंदी के फौरन बाद उतनी ही जोरदार आवाज में इस कदम के पीछे विवेक की कमी की आवाज का उठना भी अस्वाभाविक नहीं है। पूंजीवादी विकास का रास्ता इजारेदारियों के जरिये ही आगे बढ़ सकता है।

 

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