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बापू की निशानियों की नीलामी क्यों

गिरिराज किशोर जनसत्ता 2 अक्तूबर, 2014: अप्रैल 2012 के बाद से मैं इस बात के लिए परेशान हूं कि गांधी की स्मृतियों से जुड़ी वस्तुएं विदेशों में नीलाम होना कब बंद होंगी? अप्रैल 2012 में अखबारों में पढ़ा कि तीस जनवरी 1948 को प्रार्थना सभा में जाते समय जब गांधीजी को गोली मारी गई थी […]

Author October 2, 2014 11:31 AM

गिरिराज किशोर

जनसत्ता 2 अक्तूबर, 2014: अप्रैल 2012 के बाद से मैं इस बात के लिए परेशान हूं कि गांधी की स्मृतियों से जुड़ी वस्तुएं विदेशों में नीलाम होना कब बंद होंगी? अप्रैल 2012 में अखबारों में पढ़ा कि तीस जनवरी 1948 को प्रार्थना सभा में जाते समय जब गांधीजी को गोली मारी गई थी तो उनके रक्त की कुछ बूंदें बिड़ला भवन की घास पर गिरी थीं। वहां पर मौजूद सेना के एक अफसर नंबियार ने खून में सनी मिट्टी और घास उठा ली थी। नीलाम होने वाली चीजों में वह मिट्टी भी थी। मेरे दिमाग में यही सवाल आया कि गांधी समेत अन्य शहीदों ने अपने प्राण क्या इसीलिए न्योछावर किए थे कि उनसे संबंधित वस्तुएं अपने देश में संग्रहीत न होकर विदेशों में नीलाम होती फिरें।

जब मैंने अखबार में पढ़ा कि सत्रह अप्रैल 2012 को गांधीजी के रक्त से सनी घास, चश्मा, पत्र आदि लंदन में किसी नीलामी-कंपनी द्वारा नीलाम किए जा रहे हैं तो मैंने 5-4-12 को तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पत्र लिखा कि अगर बापू के रक्त-बिंदु इस तरह लंदन की हाट में नीलाम हुए तो मुझे लगता है, 2007 में राष्ट्रपतिजी द्वारा प्रदत्त पद््मश्री वापस करने के लिए बाध्य होना पड़ेगा। यह भी निवेदन किया कि इस दुर्भाग्यपूर्ण कृत्य को तत्काल रोकें। पीएमओ से उस पत्र की पावती भी नहीं आई।

प्रधानमंत्री कार्यालय की उपेक्षा से दुखी होकर 11.4.12 को तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील को पत्र लिखा कि नीलामी में छह दिन बचे हैं, सरकार से कोई संकेत नहीं कि बापू से संबंधित स्मृति चिह्नों की नीलामी रोकने के लिए कोई प्रभावी कदम उठाया जा रहा है या नहीं। उनका ध्यान संविधान की धारा 51 क (ख) और (झ) की ओर आकर्षित किया, जिसके अनुसार राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ी वस्तुओं को सहेजना सबकी जिम्मेदारी है। गांधीजी राष्ट्रीय आंदोलन के सर्वोच्च प्रतीकों में हैं। अंत में यह निवेदन किया था कि नीलाम होने की स्थिति में पद््मश्री वापस करने के लिए अप्रैल 2012 में कोई समय प्रदान करें।

दुख है कि वहां पर भी मेरा निवेदन खलाओं में खो गया। 21.5.12 को पुन: राष्ट्रपति को लिखा कि सरकार की उपेक्षा के चलते सत्रह अप्रैल को गांधीजी के स्मृति-चिह्न नीलाम कर दिए गए। यह सौभाग्य की बात है कि भारत सरकार के पूर्व मंत्री कमल मोरारका ने उन्हें खरीद कर देश का सम्मान बचा लिया। पुन: निवेदन किया कि पद्म सम्मान वापस लेकर मुझे पाप-भाव से मुक्त करें। गांधीजी के रक्त का विदेशों में असम्मान हो, मैं सम्मानित होकर घर में बैठा रहूं! समय न दें सकें तो आप राष्ट्रपति भवन के किसी दूत के द्वारा पद्म सम्मान वापस लेने की कृपा करें।
उत्तर न प्राप्त होने पर फैक्स भेजा, जिसमें लिखा कि चूंकि नीलामी के संदर्भ में भारत सरकार की निष्क्रिय दृष्टि बनी हुई है इसलिए मेरे सामने पद्मश्री लौटाने के सिवाय कोई रास्ता नहीं बचा। अत: समय देने या अपने प्रतिनिधि द्वारा वापस लेने की कृपा करें जिससे इस दंश से मुक्त हो सकूं। जब कोई उत्तर नहीं आया तो मैं समझ गया कि सरकार और राष्ट्रपति भवन उस गांधी के प्रति भावना खो चुके हैं, जिसके जन्मदिन को विश्व पंचायत ने अहिंसा दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की थी।

मेरे सब निवेदनों की अनदेखी कर, 21-5-12 के पत्र के संदर्भ में, सात जून को राष्ट्रपति के संयुक्त सचिव ने गृह मंत्रालय के संयुक्त सचिव को पत्र लिखा कि आप इस संदर्भ में डॉ गिरिराज किशोर से संपर्क करें। विदेश मंत्रालय से भी रिपोर्ट मांगी गई है। आश्चर्य है कि राष्ट्रपति के आदेश का गृह मंत्रालय ने शायद कोई संज्ञान नहीं लिया, मुझसे किसी स्तर पर गृह मंत्रालय ने कोई संपर्क नहीं किया।

दस जुलाई, 2012 को गांधी-कैलनबैक के पत्रों को, सुथबी, लंदन द्वारा पुन: नीलाम करने की सूचना छपी थी। प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति महोदय के सरोकारों को मैं समझ चुका था, इसलिए इस बार मैंने यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी को लिखने का मन बनाया। मैं हर दरवाजा खटखटा लेना चाहता था। चौदह जून, 2012 को मैंने सोनियाजी को लिखा कि गांधी-कैलनबैक के पत्र बहुत महत्त्वपूर्ण हैं, क्योंकि उनमें दक्षिण अफ्रीका में भारतीय मजदूरों के लिए किए गए संघर्ष के संदर्भ होंगे। गांधीजी के टाल्सटाय फॉर्म के लिए कैलनबैक ने ही जमीन दी थी। प्रो रामचंद्र गुहा ने इन पत्रों का परीक्षण किया है। मैंने उनको भी पद््म सम्मान लौटाने की बात लिखी थी। उन्हें यह भी सुझाव दिया कि इस तरह की भारतीय संपदा को नीलाम होने से रोकने के लिए कानून बनाया जाना चाहिए।

लंदन में जिस दिन गांधी-कैलनबैक के पत्रों की नीलामी होनी था, उसी तारीख को लिखा गया सोनियाजी का व्यक्तिगत पत्र मुझे मिला, जिसमें उन्होंने मुझे सूचित किया था कि आपकी भावनाओं का सम्मान करती हूं; संस्कृति मंत्रालय के हस्तक्षेप से गांधी-कैलनबैक के पत्रों को भारत वापस लाया जा रहा है, वे नीलाम नहीं होंगे। साथ ही उन्होंने लिखा कि संस्कृति मंत्रालय इस तरह की नीलामी के संबंध में नीति बना रहा है। उनके इस पत्र से मुझे संतोष हुआ कि सोनियाजी ने रुचि ली और इस महत्त्वपूर्ण पत्राचार की नीलामी रुकवा कर मुझे सूचित किया। जनार्दन द्विवेदी ने भी इसमें रुचि ली थी, उनका पत्र भी आया।

दिसंबर 2012 में गांधीजी के दो पत्रों की नीलामी का समाचार फिर छपा। मैंने पुन: सोनियाजी को पत्र लिख कर यह बात उनके संज्ञान में ला दी। उनका जवाब नहीं आया न यह पता चला कि संस्कृति मंत्रालय ने कोई कार्रवाई की या नहीं। वहां से प्रत्युत्तर न मिलने पर माननीय राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को लिखा कि आपका हस्तक्षेप अपेक्षित है। इससे पहले संस्कृति मंत्री सुश्री कटोच को भी लिख चुका था। मेरे लिए संकट की स्थिति थी। मैं राष्ट्रपति द्वारा दिया गया सम्मान (पद्मश्री) सड़क पर नहीं फेंक सकता था। कानपुर के तत्कालीन जिला अधिकारी के माध्यम से वापस करने का प्रयत्न भी कर चुका था। उनका कहना था कि बिना आदेश के मैं आपका पद्म सम्मान स्वीकार नहीं कर सकता।

गांधी शांति प्रतिष्ठान की अध्यक्ष के माध्यम से इस मुद्दे पर विचार के लिए गांधी समर्थकों और विद्वानों की एक बैठक दिल्ली कार्यालय में आयोजित की गई। उसमें तारा गांधी भट्टाचार्य भी सम्मिलित हुर्इं। पर कोई नतीजा नहीं निकला। ताराजी का मत था कि बापू तो सारे संसार के हैं। मैंने समझाना चाहा कि यह खरीद-फरोख्त है, सम्मान नहीं। नई सरकार आने पर मैंने पूरी स्थिति स्पष्ट करते हुए, उपरोक्त पत्रव्यवहार की प्रतियों को पुस्तक रूप में संलग्न करके, 21 जुलाई, 2014 का पत्र वर्तमान प्रधानमंत्री को यह सोच कर भेजा कि वे गांधीजी की इस उपेक्षा का संज्ञान लेंगे।
प्रधानमंत्री को भेजे इस पत्र में मैंने लिखा था: ‘‘… मैं इस बात को लेकर अत्यधिक त्रस्त रहा हं कि संसार के किसी राष्ट्र के नायक के स्मृति-शेषों को विदेशी हाट में इस तरह नीलाम नहीं किया जाता जिस तरह महात्मा गांधी से जुड़े हुए स्मृति-चिह्न और पत्र आदि लंदन में निरंतर नीलाम होते रहते हैं। जब चीन के माओ या अमेरिका के जॉर्ज वाशिंगटन या चर्चिल के स्मृति चिह्न और पत्र विदेशों में इस तरह नीलाम नहीं होते फिर गांधी ही को क्यों हमने बाजार में बिकने के लिए छोड़ा हुआ है? कम से कम मेरे लिए यह सवाल तकलीफदेह है।

‘‘मैंने यूपीए सरकार के जमाने में हर स्तर पर गांधीजी के स्मृति चिह्नों और पत्राचार आदि को विदेशों में नीलाम करने की प्रक्रिया को रोकने के लिए लिखा। मेरे लिए आश्चर्य की बात है कि सरकार क्या केवल इसलिए सरकार होती है कि सत्ता उसके पास है, उसके लिए राष्ट्र और मानव मूल्यों का कोई महत्त्व नहीं रहता।…

‘‘अगर हमारी सरकार या गांधी प्रतिष्ठान स्मृति-चिह्न उपहारस्वरूप भेजें तो सम्मान की बात होगी। बाजार में नीलाम करना उस महामानव का अपमान ही नहीं, बाजारवाद का विकृत रूप है। मुझे कई बार लगता है कि गांधीजी को अंतरराष्ट्रीय बाजार ने ब्रांड बना दिया इसलिए उनके नाम पर बहुत-सा जाली सामान भी बिक सकता है। बापू की व्यक्तिगत सामग्री बहुत कम थी। जहां तक मुझे स्मरण है उनके तीन बार चश्मे नीलाम हो चुके हैं। संभवत: तीसरे दशक में उनका एपेन्डिक्स का ऑपरेशन हुआ था उस समय की अस्पताल में इस्तेमाल हुई दो चादरें पिछले साल नीलाम हुई थीं। मेरी समझ में नहीं आया कि उन चादरों को किसने प्रमाणित किया होगा कि ये गांधी के नीचे बिछीं थीं। तब के डॉक्टर भी नहीं रहे होंगे।

इस बारे में मैंने तत्कालीन संस्कृतिमंत्री और सोनियाजी को भी लिखा था। सब जगह से निरुत्तर रहा। कुछ महीने पहले दो पारिवारिक पत्र नीलाम हुए, हरिलाल से बापू ने कुछ उनकी व्यक्तिगत बातें पूछीं थीं। मैं नहीं समझता ऐसे पत्रों को हाट पर नीलाम किया जाना चाहिए उनका स्थान तो देश के आर्काइव्ज में है। उस पर भी मैंने आपत्ति की थी।…

‘‘आप सरदार वल्लभ भाई पटेल की दुनिया में सबसे ऊंची प्रतिमा स्थापित करा रहे हैं यह प्रसन्नता की बात है। सरदार, नेहरू, जयप्रकाशजी, कृपलानीजी, मुंशीजी आदि के वास्तुकार महात्मा थे। मेरा निवेदन है कि गांधीजी को विदेशी बाजार में नीलाम होने की बेहुर्मती से बचाइए। …मैं और देश आभारी होंगे यदि आप गांधीजी के स्मृति-शेष और पत्रों की नीलामी रुकवाने की कृपा करें। पिछली बार बहुत-सी ऐतिहासिक और कीमती वस्तुएं लंदन में नीलाम हुई हैं। देश को अपनी स्मृतियों को इस तरह न खोने न दीजिए।’’

मुझे खेद है कि मोदीजी जैसे उत्साही और बार-बार गुजरात का उल्लेख करने वाले प्रधानमंत्री ने, गुजरात के महान पुत्र गांधीजी के बारे में लिखे गए पत्र का भी संज्ञान नहीं लिया। मैं जानता हूं कि गांधीजी के प्रति आरएसएस का उपेक्षा-भाव रहा है। पर इस विश्व-अभिनंदित व्यक्ति की उपेक्षा से कांग्रेस तक आज संकट का सामना कर रही है। मुझे लगता है कि सरकारें कुछ नहीं करेंगी। गांधी विचार सरकारों की नीतियों के साथ नहीं जाता। जन ही गांधी के पीछे फिर खड़ा होगा, जब वह समझ लेगा कि दक्षिणवाद, वामपंथ और मध्य-वाद कोई काम नहीं आएगा, गांधी की तरफ लौटना पड़ेगा। वे ही जमीनी हकीकत को जानते थी, वहीं से उनका चिंतन विकसित हुआ है।

 

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